अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकथा सुने, पर जो कुछ उस समय घट रहा था, वह आँखों को दिखाई पड़ रहा था। किसी कारण से कथावाचक रुक गये और कथा समाप्त कर घर चले--यह कैसा न्याय? वृन्दावन में सब लोग बहुत दुखी हो रहे हैं। सब को श्रीभगवान् अपने प्राणसम प्यारे लग रहे हैं! सब रो रहे हैं! कह रहे हैं--अरे, हमारे नयन मूँदने का समय तो आ गया लगता है! हम कैसे जियें इनके बिना? जिसने गोवर्धन उठाया था उसपर व्रज के लोगों ने भरोसा किया था, वह गोवर्धन हमारा साथ छोड़ देगा! अक्रूरजी-जैसे महापुरुष भी उन्हें ले जाने आये हैं। एक भक्त को भगवान् आज्ञा दे रहे हैं कि तू रथ ले जावेगा तो, वह रथ कैसे हाँक सकेगा कि प्रभु को ले जाये; अक्रूरजी सोच रहे हैं--भगवान् अपनी लीला कर रहे हैं। वे द्वारकाधीश तो होंगे पर ब्रज में भी तो रहेंगे। यह सोच रहे; पर माता यशोदा रोती हैं, मेरी गोद में बैठता था, दूध पीता था और अब यह रथ में चढ़ेगा। आज तक मैंने इसे पैदल भी न चलने दिया। यशोदा रोती हैं तो नन्द, सब ग्वालबाल रोते हैं। भगवान् के बिछुड़ने पर वे समझ रहे हैं कि यह हमारा ही... ऐसा अक्रूरजी सोचते हैं; कोई अक्रूरजी से तो न कहे, उस रथ को रोक ले; सब उस रथ से आगे जाकर खड़े हों; कोई उस रथ के पहिये को--जिस रथ में श्रीभगवान् के जाने की तैयारी हो रही है! उस रथ के पहिये को--इस प्रकार श्रीभगवान् के लिये सभी सब कुछ छोड़ने को तैयार थे; गोपियाँ तो अपने प्राणों का दान देने के लिये तैयार हैं, भगवान् के रथ को रोक रही हैं, रो रही हैं। कोई कहती है, कोई उस रथ के पहिये को तोड़ दे, तो रथ कैसे आगे बढ़ेगा? कभी ऐसा सोचा है? जिस कथा के माध्यम से ही हमें ज्ञान मिला उस कथा को हम तो भूलकर के ही सब कुछ कर रहे हैं। आज जिस प्रकार वृन्दावन व्याकुल हो रहा है। भगवान् के न रहने की बात सुनकर यशोदा रो रही हैं तो नन्द महाराज व्याकुल होते हैं, सब ग्वालबाल व्याकुल हो रहे हैं। भगवान् सोचते हैं, यह तो सब रो रहे हैं। भगवान् ने सबको समझाया। सब का मन भगवान् समझाते हैं। यशोदा रोती हैं, भगवान् कहते हैं-- यशोदा के वात्सल्य की बात का वर्णन तो नहीं किया जा सकता। माँ रोने लगी और रोती रही, जब तक आँखों के आँसू सूख न गये। माँ के रोने से जब नन्द रोये तो यशोदा ने कहा, अपने को तो रोना ही है। श्रीभगवान् ने कुछ देर बात की और यशोदा से कहा--कि माँ तुम रो रही हो तो मुझे रोना आता है। रो मत यशोदा! तूने जो मुझे प्यार दिया वैसा तो कोई माँ नहीं दे सकती, तेरे समान कोई भी माँ नहीं हो सकती। सब कुछ तूने मेरे लिये त्याग किया। यशोदा सोचती हैं कि सब कुछ तो दे दिया, पर कृष्ण न मिला। मैंने इतना यत्न किया; पर कृष्ण हाथ से छूटे जा रहे हैं। रो रही हैं, वे कह रही हैं--जिसने पूतना को मारा था। उस श्रीभगवान् जिसने बकासुर को मारा था। जिसने तृणावर्त को मारा। अरे तू ही तो था जो गोवर्धन को उठाये था, उस समय तूने हमारी रक्षा की थी। आज तू हमें छोड़कर मत जा, आज तो हम पर कृपा कर दे। आज उस नन्द को सम्भाल, नन्द व्याकुल हो रहे हैं। अरे यशोदा! तू नन्द को धीरज बँधायेगी या अपने आँसू पोछेगी! यह बात सुनकर श्रीभगवान् भी रोने लगे! माँ भी रो रही है, पिता भी रो रहे हैं और सब ब्रजवासी भी रो रहे हैं। आज कथा समाप्त हो रही है; आज ही तो वृन्दावन छोड़कर चले गये। आज ही तो सब रोये; सब प्रकार भक्तों की आज सब लीला हुई। लोगों ने रो-रो कर भगवान् को विदा किया, उधर कंस के पास श्रीभगवान् मथुरा पहुँचे। जिस प्रकार मथुरा में कंस का भय था, आज वे सब आनन्दित हो रहे थे। अब तो श्रीकृष्ण आ गये हैं, अब हमें भय नहीं रहा, वे सब लोग देखने लगे, सब बातें होने लगीं। जब श्रीकृष्ण और बलराम ने धनुष तोड़ दिया तो कंस भयभीत हो गया। आज का प्रसंग यहीं समाप्त हो रहा है। कल मथुरा की कथा भगवान् करेंगे। कथा समाप्त नहीं होती, कथा तो चलती रहती है।
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