अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविपद् पड़नेपर लोग रोते अवश्य हैं और रोते रहेंगे भी, क्योंकि रोना मनुष्य स्वभाव का एक धर्म है; किंतु क्या यह धर्म शांत और धीरज धारण करनेके विरुद्ध है? महाभारतकारका मत इसके पक्षमें नहीं है। वे कहते हैं-मनुष्य विधाताके हाथोंका एक खिलौना मात्र होनेके कारण सदा पराधीन रहता है। इसलिए रोने-धोनेसे कोई लाभ नहीं होता; न इस कर्मसे कोई फल मिलता है; संसारके सब शोक केवल दुःख ही दुःख देनेवाले हैं। शोक करनेसे कोई फल नहीं मिलता, वरन्, शोक करनेसे शरीर भी सूख जाता है। शोक करनेवाला मनुष्य कई प्रकारके रोगोंका शिकार हो जाता है, भय आदि इसके अन्य उपद्रव भी उठ खड़े होते हैं। दुःख होनेपर मनुष्यका कर्तव्य यह है कि वह शोक न करके, उस विपत्ति वा दुःखके निवारणका उद्योग करे। शोकसे दुःख और भी बढ़ जाता है; इसलिए उद्योग ही इस दुःखकी एकमात्र परम औषधि है। संसारमें जो बात होनेवाली है, उसका होना निश्चित है। बुद्धिमान् पुरुष कभी इस बातका शोक नहीं करते कि अमुक बात क्यों हो गयी। पर हाय! जो बात होनी ही नहीं थी, वह तो हो गयी! हे भाई! क्या तूने ऐसा सोचा था कि... शोक! शोक! उस सर्वशक्तिमान्की यह लीला भी विचित्र है! उस परमेश्वरका यह कौतुक भी विचित्र है! अमुक काम होनेके कारण ऐसा हो गया, यह तो साधारण लोगोंकी समझका फेरा है; संसारमें जो कुछ होता है सब विधाताके लेखके अनुसार होता है। तब फिर हाय-तोबा करनेसे क्या लाभ? अब शांत होकर अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिए। एक कविने ठीक कहा है- सुखके समयमें जो बात अपने वशमें रहती है, दुःखके समयमें वह हाथसे निकल जाती है। मानव केवल अपनी आत्मापर पूरा अधिकार रख सकता है, कर्मपर नहीं। इसलिए जो कुछ हुआ है, उसीमें संतोष करना चाहिए। तुलसीदासजीने भी कहा है- हानि लाभ जीवन मरन जस अपजस विधि हाथ। तुलसी काहे सोचिए भइ मनवांछित बात। जिस प्रकार नदीका जल निरंतर बहता रहता है और कभी उलटा नहीं बहता, उसी प्रकार आयु भी क्षण-क्षण व्यतीत होती जाती है, कभी उलटी नहीं लौटती। कविने सच कहा है- संसार एक पथिक-शालाके समान है, यहाँ एक आता है तो दूसरा जाता है। जबतक किसीका पुण्य रहता है, तबतक वह संसारमें जीता है और पुण्य क्षीण होनेपर संसार छोड़कर चला जाता है। मनुष्य जब यहाँ आता है, तब कुछ भी अपने साथ नहीं लाता और न जाते समय कुछ साथ ले जाता है। जिस प्रकार वृक्षोंके पत्ते गिर-गिरकर नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार संसारके जीवोंका भी अंत होता है। यह संसार अत्यंत नश्वर है; यहाँ किसीका किसीके साथ सदाका संबंध नहीं है। फिर भी जीव इस नश्वर संसारसे ममता करता है, जो उसके अनेक प्रकारके दुःखोंका कारण बन जाती है। इसलिए जीवको चाहिए कि वह इस नश्वर संसारसे मोह न करके, परमात्माका भजन-स्मरण करे, जिससे उसका कल्याण हो सके। हे भारत! तुम्हारे पिताने अनेक यज्ञ किये हैं, बहुत दान दिया है और बहुत-से सत्कर्म किये हैं; अनेक तीर्थोंका सेवन किया है; अनेक प्रकारके दान देकर ब्राह्मणोंको तृप्त किया है, इस कारण उनका परलोक अवश्य सुधरेगा; इसमें तनिक भी संदेह नहीं, अतएव उनके निमित्त शोक करना व्यर्थ और अनुचित है। जब तुम्हारे पिताने एक भी पाप नहीं किया, उन्होंने अपने जीवनको सदा निर्मल बनाये रखा और अब अपनी आयुको, सांसारिक कर्तव्यकर्मोंको समाप्त कर, परलोक सिधारे हैं; इसलिए उनका शोक करना, सांसारिक दृष्टिसे युक्तिसंगत न होनेपर भी, शास्त्रानुसार नितांत अनुचित और अधर्म, शास्त्रोक्त एवं लोकरीतिके भी विरुद्ध है। जब कोई मनुष्य मर जाता अथवा शहीद होता, तब उसके शरीरको तो हम लोग जलाकर खाक बना डालते हैं। इसलिए इस नश्वर शरीरके नष्ट हो जानेपर तो शोकका लेशमात्र भी स्थान नहीं रह जाता और जो आत्माका संबंध है, वह नश्वर नहीं होता। आत्मा अजर-अमर है, उसका न कभी जन्म होता है और न कभी विनाश होता है। इसलिए भी शोकका कोई कारण नहीं रहता। शोक तो केवल मोहका ही एक रूप मात्र है। ज्ञानीजन कभी भी मोहके वशमें नहीं होते। इसलिए शोकको छोड़कर तुम धैर्य धारण करो। जो धीर-पुरुष हैं, वे विपत्तिके समय कभी भी अपना धैर्य नहीं खोते और न कभी कातर होते; वे विपत्तिके समय भी अपने कर्तव्य-पालनमें लगे रहते हैं। इसलिए शोक करना छोड़ो; और पिताके उत्तर-कार्योंको विधिपूर्वक संपन्न करो। भीष्म पितामहके इन वचनोंको सुनकर उस समय, सब पांडवोंने कुछ धैर्य धारण किया; उनका शोक कुछ कम हुआ, और उनका व्याकुल चित्त कुछ शांत हुआ। तब उन सबने अपने पिताके उत्तर-कर्मोंको शास्त्र-विधिसे संपन्न किया? इसके उपरांत भीष्मजीने उन बालकोंको हस्तिनापुर चलनेके लिए कहा? वे उन सबको समझा-बुझाकर बोले- 'हे वत्सगण! अब तुमलोग मेरे साथ चलो! यह वन तुम्हारे रहने योग्य स्थान नहीं है! इसलिए तुम सब अपने पैतृक निवासमें चलकर रहो!' पितामहके इस प्रकार कहनेपर वे सब भाई, अपनी माता कुंतीके साथ, भीष्मजीके साथ हस्तिनापुर चले आये। 14