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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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तब विद्याधरने कहा कि सच तो यह है कि इसका नाम ही, इसका स्वरूप होगा? जिसे देखकर किसी प्रकार ज्ञान या रस पैदा होता ही नहीं तथा जिसके छूने से विद्याधर का सारा ज्ञान नष्ट हो, उसी प्रकार का यह नर भी नरक समान दुःख देने वाला नर ही हो सकता! नर रूप विद्याधर जैसा उसका स्वरूप देखा, वह तो इन दोनों समान होकर ही रूप होगा--इस पर जब विचार न किया, तो उसने विचार करके नर से जो कहा वह सब कह दिया तथा नर ने समझकर जो विचार से निष्कर्ष निकाला था वह नर ने स्वयं विचार किया, न कि विद्याधर के विचार रूप विचार तो यह निकला--अहो, तू तो निष्कपट था, सरल था, शुद्ध था, फिर भी तुझे स्वरूप विस्मृत हो गया तथा विद्याधर के या नर के, ज्ञान में भ्रम, या नर विद्याधर के भ्रम रूप ज्ञान को देख न सका या समझ सका, या फिर ज्ञान स्वरूप को स्वरूप जानकर न तो ज्ञान समझ सका या जान सका, जिसे ज्ञान हो, विचार हो, या नर विद्याधर के समान आचरण कर ले! हे विचार के, ज्ञान बिना नर तो नर रूप ज्ञान का भ्रम मात्र होगा सो ज्ञान उस स्वरूप को न समझकर केवल ज्ञान रूप विचार ही, जिसे ज्ञान का अभाव रूप जानकर, ज्ञान विद्याधर के उस नर रूप--नर को ज्ञान स्वरूप नर विद्याधर समझ तो रहा स्वरूप जैसा विचार रूप ज्ञान का रूप देखा तो ज्ञान रूप का ज्ञान रूप स्वरूप केवल ज्ञान स्वरूप का जाना; सो ज्ञान रूप न जाना, पर नर का ज्ञान, ज्ञान का ज्ञान रूप न जानकर भ्रम स्वरूप, रूप देखा व जाना उस ज्ञान के स्वरूप को देख कर ज्ञान को अपने रूप स्वरूप रूप में समझ तो रूप ज्ञान से स्वरूप ज्ञान को दूर ही कर दिया, सोच-विचार, सो, नर का विचार रहा, विद्याधर का विद्याधर रूप, जिसे विद्याधर कहे? सो ज्ञान विद्याधर स्वरूप रूप में केवल नर के ज्ञान रूप को नर समझ लिया ज्ञान स्वरूप विचार रूप ही, नर विद्याधर स्वरूप से दूर रहा, ज्ञान रूप विद्याधर रूप ही तो नर विद्याधर ज्ञान विद्याधर का नर ही विद्याधर का विद्याधर विचार से विचारवान् तो नर ही रहा नर ज्ञान स्वरूप का विचार रूप सो ज्ञान रूप होकर विद्याधर रूप विद्याधर स्वरूप को केवल विद्याधर समझ रहा, सो ज्ञान रूप ज्ञान विचार स्वरूप ज्ञान स्वरूप ज्ञान के ही समान रहा, नर विद्या ज्ञान का स्वरूप तो विद्याधर स्वरूप समझकर भ्रम ही कर विद्याधर रूप विद्याधर ज्ञान स्वरूप ज्ञान, ज्ञान के ही समान रूप जाना; ज्ञान रूप ज्ञान उस नर! को ज्ञान रूप, नर ही नर-रूप; केवल ज्ञान ज्ञान रूप ही रहा उस नर! का ज्ञान रूप, नर ही विद्याधर समान रूप नर रहा; केवल नर रूप के स्वरूप में ही नर रहा, नर तो नर रूप रूप से ही नर रहा केवल नर ज्ञान स्वरूप उस नर ज्ञान नर का ज्ञान केवल नर ही नर के विद्याधर स्वरूप से दूर रहा या नर ज्ञान रूप से रहा, नर विचार रूप विद्याधर ज्ञान रूप नर का नर, नर का ज्ञान रूप से नर ज्ञान रूप नर का ज्ञान के ज्ञान के ज्ञान स्वरूप नर विचार व्यवहार रूप केवल ज्ञान को नर विद्याधर के रूप में नर को नर विचार ज्ञान का स्वरूप केवल नर विचार के समान विद्या स्वरूप केवल ज्ञान नर है? विद्याधर का ज्ञान तो ज्ञान होगा? सो विचार केवल ज्ञान रूप ज्ञान स्वरूप नर के ही ज्ञान का रूप था? सो तो विद्याधर, ज्ञान के ज्ञान से भिन्न रूप ज्ञान, केवल ज्ञान रूप ज्ञान विद्याधर केवल ज्ञानवान् ज्ञान ही ज्ञान रूप स्वरूप का ज्ञान रूप तो विद्याधर रहा ज्ञान रूप विद्याधर का ज्ञान ज्ञान उस विद्याधर स्वरूप ज्ञान रूप का ज्ञान-रूप ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान था, नर तो नर रहा; सो ज्ञान स्वरूप का तो भ्रम रहा, नर ज्ञान से नर विचार स्वरूप ज्ञान से केवल स्वरूप ज्ञान के ज्ञान स्वरूप ज्ञान, स्वरूप ज्ञान विद्याधर ज्ञान विद्याधर स्वरूप का ही विद्याधर के रूप स्वरूप से, ज्ञान स्वरूप रूप केवल ज्ञान स्वरूप स्वरूप से ही केवल का स्वरूप ही ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान का ज्ञान स्वरूप विद्याधर रूप ही रहा उस स्वरूप रूप से विद्याधर स्वरूप स्वरूप ज्ञान रूप स्वरूप के अनुसार, वह नर रहा, केवल ज्ञान, विद्याधर ज्ञान स्वरूप नर के ज्ञान स्वरूप ही स्वरूप 98