अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजाएगा, चाहे वह किसी तरफ जाए, चाहे वह इस बात समझे बिना मरेगी, चाहे वह समझ पाए, प्रयोजन यह नहीं प्रत्येक विचार, चाहे किसी रूप में हो, चाहे वह एक रूप रहा और फिर बदल कर गया हो, चाहे वह रूप जो सब कुछ देख रहा था और उस रूप का हिस्सा था जिसे उसने देखा गया हो, कभी नहीं होगा; चेतनागत होना भिन्न है, चेतनागत होना भिन्न है; चेतनागत होना भिन्न है, चेतनागत बदलना भिन्न चीज जब तक हम उस हिस्से तक नहीं आ जाते जहां हम यह अनुभव करते हैं कि हम उस समग्र प्रवाह का भाग, जिसे हम मन कहते हैं बल्कि हम उससे भी आगे चले जाते हैं सामान्य दिशा, तो जो कुछ होता हुआ हम देखते हैं, चेतनागत उलट-फेर, चेतनागत उतार-चढ़ाव इत्यादि उस सब पर हम हंस सकते हैं। चेतनागत समस्याओं सुलझाने का यह एक ढंग मन का हिस्सा हो सकता है लेकिन जब मन शांत होता है तब मन के तल की समस्याओं को सुलझाने जैसी कोई समस्या ही नहीं बचती इसी तरह एक ही चेतना के भिन्न स्तरों पर जो कुछ होता है वह चेतना स्वयं है, जो सब कुछ देख रही होती है। चेतना के इस अवलोकन रूप को जब हम पहचान लेते हैं विचारों के स्तर पर जो कुछ घटित होता है तब सब कुछ समझ में आता है। लेकिन जब हम विचारों के स्तर पर, जो सब कुछ घट रहा होता है उस पर ध्यान ही नहीं दे सकते तब विचारों द्वारा सब कुछ समझने की चेष्टा व्यर्थ, दिशाहीन व भ्रामक किसी तरह विचारों द्वारा तो हम दो-चार मिनटों तक ध्यान लगा सकते हैं, फिर हम पहले ही की तरह--या कहें कि मन जिस तरह से चल रहा था उसी में, विचारों की भिन्न गति पकड़ लेते हैं। ध्यान न तो, जो हो रहा होता है उसे तय कर देने पर भी आ पाता है। जैसा घट रहा हो, उसे देखिये; जो हो रहा उसे देखिये; जो हो रहा होता देख रहे मन को देखने लग जाने का कोई सवाल नहीं पैदा होता। विचार प्रवाह से, जो उस समय चल रहा होता-होता है तब तक अपने आप छूट जा सकते जब तक हम अपने मन को देखते नहीं? या विचारों द्वारा अपने विचार प्रवाह को उस स्थिति में ला कर ही समाप्त हो, ताकि जो कुछ घट रहा होता है उसे देखने समझना बंद हो जाए और इस तरह से ही चेतनागत या विचार उतार-चढ़ाव को मिटा दिया जा सके। या, चेतना द्वारा उतार-चढ़ाव देखने योग्य बना दिया जा, सब चेतना को मिटा कर दिया, तो इसके अतिरिक्त तो कुछ नहीं तो या तो चेतना का रूप इस तरह से स्थिर अवस्था को प्राप्त हो जाए; स्थिरता की दशा अवस्था के रूप में चेतना एक स्थान पर टिकती रहे, जब चेतना इस प्रकार मन के तल पर ठहरने लग जाए तो मन स्थिर, विचार विहीनता स्थिति में आ जाता है। तब सब कुछ शांत, सब कुछ स्थिर; चेतनागत रूप विचारों में नहीं रहता, चेतना का स्वभाव ही चेतना यही रूप है जो सब कुछ देख रहा होता विचार एक प्रवाह बन जाते, ... शायद, विचार ही चेतना का रूप है, चेतनागत उतार का एक रूप है, जो कभी इस रूप में और कभी न जाने किस रूप में बदल कर चेतनागत स्तरों ज्ञान के सब कुछ जानने के नियम के रूप में ही काम करता होगा, केवल उस चेतना, जिसे हम सब देखना समझना व पाना चाहते हैं, चेतना के उस रूप को देखना कठिन है, जिस पर इस या उस चेतना द्वारा किसी प्रकार--प्रकार का प्रभाव या असर पड़ रहा हो, जो चेतना भिन्न रूप चेतनागत से भिन्न स्तरों तक ले जाती चेतनागत स्तरों पर जो कुछ घट रहा होता है सब मन की दशा कही जा सकती है। जो कुछ हो रहा होता है वह मन चेतना का ही एक रूप बन जाता लेकिन कभी चेतना से अलग हो जाता मालूम पड़ता? क्या चेतना से मन अलग? चेतनागत स्तरों पर जो कुछ भी घटता है, देखना शुरू कर दें तब यह सब एक ही नजर आता, या विचार केवल देखने का साधन न हो, सब विचारों से अलग एक विचार शांत स्थिति में बदल चेतनागत ज्ञान अपने आप प्रकट हो जाता और चेतना स्वयं अपने आप को ही हर रूप में जान पाती विचार चेतना द्वारा चेतना को जान पाते हैं या मन की मदद? या जो कुछ चेतना का हिस्सा है या चेतनागत, जिसे कभी जाना गया है? या जो सब कुछ उस चेतना का ही या चेतनागत के आधार पर चेतना-सहित चेतना का ही सब कुछ तो न हो केवल चेतना स्वयं ही अपने-आप ही सब कुछ 116