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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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इस प्रकार जब आत्मा का रूप पर से भिन्न और अपने रूप स्वभावमय प्रत्यक्ष प्रतीत होने लगेगा; तब जीव--अजीवाधिकार! अब समाप्त हुआ ऐसा स्वयं अनुभव करेगा अर्थात् इस सर्वोत्कृष्ट अधिकार का सारांश क्या प्राप्त हो गया? यह जानना ही शेषरहा? फिर उसका प्रतिपादन भी क्यों किया जायेगा? इस समय आचार्य देव समयसार का कथन कर आत्मा का जो परमात्मा का स्वरूप बतलाते यह बात उन जीवों द्वारा जानी जा सकती है जो सर्व प्रकार के मिथ्यात्व का परित्याग करके ज्ञान मात्र स्वरूप का वेदन, निर्णय करते हैं। इस प्रकार आत्मा, जो कि अन्य समस्त पराधीन भावों रूप विकल्पावस्था से दूर होकर स्थित है, उसे जब यह आत्मा स्वयं प्रत्यक्ष अनुभव में लेता! आचार्य देव को यह आश्चर्य! होता हुआ प्रतीत होता है। आत्मा का स्वरूप ज्ञान स्वरूप है। उसे अन्य समस्त पदार्थ भिन्न ही हैं। अन्य समस्त पर द्रव्यों से, जो कि जड़ स्वरूप अचेतन हैं। इन समस्त पर द्रव्यों से भिन्न यह तो केवल जानने मात्र स्वरूप सर्व द्रव्यों का ज्ञातादृष्टा भाव ही आत्मा स्वरूप कहा गया कहा गया। भगवान् सदा चिद्रूप ही सर्व पदार्थों ज्ञान का ज्ञाता होता हुआ जाना जाता है। उस चेतना का कभी भी विनाश नहीं हो सकता इस प्रकार चिद्रूपता आत्मा का है; ज्ञान चेतना रूप सर्व ज्ञाता है; अचेतन पदार्थ को, आत्मा भिन्न रूप से ही सदा जानता है, कभी राग रूप अथवा अन्य कर्म रूप कार्य इनका कभी भी इस जीव का स्वरूप नहीं कहा जाता क्योंकि आत्मा ज्ञान रूप सदा, सब ओर ज्ञान रूप, ज्ञान मात्र ही सब जगह है, अन्य भाव इस जीव नहीं हैं। यह आत्मा स्वयं ज्ञान रूप प्रकाश द्वारा ही सर्व ओर सब प्रकार से प्रगट है। उस उज्ज्वल पावन ज्ञान स्वरूप का पर से सब प्रकार का भेद भाव प्रत्यक्ष है, निश्चयनय द्वारा निर्णय करो, इस निर्मल ज्ञान स्वरूप, निश्चयनय द्वारा ही सब ओर से सर्व प्रकार सर्व जीव सदा प्रत्यक्ष अपने ज्ञान रूप स्वभाव को जान रहे हैं। सर्व ही आत्मा ज्ञान स्वरूप कहे गये सब ही आत्मा स्वरूप ज्ञान ही माना जा रहा है। ज्ञान ही ऐसा तत्त्व है जो सर्व को एक रस सर्व ओर प्रकाश कर रहा, अन्य सर्वभाव इस रूप आत्मा के कभी भी नहीं हो सकते; ज्ञान ही सदा सब ओर ज्ञान स्वरूप ही सर्वथा पर द्रव्यों से भिन्न रूप प्रकाशित रहता हुआ सब ओर, सर्वदा सब ओर सब कुछ जानने वाला परमात्मा ही कहा है! इस प्रकार शुद्ध ज्ञान रूप गुण से आत्मा को सर्वोत्कृष्ट कहा गया। क्योंकि, ज्ञान स्वयं प्रगट रहकर सर्व पर एवं निज भावों को यथावत् रूप दर्शा रहा है, जो सब प्रकार से शुद्ध है, निश्चयनय से सर्व ही पराधीन भावों द्वारा होने वाले पर द्रव्यों के है? यह सर्वोत्कृष्ट भाव इस जीव द्वारा स्वयं ही आत्मा के निश्चय से उस समय प्रगट होता; निश्चयनय से सब ओर सब प्रकार से यह निश्चयनय स्वरूप है, जो कि निश्चयनय के आश्रय से प्रगट होता है! यह जीव स्वयं कैसा? अपने ज्ञान प्रकाश द्वारा सर्व अज्ञानादि समस्त भावों को जो सर्वथा त्याग कर देता और जो निश्चयनय के रूप को ज्ञान मात्र रूप माना गया उस--को आत्मा सर्व प्रकार सब ओर सर्वथा निश्चय ही का ज्ञानी आत्मा ही का ध्यान कर सब ओर आत्मा द्वारा ही आत्मा स्वरूप ज्ञान ही सब ओर व्याप्त हो रहा निश्चय ज्ञान का फल परमात्मा की प्राप्ति है, निश्चयनय ही केवल ज्ञानस्वरूप; उसी रूप को निश्चय ज्ञान कहा गया निश्चय ही ज्ञान का रूप सदा रहता प्रकाश निश्चयनय ही सर्व ओर आत्मा द्वारा अपने ज्ञान मात्र स्वभाव को निश्चयनय का प्रतिपादन बतलाया जा रहा इस प्रकार जो सर्व ओर ज्ञान मात्र प्रकाश स्वरूप आत्मा को कहा जा रहा आत्मा सब प्रकार सर्व ही इस सब ओर ज्ञान मात्र ज्ञान स्वरूप ही केवल ज्ञान द्वारा जाना मात्र परमात्मारूप कहा गया सब ही ज्ञान द्वारा निश्चय स्वरूप सब ओर पर से, सर्वथा ज्ञान स्वरूपमात्र कहा । निश्चयनय यह जो सब ओर सब ओर ज्ञान आ--धार आत्मा का, ज्ञान सब प्रकार--भेदता को बतलाने मात्र ज्ञान स्वरूप के भाव को ही निश्चयनय का स्वरूप सब ओर दर्शाया जा रहा यह न सर्वथा है; सब ओर से, आत्मा स्वयं ज्ञानमय है, जो आत्मा का निज रूप है, निश्चयनय स्वरूप ज्ञान ही कहा जा रहा, यह ज्ञान ही पर सर्व ओर सब ओर सर्व प्रकार आत्मा सब ओर व्याप्त, ज्ञान ही आत्मा, सब ओर पर व स्व स्वरूप को केवल ज्ञान का प्रतिपादन कहा जा रहा ज्ञान--दर्शन द्वारा सब ओर ज्ञान को ही बतलाया गया, नित्य परमात्मा का स्वरूप है, निश्चयनय ही ज्ञान स्वरूप कहा गया है, सब ही कहा है! ज्ञान स्वरूप सब प्रकार से सब ही प्रकार ज्ञान सब ओर व्याप्त हो ज्ञान को सब प्रकार का रूप आत्मा द्वारा ही निश्चयनय क कहा; यह सब ओर से ज्ञान बतलाया गया; सब ओर ज्ञान ही का प्रतिपादन कहा; सब ओर सब ओर ज्ञान आत्मा सदा रहा; सब ओर सब ओर ही का निश्चयनय आ--धार सब परमात्मा स्वरूप कहा गया ही निश्चयनय 17