भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

इस संसार का नियम! जिस पर कृपा कीजिये उसी से भय मानिये ॥ यह विचार करके राजाने उसपर कृपाकरके सोचा, इसको धन दे तो दूँ परन्तु यह तो हमेशा हमारे पास ही! इसलिये इसका प्रभाव राजमहल में रहेगा ही नहीं, पर जो दूसरा था उसी राजा उसका विश्वास न करने लगा और राजमहल की ओर आने से रोक दिया गया तो वह बहुत पश्चात्ताप करने को राजमहल गया पर राजा बोला कि; राजकुमार विनाकारण किसीके राजमहल में आया करे इसमें भलाई है? तब राजाने जो था दूसरा साधारण राजकुमार उस से भेंट करके उसको तो रख लिया; पर जो यह राजकुमार था उसको यह सोच कर अपना विश्वासपात्र बनाके सब खजाने काम में लगा दिया कि यह राजपुत्र तो न होनेसे कभीभी लोभ कर के धोखा न देगा ॥ परिणाम में फल क्या निकला; कि एक दिन जो सच्चा राजपुत्र था उस राजाने, कि जब वह खजाने के काम में सब ठीक प्रबन्धपूर्वक ही करता ही रहता ॥ उस समय में उस राजा के कान में यह, ॥ साधारण सा जो था वह फुसक उठाके उसके विरुद्ध उस बात को भरता ही रहा कि यह सब धन लूट कर लेजाने लग रहा राजाने तो कुछ समय तक तो सहा, परिणाम में राजा बोला; खजाने काम में खर्च का भी हिसाब कुछ ज्यादा होने लगा जिसे देख राजा को भय सा होने लगा कि ज्यादा खर्च करके, यह राजकुमार ही शायद इस राज्य को भी न दबाले इसलिये राजाने ही, राज्य में से उस सच्चे राजकुमार को तो निकालदिया पर उस कपट रूप-वाले दूसरा रख लिया इसका अभिप्राय यह कि कपट रूप--आदमी का तो यह स्वभाव ही है, साधारण मनुष्य जब कभी भी उस कपटवाले को या उस कपटवाले रूप महात्मा रूप कपट का दर्शन पाता है, तो कपट रूप कपटवाले रूप महात्मा को देख कर के, कप--कपट का रूप उल्टा रूप में उस कपट को देख कर विश्वास कर लेता, परिणामतः, महात्मा रूप का न देकर, कपट महात्मा को उच्च मान कर प्रतिष्ठा करता ही रह कर पश्चात् रोता ही रह जाता है, और जब कभी भी सच्चा रूप साधारण मनुष्य का मिले! तो भी उस पर तो संदेह रूपी दृष्टी से देखता रहेगा कि यह भी तो कपटवाले का भाई ही तो नहीं है रूप में जो यह भी कपटवाले रूप महात्मा में तो विश्वास कर लेता रूप में कपटवाले को देखके धोखा खागया पर सच्चे भक्त स्वरूप को देख धोखा खाया हो; सो बात तो कभी नहीं! कपटवाले मनुष्य पर तो भरोसा? ऊपर लिखा सब प्रकार सुन कर सच्चा महात्मा सब बात सुन करके बोला परिणाम इसका यह सम्भव हुआ, कपट के आधार सब बात समझ आने पर सब प्रकार का भेद खुला महात्मा जी कहने लगे कि उस कपटवाले भक्त रूप का भी, जो ऊपर वर्णन का किया गया उसका भेद अब खुल ही तो गया जिससे परिणाम में जो कपट का ही आधार बन कर विश्वास पात्र बन सका सो भी खुल ही गया जिससे यह भी कपट कपटवाले का, उस पर विश्वासपात्र का तो सब आधार समाप्त हो गया! पर परिणाम क्या रहा! केवल कपट रूप कपट रूपी अभिप्राय साधारण मनुष्य रहा, कपट वेशवाले का कपट रूपी कपटता का रूप तो न केवल उस कपट वेशवाले को धोखा ही केवल देता रहा होगा ही, पर दूसरे कपट वेशी भक्त को कपट वेशी ही, कपट का विश्वास रूपी रूप को कपट समझ कर कपट का आधार न रहा जो रूप में कपटका ही कपट समझना रूप से कपट समझना अब कपट का आधार बन गया सो कपट रूपी रूप कपट रूपी कपटका रूप में कपट कपट आधार ही कपटका रहा, जिससे कपट कपट का पश्चात्ताप कपटवाले को; कपटवाले कपट कपट पश्चात्ताप का ही फल उस कपटवाले कपट रूप में मिल रहा कपट का कपट ही फल पाया कपट कपट जिसने कपट किया--कपटवाले कपटका ही, कपटवाले कपटका ही, कपटवाले कपटका ही, कपटवाले कपट का फल; कपट कपटवाले ही को मिला, कपटवाले को कपट का फल ही मिला कपट, कपट का कपट कपट--ही फल पाया कपट कपट--फल का कपट कपट का कपट ही फल कपटवाले, कपट ही तो ही कपट, कपट कपट कपट कपटका कपट फल मिला कपटका कपटका, कपट ही तो फल कपट कपट कपट कपटका पर कपट रूप तो सब कपट ही फल पाया, सच बोलने वाले को कपट फल कभी कपट के तो कपट रूप में कपट ही तो मिला ही! पर सच बात कभी कपट 15

होता देखना पड़ा था आखिरकार स्वामी विवेकानन्दजी भारत को वह दृश्य देखने मिला जिससे वह खुश तथा प्रसन्नचित्त हुए और माता-पिता अपने घर की लक्ष्मी को घर पर देख करके जो प्रफुल्लित और आनन्दित होते हैं तथा जिस तरह माँ का दूध पीकर बच्चा, चाहे कैसा कितना कमजोर या पहलवान क्यों न हो तन्दरुस्त हो जाता है उसी प्रकार स्वामी, जो तीन लगातार अमरीका वासियों तथा यूरोप वासियों सहित तमाम विदेशी भाई बहिनों भारत सन्तानों को धर्म का पाठ पढ़ाकर घर को लौटे कैसा आनन्द महसूस किया होगा क्या यह कोई कह सकता है? अथवा कोई लिख सकता? स्वामी जीको भारत सन्तान कह लो चाहे भारत माँ का प्यारा बेटा--यह कहना कोई; कोई अनुचित बात तो आखिरकार होगी; माता-पिता... व माता-पिता दोनों का सम्बन्ध या बड़ोंका रिश्ता तो माता-पिता अपने बच्चों पर प्रदर्शित कर सकते हैं; आखिरकार सन्तान चाहे सौ वर्ष की क्यों न हो जाय बच्चे को बच्चा ही कहेगी, इसलिए भारत माँ का प्रत्येक बच्चा या प्रत्येक सन्तान का पहला फर्ज यह है कि जिस भारत माताने उसको गोद दी उस माताकी गोदको कभी भी कलंकित नहीं होने दे बल्कि वह ऐसा सदाचार व्यवहारिक रूप सदा दिखलाए, जो सब को पसन्द व अच्छा लगे? क्या यह जो कुछ कहा गया सब सत्य नहीं है, इसका जो भी उत्तर होगा सोच समझ कर दें, या सोचें क्या इस तरह का विचार प्रत्येक व्यक्ति का होना चाहिए; जो व्यक्ति ऐसा सोच लेता और उस पर है, उसको कोई क्या कहेगा? वह व्यक्ति तो स्वयं भगवान स्वरूप रूप होकर व उस परमात्मा का स्वरूप रूप बनकर कहलाएगा कि जिस पर सन्देह नहीं किया जा, अतः प्रत्येक मानव समाजको ऐसा अपना लक्ष्य बनाना चाहिए कि भारत माँ का प्रत्येक सन्तान को सन्मार्ग पर चलना सिखा करके आगे बढ़ाएं न, किसी प्रकार भी कोई; आखिरकार भारत माँको एक एक सन्तानका हक बनता तथा फर्ज कि आखिरकार उसकी सन्तान का भला सोचे, चाहे वह किसी मतका या सम्प्रदायका क्यों नहोवे यह तो फर्ज बनता ही सब लोग भाई भाई हैं--यही तो इस बात का, प्रमाण भी है। "आपस में प्रेमभाव सब को रखना ही आखिरकार हर इन्सान का पहला फर्ज बनता है।" इस माता-पिता रूपी ईश्वर का फर्ज सब को चाहिए, जिससे कि प्रत्येक बात सुलभता पूर्वक आसानी पूर्वक समझ में आ जाय। इसलिए प्रत्येक को अपने धर्म का स्वरूप पहचान कर काम करना ही होगा; इस वास्ते जो कुछ सब समझाया गया उस पर अमल करना परम धर्म है और फर्ज भी बनता है, यदि हम अपने धर्म पर चल करके संसार को भी उस का रास्ता बता देंवे तो सब का उद्धार होगा ही होगा इसमें तनिक संशय समझना सर्वथा भूल ही तो होगी। इस का नाम धर्म या सनातन परम्परा, मर्यादा, का स्वरूप जो सब को सत्य तथा सत्य की मर्यादा बतला कर संसार के तमाम द्वन्दोंको समाप्त करवाएगा। संसार के अन्दर जो कुछ अशांति दिखाई पड़ती उस का मूल कारण यही तो मालूम होता है अन्यथा कोई कारण नहीं दिखाई देता क्योंकि सत्य का रूप ऐसा है; जिस को सब कोई मान ही लेता! जो इन्सान सत्य की ही मर्यादापर चल करके दूसरोंको सत्य का दर्शन कराता वह तो उस का अपना कर्तव्य तथा धर्म की सेवा समझना सब कोई चाहेगा ही, यह तो वह इन्सान, जो धर्म और सत्यके नियमों पालन करेगा; आखिरकार जो इस बात तथा धर्म की वास्तविकता को जान लेगा उसको अवश्य समझ आ जायगी कि तमाम मत पन्थ-धर्म केवल दिखावा करके मात्र एक भ्रम जाल फैलाया गया रहा है जो कि, केवल सत्ता लोलुप लोगों द्वारा फैलाया गया--है यह भ्रम, जाल; सत्ता प्राप्त, करने वाले लोग अधिकतर चाहे, राजनीतिक क्षेत्र के हों या फिर धर्म का नाम लेकर के लोग, जो केवल एक तरह का जाल-सा बिछा देते हैं, प्रत्येक मत का रूप केवल यही एक सा दिखाई देता कि सब को अपनी सत्ता कायम रखने का प्रयास मात्र ही दिखाई देता होता क्या इन बातों द्वारा कोई इन्सान ईश्वर दर्शन कर सकेगा? कदापि नहीं हो सके सकता है, इस बात का दावा हर कोई जिसने ईश्वर दर्शन या सत्य अनुभव किया वह तो डं के, साथ कह सकता और कहेगा; आखिरकार यह बात तो हर एक की समझ में आ जानी चाहिए कि ईश्वर का रूप क्या इस तरह बन सकता या बना सकता है; प्रत्येक मत का मठाधीश अपने को तो बहुत बड़ा मठाधीश समझता है पर भगवान् के लिए उस के पास क्या भाव है यह बात तो वह जाने या ईश्वर जाने कि वह कितने पानी में भगवान् को रखता है; क्या वह भगवान्के लिए सब कुछ त्याग करके दिखा सकता या नहीं इस बात का फैसला तो भगवान् तथा सब लोग ही कर सकते हैं; यह बात तो कोई विद्वान

16

इस प्रकार जब आत्मा का रूप पर से भिन्न और अपने रूप स्वभावमय प्रत्यक्ष प्रतीत होने लगेगा; तब जीव--अजीवाधिकार! अब समाप्त हुआ ऐसा स्वयं अनुभव करेगा अर्थात् इस सर्वोत्कृष्ट अधिकार का सारांश क्या प्राप्त हो गया? यह जानना ही शेषरहा? फिर उसका प्रतिपादन भी क्यों किया जायेगा? इस समय आचार्य देव समयसार का कथन कर आत्मा का जो परमात्मा का स्वरूप बतलाते यह बात उन जीवों द्वारा जानी जा सकती है जो सर्व प्रकार के मिथ्यात्व का परित्याग करके ज्ञान मात्र स्वरूप का वेदन, निर्णय करते हैं। इस प्रकार आत्मा, जो कि अन्य समस्त पराधीन भावों रूप विकल्पावस्था से दूर होकर स्थित है, उसे जब यह आत्मा स्वयं प्रत्यक्ष अनुभव में लेता! आचार्य देव को यह आश्चर्य! होता हुआ प्रतीत होता है। आत्मा का स्वरूप ज्ञान स्वरूप है। उसे अन्य समस्त पदार्थ भिन्न ही हैं। अन्य समस्त पर द्रव्यों से, जो कि जड़ स्वरूप अचेतन हैं। इन समस्त पर द्रव्यों से भिन्न यह तो केवल जानने मात्र स्वरूप सर्व द्रव्यों का ज्ञातादृष्टा भाव ही आत्मा स्वरूप कहा गया कहा गया। भगवान् सदा चिद्रूप ही सर्व पदार्थों ज्ञान का ज्ञाता होता हुआ जाना जाता है। उस चेतना का कभी भी विनाश नहीं हो सकता इस प्रकार चिद्रूपता आत्मा का है; ज्ञान चेतना रूप सर्व ज्ञाता है; अचेतन पदार्थ को, आत्मा भिन्न रूप से ही सदा जानता है, कभी राग रूप अथवा अन्य कर्म रूप कार्य इनका कभी भी इस जीव का स्वरूप नहीं कहा जाता क्योंकि आत्मा ज्ञान रूप सदा, सब ओर ज्ञान रूप, ज्ञान मात्र ही सब जगह है, अन्य भाव इस जीव नहीं हैं। यह आत्मा स्वयं ज्ञान रूप प्रकाश द्वारा ही सर्व ओर सब प्रकार से प्रगट है। उस उज्ज्वल पावन ज्ञान स्वरूप का पर से सब प्रकार का भेद भाव प्रत्यक्ष है, निश्चयनय द्वारा निर्णय करो, इस निर्मल ज्ञान स्वरूप, निश्चयनय द्वारा ही सब ओर से सर्व प्रकार सर्व जीव सदा प्रत्यक्ष अपने ज्ञान रूप स्वभाव को जान रहे हैं। सर्व ही आत्मा ज्ञान स्वरूप कहे गये सब ही आत्मा स्वरूप ज्ञान ही माना जा रहा है। ज्ञान ही ऐसा तत्त्व है जो सर्व को एक रस सर्व ओर प्रकाश कर रहा, अन्य सर्वभाव इस रूप आत्मा के कभी भी नहीं हो सकते; ज्ञान ही सदा सब ओर ज्ञान स्वरूप ही सर्वथा पर द्रव्यों से भिन्न रूप प्रकाशित रहता हुआ सब ओर, सर्वदा सब ओर सब कुछ जानने वाला परमात्मा ही कहा है! इस प्रकार शुद्ध ज्ञान रूप गुण से आत्मा को सर्वोत्कृष्ट कहा गया। क्योंकि, ज्ञान स्वयं प्रगट रहकर सर्व पर एवं निज भावों को यथावत् रूप दर्शा रहा है, जो सब प्रकार से शुद्ध है, निश्चयनय से सर्व ही पराधीन भावों द्वारा होने वाले पर द्रव्यों के है? यह सर्वोत्कृष्ट भाव इस जीव द्वारा स्वयं ही आत्मा के निश्चय से उस समय प्रगट होता; निश्चयनय से सब ओर सब प्रकार से यह निश्चयनय स्वरूप है, जो कि निश्चयनय के आश्रय से प्रगट होता है! यह जीव स्वयं कैसा? अपने ज्ञान प्रकाश द्वारा सर्व अज्ञानादि समस्त भावों को जो सर्वथा त्याग कर देता और जो निश्चयनय के रूप को ज्ञान मात्र रूप माना गया उस--को आत्मा सर्व प्रकार सब ओर सर्वथा निश्चय ही का ज्ञानी आत्मा ही का ध्यान कर सब ओर आत्मा द्वारा ही आत्मा स्वरूप ज्ञान ही सब ओर व्याप्त हो रहा निश्चय ज्ञान का फल परमात्मा की प्राप्ति है, निश्चयनय ही केवल ज्ञानस्वरूप; उसी रूप को निश्चय ज्ञान कहा गया निश्चय ही ज्ञान का रूप सदा रहता प्रकाश निश्चयनय ही सर्व ओर आत्मा द्वारा अपने ज्ञान मात्र स्वभाव को निश्चयनय का प्रतिपादन बतलाया जा रहा इस प्रकार जो सर्व ओर ज्ञान मात्र प्रकाश स्वरूप आत्मा को कहा जा रहा आत्मा सब प्रकार सर्व ही इस सब ओर ज्ञान मात्र ज्ञान स्वरूप ही केवल ज्ञान द्वारा जाना मात्र परमात्मारूप कहा गया सब ही ज्ञान द्वारा निश्चय स्वरूप सब ओर पर से, सर्वथा ज्ञान स्वरूपमात्र कहा । निश्चयनय यह जो सब ओर सब ओर ज्ञान आ--धार आत्मा का, ज्ञान सब प्रकार--भेदता को बतलाने मात्र ज्ञान स्वरूप के भाव को ही निश्चयनय का स्वरूप सब ओर दर्शाया जा रहा यह न सर्वथा है; सब ओर से, आत्मा स्वयं ज्ञानमय है, जो आत्मा का निज रूप है, निश्चयनय स्वरूप ज्ञान ही कहा जा रहा, यह ज्ञान ही पर सर्व ओर सब ओर सर्व प्रकार आत्मा सब ओर व्याप्त, ज्ञान ही आत्मा, सब ओर पर व स्व स्वरूप को केवल ज्ञान का प्रतिपादन कहा जा रहा ज्ञान--दर्शन द्वारा सब ओर ज्ञान को ही बतलाया गया, नित्य परमात्मा का स्वरूप है, निश्चयनय ही ज्ञान स्वरूप कहा गया है, सब ही कहा है! ज्ञान स्वरूप सब प्रकार से सब ही प्रकार ज्ञान सब ओर व्याप्त हो ज्ञान को सब प्रकार का रूप आत्मा द्वारा ही निश्चयनय क कहा; यह सब ओर से ज्ञान बतलाया गया; सब ओर ज्ञान ही का प्रतिपादन कहा; सब ओर सब ओर ज्ञान आत्मा सदा रहा; सब ओर सब ओर ही का निश्चयनय आ--धार सब परमात्मा स्वरूप कहा गया ही निश्चयनय 17

▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯▯; ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ "▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯" ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯--▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯-- ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯; ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯? ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯? ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯? ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯; ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯

इस बात का पता था, लेकिन परिस्थितिवश उन्होंने अपनी मानसिक व्यथा किसी बच्चे अथवा बन्धु-बान्धव, किसी सहृदय साथी व मित्र, या फिर अन्य किसी व्यक्ति आगे प्रकट नहीं, कभी इस बात का अहसास कराया गया, अकारण ही उन सबको समाज विरोधी किसी भी रूप में तय नहीं, अलबत्ता जो व्यक्ति या समूह इस कार्यकलाप विरोधी था उसकी मंशा जरूर संशय उत्पन्न करनेवाली स्थिति पैदा करती, परिस्थितिवश समाजकंटकों द्वारा समाज की इस विधा शाखा तथा या अन्य को; जिसे समाज तथा समय ने, सही रूप से उचित तथा उपयोगी ही नहीं माना वरन् सब को उचित भी माना गया, समाज का बहुसंख्यक या सम्प्रदाय वर्ग; अधिकांश जन-साधारण-समूह इसे सही ठहरा, समाज हितकारी कार्य मानकर ही इसकी सराहना की! ऐसे ही कुछ जन समाज के ही लोग विपरीत धारणा रखते थे अथवा वे समाज का अहितकर रूप ही मान रहे थे जिनको कभी भी समाज का सिरमौर कहा, नहीं कहा जा सकता था लेकिन वे जनहित तथा समाज हित सम्बन्धी, यद्यपि कोई महत्वपूर्ण, उपयोगी काम नहीं करते; अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिए बिना भी समाज में नहीं रह पाते, या रह ही नहीं सकते थे। समाज हमेशा कुछ भिन्न-भिन्न प्रकार की धारणा रखने वालों से युक्त रहा, कभी-कभी तो जनहित कार्य का भी विरोध समाज के कुछ लोग अपने स्वार्थ की वजह से करने लगते, सम्भवतः यह, काम भी कुछ ऐसा समाज विरोधी समूह द्वारा किया जाता रहा जिसे समाज की यह उच्च सोच तथा कार्य का यह स्तर बिल्कुल पसन्द न आ रहा था या वे ऐसा नहीं होने देना चाहते थे कि उन पर इस तरह के कार्य कोई प्रभाव पड़े व उन पर कोई संकट आये। "खैर, जो सम्भव हुआ उसे होने दिया जाए ताकि आगे ऐसा काम कोई न कर सके या फिर आगे चल, कर वह इसके आगे न बढ़ सके।" सर्वसम्मति अपने पक्ष में कर लेने के लिए वह कुछ भी करने को हर हाल में जो तैयार हो चुका व्यक्ति या समूह कुछ समय इधर-उधर करने के पश्चात्-पश्चात् जब सफल न हुआ होगा तब ही समाज तथा सब कुछ अपने पक्ष में करना चाहेगा, तब ही व्यक्तिगत रूप उसने अपनी चाल-ढाल-चरित्र उजागर करना शुरू किया होगा। खैर, यह निष्कर्ष अब तक के विचार विमर्श द्वारा स्पष्ट हुआ। समाज का एक बड़ा प्रभावशाली वर्ग इस प्रकार केवल अविश्वास--की भावना तथा भ्रम का वातावरण ही, जन्म दे रहा था, परिस्थितिवश इस प्रकार समाज का एक नुकसान किया जा रहा था जिसकी भरपाई का कोई दूसरा मार्ग नहीं था या हो सकता था वह सब कुछ केवल, सोच-विचार तक ही रहा, ताकि समस्या का कोई समाधान या हल निकालने का रास्ता सम्भव हो सके। उसने सोचा समाज कल्याण सम्बन्धी कोई बात बने, जब तक समाज के लोग सही मानसिकता तथा सोच का साथ नहीं देंगे इसके साथ सहयोग नहीं देंगे तब तक समस्या बना रहना तय--था या हो जाना तय था फिर तो इस तरह समाज का कोई भी भला अथवा इस प्रकार समाज का तो कोई भला न होगा।" समस्या का हल न हो सके समाज के सभी सदस्य या बहुसंख्यक प्रभावशाली वर्ग को कोई भी ऐसा कदम उठाने से पूर्व सोचना होगा "समस्या का कोई कारण खोज निकाला जाना चाहिए, तब कहीं जाकर इसका हल निकल सकेगा" ऐसा उसने कुछ समय के उपरान्त ही सोचा, ताकि समस्या निवारण सम्बन्धी कोई ठोस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके जिसका प्रभाव बहुसंख्यक जन तक पड़े! एक विवशता उजागर हो रही बिना किसी बात के; जो हो रहा उसे होने का कोई औचित्य--या तो नहीं होगा या फिर जो कुछ हो रहा केवल दो जन ही जान रहे एक विवशता उजागर हो रही उस पर कुछ कहा जाना तो सम्भव हो नहीं रहा होगा जिस प्रकार सब कुछ था, खैर; देखना आगे क्या कुछ होता है, तो; इस बात का पता बाद चल सकेगा एक विवशता उजागर हो रही बहुसंख्यक जन तक इसका कोई प्रभाव न होने के कारण इसे बहुत ही सहज रूप, लिया जा रहा था जिसे आगे चलकर घातक रूप धारण कर लेना चाहिए जिसे केवल अपनी व्यथा कहा जाना था। स्वयं समाप्त हो सकता था, कोई दूसरा इसका लाभ, उठाये अथवा इसका उपयोग कर ले नहीं कह 19

इसके बाद उसने किसी दूसरे गाँव जाकर 'हा! हा! मेरे स्वामी कहाँ गए सो कोई बतलाओ मुझे कि जिसके संग मेरा मन और चित्त का मोह दूर किया था; नटनागरवर मनोहरवर हे प्राणप्यारे किधर गए--अब मैं क्या करूँ कहाँ जाऊँ? हा हा! अब किस भाँति उस सुख को देखूँ? इत्यादि दो प्रकार का यह विरह प्रकट करके पछताती हुई सब सखि पर जब नहीं पाए तो फिर घर को लौट आई तब मन में विचारने लगी कि क्या अब कोई भी ऐसा नहीं रहा जो प्राणनाथ कृष्ण से मिलावे, हा कृष्ण दयाल दयानिधे! हा हे प्रभु मेरी रक्षा कीजिये ना! प्राण जीवन, चित्त चोरन श्याम! प्राण-नाथ मनमोहन, सुन्दर बदन को ना भूलूँगी एक पलक कभी; तुम बिना सब शून्य सुनो, जिस दिन मिले थे, रूप देखा था; सो तो रूप सदा ही दीखता है; सुगन्ध से शरीर के सब कष्ट मिटे थे सो भी है, हा नाथ! सो तो कहाँ, सो विचार करके वह सब रात रोती ही रही और सुबह को उठकर सब गोपियों पास जाकर सब रूप में नारायण ही को जान कर किसी को भी पराया न समझा जिस पर कृष्ण कृपा करे सो सब में कृष्ण ही को देखे और जब ऐसा जानेगा तो शोक, मोह जाता रहेगा, सो उस को भी हो गया; सब को अपना ही समझ कर कहने लगी हे सखि, उस मुरलीधर कृष्ण को तुम सब ने देखा है? जिसने परसों चित्त चुरा लिया और मुझ को मत करो ऐसा, सुधि में रहो जी, सो कहा था, पर वह रूप न जाने कैसा आनन्द का सागर था जिस का स्मरण सब ओर व्याप गया? अब तो हम को लगता ही नहीं कि इस से भिन्न कुछ भी है और संसार में सब कुछ जो है सो कृष्ण ही कृष्ण का रूप बन गया है, जिस रूप देखने को आँखें व्याकुल थीं सो सब ओर? कहती ही सुख मान रही थी कि इतने में--सब सखि सब को घेरकर कृष्ण कृष्ण ही कहने लगी कि यह कृष्ण है जब गोपियों ने ऐसा विचार किया सब मिलकर एक चित्त होकर तो सब सखि पर कृष्ण लीला प्रकट हुई, भगवान् लीलाधारी सब के मन में आन विराजे सो गोपियों ऊपर कृपा हुई सब किसी ने मान ही लिया कि कृष्ण न केवल वन में ही हैं, पर मन में हैं तो-- कहाँ नहीं? सब मिलकर इस बात को विचार कर ध्यान में मग्न हो कर बैठ गईं और सब अपने चित्त में ही रूप देखने लगीं, सो रस मिला; जो जिस भाव से चाहे सो वैसा रूप देख लेवे सो गोपियों को रूप का ध्यान बँध सो रूप सब 20

परम पूज्य गुरुदेव का अमृत चिन्तन सदा स्वस्थ और सुखी रहें

जबसे भारतीय खान-पान रहन सहन अस्त व्यस्त हुआ तभी से इस देश का जन बल घट गया; हम भूलते जा रहे हैं कि हम जो कुछ भी खाएं सोच समझकर खाएं तथा उतना ही? जो शरीर के लिए आवश्यक

आहारशास्त्र के ज्ञाता मनुष्य और प्राणिमात्रकी प्रकृति को दो या तीन उप-- भागों वात, पित्त तथा कफ में विभाजित कर सकते हैं। शरीर का जब तक वायु, पित्त तथा कफ पर आधिपत्य रहता है; स्वास्थ्य अक्षुण्ण रहता है। प्रकृति की रचना विकृत होने पर उपर्युक्त इन तीनों अथवा तीनों में से किसी एक का प्रकोप बढ़ जाता है। तब मनुष्य अपनी रोग-प्रतिरोधी क्षमता खो बैठता है। आज भारतीयों की प्रकृति में जो विकार आ गए हैं उन पर दृष्टिपात करें तो ज्ञात होगा कि अधिकांश वात जन्य रोगों से पीड़ित हैं। इसका एक कारण यह भी है कि पेट में गैस बनना साधारण बात है। हमारे देश के आहार में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा बढ़ गई है, जो कि वात विकारों को आमन्त्रित कर रही है। आलू का प्रचलन इतना बढ़ गया है कि शाकाहारी भोजन आलू के बिना अधूरा समझा जाता है; यह कार्बोहाइड्रेट उत्पन्न करने के अतिरिक्त अन्य कोई कार्य नहीं करता। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता, अधिक परिश्रम करने वालों के लिए यह कुछ उपयोगी है पर जो कम शारीरिक श्रम करते हैं वे अपनी पाचन प्रणाली को बिगाड़ ही लेते हैं। आलू को तलकर या घी-मसालों के साथ खाना तो और भी हानिकारक है; साथ ही बासी व तला आलू तो और भी नुकसान करता है। आलू के छिलके उतार कर प्रयोग करना, तो उसके गुणों को नष्ट कर देना है। आज भोजन में से हरी-सब्जी कम हो गई है। आलू अधिक बढ़ गया है। क्या हम इन कारणों पर विचार करते हैं? भोजन करते समय विचार करना चाहिए कि क्या, कितना और कैसे खाया जाए। पर क्या हम इस ओर ध्यान देते हैं? भोजन करते समय क्या, कब और कितना खाया जाए इस ओर ध्यान देना चाहिए, नहीं तो इसका उल्टा प्रभाव पड़ेगा। यदि भोजन रुचिपूर्ण न होगा तो वह पचेगा कैसे? भोजन के पाचन में लार का प्रमुख हाथ रहता है। लार के बिना भोजन पच नहीं सकता। भोजन को खूब चबाकर खाना चाहिए। चबाकर भोजन को खाने से लार पूर्ण रूप से उसमें मिल जाती है। भोजन जल्दी-जल्दी नहीं खाना चाहिए... । भोजन "धीरे-धीरे चबाकर खाया जाए" यह भी ध्यान रहे कि खूब भूख लगने पर ही खाया जाए। बिना भूख के खाना नहीं खाना चाहिए... ।

▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯; ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯; ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯; ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯; ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯; ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯; ▯▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯; ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯-▯▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯▯ ▯▯▯ "▯▯▯▯▯-▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯" ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ "▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯" ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯? ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯? ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯-▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯... ? ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯! ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯; ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯ ▯▯▯▯; ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯--▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯--▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯--▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯-▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯-▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯--▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯--▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯... ▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯; ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯; ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯--▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ .▯▯▯-.▯▯▯, ▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯; 22

□□□□ □□ □□□ □□; □□□ □□ □□□ □□ □□, □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□, □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□? □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□; □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□, □□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□! □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□ □□□□ □ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□□; □□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□? □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□? □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□; □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□, □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□, □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□, □□□ □□□□; □□ □□□ □□□ □□ □□ □□, □□ □□□ □□ □□ □□□□□□□□□□□□ □□□ □□□ □□, □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□-□□□□ □□□ □□□; □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□; □□□ □□□□ □□ □□□! □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□, □□□□□ □□□□□□ □□□, □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□, □□□ □□□□□□ □□□ □□□□□□□□□□□, □□□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□, □□□ □□ □□□□□--"□□□□□-□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□" □□□□ □□□□ □□? □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□, □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□; □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□, □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□? □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□, □□ □□□□□ □□ □□□, □□ □□□ □□ □□□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□, □□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□? "□□□□□-□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□"... □□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□--□□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□--□□□□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□, □□□□ □□ □□□□ □□□□; □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□, □□□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□□--□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□; □□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□--□□ □□ □□□□, □□ □□□□□, □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □ □□□□□□? □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□, □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□, □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□, □□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□-□□□□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□, □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□, □□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□ □□, □□□□□□□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□ □ □□ □□□□ □□□□, □□□□□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□, □□□□□□ □□□□□□, □□□□□□ □□□□□□□□□□! □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□, □□□□□□□, □□□□□-□□□□□□□, □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ 23

□□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□, □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□, □□□□-□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□, □□□□-□□□□□ □□ □□□□□ □□□ "□□□□□-□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□" □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □ □□□□□ "□□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□" □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □ □□□□; □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ "□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□" □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□? □□□□□ □□□ □□□□ □□□□, □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□; □□□□□ □□□□□□□□, □□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□? □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□-- □□□ □□□□ □□□--□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□, □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□, □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□--□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□, □□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□ □□, □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□? □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□ □□, □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□, □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□? □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□? □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□! □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□, □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□, □□□□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□-□□□□ □ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□-□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□, □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □ □□--□□ □□□□ □□□ □□□□, □□□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□□, □□ □□□□□ □□□ □□ □□, □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□, □□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□, □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□□□□ □□□□-□□□□ □□□, □□□□ □□□□-□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□, □□ □□□ □□□□□ □□□, □□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□! □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□-□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□; □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□, □□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□, □□□□ □□, □□□□ □□, □□□□ □□, □□□□□□□ □□ □□□□, □□□□ □□ □□□ □□□□, □□□□□□ □□ □□□ □□□□--□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□; □□□□□□□□ □□--□□ □□ □□□, □□□□ □□ □□□, □□□□ □□ □□□□□, □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□, □□ □□□ □□, □□□□ □□--□□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□; □□ □□□ □□, □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□, □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□, □□□□□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□! □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□□□□? □□ □□□□ □□□□ □□□□□□, □□□□ □□ □□□ □□□□□□□□, □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□... ! □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□ 24

(नोट: मूल पृष्ठ पर फ़ॉन्ट एन्कोडिंग/रेंडरिंग त्रुटि के कारण सभी देवनागरी वर्ण खाली बॉक्स/तोफ़ू '□' के रूप में प्रदर्शित हैं।)

The text in the provided image cannot be read or transcribed into meaningful Devanagari words because the font failed to render when the document was generated or scanned—every letter appears as an empty rectangle/tofu symbol (), leaving only punctuation marks, dashes, question marks, and the page number visible.

Here is the line-by-line transcription of the visible layout, punctuation, and markers from the page:

▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯; ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯-▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯; ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯; ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯; ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯! ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯! ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯... ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯.▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯--▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯; ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯! ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯; ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯; ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯ ▯▯ 25

परम्परागत ज्ञानियों जैसा दम भर रहे; कार्यकारण व्यवस्था का साधन मात्र मानकर जो किसी वस्तु तथा व्यक्ति विशेष अथवा घटना को ही श्रेय अथवा, पश्चाताप, प्रतिरोधक-दबाव का कारणत्व ही मानते चले आ रहे/मानने वाले हैं/मान रहे/मान सकते हैं/उन सबको, जिनने पद एवं पद को प्राप्त होने वाले द्रव्य तथा आचरण द्वारा शासित जन को देख कर, यह सम्भव या प्राप्त किया अथवा समझ लिया कि पद ही समस्त प्रकार की समस्याओं का निदान करने लगता है। अरे भैया ना पद तथा जन बल ही सब कुछ कर लेता होगा! वास्तविक रूप मात्र पद या जन बल द्वारा नहीं हो पा, शक्ति को प्राप्त किए बिना शासित या शासित समाज क्या कभी सुखी तथा सुव्यवस्थित रह सका है? क्या संसारी जन की कभी तृष्णा शान्त हुई? जहां तक मैंने देखा, जाना तथा सुना ज्ञान द्वारा शासित जन कभी आकुल नहीं हो सकता तथा नहीं रह सकता जब तक कि वह पद या जन या धन के प्रभाव द्वारा शासित मन को ही पद की व्यवस्था का प्रभावकारी साधन न मान बैठा हो/ मान ना बैठा समझता रहा हो; वस्तुतः ना केवल ज्ञान मात्र सब कुछ क्रिया--पद व्यवस्था का संचालन कर रहा वास्तविकता स्वरूप में, अपितु क्रिया शक्ति द्वारा सम्पन्न मन ही, अपनी क्रिया शक्ति को संयत मन के अधीन हो, सब प्रकार का वैभव पा कार्यरूप परिणत कर सब कुछ पा या जान सका या जानने का प्रयास कर ही सका होगा या सब कुछ जान सके सब कुछ कर भी सकता हो, यह सब शक्ति सम्पन्न मन तथा ज्ञान द्वारा सम्भव हुआ या किया जा सका? क्या कभी विचार मात्र से? यह सब विचार द्वारा भी, सम्भव हो सका, तब ज्ञान का प्रभाव रूप हो ही सका होगा ऐसा सब अनुभव भी, यह सब ज्ञानवान् या ज्ञान सम्पन्न सब प्रकार के वैभव प्राप्त सब जन जन का आचरण रहा ही था/होगा/रहा सब जन का सम्बोधन रहा होगा ही जिसे देख कर सब जन को भी तो सब जन का पद रूप हो ही सका ही रहा होगा, यद्यपि ज्ञान मात्र ज्ञेय-ज्ञेयक व्यवस्था तक सीमित या ज्ञेय-ज्ञेयक सम्बन्धी ज्ञान व्यवस्था विशेष तक मात्र रह गया हो, ज्ञान द्वारा ही वास्तविक व्यवस्था रूपी मर्यादा का पालन सब जन के पद द्वारा ही किया, पाया गया; केवल ज्ञान मात्र का ध्यान सब जन को रहा? तब तो सब जन ज्ञानी ही--सब जन का तो ध्यान ही रहा, सब जन ज्ञान के साथ आचरण सम्पन्न सब प्रकार जन बन सका, ना कि मात्र पद ही! पद से ही ज्ञान मात्र बना ही रह सका था यद्यपि सब प्रकार जन ज्ञान द्वारा ही, पद की पद से हीन जन को सब प्रकार का अधिकार दे दिया पर मात्र अधिकार मात्र पा कर, जो अधिकारी या सम्पन्न जन, ना कभी ज्ञानवान् हो सकता ना सम्बोधन या कल्याणकारी अथवा पद द्वारा शासित या ज्ञान सम्पन्न हो सकता था/हो-सका/हो-सकेगा/ न हो सका, जो सब जन केवल वास्तविक ज्ञानवान् अथवा पद सम्पन्न होकर अपने अधिकार रूपी पद को ही सब कुछ अधिकार का रूप ही मानने लग गए हों; परिणाम स्वरूप ज्ञान सम्बन्धी ना मन को वह जान सका ना अन्य जन को ही, पर केवल, मात्र परम्परा का रूप ही चलाने लगा/लगा दिया गया हो सकता था जिसके कारण ज्ञान का जो रूप था सो, ज्ञान रूप ज्ञान रूप मात्र ही, सीमित होकर रह गया; ना ज्ञान रहा ही, ना ज्ञानवान् ही केवल पद प्रतिष्ठा का रूप पाकर ही आचरण भी भ्रष्ट हुआ, जो सब प्रकार के जन का या सबका आचरण रूप हो चला था, सो सब अज्ञान के वश होकर ही सब को ज्ञान का ना सम्बोधन ही मिला तथा सब ने ज्ञान रूपी प्रकाश को ही, ज्ञान ना समझ कर पद को ही अधिकार जनित या मानकर अपने मन को ही ही एकमात्र व्यवस्था का संचालक मान कर सब कुछ को ही ज्ञान मान कर ही रहा। यद्यपि सब विकारवान् जन ना सब जन का सम्मान या आदर मात्र सब प्रकार के समाज से पा सके जन तथापि, सब कुछ सब जन केवल सम्पन्न तो अपने ज्ञान द्वारा किया ही; मात्र विकारों, सब विकार रहित रूप को भगवान् का रूप मानकर ही क्रिया--ज्ञान रूप ही देखा, जो क्रिया के साथ ही ज्ञान--रूप मन सम्पन्न हो सब प्रकार का ज्ञेय-ज्ञेयक रूप को ज्ञेय-ज्ञेयक रूप से, पद रूप ज्ञान का रूप मानकर न केवल न केवल, ज्ञान के रूप को मर्यादा का रूप ज्ञानकर ही अपना तथा पर का कल्याण या उत्थान कर सब जन ज्ञानी हो सब कुछ मात्र ही जान 26

यद्यपि इसका फलित निश्चय ही यह सब काल्पनिक जगत लग रहा था--पर चित्त तो जा ही चुका था। उस समय यों, जो कार्यकारण बना सम्बन्धी का भाव--वह काल्पनिक तो नहीं था वास्तविकार्थिक स्थिति, जो अपने उस साध्यभाव लक्ष्य से सम्बन्धित होकर दिखायी पड़रहाथा।वह वास्तविक प्रभाव चित्त पर पड़कर चित्त वृत्तियों सबको आकर्षित किये रहा था जिससे चित्त में लगा भाव या विषयाकर्षण या क्रिया योग का नाश न हो रहा था जिस से चित्त भाव--का आकर्षण होता रहा था। निष्कर्ष यह निकला कि जब चित्त प्रभाव शून्य हो तब चित्त वृत्त क्या करेगी और उसकी क्या वास्तविकता, क्या स्थिति, क्या परिणामावस्था, हो सकेगी इसका! या हो सके कुछ भी? चित्त को तो केवल रूप ही तो रूप रूप लय चित्त रूप को कह सकते हैं, जिस में तो केवल एक ही वास्तविक रूप हो, रूप विशेष ही रूप हो, न कल्पित रूप ही हो जिससे चित्त सदा ही यह चित्त भाव रूप लय ही तो हुआ करे । पर चित्त चेष्टा जो स्वरूप त्याग रूप चित्त लय को प्राप्त हो सकती नहीं या स्वरूप को हीन करती ही चित्त रूप लयता को प्राप्त हो सकती या त्याग करती हुई स्वरूप को शून्य करती चित्त रूप लयता को प्राप्त कराती चित्त को तो यह रूप लय ही कहला सकता लय तो चित्त लय को विशुद्ध रूप लयता प्राप्त हो या कह लें? या विशुद्ध चित्त रूप लय को रूप लय कह कर चित्त को स्वरूप स्थिति कहने का क्या है? चित्त जब तक स्वयं ही रूप हो, स्वतः चित्त वृत्त ही न होगी न? जिस तरह दर्पण में न रूप ग्रहण या रूप स्थितिक क्रिया हो, न रूप ही उस दर्पण स्थित रूप का रूप लय व रूप का अस्तित्व लय रूप लय ही कहा जा सके या दर्पण ही न रहे जिस से कि; दर्पण स्थिति या रूप लय या रूप स्थिति जो रूप का रूप लय कहे जिस प्रकार कहा गया उसी प्रकार, सामायिक द्वारा विचार किया जाय तो वास्तविकता है। चित्त जब तक चित्त भाव रूप में रहेगा, चित्त रूप तो रहेगा; भले विचार न ही हों चित्त वृत्तियां न हों ऐसी स्थिति को चित्त कहेंगे क्या? जिस तरह रूप किसी रूप को बिना देखे ही रूप स्वतः ही रूप स्वरूप अस्तित्व को लिये हुए हो सके, तो वह रूप ही कहला कर रूप रूप चित्त कहला कर चित्त रूप स्थिति को कह सके, उसी प्रकार से ही यह सिद्ध हुआ, कि जब तक रूप का रूप भाव--या तो रूप लय किसी रूप द्वारा हो, तब तक रूप चित्त लय को या तो चित्त कहिये या वास्तविकता सिद्धान्त से सामायिक भाव से ही सिद्ध होगा या कहिये रूप से सामायिक भाव से स्थिति को प्राप्त हुआ जो रूप ही चित्त भाव लय कहलाता हुआ सा सिद्ध हो सके उसी को, या तो रूप चित्त ही कह दें! चित्त लय रूप तो होगा ही; रूप ही चित्त भाव लय, स्थिति रूप से कहा गया पर विचार या सामायिक भाव का लक्ष्य तो.ही हो सकेगा! जिस तरह रूप स्वयं ही! स्वयं स्वाभाविकता लिये हो! जिस तरह दर्पण, तो यह देखा गया विचार कर के न केवल विचार द्वारा चित्त सिद्ध हो रहा चित्त रूप स्वरूप लय या स्थिति न होगी? कार्यकारण द्वारा स्वरूप का या रूप स्वरूप सिद्ध तो होगा चित्त रूप सिद्ध होने मात्र से रूप लय का होना सिद्ध नहीं कह सके या चित्त स्थिति सामायिक द्वारा रूप सिद्धि स्वरूप से तो हो ही गई किन्तु वास्तविकता सिद्ध न हो सकी या सिद्ध न हो, जिस से चित्त का चित्त ही या चित्त का लय चित्त में ही कह सामायिक रूप लय चित्त-रूप भाव-लय ही तो होगा ही, सामायिक द्वारा रूप लय ही, न चित्त सिद्धि स्थिति लय चित्त की सिद्ध होगी जैसी कि सामायिक द्वारा चित्त, स्थिति लय रूप लय लय में कहा जा सके; चित्त स्थिति तो सामायिक भाव-युक्त रूप ही सिद्ध होगा रूप से ही सिद्ध होगा रूप लय रूप स्थिति स्वरूप से कह सके स्वरूप की सिद्धि स्वरूप से सिद्ध स्वरूप से सिद्ध होगा जैसा स्वरूप का रूप स्थिति सिद्ध स्थिति रूप से सिद्ध हो सकेगी; जिस तरह से ही यह--रूप लय चित्त स्थिति से ही सिद्ध हो सकेगा; न कि चित्त; से जिस प्रकार न रूप स्थिति ही न रूप स्थिति हो--सकती रूप लय द्वारा ही! जिस तरह विचार या तो ही विचार स्थिति कह कर चित्त के ही रूप में चित्त लय चित्त स्थिति से ही रूप-लय को सिद्ध किया गया! चित्त की स्थिति को नहीं, रूप की देखा तो क्या चित्त रूप लय हुआ? या रूप ही रूप द्वारा कार्यकारणावस्था से सिद्ध होकर ही सिद्ध हुआ? यह कह सके; तब रूप ही चित्त रूप स्थिति से चित्त हुआ, 27

विचार यह बात का होता था जहां तलक बादशाह का हुक्म पहुंच--सक्ता था; सल्तनत खाली उस ही बाबत दखल देतीथी जिसका कि जी-जान या माल-मता ऊपर असर होता था, पर धर्म बात में नहीं ॥ भला, इस प्रकारका धर्म-कर्म ऊपर हुक्म चलना किसीको भी क्या पर क्या मत का हो कब और कहं तलक पसंद हो सक्ता है; न सब का ऐसा एक मत होना बन सक्ता जिससे सब लोग एक आज्ञाकारी होकर ऐसा धर्म पालें? केवल इसी बात ऊपर हिन्दू लोग मिर्जा ख्वाजा की गल्ती-रिफाई फौज का भय मन से जाता रहा; बादशाह के ऊपर सबलोगोंने एक बगावतका रुख बांधा और आपस में सब मिलके यह इरादा किया सबलोगोंने पहले मन में यह बात ठहराई कि जो कोई उनका भाई इस काम में, सच हो या झूठ हो; अथवा सब काम में जिस से धर्म का और सब का जी बचै और हिन्दू लोग धर्म काम ऊपर दृढ रहें सो बात सब मिलकर जो कोई न मानै वा न चले, वादशाहके संग वा तरफदारी में रहे उस को सब लोग एक मत होकर ऐसा दंड देवैं जो वह सब तरफसे लाचार हो बादशाह की शरण में न जावे वा न रह सकै सो ऐसा, मत ठहराया ।; अथवा ऐसा नियम बांधा कि जो कोई; अथवा राजा मानसिंह आदि; अपने धर्मके विरुद्ध वादशाह अकबर का हुक्म मानै उनको लोग भी हर तरह से लाचार करें ॥ जबतक कि कोई एक काम का करने हारा अपने मन से उस काम बाबत लाचार न हो-- तब सो काम वा धर्म बात में मन-तन से तन मन नहीं देवे; तब तलक उस काम का या धर्मका भी पालन नहीं होता, ऐसा जान बादशाह अक्बर भी; जब यह बात देखता था, तब भी उसने, लाचार होकर इस बात ऊपर ध्यान दिया कि जैसा हो सके वैसा सब बात का रुख जो कुछ कि सब बादशाह के तरफ होता, सल्तनत के वा राजकाज के सब काम ऊपर रह--सक्ता था; वैसा ही रहने दिया पीछे सब बात ठीक, ठीक हो गई! जबतक कि कोई मनुष्य एक बार मन में अपने सोच कर कोई काम करने-- लग जाता है तब सो काम में न किसी बादशाहत तन-मन से, डर कर भागता-- सक्ता है सो कारण से, इन भाई-बंधुओं के इस दृढ़निश्चय को देखकर भी बादशाह ने? इस नियम ऊपर जो मुकर्रर किया गया था सोचे बिना सब को यह हुक्म लिखा कि जो लोग जो जो काम करते; सब जन करो, उस में यह बात, सब को मनाही बादशाहतके कारबार तरफसे समझी जावे कि जो जन काम करते उस को उस काम सब तरह से करने दिया जावे ॥ अक्बर वादशाहका ऐसा मन देखकर, सबलोग शांतता से रहने को तैयार हुएलेकिन सब जन का मन वादशाहके इस राजकाज बाबत में जो शंका करने लगारहता था; सो यह तो सब को मालुम ही था कि वादशाह सब को शांत रख कर सब काम करना चाहता था जो कि हिन्दू मुसलमान सब लोग मिलके रहे जिसमें सब का भला होय, बादशाहत में सब बात का सुख हो सब धर्म का मान सब अक्बरवादशाहकेवखत में सब को सब तरह दिया या नहीं दिया सो तो सब लोग जानते हैं? वा फिर आगे लिखा जायगा? सो सब मुसलमान लोग सब बादशाहत और राजकाज सबही बातें अपने हाथ में रखने का हुनर जानते हुए सब काम कर रहे थे, सो बात हिन्दू लोग कुछ समझकर, उस ऊपर ध्यान करें? ऐसा मौका जबतक न था तब तक उस बात, बादशाही काम में दखल देना हिन्दू लोग को कुछ जरूरी नजर नहीं आता था अगर जो वो लोग ध्यान देते तो जो कुछ, उनका राज चला गया था सो सब फिर मिलता था पर उस तरफका मन हिन्दुस्तान में सब का कमजोर हो रहा था उस, उस बात, समय सब काम में सब को लाचार कर रहा, यह तो जान सब को हो रहा था पर उस लाचारी का उपाय जो होना चाहिये सो नहीं हो सका ॥ सो इस बात का जो फल हुआ सो हुआ, बादशाह भी सब को, वा हिन्दू लोग को इस तरह से काम करते देख कर अपने मन विचार करने लगे कि इन का और सब का मेल न हो सके ऐसा उपाय सब जन मिल कर करें, जिससे राज और धर्म काम में अपना ही हुक्म सब तरह से रहे ॥ इस लिये, जो बात बादशाहत सब तरफ कर रहा सो सब बादशाहत काम ऐसा ही था; हिन्दू को अपने कामके बाबत दखल न देने का अख्तियार दिया, लेकिन सब जन आगे चलकर जो काम करते उस सब बादशाहत तरफ ध्यान से सब तरफ से देखा जाता! उस बात से 28

से कथावाचक रुक गये और कथा समाप्त कर घर चले--यह कैसा न्याय?

कथा सुने, पर जो कुछ उस समय घट रहा था, वह आँखों को दिखाई पड़ रहा था। किसी कारण से कथावाचक रुक गये और कथा समाप्त कर घर चले--यह कैसा न्याय? वृन्दावन में सब लोग बहुत दुखी हो रहे हैं। सब को श्रीभगवान् अपने प्राणसम प्यारे लग रहे हैं! सब रो रहे हैं! कह रहे हैं--अरे, हमारे नयन मूँदने का समय तो आ गया लगता है! हम कैसे जियें इनके बिना? जिसने गोवर्धन उठाया था उसपर व्रज के लोगों ने भरोसा किया था, वह गोवर्धन हमारा साथ छोड़ देगा! अक्रूरजी-जैसे महापुरुष भी उन्हें ले जाने आये हैं। एक भक्त को भगवान् आज्ञा दे रहे हैं कि तू रथ ले जावेगा तो, वह रथ कैसे हाँक सकेगा कि प्रभु को ले जाये; अक्रूरजी सोच रहे हैं--भगवान् अपनी लीला कर रहे हैं। वे द्वारकाधीश तो होंगे पर ब्रज में भी तो रहेंगे। यह सोच रहे; पर माता यशोदा रोती हैं, मेरी गोद में बैठता था, दूध पीता था और अब यह रथ में चढ़ेगा। आज तक मैंने इसे पैदल भी न चलने दिया। यशोदा रोती हैं तो नन्द, सब ग्वालबाल रोते हैं। भगवान् के बिछुड़ने पर वे समझ रहे हैं कि यह हमारा ही... ऐसा अक्रूरजी सोचते हैं; कोई अक्रूरजी से तो न कहे, उस रथ को रोक ले; सब उस रथ से आगे जाकर खड़े हों; कोई उस रथ के पहिये को--जिस रथ में श्रीभगवान् के जाने की तैयारी हो रही है! उस रथ के पहिये को--इस प्रकार श्रीभगवान् के लिये सभी सब कुछ छोड़ने को तैयार थे; गोपियाँ तो अपने प्राणों का दान देने के लिये तैयार हैं, भगवान् के रथ को रोक रही हैं, रो रही हैं। कोई कहती है, कोई उस रथ के पहिये को तोड़ दे, तो रथ कैसे आगे बढ़ेगा? कभी ऐसा सोचा है? जिस कथा के माध्यम से ही हमें ज्ञान मिला उस कथा को हम तो भूलकर के ही सब कुछ कर रहे हैं। आज जिस प्रकार वृन्दावन व्याकुल हो रहा है। भगवान् के न रहने की बात सुनकर यशोदा रो रही हैं तो नन्द महाराज व्याकुल होते हैं, सब ग्वालबाल व्याकुल हो रहे हैं। भगवान् सोचते हैं, यह तो सब रो रहे हैं। भगवान् ने सबको समझाया। सब का मन भगवान् समझाते हैं। यशोदा रोती हैं, भगवान् कहते हैं-- यशोदा के वात्सल्य की बात का वर्णन तो नहीं किया जा सकता। माँ रोने लगी और रोती रही, जब तक आँखों के आँसू सूख न गये। माँ के रोने से जब नन्द रोये तो यशोदा ने कहा, अपने को तो रोना ही है। श्रीभगवान् ने कुछ देर बात की और यशोदा से कहा--कि माँ तुम रो रही हो तो मुझे रोना आता है। रो मत यशोदा! तूने जो मुझे प्यार दिया वैसा तो कोई माँ नहीं दे सकती, तेरे समान कोई भी माँ नहीं हो सकती। सब कुछ तूने मेरे लिये त्याग किया। यशोदा सोचती हैं कि सब कुछ तो दे दिया, पर कृष्ण न मिला। मैंने इतना यत्न किया; पर कृष्ण हाथ से छूटे जा रहे हैं। रो रही हैं, वे कह रही हैं--जिसने पूतना को मारा था। उस श्रीभगवान् जिसने बकासुर को मारा था। जिसने तृणावर्त को मारा। अरे तू ही तो था जो गोवर्धन को उठाये था, उस समय तूने हमारी रक्षा की थी। आज तू हमें छोड़कर मत जा, आज तो हम पर कृपा कर दे। आज उस नन्द को सम्भाल, नन्द व्याकुल हो रहे हैं। अरे यशोदा! तू नन्द को धीरज बँधायेगी या अपने आँसू पोछेगी! यह बात सुनकर श्रीभगवान् भी रोने लगे! माँ भी रो रही है, पिता भी रो रहे हैं और सब ब्रजवासी भी रो रहे हैं। आज कथा समाप्त हो रही है; आज ही तो वृन्दावन छोड़कर चले गये। आज ही तो सब रोये; सब प्रकार भक्तों की आज सब लीला हुई। लोगों ने रो-रो कर भगवान् को विदा किया, उधर कंस के पास श्रीभगवान् मथुरा पहुँचे। जिस प्रकार मथुरा में कंस का भय था, आज वे सब आनन्दित हो रहे थे। अब तो श्रीकृष्ण आ गये हैं, अब हमें भय नहीं रहा, वे सब लोग देखने लगे, सब बातें होने लगीं। जब श्रीकृष्ण और बलराम ने धनुष तोड़ दिया तो कंस भयभीत हो गया। आज का प्रसंग यहीं समाप्त हो रहा है। कल मथुरा की कथा भगवान् करेंगे। कथा समाप्त नहीं होती, कथा तो चलती रहती है।

29

ईश्वर का ध्यान करके विचार करना चाहिये कि, उस समय जीव का कैसा रूप रहता होगा कि जब परमात्मा सब को अपनी अपनी प्रकृति में लीन कर लेता होगा और सब जगत् ऐसा ही खाली दीखता होगा ? कभी ऐसा भी ध्यान लगाना चाहिये कि जब जगत् नहीं था, उस समय प्रलयकाल हो रहाथा; चारों ओर अंधकार, घोर तिमिर का राज्य फैला हुआथा फिर जीव सब जड़ रूप हो कर सो रहेथे प्रलयकाल में, प्रलयकाल की शान्ति सब बातों से बढ़ कर मालूमहोती; उस समय की सी न महाप्रलय नित्य, सदा जीवन की प्रलयहो; शान्ति का काम हो सके; कभी ऐसा विचारना कि प्रलयकाल रूप में लीन; अथवा मृत्यु रूप की मृत्यु का प्रलय स्वरूप हो, उस समय शान्ति; प्रलयकाल की समाधि अवस्था सर्वथा शान्ति प्रदायक ज्ञान की अवस्था, प्रलयकाल समाधि दशा कैसे प्राप्त होगी विचार करो? क्या उस समय शान्ति मिलै गी, आनन्द-रस समाधि प्राप्त होगा, वा न होगा यदि इस दशा विचारते हुये जगत् प्रपंच विसर ही जाय तो अच्छा, वा जो समाधि ध्यान दशा हो, समाधिरूपी हो, ऐसा विचार भी कुछ काम करेगा सब प्रपंचमात्र छोड़कर एकाग्र ध्यान लगाना चाहिये; हे जीव जब तू प्रलयमें जाय गा अथवा संसार छूट जायगातौ तू उस महाप्रलय सर्वेश्वर परमात्मा के प्रेम, शरण रूप को न भूले; प्रलयकाल आनन्दरूप शान्ति स्वरूपके ध्यान का भी अभ्यास करना चाहिये जिस सेप्रलयके भयसंसार भययुक्त समाधि के भय सब नष्ट होजायं व अभ्यास व ध्यान प्रलयका शान्ति का साधन बन जायगा सब रूप से प्रलयके अभ्यास का फल शुभ होगा ऐसा विचारने से प्रलयके समय का भय नष्ट होजायगा अभ्यास अभ्यास एकांत में बैठ-बैठ कर ऐसा ध्यान करने लग जाय तौ प्रलय के समय का रूप समझ मेंआने लग जायगा फिर चिन्ता का कारण ही क्या? ऐसा ध्यान कर सब भय छूटकर आनन्द-स्थान को प्राप्त होता हुआ सब को एकाग्र का ध्यान करा--ता हुआ एकाग्रता को प्राप्त होगा जब तक ध्यान में मन लगा रहेगा वा ध्यान बना हुआ रहेगा वा अभ्यास बना रहेगा तब काल का प्रभाव कुछ काम नकर सकेगा ना ही अविद्या-अज्ञान को, विकार को, वा अज्ञान जन्य प्रलयको उत्पन्न कर सकेगा ना ही जीव का जन्म, मरण, होगा जब तक अभ्यास का प्रभाव बना हुआ काल-मृत्यु का भय नहो सकेगा जब तक अभ्यास ध्यान बना ही रहेगा तब, काल को; उस काल रूप महाप्रलय को भी महाप्रलय रूप काल के समान काल स्वरूप जान के व समझ कर निर्भय हो कर रहेगा; प्रलयकाल से डर कर उस समय शान्ति रूप को छोड़ना भय का कारण जान ध्यान को ध्यान करने के लीये सब भय को नष्ट जान यह अभ्यास कर सब भय को दूर कर सब को महाप्रलय आनन्द-स्वरूप जान, सब रूप त्याग जीव सत्य--चित् को जान कर जीव समाधिस्थ होता जायगा जब मन एकाग्र समाधि में लीन हो कर सब भय रूप सब का त्याग कर, उस आनन्द, स्वरूप, समाधि रूप को प्राप्त; आनन्दमय, सुख स्वरूपमय, प्रेम, स्वरूप आनन्द सागर रूपके रस को आस्वादन करे? आनन्द रस? प्रेम रस आस्वादन करेगा वा न करेगा; वा उस रस रूप रस पान ध्यान लय होगा वा लय हो, ना लय न रसका हो, न परमात्मा का; अथवा यह आनन्द-आत्मानन्द प्राप्त हो गा? वा संसार का भय होगा, वा अविद्या भय का, प्रलयकाल भय सब परमात्मा स्वरूप जान भय रहित हो, ना सब भय प्रलय रूपी भय का संशय मिट, वा अविद्या भय, वा सब रूपी अविद्यादि अज्ञान महाप्रलय का भय मिटकर यह सब स्वात्मानन्द रूप होकर उस प्रलयकाल के भय को भी, उस काल रूप-मृत्यु को भी स्वात्म समझ कर, सब प्रलय को, सब कालको जीत! या पराजित कर के विजय को प्राप्त कर आनन्द मग्न होकर सब को जीत कर, लय अवस्था स्वरूप होगा ऐसा जान सब समाधि का आत्मानन्द रूप जान, स्वात्म रूप आनन्द का रूप जाने गा? अभ्यास करते हुए सब जीव रूप सब प्रपंच रूप प्रलयके रूप सब को लय का कारण जानकर, प्रलय रूपी समाधि जाने गा? ज्ञान का सुख होगा, उस का आनन्द भी परम सुख रूप रस का होगा, समाधि का स्वरूप सब प्रकार आनन्द दायक जान कर उस समाधिस्थ--रूप सब संसार को उस रूप जान सब भय को पराजय करेगा! जो ऐसा ध्यान अभ्यास न करेगा, अज्ञान प्रलय रूप भय को न त्याग कर काल के वशहोकर सब दुःख भोगता हुआ मरेगा व जिये! सब को त्याग करेगा? प्रलय को जान न सकेगा; प्रलय स्वरूप सुख रूप को, प्रलय रूपको जाने गा क्या? प्रलय रूपको क्या जानेगा? उस रूप प्रलय काल को, प्रलय, प्रलयकाल रूपका ज्ञान हुआ जिससे प्रलय का रूप वा स्वरूप ज्ञात 30

देखना क्या यह लाल-पीला सा कोई खण्ड होगा? पर वह खण्ड तो, जो सब से परे, सब प्रकार से श्रेष्ठ होगा? उसका नाम ही तो एक रस तृप्त रस, जिसको न घट, जिसको घट ही न हो कभी, जिसको न घटा सके न बढ़ा सके कोई--हे परमात्मन्, तू इस अधिकार--का फल दिला ही देगा क्या? लेकिन जब कि ऐसी एक निष्ठा लेकर मनुष्य सब प्रकार उस रस रूप प्रभु पर ही सब छोड़ देता अथवा सब कुछ त्याग कर के प्रभु रूप लाल-पीले को छोड़ देता, स्वयं चिन्मात्र सत्ता रूप हो कर स्थित होजायगा तब तो सब भेद मिटने पर केवल ही हो कर सर्वव्यापक हो जायगा अथवा किसी भी तरफ से अपने को भिन्न न समझ कर सब से अपने को गिने; पर दोनों ही तरह से ही भक्त का कल्याण प्रत्यक्ष ही हो रहा है न उस को डर रहा न उस को कोई तृष्णा रही केवल यह विचार कि सब संसार का स्वामी ही सब कुछ सब तरह से कर रहा है सब ही रस दिखलायगा उस व्यापक प्रभु-सत्ता--सर्वव्यापी परमात्मा सब प्रकार भला करे, जिसको कि अनन्यनिष्ठा वाला विवेकी सब तरह अपनी रक्षा करने वाला जानता ही रहा है। भगवत्स्वरूप सब प्रकार से सब पर दया स्वाभाविक रीति से करता ही रहा है, अतः उस भक्त विवेक विचारपूर्वक भगवान् सब पर दया करते हैं यह जानकर क्यों न डरेगा! जो भगवान् की सब बात भला करने पर ही निर्भर हो कर सोचेगा ही, वह घबड़ायगा क्यों; चिन्ता से छुटकारा पा ही गया वह भक्त तो सदा भगवान् के भजन चित्त को लगा ही रखता है, भगवान् की कृपा चिन्तन विचारपूर्वक सब प्रकार से करता हुआ स्वाधीनता को ही प्राप्त होता रहता है, कभी अकेलापन सब संसार रूप समझ कर सब प्रकार से निर्भय हो कर बैठता ही रहता है, पर सोच यही तो मन में रहता है सदा ही कि हे सर्वसमर्थ तू दयालु, सर्वथा स्वतंत्र सब कुछ रूप परमात्मा ही सबका सब--कुछ कर सकता हुआ सब प्रकार भला कर रहा है जो सब कुछ देखने में आरहा, फिर मनुष्य क्यों घबड़ावे री, जब दाता ही सब प्रकार भला सब तरफ कर दिखलाने को तय्यार, फिर डर क्या पर बात तो जब मनुष्य के मन में समावे, भगवन्त रूप विचार सब अन्तःकरण में ही तो होगा? कभी चित्त को एकाग्र करके यह भी तो सोचे भगवान् सब का ही भला करते हैं; लेकिन भला ही तो सोचे विचार करे तो ही उसे ऐसा सत-भाव उस से मिल सकता अथवा प्रकाशमय कर सके ज्ञान को जो ज्ञान ही, रूप ही तो मनुष्य के जीवन का प्राण हो कर सब से परे, सब से अलग विभूति को देता, पर ज्ञान सब से श्रेष्ठ ही तो सब का सब कुछ रस देने वाला रहा है, वह अज्ञानता सब को क्यों भगावे? जो सर्वव्यापक सत्ता सर्वज्ञता रूप सब कल्याण कर सकती उस से मन के भीतर से क्यों न प्रार्थना की जाय ताकि मुक्ति लाभ सब का सब मिल सके उस का मन भी शांत हो, प्रभु शरण! पर अज्ञान को दूर करने का ज्ञान विचार प्रभु से मांग कर मनुष्य को सब प्रकार से सुखी होना, सो सब से श्रेष्ठ विचार है; भगवन्त ही दयालु सब का, जो मनुष्य पर कृपा करे, तो मनुष्य केवल ही! उस का यश सब प्रकार से सर्वत्र सब तरफ फैल जायगा और उस का, दयालु का दयाल रूप परमात्मा का ही गुण संसार में जो प्रसिद्ध होगा सब से ही सब का कल्याण सब तरह सब का सर्व प्रकार से सिद्ध साधन हो सकता ही रहा केवल ज्ञान से ही तो सब अविवेकता रूपी जो सब अविवेकता भरी सब बात जिस संसार से मनुष्य समझ रहा होगा? लेकिन मन तो जो अविवेकी, भगवान् की पर आश्रित रहकर ही मिटा ही देवे! पर जब ऐसा उत्तम विचार सब तरफ फैला हो गया होगा, फिर घबड़ावे? ज्ञान स्वयं ही मनुष्य को सब तरफ लेजा कर ऐसा परम प्रकाश स्वरूप कर सकता जिस प्रकाश रूप को ही प्रभु कह सकते हैं, जिस रूप द्वारा संसार का कल्याण, भला ही सदा... ॥ इतना कह प्रभु के चरण में वन्दना किया, प्रभु सब के सब प्रकार से मंगल का विचार करते हैं, दयालु हैं, जो पल-पल अविवेकीयों को अपने समान विचारवान् करते हुए कल्याण में, जो संसार कल्याणकारी सब का रूप है? सर्वव्यापी सत्ता का ध्यान ही सुख-सम्पदा को ही देने वाला हो सकता रहेगा; जिससे कि सारा संसार? ही तो तृप्त रूप रस से भर कर न केवल आनन्द स्वरूप आनन्दमय हो जाय विकार-वासनारहित सब मन मस्त ज्ञान रस आनन्द-रसस्वरूप 31

□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□? □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□? □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□□□... □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□; □□□□□ □□ □□□□ □□□□? □□ □□□□□ □□, □□□ □□□□□□ □□□□□□□ □□, □□□ □□□, □□□ □□□ □□□, □□ □□□ □□□□, □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□? □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□, □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□, □□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□, □□ □□□□ □□ □□ □□□, □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□, □□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□, □□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□, □□□□ □ □□□□; □□□□ □□□□, □□□□ □ □□□□; □□□□ □□□ □□□□, □□□□ □□□ □□□□! □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□; □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□-□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□□ □ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□? □□□□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□? □□ □ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□-□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□, □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□-□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□, □□□□ □□□□ □□□ □□□ □ □□□ □□□ □□ □□□□; □□□□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□-□□□ □□□□ □ □□□ □□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□, □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □ □□□□□□ □□ □□□□ □□, □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□; □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□--□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□? □□□□□ □□□□□□□ □□□ □□? □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□, □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □ □□--□□□ □□□□□□□ □□□ □□, □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□ □□ □□□□; □□ □□□ □□□□□□□□□□□ □□□, □□□-□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□, □□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□; □□□-□□□□□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□□□-□□□□□ □□□□□□□ □□□□-□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□, □□□ □□□□ □□ □ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □ □□□□□□, □□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□, □□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□; □□□□□□□ □□ □□, □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□? □□□□, □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□, □□ □□ □□□□; □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□, □□ □□□□ □□ □ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□- □□□□, □□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□ 32

और इसके सिवाय आत्मा ऐसा तो नहीं जिसे जानना सहज होगा, कठिन होगा, असाध्य होगा? कठिन होगा, ऐसा न होगा? कठिन तब होता, अगर उसे बाहर से लाना होता ऐसा कोई पदार्थ जिसे अन्य लोग जानते हों, उसे भीतर लाना होता और भीतर बैठाना ही कठिन हो गया; परन्तु भीतर बैठा ही हुआ है इसलिए वह कठिन होगा? बाहर से लाना हो तब तो सोच और श्रम भी करना पड़े पर जो भीतर ही बैठा हुआ कठिन होगा? सच, बाहर जाना कठिन है, भीतर आना बहुत सहज पर जब भीतर जाना ही नहीं होता तो यह बात कैसे समझ में आवे कि भीतर की निवृत्ति कैसी हो सकती, इसका उपाय जानना न पड़े तो फिर और तो क्या हो सकता भाई, पर इसके लिए जीव बहुत उपाय कर चुका पर मुक्ति नहीं हुई, तब उपाय किया गया, जिसे यह समझ में आवेगा कि व्यवहार रूप निमित्त मात्र कोई भी बात से तो काम नहीं होगा? इसका कारण यह, जिसे सब ही कर ही रहे हैं और करते रहेंगे, क्योंकि यह तो अनादिकाल से ही कर रहे थे। ऐसा जानकर अब निश्चय जानकर करना होगा कि यह तो व्यवहार ही रहा है, और फिर जो सब संत जन इस स्वरूप बात कहते आये हैं सो इस बात के विपरीत तो नहीं कह गये हैं और अगर वे सब संत जन इस प्रकार के उपाय करने से ही मुक्त हुए हैं तब निश्चय से इसके ही द्वारा मोक्ष होता है सो जान कर ही तो ज्ञानी जन इस पर जोर लगाते आये हैं। इस बात, उपाय भिन्न--भिन्न प्रकार समझाने का यह एक ही तो प्रयोजन हो सकता है कि, हम सब इस बात को समझ कर आत्मकल्याण के योग्य बनें! भला सोचो? यह बात समझ कर कैसे आगे बढ़ें पहले ऐसा समझो, इसमें तो संशय न रहा? जो भी कह रहे हैं शास्त्र और संत जन वे आत्मज्ञान के ही लिए कहते आये हैं। इस बात में, जिसे भी संशय होगा सो सब व्यर्थ समझ लेगा पर जिसे समझ में आया सो ऐसा न कहे, जो कुछ भी कहा जा रहा जिसे भी समझा जा सके सो ही कहा जा रहा, समझे बिना काम कैसे चलेगा क्यों? जो कुछ भी कहा जा रहा उसका लाभ लेना चाहिये न कि इस तरह सोचे कि केवल सुन लेने से ही सब हो! निश्चय ही! संशय को छोड़ कर? जो कुछ भी कहा जा रहा सो सब को ही लाभ करने वाला समझना चाहिये सो इस भाव से ही बात को ग्रहण करे! निश्चय लाभ होगा ही? जो बात कही जा रही है उसको मन न दे तो क्या निश्चय जान लो, अज्ञानी, तू तो समय के बीत जाने पर ही पछताये बिना रहेगा न जब समय बीत कर हाथ से निकल गये अवसर तब सिर पर हाथ रखकर ही केवल पछता रहेगा न? पर ज्ञानीजन तो ऐसा नहीं सोचते ऐसा विचार कर ज्ञानी पुरुष तो सब सांसारिक मोह को ही त्याग दिया करते हैं, वे ही ज्ञानी या तत्वज्ञानी कहला सकते हैं। जिसे इस बात का भी ज्ञान नहीं वह तो ज्ञानी कहला नहीं सकता, जो भी ज्ञानी के पास जा कर ही सब तरह का जो भी कुछ जान सकता अवश्य लाभ उठायेगा पर स्वयं तो नहीं, अपने आप ही तो, जो भी ज्ञानी जन कह रहे हैं सो, इन बातों द्वारा निश्चय ही मन को इस ओर लगा कर लाभ प्राप्त कर सकता पर जब तक ही निश्चय होगा तब तक कुछ लाभ होगा सब सन्देहों को मिटा दो! भाई, सब मन देकर सुनो सुनो सुनो बात को सुनो सुनो! जो भी कहा गया न समझो कि यह यों ही कहा जा रहा; यह तो विशेष ज्ञान की बात ही सब को सुनायी जावेगी सो ही इस बात पर जो भी ध्यान लगायेगा उसका ही तो ही भला होगा सो ही इस प्रकार का ही फल; ही प्राप्त कर लेगा निश्चय सो ज्ञानीजन कहते "जो भी संशय मिटा कर मन से शांत होकर सुनेगा उसका संशय सब मिटेगा या जिसके पास कोई उपाय शंका मिटाने का होगा, सो ही निश्चय ही तो सब इस सांसारिकता से पार सांसारिक तो काम सब एक--प्रकार से मन--ही करता रहा न रहेगा; जब ही इसके पार मुक्ति पायेगा ज्ञान स्वरूप सदा काल ही सब सांसारिक बातों से अधिक उत्तम ज्ञान सर्वश्रेष्ठ स्वरूप रहा हमेशा सांसारिकता से सदा काल मन--मुक्त रहने पर ही कल्याण स्वरूप को प्राप्त कर सकता और जो इस प्रकार का मन बना लेवेगा सो ही सांसारिक बन्धन रहित हो कर, जो सिद्ध रूप निश्चय रूप प्राप्त कर लेगा, सो ज्ञानी पुरुष 33

चित्र में प्रयुक्त फ़ॉन्ट/एन्कोडिंग त्रुटि के कारण सभी देवनागरी वर्ण अपठनीय (चौकोर बॉक्स / Tofu '□') के रूप में दिखाई दे रहे हैं। केवल विराम चिह्न और पृष्ठ संख्या दृश्यमान हैं।

दृश्यमान चिह्नों और स्वरूप के अनुसार पंक्ति-वार (Line-by-line) विवरण:

□□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□--□ □□□□ □□□□□ □□ □□, □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□□ □□□□; □□□ □□□□□ □□□□, □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□--□□□□ □□□□, □□□□ □□□□□, □□□□ □□□□-□□□□□! □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□! □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□, □□ □ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□□□□□□□ □□; □□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□, □□□ □□ □ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□, □□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□, □□□ □□ □□□, □□□ □□ □□□, □□□□□□□ □□ □□□□□□□, □□□□ □□ □□□□, □□□□□ □□ □□□□□, □□□ □□ □□--□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□, □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□! □□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□, □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□, □□□□□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□, □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□; □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□; □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□, □□□ □□□ □□, □□□□ □□, □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□-□□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □ □□□□ □□ □□□□□□-□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□... □ □□ □□□ □□□□, □□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□, □□□□ □□□ □□ □□□ □□, □□□□□ □□□ □□ □□□ □□, □□□□□ □□□ □□ □□□ □□, □□□□ □□□ □□ □□□ □□--□□□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□-□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□, □□□□ □□□ □□ □□□□-□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□-□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□; □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□, □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□! □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□? □□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□-□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□-□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□□□, □□□□-□□□□ □□□-□□□□ □□ □□□ □□□□□; □□□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□, □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□; □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□; □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□--□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□, □□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□, □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□--□□ □□ □□ □□ □□□□, □□□□ □□□ □□, □□□□□ □□□ □□, □□□□□□ □□□ □□; □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□ 34