अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअब दोनों सखियाँ परस्पर सलाह करके सोचने लगीं कि महाराज यदु की रानी महापतिव्रता होगी तब तो महाराज को यदु लड़का ना उत्पन्न हो सकता था सो अब देखना चाहिये कि कैसी है?, चित्तलेखा बोली कि चलो अब हम दोनों चलें यह तो सखियों का हाल कह आये अब आगे सुनो कि क्या हुआ, रानी देवकी जी महाराज यदु समेत अपने महल-कूप में बैठी थीं कि महाराज उनके पास गये कि आज तो कुछ आनन्द लें पर क्या हो सखियों को देखकर यदु भय करने लगे मन में डरने लगे, भय इस लिये हुआ कि हम पापी हैं, इन सखियों का तो दर्शन दुर्लभ था, भाग्य से प्राप्त हुआ समझ लिया, विचार तो उनका था दर्शन करने का, रानी बोली, प्राण नाथ यह कौन स्वरूप है जो सब को भय युक्त कर रहा है, महाराज ने कहा सुनो; यह वह मूर्ति हैं, जिन्हें मैं अपने साथ लाया हूँ; देख लो यह रूप कैसा है, लज्जावंती हैं, इनका स्वरूप देखने का मन में भय पैदा करता क्या नाम तुम्हारा है जी? --देवकी, सब सोच-गम को, दूर करके बोली, महारानी चित्तलेखा से महाराज बोले कि देख लीजै, जिस सुन्दरी का नाम देवकी रखा गया! सब इन को देख कर चकित होकर कहने लगीं क्या? --हे सब बातों के जान, हे प्रभु अन्तर्यामी, हम तो समझती थीं महाराज को; सब सोच-गम से रहित संसार के चक्रवर्ती राजा सब प्रकार के, सुखों से युक्त हैं परन्तु हमारी समझ में यह सब धोखा व भ्रम--जाल पड़ा हुआ मालूम हो रहा, यदुजी ने जो कुछ, चित्तलेखा जी से कहा--यह सब न कहिये हम केवल यह चाहते हैं, विचार ऐसा करो, महाराज को जो भय हो रहा उसका नाश हो जाय, सखियों ने, देवकी महारानी जी से कुछ भी नहीं कहा; चित्तलेखा जी बोलीं कि, महाराज सुनो मेरी बात सुनो! महाराज यदु जी बोले कि मन मेरा भय से भर गया क्योंकि मै पापी व कपटी महारानी देवकी समेत हूँ! बात सुनकर ही सब रानी सोच विचार करने लगीं, हाथ जोड़ कर विनती कर यदु जी चरण में चित्तलेखा महारानी के चरणों पर गिर कर रोने लगे, हाथ भी जोड़ लिये! रानी भी दोनों हाथ जोड़ कर श्री चरण पर गिर पड़ीं, रो कर कहने लगीं कि मुझको क्षमा कीजिये; महाराज बोले सुनो हमारी भी, बात मन में डर बैठ गया है भय निवारो; हमारे मन का डर दूर करो, चित्तलेखा हंसकर बोलीं कि जब तक तुम दोनों का मन तन सब बातों से साफ नहीं होगा, चित्तलेखा जी के वचनों को सुन--कर यदु जी दोनों कर जोड़ खड़े रहे और उनका मन विचलित हो रहा था मन में, भय समाया हुआ, देवकी रानी मन में सोच--कर हाथ जोड़ खड़ी थी, देवकी जी चित्तलेखा से प्रार्थना कर पूछने लगीं? हे सखीश्वरी जी सुनो देवकी जी हाथ जोड़कर बोलीं कि, हम तो सब प्रकार तुम्हारा यश सुनती रही सो तो प्रत्यक्ष देख लिया, पर दया--का दान-विद्यादान दीजिये सब कुछ विचार दूर हो जाय; महाराज भी बोले--कृपा हो तो हम समझें! यह बात चित्तलेखा जी, अपने मन में विचारने लगीं कि महाराज देवकी समेत अपने मन को शांत व आनन्दित करना चाहते हैं सो यह महाराज केवल अपने लिये ही नहीं विचार करते हैं किन्तु सब जीव मात्र के कल्याण का अभिलाषा उनके मन में भरा हुआ जान पड़ता है मन में ऐसा विचार कर उसी समय यदु को कुछ उपदेश देने लगीं, उस समय देवकी जी; देवकी समेत जब राजा ने यह बात सुनी चित्त शांत हुआ, सब दुःख दूर हो गये; आनन्द छाया तब महाराज यदु हाथ जोड़कर बोले, धन्य हो तुम दोनों जगजननी यह कह कर शांत हो गये, कुछ काल के उपरान्त जब यदु जी का राज-पाट माता पिता के हाथ में आया, तो उस वक्त रानी समेत यदु वन को चले गये और सब बातें जो वन में देखीं सब से बढ़कर चित्त शांत करने की बात सुनी गई अब यह हाल चित्तलेखा जी ने कहा सो सुनो; राजा तो चला गया; मन, उस वन लीला का लगा ही रहा; तब, राजा ने कहा था; वन लीला का सुख सब सुखों से बढ़ कर मिला जिस दिन से वहां रहा, चित्त शांत रहा रानी चित्तलेखा समेत प्रसन्न रही; सब लोग सुख पाओगे, सबका कल्याण होगा सत्य बात कहो इसमें किसी को कुछ संशय होगा? सब लोग तो जानते होंगे किस प्रकार से सब को मन का सुख प्राप्त हुआ; केवल सत्य-नाम के नाम से सबने 124