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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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श्वेताम्बरसम्प्रदाय का समस्त साधु समुदाय इस काल्पनिक परम्परा अनुसार तीर्थंकर का उत्तराधिकारी बनकर विहार करता रहा और संघ को यह उपदेश भी देता रहा—हे भव्यजीवो, केवल ज्ञानादि तो नष्ट हो चुका मगर उसका अंश हमारे पास मौजूद है। साधु परम्परा से प्राप्त संघ का यह अंश ही भगवान् का अंश है। इसके दर्शन ही प्रभु दर्शन हैं। इसके कथन का पालन यह वह समय था जब संसार भारत का नाम तक नहीं जानता था। केवल इसी देश में संसार का वह प्रकाश जग रहा था। वह धर्म का प्रकाश जिसके कारण यह देश जगद्गुरु कहलाया था। उस समय जब भारत केवल अपनी सीमाओं में ही बंधा हुआ नहीं, बल्कि एशिया खण्ड तक फैला हुआ था तब यह नहीं था कि समस्त संसार में धर्म का नामोनिशान नहीं था। धर्म सदा समस्त भू मण्डल पर फैला हुआ था; पर भारत में, विशेषकर जैन धर्म की परम्परा में वह धर्म था जिसे हम, अहिंसात्मक धर्म कह सकते हैं। वह धर्म, जो हर प्राणी को जीने का समान ही अधिकार प्रदान करता था। संसार के अन्य भागों में फैला हुआ धर्म बलिप्रथा से युक्त था। भगवान् महावीर, बुद्ध ने इस बात का विरोध किया—‘अहिंसा परमो धर्म!’ धर्म हिंसा नहीं सिखाता। धर्म दया सिखाता है। जो धर्म का प्रचार करने निकल पड़े क्या वे? केवल इस देश में? उस देश में? श्वेताम्बरियों का दावा चाहे जो हो, तथ्य तो सामने है। जब मौर्य काल तक जैन धर्म का प्रसार देश में ही नहीं बल्कि उस समय ज्ञात अन्य देशों में फैला था। तब यह क्यों मान लिया जाए कि इसके बाद जब संघ का विघटन हुआ, तब श्वेताम्बर संघ, जो मध्य देश में ही सीमित होकर रह गया, अपने आपको ही सब कुछ मान ले और अन्य मुनियों का जो देश व अन्य देशों में धर्म प्रचार कर रहे थे? उस प्रचार को उन मुनियों को ही भूल जाए। दिगम्बर यह दावा नहीं करते, ... नहीं, यह उनका या संघ का दावा नहीं है--यह दावा आज खोज--खोज कर निकाल कर रखा गया है। भारत के बाहर बौद्ध मत का प्रचार गया व फैला, ... पर जो बौद्ध धर्म से भी पुराना है। भारत की सीमा के--इन पार देशों मिस्र--तक पहुँचा वह श्वेताम्बर नहीं, बल्कि जैन दिगम्बर मुनि परम्परा थी। इसका अर्थ यह है कि इस देश में बौद्ध धर्म का प्रचार होने के पहले ही जैन मुनि जो श्वेताम्बर नहीं थे जैन धर्म को दूर देशों तक ले जा चुके थे। यह भी कहा जा सकता है कि केवल मध्य देश ही नहीं, बल्कि उस समय सारे भारतवर्ष में जहाँ पर भी जैन थे, वे केवल वे जैन थे, जो दिगम्बर कहलाए। जब दिगम्बर जैन सारे भारतवर्ष में फैले हुए थे तो श्वेताम्बर ही; श्वेताम्बर ही सारे भारत के एकमात्र जैन कैसे कहलाए जाते। इस वास्तविक ऐतिहासिक तथ्य को झुठ--लाया नहीं जा सकता, जिसे आज दिगम्बरों द्वारा ही केवल प्रचारित नहीं किया जा रहा है। अन्य देशों के इतिहासकार तथा शोध कर्ता विभिन्न खोजों के माध्यम से इस बात को प्रमाणित कर रहे हैं। युरो--पीय विद्वानों का योगदान इस दिशा में अधिक है। उन्होंने अपने देश के इतिहास में कुछ ऐसे प्रमाण-चिह्न पाए जो इस बात को प्रमाणित करते हैं। यहाँ यह कहना आवश्यक हो जाता है; चाहे दिगम्बर का प्रसार अन्य देशों में कितना भी हुआ हो उसका इस बात से कोई सम्बन्ध नहीं है कि भारत में जैन धर्म, जो कि एक मात्र धर्म था, उस समय जब तक मौर्य काल समाप्त नहीं हुआ तब तक भारत के बाहर के देशों में तो बढ़ रहा था मगर भारत में ही उसकी जड़ें कट जाने की शुरुआत हो गई। श्वेताम्बर जो कुछ प्रचार करते; वह केवल स्वयं को प्रमाणित करने अथवा संतुष्ट करने हेतु? इसे यह बात भली भांति समझ लेनी चाहिए। इतिहास केवल श्वेताम्बर परम्परा का प्रचार नहीं करता। इतिहास साक्षी है दिगम्बर मुनि संघ की उस त्याग और तपस्या का जिसने कभी हार नहीं मानी। अनेक बार देश में धर्म को बचाने के लिए स्वयं अपने अस्तित्व को दांव पर लगा दिया। इतिहास साक्षी है उस समय का भी, जब दिगम्बर मुनि, संघ व धर्मरक्षक आचार्य कुन्द कुन्द हुए। यह वह समय था, जब श्वेताम्बर संघ अपने आप को आगे ले जाने का दावा कर रहा था मगर उस दावा करने वाले को उस बात का लेश मात्र ज्ञान न था कि वह दावा कितना खोखला है; जब कि मात्र १ या दो ही लोग उस सम्प्रदाय के पास ऐसे थे। 117