अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविचार करूँ परमात्माको स्मरण करूँ अथवा नित्य यह विचार करूँ कि पाँच तत्त्व और पच्चीस प्रकृति जिन प्रकृतियोंने मिल कर ( स्थूल शरीर, सूक्ष्म प्रकृतियोंने मिल ( लिंगशरीर और कारण प्रकृतियोंने मिल ( प्रपञ्च, यह त्रिविधशरीर रूप जो कार्य उपाधि हुई सो अविद्याका कार्य और अविद्या अज्ञान रूप, फिर उसका न सत्-चित् लक्षण ब्रह्मके साथ क्या सम्बन्ध, ऐसा विचार करूँ तो समाधान हुआ संशयवाले की अपेक्षा निश्चयवाले पुरुष श्रेष्ठ हैं क्योंकि विचार निश्चय का फलित होता अतः केवल विचार संशयवान् को अधिकारवान् होने के अधिकारसे वंचित नहीं कर सकता वा न कर सकेगा। तात्पर्य इसका यह, आत्मविचार की योग्यता--चित्त की चंचलताका निवारण होकर स्थिर होनेपर ही प्राप्त हो, इसलिए चित्त एकाग्र करने और विशुद्ध विचार उत्पन्न करने का यत्न पहले करना और जब तक वह योग्यता प्राप्त न होवे तब तक साधन रूप कर्म करना और उससे चित्तकी शुद्धि हो जाय, फिर कर्मका त्याग करके ज्ञान की खोज करे? पहले निष्काम कर्मका त्याग कर देवे फिर संशय को दूर करे और फिर ज्ञान प्राप्त करे, ऐसा ही किया जायगा? इसके उत्तर, ज्ञान विचारके समय भी जो कर्म करे उनका क्या? इस विचार को कहते हैं कि जो कर्म निष्काम प्रकार करेगा; निश्चयतः, फल उस पुरुषके चित्त और ज्ञान की योग्यता--चित्त की विशुद्धता का कारण निश्चयपूर्वक होगा क्योंकि कर्म का यह त्याग केवल अहंता-ममताबुद्धिकारित है अर्थात् कर्मका स्वरूप से त्याग नहीं है किन्तु जो कर्म भी विहित वा कर्म शास्त्र आज्ञा रूपसे विहित कर्त्तव्य हैं उनका ( निष्काम प्रकार से आचरणका नाम त्याग कहा गया वा इस निष्कामप्रकार कर्मके फलका फलित यह चित्तकी शुद्धि होगी, विवेकवैराग्यकी प्राप्ति होगी जिससे कि विचारवान् पुरुष केवल स्वरूप विचार करेगा, जिससे उसको यह ज्ञान होगा अर्थात् चित्तकी शुद्धिपूर्वक ही, विशुद्ध विचार की स्थिति सिद्ध होगी और ऐसा विचार संशयवान् की तरह व्यर्थ नहीं होगा किन्तु ज्ञान की स्थिति को प्राप्त होगा, यह कर्मयोग विचार-ज्ञान का कारण सिद्ध हुआ। संशयवान् अधिकारी के आशय समझ कर, यह जो कर्म-योग की स्थिति कही इससे संशयवान् कर्म करके विशुद्ध चित्त होकर संशय को दूर करेगा और ज्ञानवान् होगा, इसके उपरान्त कर्मका त्याग वा संन्यास करेगा, इसलिए यह दोनों स्वरूपसे एक फल देनेवाले हुए अर्थात्, जो अधिकारी संशय से पूर्ण निष्काम कर्मका आचरण करता हुआ संशय, जो केवल स्वरूपके अज्ञानसे उत्पन्न हुए हैं उनको विचारके द्वारा दूर करके ज्ञानवान् हुआ, वह केवल संन्यासी के समान ज्ञान को प्राप्त हुआ इसलिए एक निष्कामभाव कर्मके फल ज्ञान का कारण सिद्ध हुआ। इस संशयात्मा पुरुष को कर्मसंन्यास के त्याग रूप का संन्यासी मानकर जो ज्ञान प्राप्तिका फल कहा सो इस ज्ञान और कर्म दोनों की संशय के निवारण निमित्त आवश्यकता है, कर्म संशयवान् पुरुष चित्त शुद्धिपूर्वक ज्ञान संपादन करने योग्य बनकर ज्ञान को प्राप्त करेगा और ज्ञान, जिससे कि अज्ञान संशय सर्वथा नाश हो सके इसलिए कर्मयोग संन्यासका ही एक अंगरूप है॥२॥
केवल संन्यासी कर्म फलके त्यागके साधन--विद्या, विचार, यज्ञानुष्ठान, तपस्या, श्रवण, मननादि--इन सबमें रत, संशय को दूर करके अपने स्वरूपका ज्ञान लाभ करके मुक्त होता और ज्ञान प्राप्त करके संशय रहित होकर स्वयं ब्रह्मरूप हो जाता है?
संन्यास की आवश्यकता है, अतः संन्यास श्रेष्ठ अथवा निष्काम कर्म? संन्यास की आवश्यकता है, अतः सुनो; संशय को दूर कर, निष्काम कर्मके द्वारा विचार की योग्यता पा, संशयवान् ज्ञान लाभ करे? ज्ञान जब होगा, संशय गया, फिर संन्यास आवश्यक क्यों, जो इस बातको जानता है? इसके बाद संन्यास ही तो रह जाता फिर ज्ञान संपादनके उपरान्त जो, ज्ञान लाभ संन्यासके द्वारा करेगा उस ज्ञानका फल क्या, जब ज्ञान पहले ही प्राप्त था इसलिए संन्यास का संन्यासके रूपमें ज्ञान लाभ करना केवल ज्ञानमात्र निष्प्रयोजन ही तो सिद्ध संन्यासका फल हुआ, इस कारण ज्ञान निष्काम कर्म द्वारा जब अज्ञान का नाश संपादन करता है, तब संन्यास की आवश्यकता ही, कर्म त्याग रूप फल ज्ञान को प्राप्त कराने के लिए क्या रह गई? संशय का निवारण अज्ञान ? संशय ज्ञान से दूर, संन्यास करके ज्ञान लाभ करने का अभिप्राय क्या, क्या संन्यास? केवल अज्ञानका नाश, संशयका नाश, ही संन्यास निष्फल हुआ? जो संन्यासी ज्ञान प्राप्त करके भी, उस ज्ञान का यत्न न कर ज्ञान रूप कर्म कर न कर स्वयं को ब्रह्म मानने लगा केवल उस अज्ञान, मद से पूर्ण हो कर संन्यासी बना, उसका ज्ञान यत्न रहित हो कर केवल मद स्वरूप ही क्यों माना जाय? अतः संशय संन्यास
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