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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

से कथावाचक रुक गये और कथा समाप्त कर घर चले--यह कैसा न्याय?

कथा सुने, पर जो कुछ उस समय घट रहा था, वह आँखों को दिखाई पड़ रहा था। किसी कारण से कथावाचक रुक गये और कथा समाप्त कर घर चले--यह कैसा न्याय? वृन्दावन में सब लोग बहुत दुखी हो रहे हैं। सब को श्रीभगवान् अपने प्राणसम प्यारे लग रहे हैं! सब रो रहे हैं! कह रहे हैं--अरे, हमारे नयन मूँदने का समय तो आ गया लगता है! हम कैसे जियें इनके बिना? जिसने गोवर्धन उठाया था उसपर व्रज के लोगों ने भरोसा किया था, वह गोवर्धन हमारा साथ छोड़ देगा! अक्रूरजी-जैसे महापुरुष भी उन्हें ले जाने आये हैं। एक भक्त को भगवान् आज्ञा दे रहे हैं कि तू रथ ले जावेगा तो, वह रथ कैसे हाँक सकेगा कि प्रभु को ले जाये; अक्रूरजी सोच रहे हैं--भगवान् अपनी लीला कर रहे हैं। वे द्वारकाधीश तो होंगे पर ब्रज में भी तो रहेंगे। यह सोच रहे; पर माता यशोदा रोती हैं, मेरी गोद में बैठता था, दूध पीता था और अब यह रथ में चढ़ेगा। आज तक मैंने इसे पैदल भी न चलने दिया। यशोदा रोती हैं तो नन्द, सब ग्वालबाल रोते हैं। भगवान् के बिछुड़ने पर वे समझ रहे हैं कि यह हमारा ही... ऐसा अक्रूरजी सोचते हैं; कोई अक्रूरजी से तो न कहे, उस रथ को रोक ले; सब उस रथ से आगे जाकर खड़े हों; कोई उस रथ के पहिये को--जिस रथ में श्रीभगवान् के जाने की तैयारी हो रही है! उस रथ के पहिये को--इस प्रकार श्रीभगवान् के लिये सभी सब कुछ छोड़ने को तैयार थे; गोपियाँ तो अपने प्राणों का दान देने के लिये तैयार हैं, भगवान् के रथ को रोक रही हैं, रो रही हैं। कोई कहती है, कोई उस रथ के पहिये को तोड़ दे, तो रथ कैसे आगे बढ़ेगा? कभी ऐसा सोचा है? जिस कथा के माध्यम से ही हमें ज्ञान मिला उस कथा को हम तो भूलकर के ही सब कुछ कर रहे हैं। आज जिस प्रकार वृन्दावन व्याकुल हो रहा है। भगवान् के न रहने की बात सुनकर यशोदा रो रही हैं तो नन्द महाराज व्याकुल होते हैं, सब ग्वालबाल व्याकुल हो रहे हैं। भगवान् सोचते हैं, यह तो सब रो रहे हैं। भगवान् ने सबको समझाया। सब का मन भगवान् समझाते हैं। यशोदा रोती हैं, भगवान् कहते हैं-- यशोदा के वात्सल्य की बात का वर्णन तो नहीं किया जा सकता। माँ रोने लगी और रोती रही, जब तक आँखों के आँसू सूख न गये। माँ के रोने से जब नन्द रोये तो यशोदा ने कहा, अपने को तो रोना ही है। श्रीभगवान् ने कुछ देर बात की और यशोदा से कहा--कि माँ तुम रो रही हो तो मुझे रोना आता है। रो मत यशोदा! तूने जो मुझे प्यार दिया वैसा तो कोई माँ नहीं दे सकती, तेरे समान कोई भी माँ नहीं हो सकती। सब कुछ तूने मेरे लिये त्याग किया। यशोदा सोचती हैं कि सब कुछ तो दे दिया, पर कृष्ण न मिला। मैंने इतना यत्न किया; पर कृष्ण हाथ से छूटे जा रहे हैं। रो रही हैं, वे कह रही हैं--जिसने पूतना को मारा था। उस श्रीभगवान् जिसने बकासुर को मारा था। जिसने तृणावर्त को मारा। अरे तू ही तो था जो गोवर्धन को उठाये था, उस समय तूने हमारी रक्षा की थी। आज तू हमें छोड़कर मत जा, आज तो हम पर कृपा कर दे। आज उस नन्द को सम्भाल, नन्द व्याकुल हो रहे हैं। अरे यशोदा! तू नन्द को धीरज बँधायेगी या अपने आँसू पोछेगी! यह बात सुनकर श्रीभगवान् भी रोने लगे! माँ भी रो रही है, पिता भी रो रहे हैं और सब ब्रजवासी भी रो रहे हैं। आज कथा समाप्त हो रही है; आज ही तो वृन्दावन छोड़कर चले गये। आज ही तो सब रोये; सब प्रकार भक्तों की आज सब लीला हुई। लोगों ने रो-रो कर भगवान् को विदा किया, उधर कंस के पास श्रीभगवान् मथुरा पहुँचे। जिस प्रकार मथुरा में कंस का भय था, आज वे सब आनन्दित हो रहे थे। अब तो श्रीकृष्ण आ गये हैं, अब हमें भय नहीं रहा, वे सब लोग देखने लगे, सब बातें होने लगीं। जब श्रीकृष्ण और बलराम ने धनुष तोड़ दिया तो कंस भयभीत हो गया। आज का प्रसंग यहीं समाप्त हो रहा है। कल मथुरा की कथा भगवान् करेंगे। कथा समाप्त नहीं होती, कथा तो चलती रहती है।

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ईश्वर का ध्यान करके विचार करना चाहिये कि, उस समय जीव का कैसा रूप रहता होगा कि जब परमात्मा सब को अपनी अपनी प्रकृति में लीन कर लेता होगा और सब जगत् ऐसा ही खाली दीखता होगा ? कभी ऐसा भी ध्यान लगाना चाहिये कि जब जगत् नहीं था, उस समय प्रलयकाल हो रहाथा; चारों ओर अंधकार, घोर तिमिर का राज्य फैला हुआथा फिर जीव सब जड़ रूप हो कर सो रहेथे प्रलयकाल में, प्रलयकाल की शान्ति सब बातों से बढ़ कर मालूमहोती; उस समय की सी न महाप्रलय नित्य, सदा जीवन की प्रलयहो; शान्ति का काम हो सके; कभी ऐसा विचारना कि प्रलयकाल रूप में लीन; अथवा मृत्यु रूप की मृत्यु का प्रलय स्वरूप हो, उस समय शान्ति; प्रलयकाल की समाधि अवस्था सर्वथा शान्ति प्रदायक ज्ञान की अवस्था, प्रलयकाल समाधि दशा कैसे प्राप्त होगी विचार करो? क्या उस समय शान्ति मिलै गी, आनन्द-रस समाधि प्राप्त होगा, वा न होगा यदि इस दशा विचारते हुये जगत् प्रपंच विसर ही जाय तो अच्छा, वा जो समाधि ध्यान दशा हो, समाधिरूपी हो, ऐसा विचार भी कुछ काम करेगा सब प्रपंचमात्र छोड़कर एकाग्र ध्यान लगाना चाहिये; हे जीव जब तू प्रलयमें जाय गा अथवा संसार छूट जायगातौ तू उस महाप्रलय सर्वेश्वर परमात्मा के प्रेम, शरण रूप को न भूले; प्रलयकाल आनन्दरूप शान्ति स्वरूपके ध्यान का भी अभ्यास करना चाहिये जिस सेप्रलयके भयसंसार भययुक्त समाधि के भय सब नष्ट होजायं व अभ्यास व ध्यान प्रलयका शान्ति का साधन बन जायगा सब रूप से प्रलयके अभ्यास का फल शुभ होगा ऐसा विचारने से प्रलयके समय का भय नष्ट होजायगा अभ्यास अभ्यास एकांत में बैठ-बैठ कर ऐसा ध्यान करने लग जाय तौ प्रलय के समय का रूप समझ मेंआने लग जायगा फिर चिन्ता का कारण ही क्या? ऐसा ध्यान कर सब भय छूटकर आनन्द-स्थान को प्राप्त होता हुआ सब को एकाग्र का ध्यान करा--ता हुआ एकाग्रता को प्राप्त होगा जब तक ध्यान में मन लगा रहेगा वा ध्यान बना हुआ रहेगा वा अभ्यास बना रहेगा तब काल का प्रभाव कुछ काम नकर सकेगा ना ही अविद्या-अज्ञान को, विकार को, वा अज्ञान जन्य प्रलयको उत्पन्न कर सकेगा ना ही जीव का जन्म, मरण, होगा जब तक अभ्यास का प्रभाव बना हुआ काल-मृत्यु का भय नहो सकेगा जब तक अभ्यास ध्यान बना ही रहेगा तब, काल को; उस काल रूप महाप्रलय को भी महाप्रलय रूप काल के समान काल स्वरूप जान के व समझ कर निर्भय हो कर रहेगा; प्रलयकाल से डर कर उस समय शान्ति रूप को छोड़ना भय का कारण जान ध्यान को ध्यान करने के लीये सब भय को नष्ट जान यह अभ्यास कर सब भय को दूर कर सब को महाप्रलय आनन्द-स्वरूप जान, सब रूप त्याग जीव सत्य--चित् को जान कर जीव समाधिस्थ होता जायगा जब मन एकाग्र समाधि में लीन हो कर सब भय रूप सब का त्याग कर, उस आनन्द, स्वरूप, समाधि रूप को प्राप्त; आनन्दमय, सुख स्वरूपमय, प्रेम, स्वरूप आनन्द सागर रूपके रस को आस्वादन करे? आनन्द रस? प्रेम रस आस्वादन करेगा वा न करेगा; वा उस रस रूप रस पान ध्यान लय होगा वा लय हो, ना लय न रसका हो, न परमात्मा का; अथवा यह आनन्द-आत्मानन्द प्राप्त हो गा? वा संसार का भय होगा, वा अविद्या भय का, प्रलयकाल भय सब परमात्मा स्वरूप जान भय रहित हो, ना सब भय प्रलय रूपी भय का संशय मिट, वा अविद्या भय, वा सब रूपी अविद्यादि अज्ञान महाप्रलय का भय मिटकर यह सब स्वात्मानन्द रूप होकर उस प्रलयकाल के भय को भी, उस काल रूप-मृत्यु को भी स्वात्म समझ कर, सब प्रलय को, सब कालको जीत! या पराजित कर के विजय को प्राप्त कर आनन्द मग्न होकर सब को जीत कर, लय अवस्था स्वरूप होगा ऐसा जान सब समाधि का आत्मानन्द रूप जान, स्वात्म रूप आनन्द का रूप जाने गा? अभ्यास करते हुए सब जीव रूप सब प्रपंच रूप प्रलयके रूप सब को लय का कारण जानकर, प्रलय रूपी समाधि जाने गा? ज्ञान का सुख होगा, उस का आनन्द भी परम सुख रूप रस का होगा, समाधि का स्वरूप सब प्रकार आनन्द दायक जान कर उस समाधिस्थ--रूप सब संसार को उस रूप जान सब भय को पराजय करेगा! जो ऐसा ध्यान अभ्यास न करेगा, अज्ञान प्रलय रूप भय को न त्याग कर काल के वशहोकर सब दुःख भोगता हुआ मरेगा व जिये! सब को त्याग करेगा? प्रलय को जान न सकेगा; प्रलय स्वरूप सुख रूप को, प्रलय रूपको जाने गा क्या? प्रलय रूपको क्या जानेगा? उस रूप प्रलय काल को, प्रलय, प्रलयकाल रूपका ज्ञान हुआ जिससे प्रलय का रूप वा स्वरूप ज्ञात 30

देखना क्या यह लाल-पीला सा कोई खण्ड होगा? पर वह खण्ड तो, जो सब से परे, सब प्रकार से श्रेष्ठ होगा? उसका नाम ही तो एक रस तृप्त रस, जिसको न घट, जिसको घट ही न हो कभी, जिसको न घटा सके न बढ़ा सके कोई--हे परमात्मन्, तू इस अधिकार--का फल दिला ही देगा क्या? लेकिन जब कि ऐसी एक निष्ठा लेकर मनुष्य सब प्रकार उस रस रूप प्रभु पर ही सब छोड़ देता अथवा सब कुछ त्याग कर के प्रभु रूप लाल-पीले को छोड़ देता, स्वयं चिन्मात्र सत्ता रूप हो कर स्थित होजायगा तब तो सब भेद मिटने पर केवल ही हो कर सर्वव्यापक हो जायगा अथवा किसी भी तरफ से अपने को भिन्न न समझ कर सब से अपने को गिने; पर दोनों ही तरह से ही भक्त का कल्याण प्रत्यक्ष ही हो रहा है न उस को डर रहा न उस को कोई तृष्णा रही केवल यह विचार कि सब संसार का स्वामी ही सब कुछ सब तरह से कर रहा है सब ही रस दिखलायगा उस व्यापक प्रभु-सत्ता--सर्वव्यापी परमात्मा सब प्रकार भला करे, जिसको कि अनन्यनिष्ठा वाला विवेकी सब तरह अपनी रक्षा करने वाला जानता ही रहा है। भगवत्स्वरूप सब प्रकार से सब पर दया स्वाभाविक रीति से करता ही रहा है, अतः उस भक्त विवेक विचारपूर्वक भगवान् सब पर दया करते हैं यह जानकर क्यों न डरेगा! जो भगवान् की सब बात भला करने पर ही निर्भर हो कर सोचेगा ही, वह घबड़ायगा क्यों; चिन्ता से छुटकारा पा ही गया वह भक्त तो सदा भगवान् के भजन चित्त को लगा ही रखता है, भगवान् की कृपा चिन्तन विचारपूर्वक सब प्रकार से करता हुआ स्वाधीनता को ही प्राप्त होता रहता है, कभी अकेलापन सब संसार रूप समझ कर सब प्रकार से निर्भय हो कर बैठता ही रहता है, पर सोच यही तो मन में रहता है सदा ही कि हे सर्वसमर्थ तू दयालु, सर्वथा स्वतंत्र सब कुछ रूप परमात्मा ही सबका सब--कुछ कर सकता हुआ सब प्रकार भला कर रहा है जो सब कुछ देखने में आरहा, फिर मनुष्य क्यों घबड़ावे री, जब दाता ही सब प्रकार भला सब तरफ कर दिखलाने को तय्यार, फिर डर क्या पर बात तो जब मनुष्य के मन में समावे, भगवन्त रूप विचार सब अन्तःकरण में ही तो होगा? कभी चित्त को एकाग्र करके यह भी तो सोचे भगवान् सब का ही भला करते हैं; लेकिन भला ही तो सोचे विचार करे तो ही उसे ऐसा सत-भाव उस से मिल सकता अथवा प्रकाशमय कर सके ज्ञान को जो ज्ञान ही, रूप ही तो मनुष्य के जीवन का प्राण हो कर सब से परे, सब से अलग विभूति को देता, पर ज्ञान सब से श्रेष्ठ ही तो सब का सब कुछ रस देने वाला रहा है, वह अज्ञानता सब को क्यों भगावे? जो सर्वव्यापक सत्ता सर्वज्ञता रूप सब कल्याण कर सकती उस से मन के भीतर से क्यों न प्रार्थना की जाय ताकि मुक्ति लाभ सब का सब मिल सके उस का मन भी शांत हो, प्रभु शरण! पर अज्ञान को दूर करने का ज्ञान विचार प्रभु से मांग कर मनुष्य को सब प्रकार से सुखी होना, सो सब से श्रेष्ठ विचार है; भगवन्त ही दयालु सब का, जो मनुष्य पर कृपा करे, तो मनुष्य केवल ही! उस का यश सब प्रकार से सर्वत्र सब तरफ फैल जायगा और उस का, दयालु का दयाल रूप परमात्मा का ही गुण संसार में जो प्रसिद्ध होगा सब से ही सब का कल्याण सब तरह सब का सर्व प्रकार से सिद्ध साधन हो सकता ही रहा केवल ज्ञान से ही तो सब अविवेकता रूपी जो सब अविवेकता भरी सब बात जिस संसार से मनुष्य समझ रहा होगा? लेकिन मन तो जो अविवेकी, भगवान् की पर आश्रित रहकर ही मिटा ही देवे! पर जब ऐसा उत्तम विचार सब तरफ फैला हो गया होगा, फिर घबड़ावे? ज्ञान स्वयं ही मनुष्य को सब तरफ लेजा कर ऐसा परम प्रकाश स्वरूप कर सकता जिस प्रकाश रूप को ही प्रभु कह सकते हैं, जिस रूप द्वारा संसार का कल्याण, भला ही सदा... ॥ इतना कह प्रभु के चरण में वन्दना किया, प्रभु सब के सब प्रकार से मंगल का विचार करते हैं, दयालु हैं, जो पल-पल अविवेकीयों को अपने समान विचारवान् करते हुए कल्याण में, जो संसार कल्याणकारी सब का रूप है? सर्वव्यापी सत्ता का ध्यान ही सुख-सम्पदा को ही देने वाला हो सकता रहेगा; जिससे कि सारा संसार? ही तो तृप्त रूप रस से भर कर न केवल आनन्द स्वरूप आनन्दमय हो जाय विकार-वासनारहित सब मन मस्त ज्ञान रस आनन्द-रसस्वरूप 31

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और इसके सिवाय आत्मा ऐसा तो नहीं जिसे जानना सहज होगा, कठिन होगा, असाध्य होगा? कठिन होगा, ऐसा न होगा? कठिन तब होता, अगर उसे बाहर से लाना होता ऐसा कोई पदार्थ जिसे अन्य लोग जानते हों, उसे भीतर लाना होता और भीतर बैठाना ही कठिन हो गया; परन्तु भीतर बैठा ही हुआ है इसलिए वह कठिन होगा? बाहर से लाना हो तब तो सोच और श्रम भी करना पड़े पर जो भीतर ही बैठा हुआ कठिन होगा? सच, बाहर जाना कठिन है, भीतर आना बहुत सहज पर जब भीतर जाना ही नहीं होता तो यह बात कैसे समझ में आवे कि भीतर की निवृत्ति कैसी हो सकती, इसका उपाय जानना न पड़े तो फिर और तो क्या हो सकता भाई, पर इसके लिए जीव बहुत उपाय कर चुका पर मुक्ति नहीं हुई, तब उपाय किया गया, जिसे यह समझ में आवेगा कि व्यवहार रूप निमित्त मात्र कोई भी बात से तो काम नहीं होगा? इसका कारण यह, जिसे सब ही कर ही रहे हैं और करते रहेंगे, क्योंकि यह तो अनादिकाल से ही कर रहे थे। ऐसा जानकर अब निश्चय जानकर करना होगा कि यह तो व्यवहार ही रहा है, और फिर जो सब संत जन इस स्वरूप बात कहते आये हैं सो इस बात के विपरीत तो नहीं कह गये हैं और अगर वे सब संत जन इस प्रकार के उपाय करने से ही मुक्त हुए हैं तब निश्चय से इसके ही द्वारा मोक्ष होता है सो जान कर ही तो ज्ञानी जन इस पर जोर लगाते आये हैं। इस बात, उपाय भिन्न--भिन्न प्रकार समझाने का यह एक ही तो प्रयोजन हो सकता है कि, हम सब इस बात को समझ कर आत्मकल्याण के योग्य बनें! भला सोचो? यह बात समझ कर कैसे आगे बढ़ें पहले ऐसा समझो, इसमें तो संशय न रहा? जो भी कह रहे हैं शास्त्र और संत जन वे आत्मज्ञान के ही लिए कहते आये हैं। इस बात में, जिसे भी संशय होगा सो सब व्यर्थ समझ लेगा पर जिसे समझ में आया सो ऐसा न कहे, जो कुछ भी कहा जा रहा जिसे भी समझा जा सके सो ही कहा जा रहा, समझे बिना काम कैसे चलेगा क्यों? जो कुछ भी कहा जा रहा उसका लाभ लेना चाहिये न कि इस तरह सोचे कि केवल सुन लेने से ही सब हो! निश्चय ही! संशय को छोड़ कर? जो कुछ भी कहा जा रहा सो सब को ही लाभ करने वाला समझना चाहिये सो इस भाव से ही बात को ग्रहण करे! निश्चय लाभ होगा ही? जो बात कही जा रही है उसको मन न दे तो क्या निश्चय जान लो, अज्ञानी, तू तो समय के बीत जाने पर ही पछताये बिना रहेगा न जब समय बीत कर हाथ से निकल गये अवसर तब सिर पर हाथ रखकर ही केवल पछता रहेगा न? पर ज्ञानीजन तो ऐसा नहीं सोचते ऐसा विचार कर ज्ञानी पुरुष तो सब सांसारिक मोह को ही त्याग दिया करते हैं, वे ही ज्ञानी या तत्वज्ञानी कहला सकते हैं। जिसे इस बात का भी ज्ञान नहीं वह तो ज्ञानी कहला नहीं सकता, जो भी ज्ञानी के पास जा कर ही सब तरह का जो भी कुछ जान सकता अवश्य लाभ उठायेगा पर स्वयं तो नहीं, अपने आप ही तो, जो भी ज्ञानी जन कह रहे हैं सो, इन बातों द्वारा निश्चय ही मन को इस ओर लगा कर लाभ प्राप्त कर सकता पर जब तक ही निश्चय होगा तब तक कुछ लाभ होगा सब सन्देहों को मिटा दो! भाई, सब मन देकर सुनो सुनो सुनो बात को सुनो सुनो! जो भी कहा गया न समझो कि यह यों ही कहा जा रहा; यह तो विशेष ज्ञान की बात ही सब को सुनायी जावेगी सो ही इस बात पर जो भी ध्यान लगायेगा उसका ही तो ही भला होगा सो ही इस प्रकार का ही फल; ही प्राप्त कर लेगा निश्चय सो ज्ञानीजन कहते "जो भी संशय मिटा कर मन से शांत होकर सुनेगा उसका संशय सब मिटेगा या जिसके पास कोई उपाय शंका मिटाने का होगा, सो ही निश्चय ही तो सब इस सांसारिकता से पार सांसारिक तो काम सब एक--प्रकार से मन--ही करता रहा न रहेगा; जब ही इसके पार मुक्ति पायेगा ज्ञान स्वरूप सदा काल ही सब सांसारिक बातों से अधिक उत्तम ज्ञान सर्वश्रेष्ठ स्वरूप रहा हमेशा सांसारिकता से सदा काल मन--मुक्त रहने पर ही कल्याण स्वरूप को प्राप्त कर सकता और जो इस प्रकार का मन बना लेवेगा सो ही सांसारिक बन्धन रहित हो कर, जो सिद्ध रूप निश्चय रूप प्राप्त कर लेगा, सो ज्ञानी पुरुष 33

चित्र में प्रयुक्त फ़ॉन्ट/एन्कोडिंग त्रुटि के कारण सभी देवनागरी वर्ण अपठनीय (चौकोर बॉक्स / Tofu '□') के रूप में दिखाई दे रहे हैं। केवल विराम चिह्न और पृष्ठ संख्या दृश्यमान हैं।

दृश्यमान चिह्नों और स्वरूप के अनुसार पंक्ति-वार (Line-by-line) विवरण:

□□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□--□ □□□□ □□□□□ □□ □□, □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□□ □□□□; □□□ □□□□□ □□□□, □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□--□□□□ □□□□, □□□□ □□□□□, □□□□ □□□□-□□□□□! □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□! □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□, □□ □ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□□□□□□□ □□; □□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□, □□□ □□ □ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□, □□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□, □□□ □□ □□□, □□□ □□ □□□, □□□□□□□ □□ □□□□□□□, □□□□ □□ □□□□, □□□□□ □□ □□□□□, □□□ □□ □□--□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□, □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□! □□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□, □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□, □□□□□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□, □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□; □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□; □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□, □□□ □□□ □□, □□□□ □□, □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□-□□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □ □□□□ □□ □□□□□□-□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□... □ □□ □□□ □□□□, □□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□, □□□□ □□□ □□ □□□ □□, □□□□□ □□□ □□ □□□ □□, □□□□□ □□□ □□ □□□ □□, □□□□ □□□ □□ □□□ □□--□□□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□-□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□, □□□□ □□□ □□ □□□□-□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□-□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□; □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□, □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□! □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□? □□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□-□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□-□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□□□, □□□□-□□□□ □□□-□□□□ □□ □□□ □□□□□; □□□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□, □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□; □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□; □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□--□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□, □□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□, □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□--□□ □□ □□ □□ □□□□, □□□□ □□□ □□, □□□□□ □□□ □□, □□□□□□ □□□ □□; □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□ 34

पाप और पुण्य का प्रमाण क्या प्रभु कृपा कहो मुझे, जिससे कि उसका फल समझ सकूँ? किस वस्तु पाप, किसे पुण्य कहा-गया है? किस कर्म से, किस कार्य कहलाता है? सर्वसाधारण जन, पाप का विचार संकोच से किया सब लोग उस मन-वचन और कर्म विचार से सब लोग सब को यह विचार सदा मन को शुभा और अशुभ कर्म की चिंता को सब समझकर सब का उद्धार कर सब ऐसा विचार सदाचार स्वभाव बना सकता है; यह विचार ही सब हृदय में आ जाय, जिससे कि सब का उद्धार सदा सब सके! सर्वसाधारण जन का मन विचार-योग्य? सर्वसाधारण विचार सब का सदा हो? सब का कल्याण सब सब लोग करें! विचार सबका ही सब उत्तम हो, इससे सब लोग सदा ही सब तरह सर्वदा ही सब तरह अपने आप को सब विचार सब सब प्रकार से सब को मन से शुभाशुभ कर्म का निर्णय कर सब लोग सब रहें। सब ही ऐसा सर्वसाधारण हो, इससे सबका सदा विचार ही सर्वदा ही कल्याण योग्य हो? सब इस मन-का विचार ही सब का विचार सब उत्तम हो सब सब कल्याण ही करें; सब को सदाचार उत्तम मिले; सब ही लोग जो विचार उत्तम विचार सदा सब का उद्धार सब लोग समझ कर, तन-मन सदा ही विचार उत्तम करें। सब तरह का सब विचार ही उत्तम रूप सब लोग सदा विचार जानकर ही कहें, जिससे कल्याण ही होवे, जो सब प्रकार से होवे, जो सदाचार सर्वसम्मत हो तन--मन सदा रहेगा? इसलिए सब लोग जो विचार सब लोग कहें, जो सब प्रकार से सदा सब लोग सब तरह सदा विचार का निर्णय ही सदा कहें सब उस ही सदाचार विचार को ही सदाचार सब ही विचार ही सब तन-मन सदा रहें। सब विचार सब सदाचार विचार ही सब उस तन-मन सब रहें, जिससे सर्वसाधारण स्वावलंबन का ही सब सदाचार विचार सदा ही सब लोग विचार ही सब सदाचार विचार सब अपने मन को समझ कर सदाचार सदा विचार करें, सदाचार सदा सब विचार सदा सदा ही विचार से विचार करें, जिससे कि सदा विचार रहे, सदाचार सब तन--का सब सदाचार स्वभाव ही सदा रहे ही सब को, सदाचार का विचार सब लोग सब सदा सब तरह से सदा सब को सब कहें, सदाचार सदा ही विचार सब विचार सदाचार स्वावलंबन सदाचार सब विचार सब को प्राप्त हो, सदा ऐसा करें। जो सर्वसाधारण सब विचार सब सब करें; सब विचार सब तरह कहें; सर्वसाधारण विचार स्वावलंबन का सब सब तरह विचार करें, जिससे स्वावलंबन, स्वावलंबन सदा, जिससे सबका सब ही उद्धार हो; जो विचार ही विचार सब लोग का स्वावलंबन विचार ही सब लोग सदा कहें जिससे विचार सब तरह सब सब तरह सब लोग जो विचार सब का विचार सदा ही करें। ऐसा विचार ही सब सदाचार का विचार समझना चाहिए, जो सब प्रकार सब विचार, सब तरह सब विचार, जो सदाचार का सब ही विचार हो स्वावलंबन ही सब को तन--का ही विचार हो, जो विचार सब लोग सदा सब सब करें, जिससे सदा उत्तम विचार सब का सदाचार विचार सदा ही हो सके सब तरह, जिससे सब विचार सदा ही, सदा ऐसा करें। ऐसा विचार ही, जो सब लोग सब विचार ही का विचार हो, सदाचार का ही विचार हो, सब प्रकार से ही सदाचार का विचार सदाचार का विचार हो, सब प्रकार से ही विचार ही सदाचार विचार समझें, जिससे कि जो विचार, वह सब स्वावलंबन विचार ही विचार सब को सदा विचार कर सब ही का स्वावलंबन सब तरह विचार ही का सब ही सदा ही सब सदाचार रहे। सर्वसाधारण सब विचार करें; तन-मन विचार ही विचार सब सर्वसाधारण सब स्वावलंबन विचार ही सब प्रकार सदा करें; सर्वसाधारण ही सदाचार तन--मन हो, सब ऐसा हो, सदाचार हो! जो ही सदाचार ही सब सदाचार-स्वावलंबन का सदा तन-मन हो; जो स्वावलंबन का सदा ही सब को सब ही विचार सब सब लोग करें जो सब सदाचार सदा ही सदाचार विचार ही सदा रहे; जिससे कि सदा सब लोग जो, सदा ही सदाचार स्वावलंबन सदा रहे, जो विचार सब सब लोग करें। जिससे स्वावलंबन सब सदा सदा प्रकार से ही स्वावलंबन सब ही सदा स्वावलंबन विचार सब लोग करें, सदाचार विचार सदा सदा ही सब को सदा विचार ही सदा विचार ही ही सब कहें, जिससे सदाचार विचार ही सदा 35

▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯ ▯▯▯▯▯▯; ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ 36

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कदाचित् जीव को परमात्मा रूप जल मिल जाता है। तब आत्मा रूप कमल खिल जाता है। जो प्रभु का ध्यान करे। महाराज ! जब भी कोई जीव सो जाता है, तब वह मन, बुद्धि रूप जो सूक्ष्म, वा स्थूल समस्त प्रपंच रहता है न तब आत्मा का न मन, न च बुद्धि, आत्मा को आनन्द रहा, न यह जग विस्मृत हो परमात्मा मिला, पर मुक्ति जीव को न मिली है, जब यह जाग--कर फिर विषय रस में चला गया है, वा तो मुक्ति जीव को, महाराज जी कहे, तब मिले जब वह इस शरीर, मन को त्याग कर--कर सदा ही समा गया हो मुक्ति पाया, सदा आनन्द में लव लीन रहा! वा जबी मन किसी का लय हुआ तब ही आनन्द है; सदा आनन्द तब ही विश्राम है; सदा ऐसा रूप हो कर रहे सो मुक्ति रूप ही समझ सो मुक्ति हां, जो मन की वृत्तियां सब लय होकर एकाग्र चित्त हो कर परमात्मा परमात्मा में मिलन करे तब ही परमात्मा रूप ज्ञान परमात्मा समाधि रूप सब रस रस परमात्मा रूप रस को प्राप्त परमात्मा स्वरूप हो जाता तब ही रस परमात्मा रूप रस को प्राप्त होकर सदा ही तृप्त, आनन्द रूप रस-मय रूप परमात्मा जैसा आप बन जाता है सो ही, मुक्ति परमात्मा परमात्मा रस-मय रूप परमात्मा स्वरूप रस में तृप्त हो कर सो, मुक्ति परमात्मा स्वरूप ही समा गया- समा ही, रस-मय रस में लय फिर जो सदा आत्मा रूप ही स्वरूप को जान कर सो तो ही समाया कभी बाहर तो न गया सब परमात्मा ही स्वरूप है--सब जन ऐसा ही समझे सदा ही सदा आत्मा ही परमात्मा ही रहा; सो सदा ही सदा ही सदा ही मुक्ति स्वरूप सदा रूप परमात्मा का परमात्मा रूप ही ज्ञान रस परमात्मा रूप रस को प्राप्त रहा; परमात्मा रूप सदा आनन्द तृप्त हो कर आत्मा परमात्मा समाधि सदा चित्त ही रस-अमृत परमात्मा सदा, परमात्मा तृप्त लय रस रस जन, सब सब आत्मा रूप सदा समाया रहा, सब परमात्मा रूप रस समाया रस रूप रस स्वरूप ही सदा तृप्त हो कर सदा ही सदा सदा ही समाया मुक्ति सदा तृप्त रहा; प्रभु रूप को मन से तृप्त सब रूप में, सब मुक्ति ही ही ही जो सदा रूप जन, सो सदा तृप्त हो कर परमात्मा रस प्राप्त संसार के मोह से छूट कर आत्मा का ध्यान ही सब से बड़ा योग कर्म, व तपस्या रूप ही सब जान सब कर्मों से उत्तम कर्म ही सब कर्म रूप से, प्रभु स्वरूप जान कर ही, ज्ञान योग स्वरूप ही सो सदा ही ही सब कर्म सब ही सत्य ही ही सत्य--है! सब ही मुक्ति का रस मुक्ति रूप, सदा सब सत्य ही सत्य परमात्मा सब रस सत्य, सत्य ही सब सो--सब रस सत्य है; परमात्मा ज्ञान ही स्वरूप सत्य है... व मन सब का सब रस से छूट कर केवल, सो ही सत्य ही परमात्मा रूप जान सदा ही परमात्मा रूप ही ही सदा रहता ही रस है, सब प्रभु ही रस रूप सत्य रूप सब ही सो स्वरूप ही सब सब सब ही मुक्ति रूप ही, सब परमात्मा ही सत्य ही ही सब ही परमात्मा ही सब सब व स्वरूप, जो जन सब स्वरूप परमात्मा ही जान सब मुक्ता ही परमात्मा सत्य--ही सब स्वरूप ही स्वरूप सब संसार के समस्त विकारों को, त्यागकर सदा ही प्रभु परमात्मा परमात्मा सदा जो परमात्मा परमात्मा ही बन रहा, सदा आनन्द परमात्मा ही स्वरूप ही सदा प्रभु ही परमात्मा स्वरूप ही सब जग सदा स्वरूप, मुक्ति सदा ही सब ही ही सदा ही, सब सदा ही परमात्मा सदा मुक्ति स्वरूप सदा सब सदा ही, सब सदा तृप्त स्वरूप ही तृप्त-तृप्त ही सदा ही परमात्मा तृप्त सदा तृप्त प्रभु ही तृप्त-तृप्त ही रस तृप्त रस--परमात्मा तृप्त-परमात्मा सदा ही--ही तृप्त-परमात्मा तृप्त सब सब तृप्त तृप्त स्वरूप सब परमात्मा ही सब परमात्मा ही सदा रहा सो ही परमात्मा स्वरूप सब रहा, सदा ही सब सब सब व परमात्मा "तृप्त-तृप्त ही सदा तृप्त-रस ही रस सब ही सब सदा स्वरूप ही स्वरूप सदा तृप्त स्वरूप ही परमात्मा ही सदा तृप्त सदा तृप्त ही"-- सब रस सदा तृप्त सब परमात्मा स्वरूप सब ही सब परमात्मा सदा रूप तृप्त ही सब ही सदा परमात्मा रूप ही सदा तृप्त ही सदा ही; सो सब जग रस ही तृप्त ही सदा ही ही ही स्वरूप परमात्मा ही सदा सब ही सो सदा सब सदा स्वरूप ही तृप्त ही सब सब ही परमात्मा स्वरूप ही, 40

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कथा का प्रवाह किसी ओर बह रहा था। स्वामी जी जब कथा कह रहे थे तब सब लोग स्तब्ध थे, केवल उनके मुख मण्डल तथा उनकी उस प्रतिभा को निहारते जा सकते थे। उसके पश्चात जब व्यास गद्दी किसी दूसरे महात्मा को सौंपी गयी तो सब लोग उठ कर कथा मण्डप से दूर परस्पर गप लड़ाने लगे। प्रद्युम्नसिंह जनसमूहके साथ आगे बढ़ा। आगे जाकर वह एक साधु महाराज के पास बैठा; और उनके चरण दबाने लगा। कुछ देर के पश्चात साधु महाराज को कुछ चेतना आयी; फिर वह आंखें खोल कर, इधर उधर देखकर कुछ चकित हुआ, आश्चर्य प्रकट करता हुआ साधु क्या कहने लगा? प्रद्युम्नसिंह को देखकर साधु कहने लगा कि बेटा! तुम कौन हो। किसी को खोजते हो क्या--प्रद्युम्नसिंह ने कहा स्वामी जी आप अन्तर्यामी हैं। सब कुछ जानते हैं फिर मुझ जैसे पापी से पूछने की क्या आवश्यकता है। आप यह बतलायें कि हम जो कुछ करते हैं, उसका परिणाम तो हमें न कभी न कभी भुगतना ही पड़ेगा। साधु कहने लगे अवश्य ही कर्म-फल भोगना ही पड़ता है। कर्म सिद्धान्त का चक्र; फिर कौन सी ऐसी बात समझना चाहते हो। प्रद्युम्न ने हाथ जोड़कर कहा कि यह तो बतलाओ कि मनुष्य अपने कर्मों का फल कब तक और किस प्रकार से भोगता है। साधु महाराज ने कहा-- "कर्मों का फल कर्म-फल के रूप में, जो रूप धारण करता है अवश्य होगा" इतना सुनते ही प्रद्युम्न सिंह के मुख से पश्चाताप की एक लहर सी उठी। कि इस संसार चक्र में इस कर्म के बन्धन से कौन छूट सकता है? उसने कहा साधु जी महाराज ! यह बात किसी प्रकार से मिट नहीं सकती क्या? यदि ऐसा नहीं; फिर उपाय क्या है? प्रद्युम्न ने अपने उस पाप को याद करके एक आह भरी और कहने लगा, क्या उपाय? उस समय साधु ने कहा कि अरे भाई! तू तो सब कुछ जान कर भी अनजान सा क्यों बनता है! जब तक ईश्वर की शरण में नहीं जाओगे तब तक छुटकारा मिल पाना असम्भव है। "कर्म-फल से त्राण भगवत्-कृपा से मिल गया तो, तुम बच जाओगे अन्यथा तो भुगतना होगा" प्रद्युम्न को फिर कुछ शान्ति मिली। जब वह स्वामी जी महाराज के पास से जाने लगा तब, एक आवाज सुनायी दी, एक व्यक्ति कहता चला, जा रहा था कि कन्हैया तुम्हारे कारण, सब लोग अपना काम छोड़ कर आ गये। हमारा काम बिगड़ गया; नुकसान बहुत हुआ। उस समय कन्हैया चुप था। वह केवल इतना ही बोला कि! नुकसान सचमुच हुआ होगा पर हम सब का सहारा तो भगवान ही हैं न? कन्हैया ने कहा सच कहना तो, सब बिगड़ जाता! "कन्हैया ने सच ही कहा था।" उस समय प्रद्युम्न सिंह सोच रहा था कि कन्हैया ठीक कहता है, हर बात सच ही होनी चाहिए, सच को कोई कैसे छुपा सकता है। साधु महाराज सच कह रहे थे। सच से बचा तो जा सकता है, पर झूठ से नहीं। प्रद्युम्न ने विचार किया कि उसने जीवन में क्या सच कहा? किया या सुना? प्रद्युम्न सिंह सोच रहा था कि? जो अत्याचार किया उसका परिणाम कितना भुगतना पड़ेगा? उसे अब समझ आ रहा था कि पाप का परिणाम सच से अधिक भयंकर होता है, पाप कभी छिपता नहीं केवल पाप से छुटकारा पा लेना ही श्रेयस्कर है, प्रद्युम्न को अपनी भूल दिखाई पड़ने लगी थी। प्रद्युम्न का पश्चाताप और गहरा होने लगा। प्रद्युम्न का शरीर, लरजने लगा। वह कांपने लगा; प्रद्युम्न सिंह एक ओर जाकर बैठ गया। रात को जब सब सो गये तो प्रद्युम्न ने स्वयं को असहाय सा अनुभव किया; प्रद्युम्न अपनी अकर्मण्यता पर रोने लगा, कि भगवान् अब; प्रद्युम्न अपने पापों के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था। उसके पश्चाताप के आंसू निकल रहे थे। वह रात भर सो न सका। वह स्वयं को बहुत ही नीच; पापी और कुकर्मी समझता हुआ रात भर तड़पता रहा; प्रद्युम्न ने सोचा कि ईश्वर की शरण में जाने के लिए अब देर न करनी चाहिए, प्रातः काल प्रद्युम्न सिंह ने सोचा कि प्रद्युम्न को अब कर्म--फल भोगना ही होगा, ईश्वर दयालु और समर्थ हैं। प्रद्युम्न के मन में अब ईश्वर के प्रति श्रद्धा जागने लगी। वह उठकर बैठ गया और भगवान के चरणों में ध्यान लगाने लगा। इस प्रकार वह ईश्वर के नाम का जप करते हुए, प्रद्युम्न सिंह ने निश्चय किया कि अब सब कुछ ईश्वर के ऊपर छोड़ देना चाहिए; ईश्वर बड़ा दयालु, कृपालु और सर्वव्यापी है। प्रद्युम्न ने अपने मन को ईश्वर के प्रति एकाग्र किया। 45

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होगा? सुनो, इस आत्मकथा लेखक लोग का इतिहास भी तो समझो। कभी-कभी तो

होगा? सुनो, इस आत्मकथा लेखक लोग का इतिहास भी तो समझो। कभी-कभी तो ऐसा स्वर सुनाई पड़ेगा जिसके हर एक शब्द को सुन कर पाठक भय विह्वल हो उठेगा या ऐसा स्वर सुनाई पड़ेगा कि वह, रोने लग जाय। सहानुभूति का भाव तो जागना ही चाहिये हृदय से। सुनो देखो, प्रत्येक आत्मकथा लेखक अपने सुख का वर्णन जितनी प्रसन्नता पूर्वक करता है सम्भवतः दुःख का उल्लेख वह उतनी प्रसन्नता से न कर सके। यदि दुःख का उल्लेख वह कर भी देवे, उस अवस्था को वह दुःख न समझेगा या समझेगा भी! तात्पर्य यह प्रत्येक आत्मकथा में? लेखक ने तो अपने सुख को सब सुखों से बढ़कर माना ही, दुःख को, प्रत्येक दुःख को एक प्रकार का सुख ही मान कर चला, लेखक तो यह सदैव चाहेगा प्रत्येक दशा में कि वह, चाहे या न चाहे लोग उसकी प्रशंसा ही करें और उसका रोब मान कर चलें सब लोग अथवा संसार; लेखक तो यह कभी चाहेगा ही न कि कोई उसकी पोल खोले या कोई उसके छिद्रों की खोज करता फिरे या कोई उस पर छींटा कसे; वह सब से तो यही चाहेगा! पाठकगण, आत्मकथा तो हर कोई लिख लेता होगा पर सच तो यह लिखना प्रत्येक जन के वश की बात नहीं हो सकती। सच और झूठ, इन दोनों पक्षों को, चाहे वह जन कितना बड़ा क्यों न हो लेखक, यह लिखना आत्मकथा के हर लेखक प्रत्येक आत्मकथा रूपी ग्रन्थ में कभी नहीं सम्भव कर सकेगा आत्मकथा क्या सचमुच लिखा गया! क्या आत्मविश्वास प्रत्येक जन लिख सका है या सच मान कर अपने को त्याग कर सकेगा या त्याग सकेगा भी तो वह जन जो सब कुछ त्याग चुका अथवा जिसने अ--कथ्य व्यथा को जन--जन-तक भेजा हो, जिसने अपना सब कुछ दे कर सोचा भी कुछ हो, तो पाठक गण! आत्मकथा लिखना हर जन का काम अथवा विचार वश का काम नहीं हो सकता और सम्भव भी नहीं, सुनो, सुनो, कभी--तो हर एक जन आत्मकथा को, स्वयं आत्मकथा मान प्रत्येक प्रत्येक जन के भावों को तो क्या हर जन प्रत्येक सम्भावना के आधार पर भी नहीं लिख पा रहा होगा या तो केवल उस बात जिसके आधार पर, वह स्वयं चलता ही अथवा उसने सब पर उस बात अथवा उस भाव को लादना चाहा होगा। और यह भी तो सच, कि जब--तो जन आत्मकथा के नाम पर भी अपने आप को नहीं समझ पाता होगा, वह तो स्वयं एक जन के आगे आत्म--कथा कहने का भी साहस नहीं कर पाता होगा या समझा सकेगा! इस का भी रहस्य छिपा रहा न हो। जब भी जन अपने को आदरणीय समझ बैठा अथवा किसी को बना बैठा हो तो समझ लीजिये सब, प्रत्येक बात सत्य मान कर चला जा रहा होगा न? आत्मकथा पढ़ना सहज जन सम्भव पर उस जन द्वारा लिखा हुआ प्रत्येक जन के लिये आदरणीय होना कठिन जान पड़ा प्रत्येक जन अपने रूप आकार को समझ कर प्रत्येक ही जन से आदरणीय हो अथवा ऐसा भाव प्रत्येक जन के मन उपजा करे या ऐसा समझ प्रत्येक ही जन करे। प्रत्येक ही समय सब अपने सुख साधन रूप में देखना चाहे आत्मकथा को तो आत्मकथा न कह कर जन को आत्मकहानी कहना उचित होगा। स्वयं का आत्मकथा या प्रत्येक का जन कहा जा सकता है। आत्मकथा का रूप तो सुनो, इस आत्मकथा को भी समझ कर ही प्रत्येक को समझना चाहिये कि यह रूप ऐसा सब विचार प्रत्येक आधार को ले कर बन सका हो अथवा न बन सका पाठक समझता समझे चाहे जन उस बात को समझे आत्मकथा-सम्बन्धी रूपान्तर हो तो सब जन न केवल--तो आत्मकथा रूप को समझेगा ही, पर आत्मकथा ग्रन्थ को भी जन समझेगा; आत्मकथा प्रत्येक जन समझे न समझे; प्रत्येक आत्मकथा ग्रन्थ एक कथा--कहानी न हो सकेगा" "कथा-कथन के नाम जन-जन के मन का भ्रम दूर करना प्रथम तो प्रत्येक ग्रन्थ लेखक का कर्तव्य या आधार होना चाहिये ग्रन्थ द्वारा" "प्रत्येक, हर दशा में इस रहस्य जन को; हर प्रत्येक बात को समझ ले, ऐसा सोचे" यह सोच कर कह कर जन रूप का मन सब प्रकार शांत समझ कर बोला पाठक। जन बोला सुनो, जो बात कहना है, आत्मकथा रूप सुनो; प्रत्येक को सुख तो मिल ही रहा सब कुछ पढ़ने पर क्या केवल सच ही जान, प्रत्येक को तो केवल असत्य ही मिलेगा 48