अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपहला सवाल कि अगर विचार बदल गया तो क्या भाषा बदल कर बोलेंगे? या तो खुद ही मालूम हो गया होगा क्योंकि हर एक का खुद का अनुभव ही यह रहा होगा अथवा अपने चारों तरफ देख रहे होंगे कि विचार क्या बदला? हर विचार का प्रभाव तो मन पर ही मन में रहा या वाणी पर आया अथवा मुख के नयनों के भाव पर भी असर पड़ता ही पड़ता ही रहेगा।; अब जब तक भाषा नहीं बदलती तो तब तक समझना कि जब वाणी बदलेगी तो ही वायुमण्डल बदल कर हल्का होगा, तो बोलचाल की रूप रेखा बदल कर ही हर परिस्थिति बदल कर हल्की होगी, तो बोलचाल की रूहानी भाषा और बोलचालहीनता, बोलचाल का संयम यह सब वाणी का ही खेल चलता रहा और चलता रहेगा ही। इस रीति जब बोल, तो बोल निरहंकारी के बजाए अहंकारीपन भरें हुए बोल मुखड़ा मोड़ कर बोलेंगे तो--तो आपस में ईर्ष्या, ना प्यार से बोलेंगे, ना प्यार से देखेंगे--तो यह बोलचाल बोलचाल थोड़ी होगी यह--बोलना नहीं होगा बल्कि यह तो तीर फेंक कर आपस में घाव ही करेंगे फिर चाहे मन कुछ भी कहे या करे पर मुख के--बोलने भर से ही यह आपस प्यार घट कर दूरी पैदा कर देगा, तो उस तीर द्वारा घाव--पैदा करने का भी फलड़ा भोग भोग कर ही हल्का होना पड़ेगा इसलिए हर एक बात मन ही निकाल कर ही सब बोल मुख से बोले और पहले ही परख लेवे निरहंकारिता का निरहंकार भर तो नहीं रहा है क्योंकि हर एक बोल! रूप तो बन गया।; इसलिए अब समय आ रहा है हर बोल बोलने वक्त, बोलने से पहले उस बोल सम्बंधी सोच विचार क्या बोलना है और बोलने द्वारा क्या तो फल पाना अथवा देना पड़ेगा? ऐसा विचार पहले करें; फिर मुख द्वारा निकालें ऐसा बोल जो, स्वयं के निमित्त भी हल्का कर देवे या दूसरे के निमित्त सुख और शान्ति दायक रहे या तो फिर ऐसा बोल ही मत बोलो जो वायुमण्डल को भारी कर देवे जब कि भारी बोल बोल कर भारी किया हुआ है? अब सब हल्का, स्वच्छ और शक्तिशाली रूप में तब ही आ सकता जब स्वयं अपनी भाषा को संयमी करें, मुखड़ा रूप बदलें, हँस-मुखड़ा रूप बनाएं ना, कि गुस्से का--रूप बना कर मुख का रूप सब बिगाड़ दें; क्योंकि आत्मज्ञानी रूप और आत्मा के स्वरूप आत्मा को सब तरफ प्रेम ही दिखता है, प्रेम-स्वरूप आत्मा स्वयं स्वरूप द्वारा ही बोलती है या बोलती है, इसलिए आत्मज्ञानी; अभिमानी स्वरूप कभी ना लेंवे भले कोई कितना भी उल्टा बोले पहले खुद तो उस उल्टेपन स्थिति द्वारा खुद संभल कर, हर एक आत्मा प्रति शुभ भावना रखें या ना रखें लेकिन कभी उल्टा रूप धारण ना लें उलटा-सुलटा रूप तब तक धारण होता जब तक देह-अहंकार रूप स्थिति धारण होती है इसलिए हर एक बोल वाणी का या दृष्टि का रूप स्वयं निरहंकारी का रूप लेवे; ना उल्टा रूप धारण करें; ना उल्टे को देख कर खुद उल्टा बोल बोलें, इसलिए यह, देह-अहंकार की बोलचाल ही बन गई, जिसे सब विरोधी बोलचाल ही कहेंगे और यह वाणी-रूप तीर घाव पैदा करते हुए सब कुछ बिखेर देगा इसलिए इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी अब आगे जीवन बदलाव में इस रूप से; वाणी सम्बंधी सब विचार-व्यवहार का प्रभाव जब वाणी पर आ जाता तो वाणी द्वारा खुद अपना प्रभाव पड़ता है? जो कि उल्टे बोल मन को लग कर, सब कुछ तहस नहस कर भारी बना देगा जो अपनी वाणी से ऐसा तीर ना लगे! यह सोच कर ही बोलें? ताकि स्थिति भी एक रस रहे! अपनी वाणी वाणी का प्रभाव पड़ कर मन भी शांत हो सकेगी यह अभ्यास वाणी का ही वाणी द्वारा जब वाणी पर संयम आवेगा तब ही वाणी द्वारा मुख मण्डल पर उसका असर पड़ कर वाणी एक रसता लाती हुई वाणी का प्रभाव वाणी द्वारा ऐसा हो जावेगा कि वाणी सुनने वाला भी हल्का रहे, ना कि भारी होकर वाणी सुनकर ही दूर भागने लगे इसलिए वाणी का संयम अब रखो! जो कि सब की स्थिति एक जैसी बनी रहे और शांत भी रहे; शांत मन से बोलें; शांत मन रखें; ताकि हर स्थिति का असर, बोलचाल द्वारा बदल कर सबके लिए सहज होवे। इसलिए शांत मन द्वारा ही हर स्थिति रूप पर जीत प्राप्त करने द्वारा सब रूप व रंग बदलेगा
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