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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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विचार यह बात का होता था जहां तलक बादशाह का हुक्म पहुंच--सक्ता था; सल्तनत खाली उस ही बाबत दखल देतीथी जिसका कि जी-जान या माल-मता ऊपर असर होता था, पर धर्म बात में नहीं ॥ भला, इस प्रकारका धर्म-कर्म ऊपर हुक्म चलना किसीको भी क्या पर क्या मत का हो कब और कहं तलक पसंद हो सक्ता है; न सब का ऐसा एक मत होना बन सक्ता जिससे सब लोग एक आज्ञाकारी होकर ऐसा धर्म पालें? केवल इसी बात ऊपर हिन्दू लोग मिर्जा ख्वाजा की गल्ती-रिफाई फौज का भय मन से जाता रहा; बादशाह के ऊपर सबलोगोंने एक बगावतका रुख बांधा और आपस में सब मिलके यह इरादा किया सबलोगोंने पहले मन में यह बात ठहराई कि जो कोई उनका भाई इस काम में, सच हो या झूठ हो; अथवा सब काम में जिस से धर्म का और सब का जी बचै और हिन्दू लोग धर्म काम ऊपर दृढ रहें सो बात सब मिलकर जो कोई न मानै वा न चले, वादशाहके संग वा तरफदारी में रहे उस को सब लोग एक मत होकर ऐसा दंड देवैं जो वह सब तरफसे लाचार हो बादशाह की शरण में न जावे वा न रह सकै सो ऐसा, मत ठहराया ।; अथवा ऐसा नियम बांधा कि जो कोई; अथवा राजा मानसिंह आदि; अपने धर्मके विरुद्ध वादशाह अकबर का हुक्म मानै उनको लोग भी हर तरह से लाचार करें ॥ जबतक कि कोई एक काम का करने हारा अपने मन से उस काम बाबत लाचार न हो-- तब सो काम वा धर्म बात में मन-तन से तन मन नहीं देवे; तब तलक उस काम का या धर्मका भी पालन नहीं होता, ऐसा जान बादशाह अक्बर भी; जब यह बात देखता था, तब भी उसने, लाचार होकर इस बात ऊपर ध्यान दिया कि जैसा हो सके वैसा सब बात का रुख जो कुछ कि सब बादशाह के तरफ होता, सल्तनत के वा राजकाज के सब काम ऊपर रह--सक्ता था; वैसा ही रहने दिया पीछे सब बात ठीक, ठीक हो गई! जबतक कि कोई मनुष्य एक बार मन में अपने सोच कर कोई काम करने-- लग जाता है तब सो काम में न किसी बादशाहत तन-मन से, डर कर भागता-- सक्ता है सो कारण से, इन भाई-बंधुओं के इस दृढ़निश्चय को देखकर भी बादशाह ने? इस नियम ऊपर जो मुकर्रर किया गया था सोचे बिना सब को यह हुक्म लिखा कि जो लोग जो जो काम करते; सब जन करो, उस में यह बात, सब को मनाही बादशाहतके कारबार तरफसे समझी जावे कि जो जन काम करते उस को उस काम सब तरह से करने दिया जावे ॥ अक्बर वादशाहका ऐसा मन देखकर, सबलोग शांतता से रहने को तैयार हुएलेकिन सब जन का मन वादशाहके इस राजकाज बाबत में जो शंका करने लगारहता था; सो यह तो सब को मालुम ही था कि वादशाह सब को शांत रख कर सब काम करना चाहता था जो कि हिन्दू मुसलमान सब लोग मिलके रहे जिसमें सब का भला होय, बादशाहत में सब बात का सुख हो सब धर्म का मान सब अक्बरवादशाहकेवखत में सब को सब तरह दिया या नहीं दिया सो तो सब लोग जानते हैं? वा फिर आगे लिखा जायगा? सो सब मुसलमान लोग सब बादशाहत और राजकाज सबही बातें अपने हाथ में रखने का हुनर जानते हुए सब काम कर रहे थे, सो बात हिन्दू लोग कुछ समझकर, उस ऊपर ध्यान करें? ऐसा मौका जबतक न था तब तक उस बात, बादशाही काम में दखल देना हिन्दू लोग को कुछ जरूरी नजर नहीं आता था अगर जो वो लोग ध्यान देते तो जो कुछ, उनका राज चला गया था सो सब फिर मिलता था पर उस तरफका मन हिन्दुस्तान में सब का कमजोर हो रहा था उस, उस बात, समय सब काम में सब को लाचार कर रहा, यह तो जान सब को हो रहा था पर उस लाचारी का उपाय जो होना चाहिये सो नहीं हो सका ॥ सो इस बात का जो फल हुआ सो हुआ, बादशाह भी सब को, वा हिन्दू लोग को इस तरह से काम करते देख कर अपने मन विचार करने लगे कि इन का और सब का मेल न हो सके ऐसा उपाय सब जन मिल कर करें, जिससे राज और धर्म काम में अपना ही हुक्म सब तरह से रहे ॥ इस लिये, जो बात बादशाहत सब तरफ कर रहा सो सब बादशाहत काम ऐसा ही था; हिन्दू को अपने कामके बाबत दखल न देने का अख्तियार दिया, लेकिन सब जन आगे चलकर जो काम करते उस सब बादशाहत तरफ ध्यान से सब तरफ से देखा जाता! उस बात से 28