अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
पृष्ठ 15, कुल 183 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस संसार का नियम! जिस पर कृपा कीजिये उसी से भय मानिये ॥ यह विचार करके राजाने उसपर कृपाकरके सोचा, इसको धन दे तो दूँ परन्तु यह तो हमेशा हमारे पास ही! इसलिये इसका प्रभाव राजमहल में रहेगा ही नहीं, पर जो दूसरा था उसी राजा उसका विश्वास न करने लगा और राजमहल की ओर आने से रोक दिया गया तो वह बहुत पश्चात्ताप करने को राजमहल गया पर राजा बोला कि; राजकुमार विनाकारण किसीके राजमहल में आया करे इसमें भलाई है? तब राजाने जो था दूसरा साधारण राजकुमार उस से भेंट करके उसको तो रख लिया; पर जो यह राजकुमार था उसको यह सोच कर अपना विश्वासपात्र बनाके सब खजाने काम में लगा दिया कि यह राजपुत्र तो न होनेसे कभीभी लोभ कर के धोखा न देगा ॥ परिणाम में फल क्या निकला; कि एक दिन जो सच्चा राजपुत्र था उस राजाने, कि जब वह खजाने के काम में सब ठीक प्रबन्धपूर्वक ही करता ही रहता ॥ उस समय में उस राजा के कान में यह, ॥ साधारण सा जो था वह फुसक उठाके उसके विरुद्ध उस बात को भरता ही रहा कि यह सब धन लूट कर लेजाने लग रहा राजाने तो कुछ समय तक तो सहा, परिणाम में राजा बोला; खजाने काम में खर्च का भी हिसाब कुछ ज्यादा होने लगा जिसे देख राजा को भय सा होने लगा कि ज्यादा खर्च करके, यह राजकुमार ही शायद इस राज्य को भी न दबाले इसलिये राजाने ही, राज्य में से उस सच्चे राजकुमार को तो निकालदिया पर उस कपट रूप-वाले दूसरा रख लिया इसका अभिप्राय यह कि कपट रूप--आदमी का तो यह स्वभाव ही है, साधारण मनुष्य जब कभी भी उस कपटवाले को या उस कपटवाले रूप महात्मा रूप कपट का दर्शन पाता है, तो कपट रूप कपटवाले रूप महात्मा को देख कर के, कप--कपट का रूप उल्टा रूप में उस कपट को देख कर विश्वास कर लेता, परिणामतः, महात्मा रूप का न देकर, कपट महात्मा को उच्च मान कर प्रतिष्ठा करता ही रह कर पश्चात् रोता ही रह जाता है, और जब कभी भी सच्चा रूप साधारण मनुष्य का मिले! तो भी उस पर तो संदेह रूपी दृष्टी से देखता रहेगा कि यह भी तो कपटवाले का भाई ही तो नहीं है रूप में जो यह भी कपटवाले रूप महात्मा में तो विश्वास कर लेता रूप में कपटवाले को देखके धोखा खागया पर सच्चे भक्त स्वरूप को देख धोखा खाया हो; सो बात तो कभी नहीं! कपटवाले मनुष्य पर तो भरोसा? ऊपर लिखा सब प्रकार सुन कर सच्चा महात्मा सब बात सुन करके बोला परिणाम इसका यह सम्भव हुआ, कपट के आधार सब बात समझ आने पर सब प्रकार का भेद खुला महात्मा जी कहने लगे कि उस कपटवाले भक्त रूप का भी, जो ऊपर वर्णन का किया गया उसका भेद अब खुल ही तो गया जिससे परिणाम में जो कपट का ही आधार बन कर विश्वास पात्र बन सका सो भी खुल ही गया जिससे यह भी कपट कपटवाले का, उस पर विश्वासपात्र का तो सब आधार समाप्त हो गया! पर परिणाम क्या रहा! केवल कपट रूप कपट रूपी अभिप्राय साधारण मनुष्य रहा, कपट वेशवाले का कपट रूपी कपटता का रूप तो न केवल उस कपट वेशवाले को धोखा ही केवल देता रहा होगा ही, पर दूसरे कपट वेशी भक्त को कपट वेशी ही, कपट का विश्वास रूपी रूप को कपट समझ कर कपट का आधार न रहा जो रूप में कपटका ही कपट समझना रूप से कपट समझना अब कपट का आधार बन गया सो कपट रूपी रूप कपट रूपी कपटका रूप में कपट कपट आधार ही कपटका रहा, जिससे कपट कपट का पश्चात्ताप कपटवाले को; कपटवाले कपट कपट पश्चात्ताप का ही फल उस कपटवाले कपट रूप में मिल रहा कपट का कपट ही फल पाया कपट कपट जिसने कपट किया--कपटवाले कपटका ही, कपटवाले कपटका ही, कपटवाले कपटका ही, कपटवाले कपट का फल; कपट कपटवाले ही को मिला, कपटवाले को कपट का फल ही मिला कपट, कपट का कपट कपट--ही फल पाया कपट कपट--फल का कपट कपट का कपट ही फल कपटवाले, कपट ही तो ही कपट, कपट कपट कपट कपटका कपट फल मिला कपटका कपटका, कपट ही तो फल कपट कपट कपट कपटका पर कपट रूप तो सब कपट ही फल पाया, सच बोलने वाले को कपट फल कभी कपट के तो कपट रूप में कपट ही तो मिला ही! पर सच बात कभी कपट 15