अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजिसका सम्यग्दर्शन निर्मल विशुद्ध वर्तता हुआ, अनादिकाल पाकर मिथ्यात्वको त्यागकर जीव शुद्ध सम्यक्त्वको ग्रहण करता हुआ इस जन्म मरण रूप संसारके महा दुःखोंको मेटकर केवल ज्ञान रूप मोक्ष पदको प्राप्त हो जाता है। जिस प्रकार कंचन पाषाण को तपा कर शुद्ध सुवर्णस्वरूप कर दिया जाता है; उसीप्रकार यह जीव भी सम्यक्त्व रूपी अग्निसे पाषाण रूप मन को शुद्ध कर सर्व कर्मों को जलाकर भस्म कर देता हुआ मोक्ष को प्राप्त होता जिस को सम्यक् दर्शन हुआ समझिये कि वह तो धीरे-धीरे कर मोक्ष सुख पावेगा ऐसा विचार करके भव्य जीवों अपने आत्म स्वरूप का सम्यक् श्रद्धान करो, सम्यक् दर्शन लो! जिससे कि तुम्हारा संसार का भय मिट कर सुख का वास हो। सम्यग् दर्शन कैसा? जो राग द्वेष मोह रहित धर्म को मानता हो जिनेन्द्रदेव जिनका हो, गुरु निर्ग्रन्थ ही मान्य हों। भव्य जीवों को ज्ञान होना, दर्शन का भी ज्ञान होना, कि ज्ञान कैसा सो सुनो, कि ज्ञान जीव का मुख्य गुण सम्यग्ज्ञान ही सब गुण को कर देता सत्--स्वरूप ज्ञान हुआ तो! ज्ञान हुआ तो सब ज्ञान सुख का देने वाला है, .सम्यक्-.ज्ञान हुआ तब सब गुण सत्--स्वरूप कहलाए गए! सो सम्यक् ज्ञानके होनेसे महामुनियोंने ज्ञानियोंने जो सुख को पाया सत्-- स्वरूप ज्ञान से! सो प्रत्येक प्राणी विचार, कर उस क ज्ञानका जो निज रूप सत् सुख सत्--स्वरूप ज्ञान है! सो ज्ञान को प्राप्त करने वाला जो पुरुष सो सम्यक् सो मोक्षमार्ग रूप ज्ञान द्वारा पा जाता है। ज्ञान सम्यक्त्व स्वाध्याय द्वारा ही प्राप्त होवे अतः सब भव्य जीवों को आगमके द्वारा ही स्वाध्याय करके ज्ञान को प्राप्त ज्ञान स्वरूप होना चाहिये स्वाध्याय क्या चीज है? आगमका पठन पाठन श्रवण मनन करना सो स्वाध्याय सो ही तो ज्ञान स्वरूप? आगमका पठन मनन आगम को श्रवण कर उस स्वाध्यायका ध्यान करना सो? सो स्वाध्यायके ध्यान करने से ही जीव अपने को पाप कर्म से छुड़ा क स्वाध्याय द्वारा स्वाध्यायका जो फल प्राप्त होता सो क्या है? सुख कैसा सुख? आगमका? पठन किया क उस का ध्यान कर आत्मा के ही ध्यानमें मग्न होना सोई शास्त्र का मनन स्वाध्याय सो, जो स्वाध्याय करता हुआ मन को स्थिर धीरे-धीरे करेगा सो? सो अपने स्वरूप को? पाप से मनको हटा कर स्वाध्याय द्वारा शुद्ध, निर्दोष भाव को पावे सो, सो ध्यान आगम द्वारा हुआ मनका सो स्वाध्याय का, फल स्वाध्याय करने वालेको यह ही फल प्राप्त होता सत्--स्वरूप प्राप्त होता सो स्वाध्याय का फल समता को पाया, जो क स्वाध्याय करके भी समता सम्यक्त्वको मन में धारण नहीं करता सो पाषाण के समान है सो कभी स्वाध्यायका फल नहीं पा सकता, क्या किया सो? सो जिस मन को सम्यक् सो, आगमके द्वारा ज्ञान हुआ सम्यक् सो ज्ञान का, वैराग्य भाव सो, सो ही मन सम्यक् ज्ञान का ही रूप सो मन-ज्ञान आगम स्वाध्याय द्वारा प्राप्त होवे सो सम्यक् ज्ञान सत् सो, सो स्वरूप मन का सम्यक् सो मन का जो रूप सत् सत्--स्वरूप ज्ञान सो! स्वाध्याय से मन सत् ज्ञान स्वरूप बन कर यह मन सत्--रूप ही बन जाता सब पाप रूप राग द्वेष आदि मलको त्याग करके शुद्ध हो जाता है, मन सब मल मल सो, सो स्वाध्याय द्वारा छुट जाता स्वाध्याय द्वारा ध्यान सो, एकाग्र मनका होना सो, सो स्वाध्याय रूप सो, जिस ध्यान को ध्यान कहा जाता है; जिस ध्यानके आधीन मुनिगण सब कार्यको करते हैं, समता भावो द्वारा मन को सो, सर्व स्वाध्याय को धारण कर मुनि जन ध्यान स्वरूप हो कर सब पाप को दूर करके मोक्ष सुख को प्राप्त होते क ध्यान ध्यान द्वारा प्राप्त होता स्वाध्याय द्वारा मनका ध्यान प्राप्त सो, जो सब ध्यान आगम द्वारा शास्त्र अभ्यास द्वारा जीव अपने आत्म स्वरूप ध्यान द्वारा सब ध्यान को, सो आगम ज्ञान रूप जो मन को राग द्वेष मोह से हटाकर सब पापों का त्याग कर समता रूप जो धारण कर सब प्रकारके राग द्वेष को त्याग कर जिस ध्यान को, ध्यान तो मुनि ही सो ध्यान रूप ज्ञान महा मुनि पाकर अपने मन को सर्व ओर से हटा कर अपने निज स्वरूप का ध्यान कर सर्वथा कर्मोंका नाश करते हैं जिस ध्यानका फल मोक्ष स्वाध्याय का फल ऐसा प्राप्त होता, आगम स्वाध्याय सब ध्यानका ही रूप फल सो सो, सो ही, स्वाध्यायके सत्--ज्ञान द्वारा सो मन का जो सम्यक् ज्ञान होता सो सब पापों आगम द्वारा सब पाप कर्म से स्वाध्याय रूपी समता द्वारा नष्ट स्वाध्याय करके मन को पाप कर्म त्यागने का जो साधन बनता जिससे ध्यान होता सो मोक्ष स्वाध्याय द्वारा सब प्रकार का होता, सो सब को ज्ञान ध्यान करना चाहिये 134