अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहोता देखना पड़ा था आखिरकार स्वामी विवेकानन्दजी भारत को वह दृश्य देखने मिला जिससे वह खुश तथा प्रसन्नचित्त हुए और माता-पिता अपने घर की लक्ष्मी को घर पर देख करके जो प्रफुल्लित और आनन्दित होते हैं तथा जिस तरह माँ का दूध पीकर बच्चा, चाहे कैसा कितना कमजोर या पहलवान क्यों न हो तन्दरुस्त हो जाता है उसी प्रकार स्वामी, जो तीन लगातार अमरीका वासियों तथा यूरोप वासियों सहित तमाम विदेशी भाई बहिनों भारत सन्तानों को धर्म का पाठ पढ़ाकर घर को लौटे कैसा आनन्द महसूस किया होगा क्या यह कोई कह सकता है? अथवा कोई लिख सकता? स्वामी जीको भारत सन्तान कह लो चाहे भारत माँ का प्यारा बेटा--यह कहना कोई; कोई अनुचित बात तो आखिरकार होगी; माता-पिता... व माता-पिता दोनों का सम्बन्ध या बड़ोंका रिश्ता तो माता-पिता अपने बच्चों पर प्रदर्शित कर सकते हैं; आखिरकार सन्तान चाहे सौ वर्ष की क्यों न हो जाय बच्चे को बच्चा ही कहेगी, इसलिए भारत माँ का प्रत्येक बच्चा या प्रत्येक सन्तान का पहला फर्ज यह है कि जिस भारत माताने उसको गोद दी उस माताकी गोदको कभी भी कलंकित नहीं होने दे बल्कि वह ऐसा सदाचार व्यवहारिक रूप सदा दिखलाए, जो सब को पसन्द व अच्छा लगे? क्या यह जो कुछ कहा गया सब सत्य नहीं है, इसका जो भी उत्तर होगा सोच समझ कर दें, या सोचें क्या इस तरह का विचार प्रत्येक व्यक्ति का होना चाहिए; जो व्यक्ति ऐसा सोच लेता और उस पर है, उसको कोई क्या कहेगा? वह व्यक्ति तो स्वयं भगवान स्वरूप रूप होकर व उस परमात्मा का स्वरूप रूप बनकर कहलाएगा कि जिस पर सन्देह नहीं किया जा, अतः प्रत्येक मानव समाजको ऐसा अपना लक्ष्य बनाना चाहिए कि भारत माँ का प्रत्येक सन्तान को सन्मार्ग पर चलना सिखा करके आगे बढ़ाएं न, किसी प्रकार भी कोई; आखिरकार भारत माँको एक एक सन्तानका हक बनता तथा फर्ज कि आखिरकार उसकी सन्तान का भला सोचे, चाहे वह किसी मतका या सम्प्रदायका क्यों नहोवे यह तो फर्ज बनता ही सब लोग भाई भाई हैं--यही तो इस बात का, प्रमाण भी है। "आपस में प्रेमभाव सब को रखना ही आखिरकार हर इन्सान का पहला फर्ज बनता है।" इस माता-पिता रूपी ईश्वर का फर्ज सब को चाहिए, जिससे कि प्रत्येक बात सुलभता पूर्वक आसानी पूर्वक समझ में आ जाय। इसलिए प्रत्येक को अपने धर्म का स्वरूप पहचान कर काम करना ही होगा; इस वास्ते जो कुछ सब समझाया गया उस पर अमल करना परम धर्म है और फर्ज भी बनता है, यदि हम अपने धर्म पर चल करके संसार को भी उस का रास्ता बता देंवे तो सब का उद्धार होगा ही होगा इसमें तनिक संशय समझना सर्वथा भूल ही तो होगी। इस का नाम धर्म या सनातन परम्परा, मर्यादा, का स्वरूप जो सब को सत्य तथा सत्य की मर्यादा बतला कर संसार के तमाम द्वन्दोंको समाप्त करवाएगा। संसार के अन्दर जो कुछ अशांति दिखाई पड़ती उस का मूल कारण यही तो मालूम होता है अन्यथा कोई कारण नहीं दिखाई देता क्योंकि सत्य का रूप ऐसा है; जिस को सब कोई मान ही लेता! जो इन्सान सत्य की ही मर्यादापर चल करके दूसरोंको सत्य का दर्शन कराता वह तो उस का अपना कर्तव्य तथा धर्म की सेवा समझना सब कोई चाहेगा ही, यह तो वह इन्सान, जो धर्म और सत्यके नियमों पालन करेगा; आखिरकार जो इस बात तथा धर्म की वास्तविकता को जान लेगा उसको अवश्य समझ आ जायगी कि तमाम मत पन्थ-धर्म केवल दिखावा करके मात्र एक भ्रम जाल फैलाया गया रहा है जो कि, केवल सत्ता लोलुप लोगों द्वारा फैलाया गया--है यह भ्रम, जाल; सत्ता प्राप्त, करने वाले लोग अधिकतर चाहे, राजनीतिक क्षेत्र के हों या फिर धर्म का नाम लेकर के लोग, जो केवल एक तरह का जाल-सा बिछा देते हैं, प्रत्येक मत का रूप केवल यही एक सा दिखाई देता कि सब को अपनी सत्ता कायम रखने का प्रयास मात्र ही दिखाई देता होता क्या इन बातों द्वारा कोई इन्सान ईश्वर दर्शन कर सकेगा? कदापि नहीं हो सके सकता है, इस बात का दावा हर कोई जिसने ईश्वर दर्शन या सत्य अनुभव किया वह तो डं के, साथ कह सकता और कहेगा; आखिरकार यह बात तो हर एक की समझ में आ जानी चाहिए कि ईश्वर का रूप क्या इस तरह बन सकता या बना सकता है; प्रत्येक मत का मठाधीश अपने को तो बहुत बड़ा मठाधीश समझता है पर भगवान् के लिए उस के पास क्या भाव है यह बात तो वह जाने या ईश्वर जाने कि वह कितने पानी में भगवान् को रखता है; क्या वह भगवान्के लिए सब कुछ त्याग करके दिखा सकता या नहीं इस बात का फैसला तो भगवान् तथा सब लोग ही कर सकते हैं; यह बात तो कोई विद्वान
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