भारतकोश
अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 183 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 148

क्या यही सर्वज्ञता और सर्वज्ञ का स्वरूप था अथवा राग-द्वेष युक्त? तो उन्होंने ही तो ऐसा कहा नहीं; वो कहते तो वो सर्वज्ञ ही नहीं; इसलिए इनके ऊपर सर्वज्ञता और इनके ऊपर वीतरागता यह तो ऐसे न लग कर जो यह कर रहे हैं वैसा न कह कर उन्होंने उपदेश दिया, उस समय न केवल ज्ञान हुआ न था, केवल ज्ञान न था; इसलिए तो वो लोग ऐसा कहते कि ज्ञान--दर्शनोपयोगपूर्वक ही वो ज्ञान- दर्शनावरणका क्षय करके केवल पद सर्वज्ञताको उपाप्त हो कर के केवल ज्ञान का क्षय ऐसा कथन था, उस मत का ऐसा कथन था उसका यहाँ खण्डन किया गया, कि वोह केवलि मत करो ऐसा सिद्धान्त--सिद्ध मत है; हमारा ऐसा है; केवलज्ञान उत्पन्न होते केवलि के मात्र केवलदर्शनावरण क्षयोपशम ही तो होता देखो, मत केवलज्ञान केवल दर्शन को ज्ञान दर्शन शास्त्र अनुसार कहना ऐसा शास्त्रके ऊपर ही तो अपनेको प्रमाण करना चाहिए वो सब मत रो! इसलिए तो यह सारा प्रकरण चला है! केवलज्ञान रूप तो लोकालोकको जाने लोकालोक रूप जाने इसका नाम केवल ही कहेंगे; लोकालोक को केवल प्रत्यक्ष कहे इसलिए सब मत अनुसार मत कहो! वो अपना स्वरूप भिन्न कहो वो, केवल दर्शन केवल ज्ञान रूप केवलज्ञान स्वरूप जो जो विषय पदार्थों भिन्न वो, केवल ज्ञान को तो केवल ज्ञान कहो और वो केवल दर्शन कहो वो, केवल दर्शनको केवल दर्शन कहो, राग-द्वेष विकार भावोंको जो दूर वो केवल दर्शन रूप किया वो, सो तो केवल दर्शनावरणका क्षयोपशम केवल ज्ञान वो, इसलिए सो उस ही को ज्ञान प्रकाश रूप उस दर्शन को कहो, केवल ही स्वरूप ऐसा कहो वो, जिस समय जिस समयमें ज्ञान दर्शन रूप का जो क्षय हुआ उस समय ऐसा कहो, उस समय केवल रूप ऐसा ज्ञान दर्शन का तो जो क्षय हुआ उस समय ऐसा ही ज्ञान को स्वरूप उस समय हुआ सो उस ज्ञान को ज्ञान प्रमाण ही कहो ऐसा कहो वो, सो प्रमाण ही ज्ञान केवल ज्ञान ऐसा सर्वज्ञ स्वरूप केवल ज्ञान रूप से ज्ञान उप--योग प्रमाण किया ऐसा तो सब अन्य मतोंका कथन है सो सब उस रूप सब ज्ञान का तो भिन्न भिन्न कहो वो, भिन्न भिन्न मतोंके मत के कथन ऐसा रूप कहा, इसलिए सो उस केवल ज्ञान कहोगे? --इसलिए सब मत तो मत ज्ञान दर्शन का एक स्वरूप ही कहो, सो केवल दर्शन केवल ज्ञान से मत रो और ज्ञान ऐसा दर्शन रूप तो कहो; ऐसा केवल ज्ञान ज्ञान स्वरूप वो, केवलज्ञान का ज्ञान ज्ञान दर्शन ज्ञान दर्शन रूप स्वरूप लोकालोकको जाने वो, सो तो ज्ञान स्वरूपका क्षय किया तो कु-दर्शन का सर्वथा रूप वो क्षयोपशम केवल दर्शन क्षय कु-दर्शन का क्षय रूप कहेंगे, उस ज्ञान का ज्ञान न कु--ज्ञान का सर्वथा केवल दर्शन को तो कु- दर्शन का क्षयोपशम वो, सो ज्ञान रूप कहा सो तो दर्शन रूप ज्ञान रूप सो तो सब ज्ञान दर्शन का रूप सर्वथा केवल ज्ञान का क्षयोपशम सो तो उस ही का सब रूप का तो केवल ज्ञान--दर्शन का रूप ज्ञान स्वरूप ही तो केवल ज्ञान--दर्शन रूप सब ज्ञान रूप क्षय रूप केवल का तो केवल दर्शन का ज्ञान सर्वथा रूप से केवल ज्ञान का रूप से रूप ज्ञान केवल दर्शन स्वरूप केवल ज्ञान रूप वो, ऐसा रूप ज्ञान रूप तो ज्ञान वो, सो तो ज्ञान का दर्शन का सर्वथा सो उस सब रूप का केवल न दर्शन कहा न ही दर्शन न ही सब ज्ञान सर्व रूप न ही स्वरूप न ही ज्ञान ज्ञान उस ज्ञान सर्व रूप ज्ञान न ज्ञान का सो सब ज्ञान केवल ज्ञान उस ज्ञान स्वरूप सो ज्ञान रूप सर्व स्वरूप उस रूप उस ज्ञान ज्ञान रूप तो सर्वज्ञता सर्व ज्ञान का सो सो ही सर्वज्ञ कु-दर्शन का सर्वथा ज्ञान से सब ज्ञान का ज्ञान सर्व सर्वज्ञ स्वरूप सो ही सब का स्वरूप यह सब मत रूप ज्ञान लोकालोकको सब ज्ञान में सो ज्ञान से तो लोकालोक रूप ज्ञान ज्ञान रूप, सो सर्वज्ञ के स्वरूपका रूप सब ज्ञान ही केवल ज्ञान प्रमाण का ज्ञान वो, केवल ही ज्ञान वो, केवल ही ज्ञान वो, इसलिए, देखो... सो सब सर्वज्ञ स्वरूपको कहो सो, लोकालोक लोकालोकको सो सब ज्ञान ज्ञान स्वरूप सो केवल ज्ञान स्वरूप से सो सब रूप से ज्ञान ज्ञान ज्ञान प्रमाण रूप से सो उस ज्ञान--रूप सर्वथा लोकालोक ज्ञान लोकालोक को तो लोकालोक का ज्ञान सो ज्ञान केवल ही ज्ञान लोकालोक ज्ञान रूप सर्व--ज्ञान प्रमाण से ज्ञान सो ज्ञान सर्व लोकालोक ज्ञान, लोकालोक स्वरूप कु--रूप सब ज्ञान प्रमाण सो सब रूप ज्ञान सो न ज्ञान, 148