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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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ईश्वर का ध्यान करके विचार करना चाहिये कि, उस समय जीव का कैसा रूप रहता होगा कि जब परमात्मा सब को अपनी अपनी प्रकृति में लीन कर लेता होगा और सब जगत् ऐसा ही खाली दीखता होगा ? कभी ऐसा भी ध्यान लगाना चाहिये कि जब जगत् नहीं था, उस समय प्रलयकाल हो रहाथा; चारों ओर अंधकार, घोर तिमिर का राज्य फैला हुआथा फिर जीव सब जड़ रूप हो कर सो रहेथे प्रलयकाल में, प्रलयकाल की शान्ति सब बातों से बढ़ कर मालूमहोती; उस समय की सी न महाप्रलय नित्य, सदा जीवन की प्रलयहो; शान्ति का काम हो सके; कभी ऐसा विचारना कि प्रलयकाल रूप में लीन; अथवा मृत्यु रूप की मृत्यु का प्रलय स्वरूप हो, उस समय शान्ति; प्रलयकाल की समाधि अवस्था सर्वथा शान्ति प्रदायक ज्ञान की अवस्था, प्रलयकाल समाधि दशा कैसे प्राप्त होगी विचार करो? क्या उस समय शान्ति मिलै गी, आनन्द-रस समाधि प्राप्त होगा, वा न होगा यदि इस दशा विचारते हुये जगत् प्रपंच विसर ही जाय तो अच्छा, वा जो समाधि ध्यान दशा हो, समाधिरूपी हो, ऐसा विचार भी कुछ काम करेगा सब प्रपंचमात्र छोड़कर एकाग्र ध्यान लगाना चाहिये; हे जीव जब तू प्रलयमें जाय गा अथवा संसार छूट जायगातौ तू उस महाप्रलय सर्वेश्वर परमात्मा के प्रेम, शरण रूप को न भूले; प्रलयकाल आनन्दरूप शान्ति स्वरूपके ध्यान का भी अभ्यास करना चाहिये जिस सेप्रलयके भयसंसार भययुक्त समाधि के भय सब नष्ट होजायं व अभ्यास व ध्यान प्रलयका शान्ति का साधन बन जायगा सब रूप से प्रलयके अभ्यास का फल शुभ होगा ऐसा विचारने से प्रलयके समय का भय नष्ट होजायगा अभ्यास अभ्यास एकांत में बैठ-बैठ कर ऐसा ध्यान करने लग जाय तौ प्रलय के समय का रूप समझ मेंआने लग जायगा फिर चिन्ता का कारण ही क्या? ऐसा ध्यान कर सब भय छूटकर आनन्द-स्थान को प्राप्त होता हुआ सब को एकाग्र का ध्यान करा--ता हुआ एकाग्रता को प्राप्त होगा जब तक ध्यान में मन लगा रहेगा वा ध्यान बना हुआ रहेगा वा अभ्यास बना रहेगा तब काल का प्रभाव कुछ काम नकर सकेगा ना ही अविद्या-अज्ञान को, विकार को, वा अज्ञान जन्य प्रलयको उत्पन्न कर सकेगा ना ही जीव का जन्म, मरण, होगा जब तक अभ्यास का प्रभाव बना हुआ काल-मृत्यु का भय नहो सकेगा जब तक अभ्यास ध्यान बना ही रहेगा तब, काल को; उस काल रूप महाप्रलय को भी महाप्रलय रूप काल के समान काल स्वरूप जान के व समझ कर निर्भय हो कर रहेगा; प्रलयकाल से डर कर उस समय शान्ति रूप को छोड़ना भय का कारण जान ध्यान को ध्यान करने के लीये सब भय को नष्ट जान यह अभ्यास कर सब भय को दूर कर सब को महाप्रलय आनन्द-स्वरूप जान, सब रूप त्याग जीव सत्य--चित् को जान कर जीव समाधिस्थ होता जायगा जब मन एकाग्र समाधि में लीन हो कर सब भय रूप सब का त्याग कर, उस आनन्द, स्वरूप, समाधि रूप को प्राप्त; आनन्दमय, सुख स्वरूपमय, प्रेम, स्वरूप आनन्द सागर रूपके रस को आस्वादन करे? आनन्द रस? प्रेम रस आस्वादन करेगा वा न करेगा; वा उस रस रूप रस पान ध्यान लय होगा वा लय हो, ना लय न रसका हो, न परमात्मा का; अथवा यह आनन्द-आत्मानन्द प्राप्त हो गा? वा संसार का भय होगा, वा अविद्या भय का, प्रलयकाल भय सब परमात्मा स्वरूप जान भय रहित हो, ना सब भय प्रलय रूपी भय का संशय मिट, वा अविद्या भय, वा सब रूपी अविद्यादि अज्ञान महाप्रलय का भय मिटकर यह सब स्वात्मानन्द रूप होकर उस प्रलयकाल के भय को भी, उस काल रूप-मृत्यु को भी स्वात्म समझ कर, सब प्रलय को, सब कालको जीत! या पराजित कर के विजय को प्राप्त कर आनन्द मग्न होकर सब को जीत कर, लय अवस्था स्वरूप होगा ऐसा जान सब समाधि का आत्मानन्द रूप जान, स्वात्म रूप आनन्द का रूप जाने गा? अभ्यास करते हुए सब जीव रूप सब प्रपंच रूप प्रलयके रूप सब को लय का कारण जानकर, प्रलय रूपी समाधि जाने गा? ज्ञान का सुख होगा, उस का आनन्द भी परम सुख रूप रस का होगा, समाधि का स्वरूप सब प्रकार आनन्द दायक जान कर उस समाधिस्थ--रूप सब संसार को उस रूप जान सब भय को पराजय करेगा! जो ऐसा ध्यान अभ्यास न करेगा, अज्ञान प्रलय रूप भय को न त्याग कर काल के वशहोकर सब दुःख भोगता हुआ मरेगा व जिये! सब को त्याग करेगा? प्रलय को जान न सकेगा; प्रलय स्वरूप सुख रूप को, प्रलय रूपको जाने गा क्या? प्रलय रूपको क्या जानेगा? उस रूप प्रलय काल को, प्रलय, प्रलयकाल रूपका ज्ञान हुआ जिससे प्रलय का रूप वा स्वरूप ज्ञात 30