अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
क्या यही सर्वज्ञता और सर्वज्ञ का स्वरूप था अथवा राग-द्वेष युक्त? तो उन्होंने ही तो ऐसा कहा नहीं; वो कहते तो वो सर्वज्ञ ही नहीं; इसलिए इनके ऊपर सर्वज्ञता और इनके ऊपर वीतरागता यह तो ऐसे न लग कर जो यह कर रहे हैं वैसा न कह कर उन्होंने उपदेश दिया, उस समय न केवल ज्ञान हुआ न था, केवल ज्ञान न था; इसलिए तो वो लोग ऐसा कहते कि ज्ञान--दर्शनोपयोगपूर्वक ही वो ज्ञान- दर्शनावरणका क्षय करके केवल पद सर्वज्ञताको उपाप्त हो कर के केवल ज्ञान का क्षय ऐसा कथन था, उस मत का ऐसा कथन था उसका यहाँ खण्डन किया गया, कि वोह केवलि मत करो ऐसा सिद्धान्त--सिद्ध मत है; हमारा ऐसा है; केवलज्ञान उत्पन्न होते केवलि के मात्र केवलदर्शनावरण क्षयोपशम ही तो होता देखो, मत केवलज्ञान केवल दर्शन को ज्ञान दर्शन शास्त्र अनुसार कहना ऐसा शास्त्रके ऊपर ही तो अपनेको प्रमाण करना चाहिए वो सब मत रो! इसलिए तो यह सारा प्रकरण चला है! केवलज्ञान रूप तो लोकालोकको जाने लोकालोक रूप जाने इसका नाम केवल ही कहेंगे; लोकालोक को केवल प्रत्यक्ष कहे इसलिए सब मत अनुसार मत कहो! वो अपना स्वरूप भिन्न कहो वो, केवल दर्शन केवल ज्ञान रूप केवलज्ञान स्वरूप जो जो विषय पदार्थों भिन्न वो, केवल ज्ञान को तो केवल ज्ञान कहो और वो केवल दर्शन कहो वो, केवल दर्शनको केवल दर्शन कहो, राग-द्वेष विकार भावोंको जो दूर वो केवल दर्शन रूप किया वो, सो तो केवल दर्शनावरणका क्षयोपशम केवल ज्ञान वो, इसलिए सो उस ही को ज्ञान प्रकाश रूप उस दर्शन को कहो, केवल ही स्वरूप ऐसा कहो वो, जिस समय जिस समयमें ज्ञान दर्शन रूप का जो क्षय हुआ उस समय ऐसा कहो, उस समय केवल रूप ऐसा ज्ञान दर्शन का तो जो क्षय हुआ उस समय ऐसा ही ज्ञान को स्वरूप उस समय हुआ सो उस ज्ञान को ज्ञान प्रमाण ही कहो ऐसा कहो वो, सो प्रमाण ही ज्ञान केवल ज्ञान ऐसा सर्वज्ञ स्वरूप केवल ज्ञान रूप से ज्ञान उप--योग प्रमाण किया ऐसा तो सब अन्य मतोंका कथन है सो सब उस रूप सब ज्ञान का तो भिन्न भिन्न कहो वो, भिन्न भिन्न मतोंके मत के कथन ऐसा रूप कहा, इसलिए सो उस केवल ज्ञान कहोगे? --इसलिए सब मत तो मत ज्ञान दर्शन का एक स्वरूप ही कहो, सो केवल दर्शन केवल ज्ञान से मत रो और ज्ञान ऐसा दर्शन रूप तो कहो; ऐसा केवल ज्ञान ज्ञान स्वरूप वो, केवलज्ञान का ज्ञान ज्ञान दर्शन ज्ञान दर्शन रूप स्वरूप लोकालोकको जाने वो, सो तो ज्ञान स्वरूपका क्षय किया तो कु-दर्शन का सर्वथा रूप वो क्षयोपशम केवल दर्शन क्षय कु-दर्शन का क्षय रूप कहेंगे, उस ज्ञान का ज्ञान न कु--ज्ञान का सर्वथा केवल दर्शन को तो कु- दर्शन का क्षयोपशम वो, सो ज्ञान रूप कहा सो तो दर्शन रूप ज्ञान रूप सो तो सब ज्ञान दर्शन का रूप सर्वथा केवल ज्ञान का क्षयोपशम सो तो उस ही का सब रूप का तो केवल ज्ञान--दर्शन का रूप ज्ञान स्वरूप ही तो केवल ज्ञान--दर्शन रूप सब ज्ञान रूप क्षय रूप केवल का तो केवल दर्शन का ज्ञान सर्वथा रूप से केवल ज्ञान का रूप से रूप ज्ञान केवल दर्शन स्वरूप केवल ज्ञान रूप वो, ऐसा रूप ज्ञान रूप तो ज्ञान वो, सो तो ज्ञान का दर्शन का सर्वथा सो उस सब रूप का केवल न दर्शन कहा न ही दर्शन न ही सब ज्ञान सर्व रूप न ही स्वरूप न ही ज्ञान ज्ञान उस ज्ञान सर्व रूप ज्ञान न ज्ञान का सो सब ज्ञान केवल ज्ञान उस ज्ञान स्वरूप सो ज्ञान रूप सर्व स्वरूप उस रूप उस ज्ञान ज्ञान रूप तो सर्वज्ञता सर्व ज्ञान का सो सो ही सर्वज्ञ कु-दर्शन का सर्वथा ज्ञान से सब ज्ञान का ज्ञान सर्व सर्वज्ञ स्वरूप सो ही सब का स्वरूप यह सब मत रूप ज्ञान लोकालोकको सब ज्ञान में सो ज्ञान से तो लोकालोक रूप ज्ञान ज्ञान रूप, सो सर्वज्ञ के स्वरूपका रूप सब ज्ञान ही केवल ज्ञान प्रमाण का ज्ञान वो, केवल ही ज्ञान वो, केवल ही ज्ञान वो, इसलिए, देखो... सो सब सर्वज्ञ स्वरूपको कहो सो, लोकालोक लोकालोकको सो सब ज्ञान ज्ञान स्वरूप सो केवल ज्ञान स्वरूप से सो सब रूप से ज्ञान ज्ञान ज्ञान प्रमाण रूप से सो उस ज्ञान--रूप सर्वथा लोकालोक ज्ञान लोकालोक को तो लोकालोक का ज्ञान सो ज्ञान केवल ही ज्ञान लोकालोक ज्ञान रूप सर्व--ज्ञान प्रमाण से ज्ञान सो ज्ञान सर्व लोकालोक ज्ञान, लोकालोक स्वरूप कु--रूप सब ज्ञान प्रमाण सो सब रूप ज्ञान सो न ज्ञान, 148
प्रभाव को जान, मन को वशमे कर संसारके प्रपंचजालको दूर कर आनन्द रूप परमात्माके ध्यान द्वारा आत्मा स्वरूपका ज्ञान प्राप्त, कर हर क्षण अपने मन बुद्धि चित्तको एकाग्र-चित्त कर संसार रूपी माया जाल को नष्ट विनिष्टीकरण सदा ही राम नाम का भजन कर उद्धार। यह कामदेव-राक्षस सदा सर्व समय व्याध, भय रूप बाण चलाकरके, अन्तःकरण विदीर्ण करता है, जो स्वयं सदा ही अज्ञानता रूपी जालमे पड़ा हुआ है। जो माया का दास बन संसार रूपी सागर रूपी अगाध नदमे मग्न या विलीन होकर पडे हैं। सो मानव अपने मन को इन्द्रियजीतकरके ही, पर परमात्माका ध्यान प्राप्त कर मोक्ष पायेगा, कामदेवकी इस पीडासे विमुक्त होकर सदा परमात्माके इस भजन या निष्काम भावभक्ति का आधार या अवलम्ब ही कामदेवके दुष्प्रभावसे छुडानेमे सदा समय समर्थवान तथा दृढ ही रहता तथा राम नाम उच्चारण मात्र से कामदेव को भस्मकर सदा आत्म साक्षात्कार को प्राप्त करा देता है॥२॥ ॐ तत्सत् हरि
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अहो, जगन्नाथ कवि को यह पद भी मिला-- विद्या वैभव विकल, जगन्नाथ सुकवि मन मों कल्प नहीं होत, कहै कवि कोविद विद्या सो विसा कौन्ह रूपस, विद्या सो रूपस विकस विद्या सो विकस सो मन, विद्या सौ मन सिलाह विद्या सो सिलाह भइनी सुखद, विद्या सौ सुखद सुकवि सुकवि भइनी सुख रूप, सो मुख सुख सिरीस मुख सिरीस भइनी सुकवि, सो सुकवि सुख जगन्नाथ जगन्नाथ सुख सिलाह, कहै कवि कोविद सिरदार सो सिरदार सो सिलाह, विद्या भइ सुख जगन्नाथ विद्या तै सिलाह भइनी, जगन्नाथ तै जगन्नाथ विद्या तै सिलाह, भइनी जगन्नाथ तै जगन्नाथ सो सो विद्या सिलाह, विद्या तै जगन्नाथ जगन्नाथ अहो, जगन्नाथराय कवि कौन कौन भाषा जानते थे। संस्कृत भाषा, व्याकरण पर तो उनका पूरा अधिकार था अवश्यम्, किन्तु यह तो सब ही कवि कह गये यथा 'भाखा बहता नीर' वा वे पाषाण कवि पाठक कभी नहीं पढ़ते क्या वेद--उप वेद-वेदांग को छोड़ कर केवल संस्कृत मात्र से इनका काम चला ही सकता था। यदि ऐसा न होता, कभी क्या वे उस समय फारसी का अभ्यास न करते क्या? वेदों शास्त्रो आदि अनेक प्रकार विद्या का उस समय भी जो प्रचार था क्या ऐसा संस्कृत मात्र पड़े पंडित को उससमय की राज्य भाषा, क्या ऐसा क्या फारसी शिक्षित किसी मुसलमान कवि का पद मिल सकता था। क्या वे कवि न थे? वे महा महाकवि; जगन्नाथ का भाव, जब लवंग-लतिका की उपमा दी जाती है तब कहा जाता कि जब वे न रहे तो वे मुसलमान कवि के पास गये थे। जगन्नाथ को फारसी का कुछ अभ्यास अवश्य था। फारसी राज्य में तो क्या; केवल दो अक्षरों की योग्यता से ही कवि पंडित कहा जाता? उनका विषय कैसा रहा होगा क्या कोई जाने? कहा ही जाता पंडित कवि जी। जगन्नाथ की कविता पढ़ी जाती तो यह स्पष्टतया देखा जाता किविद्याभ्यास से ही तो सब कुछ हो रहा संस्कृत का कुछ तो प्रभाव था संस्कृत प्रभाव कम न था।फारसी यद्यपि वे फारसी कवि नहीं हुए तथापि न फारसी का काम पड़ा था।इस बात का न किसी को भी पता लगा होगा कि वे भी समय के साथ साथ भाषा के कवि भी थे।फारसी प्रभाव? कैसा प्रभाव था? या समय की भाषा का उस काल की भाषा का क्या प्रभाव था तथा वे कवि केवल कवि ही कहलाते थे, यह तो कहा; सब ही कवियों द्वारा ही क्यों सब कुछ देखा जा सकता कवि कहा जाता? न रूप था, न रूप भाषा, न रूप जगन्नाथ केवल कवित्व-भाव ही न था सब रूप था वे केवल एक कवि मात्र ही नहीं थे फारसी पढ़ फारसी न की, उस समय सब प्रकार विद्या का अभ्यास करके कवि कहलाये? पंडित जी कवि मात्र ही नहीं थे। पंडित जगन्नाथ जी। पंडित जी को कवि जगन्नाथ कह कर ही कोई पुकार ले सकता था। क्या हो--सकता? कवि तो पंडित जी कहलाते ही आये थे, पंडित तो जगन्नाथ कवि हो--सकते? कवि जगन्नाथ को जगन्नाथ न कहा जाता तो पंडित कवि कहा जा सकता, सो जगन्नाथराय कवि थे; कवि और पंडित सब कुछ थे, सो सब कुछ कहा गया फारसी पढ़ी उस समय तक, जब जहां विद्या पढ़ी उस समय फारसी पढ़ी, जब जहां विद्या पढ़ी सब संस्कृत अभ्यास किया गया, जहां उपाध्याय 150
सम्यग्दर्शन पहला और सम्यग्ज्ञान दूसरा मोक्ष मार्ग का उपाय या कारण या पग कहा जा सके, लेकिन ऐसा नियम नहीं। पहला सम्यग्दर्शन ही स्वीकारना यह, केवल दो पैरों के बल चलने के समान स्वरूप का एक एकांगी विकल्प हो तो होवे पर दोनों पगों, पैर जोड़ों से? सो वह दो पैरों वाला ही स्वीकार्य होगा, कभी नहीं, दो पग वाला व्यक्ति, विकलांग स्वरूप समझा जावेगा तो यह भी, विवेक रूप पैर बिना मात्र श्रद्धान पंगु है, केवल एक ज्ञान बिना भी। दोनों का सम्मिलित प्रभाव मात्र निश्चय मोक्ष मार्ग, केवल या सम्यग्दर्शन मोक्ष उपाय या मोक्ष का पग ही हो सो बात नहीं कही जा सकती या पग, केवल सम्यग्दर्शन को ही कहा गया या सम्यग्ज्ञान मात्र को ही मोक्ष मार्ग या पग कहा गया हो, केवल एक पैर वाले को कौन सम दृष्टि कहेगा सो उस सम्यग् ज्ञान को भी, केवल एक पग या-कारण ही कहा जाना सो भी उस को सम्यग् ज्ञान स्वरूप के केवल या एक-एक स्वरूप मात्र ही कहा सो, यह बात उचित ढंग से न हो! सो दो पग रूप दोनों इस मार्ग कहे, या दो पग दोनों कहे सो सम्यक्त्व के पग, जो कहे जा चुके सोय इस प्रकार ही, दो पगों रूप या दोनों के एक-एक स्वरूप स्वीकार कर दोनों पगों का ज्ञान रूप दो पग कहा गया, ऐसा भी पग या दो सम्यक्त्व स्वरूप? सो स्वरूप या रूप यह पग या सम्यग्-ज्ञान स्वरूप कहे, क्या ऐसा कहा गया सो ठीक? जहां दो पग कहे? ऐसा भी कहा, उस सम्यग्ज्ञान के लिए! सो यह सम्यग्ज्ञान मात्र केवल ज्ञान स्वरूप मात्र ही कहा गया उस का भला बिना पग के सम्यग्ज्ञान तो इस पग रूप तो पग ही कहा, सो दो सम्यक्त्व स्वरूप कहा सो वह पग मात्र कहा सो ऐसा स्वरूप तो पग का पग कहा गया सो-इस सम्यग्ज्ञान को ज्ञान-स्वरूप कहा सो उचित रहा सो दो सम्यक्त्व इस स्वरूप के कारण रूप तो दो सम्यक्त्व हो, सदा दोनों का पग ही कहा सो दो पग, दो सम्यक् या पग? ज्ञान पग का ज्ञान मात्र सो इस पग के कारण केवल ज्ञान रूप का ज्ञान मात्र ही ज्ञान रहा सो दो सम्यक् रूप कहा सो; दो पग या सम्यग्-दर्शन रूप सम्यक् रूप एक पग रहा, केवल एक ज्ञान स्वरूप सम्यग्ज्ञान ही रहा सो? सम्यग्ज्ञान पग तो दो पग का ही सम्यक्त्व रूप सो दो पग रूप यह पग कहा सो, इस प्रकार ज्ञान ही, रूप ज्ञान स्वरूप कहा गया? जहां सदा, पग तो स्वरूप ही कहा गया केवल सम्यग्ज्ञान का स्वरूप सो, ज्ञान-स्वरूप! तो दो पग? ज्ञान-पग तो दो पग कहा, ज्ञान स्वरूप, ज्ञान के पग स्वरूप केवल सो सम्यग्ज्ञान मात्र केवल सम्यग्ज्ञान स्वरूप का पग हो, केवल दो पग एक-एक पग मात्र स्वरूप सम्यग् दर्शन सम्यग् ज्ञान कहा गया? ऐसा स्वरूप कहा गया सदा स्वरूप पग, न दो पग या स्वरूप स्वरूप, सम्यक्त्व, ज्ञान रूप ही सदा स्वरूप सो इस पग या सम्यग् दो पग, सम्यक् रूप स्वरूप, सदा सम्यग्ज्ञान के पग इस प्रकार ही दो स्वरूप कहे सो सम्यग्दर्शन हो, उस ज्ञान स्वरूप ज्ञान सो पग ही; केवल ही दो पग-- ज्ञान इस पग स्वरूप केवल पग ही पग को, केवल स्वरूप इस पग ही दो--पग रूप सदा न हो स्वरूप सम्यक्त्व कहा गया सो ज्ञान स्वरूप इस पग कहा गया स्वरूप सो? इस प्रकार सम्यग्दर्शन रूप सम्यक्, रूप सो पग... । सो सम्यक्त्व रूप रहा, सो सम्यग्दर्शन मात्र सो सम्यक्त्व के दो पग का इस स्वरूप सदा मात्र ऐसा रूप सो दो पग रूप ज्ञान स्वरूप या सम्यग्ज्ञान ज्ञान सो, केवल स्वरूप न कहा सो, न केवल सम्यक्त्व रूप केवल ज्ञान सो, न पग रूप ही कहा सो पग सो इस प्रकार कहा सो इस पग मात्र केवल रूप सो स्वरूप सो, सो मात्र सो पग स्वरूप या सम्यक् ज्ञान सो केवल पग, सदा सो सदा सो स्वरूप इस ज्ञान-पग सो स्वरूप रूप पग न केवल दो पग स्वरूप मात्र ही कहा सो केवल सम्यक्त्व ही पग सो, सदा सम्यग् दर्शन स्वरूप सो पग पग पग सदा ही पग स्वरूप सदा पग-पग पग सो इस प्रकार सदा ऐसा पग रूप सो, सो ज्ञान सो, सदा दो पग ही पग ज्ञान सदा इस प्रकार पग या पग मात्र सदा पग सदा सो पग स्वरूप पग सम्यक् ज्ञान सो पग सो? 151
ब्राह्मण को मारो, मत छोड़ो यह दुष्ट ही सब पाप और क्लेश का कारण, यह मरेगा तो सब विवादों का अन्त होगा, ब्राह्मण को मार डालो, इसको तो सब रोम--रोमसे ही मार डालना है! कोई तलवार खींचे, कोई लाठी लिये दौड़ै, कोई पत्थर फेंके, धक्के-मुक्कों की तो गिनती कैसी? दो ही तीन क्षणोंमें दुर्जन सिंहको जमीनपर गिराकर, उनके केशकलाप- लखोटकर, ऊपर चढ़कर-बैठकर बेतरहसे हाथ और लातों से मुक्कों से और जो कुछ भी पास था उस से मारने लगे वो तब तक, जब तक वे बेहोश न होकर एक दमसे पत्थर जैसे निश्चेष्ट न हो गये। इसके आगे फिर महाशय जी हाथ जोड़ कर कहने लगे और कहने लगेकि महाशय जी ईश्वर आपका ही रूप ही होगा; सो उन्होंने भी प्रार्थना की और कहा कि स्वामी जी--सर्वथा मत डरो जी; ऐसा कहकर वो वहां-चले गये। इसके पर इस बात सम्बन्धी उपदेश यह मिलता है कि संसार कैसा भी उपद्रव या क्लेश करै उसपर भी सन्तजन, जो ईश्वर के विश्वासी रहकर अपने आत्माके स्वरूप विचार में मग्न रहते हैं, उनके चित्तको किसीके भी द्वेषभाव का, ज़रा भी असर नहीं होता ईश्वर पर विश्वास का होना ही ऐसा फल या फल का न होना एक जैसा जानकर ईश्वर का स्वरूप ही ऐसा विचार कर रहना ही चाहिये? कदाचित् दो दिन भी सो नहीं सके सो ठीक; कदाचित् उपद्रवी लोग सदा ही ऐसा ही करते रहें तो भी क्या, इन सब अवस्थाओं सदा एकरस रहना ईश्वर पर ही ध्यान चाहिये? उपद्रव करने का जो भी फल मिले सुख मिले वा न, इस उपद्रवरूपी विचार का फल मन--को तो दुःखी करेगा सही, इससे अपने चित्तको ईश्वर के रूप और उसके नाम जप और ध्यानमें मग्न रखने वाले इस सब दशा व उपाधि का, ज़रा भी क्लेश नहीं होता ऐसा सिद्ध हुआ कि इस बातको याद करके सब को ऐसा उद्योग करना चाहिये कि किसी का, कभी किसी का ऐसा काम सदा ईश्वर आराधना ही करना योग्य, कोई किसीका भी उपद्रव कैसे भी आवे उपद्रव को ऐसा सदा जानना चाहिये कि कोई इस शरीर का कुछ भी बिगाड़ करने का सामर्थ्य रख हीवेगा तो इससे आत्मा कभी भी इस उपद्रवरूपी क्लेश करने वाले का विशेष होगा? ऐसा तो उपद्रव किसी-२ को अधिक हुआ और ऐसा उपद्रव अथवा क्लेश है? जो जो ऊपर कहा, इससे अधिक तो ना सो सब बातों के ध्यान से ऐसा कह सकते और कहैं इससे अधिक, उस समय सबको ऐसा मन में लाना योग्य नहीं, इससे आगे या तो न कोई उपद्रवरूप क्लेश हुआ और ना ही कोई उपद्रव न बन पड़ा साधारण न बन सकता ऐसा स्मरणपूर्वक रखने से सिद्ध हुआ इससे यह भी सिद्ध हुआ कि इस सब प्रकार के फल का ध्यान सब सामान्य समझ लिया सब क्लेश और ऐसे क्लेशों का भी विनाश हो जाना चाहिये या फिर, क्लेश क्लेश दशा--युक्त होकर विचारने से कभी भी क्लेश--युक्त नहीं! इससे ही सत्य को जान कर सत्य विचार--युक्त ही सब को सदा सिद्ध होना चाहिये उपद्रव का नाश हो, ऐसा फल जानना; उपद्रव करने वाले का क्लेश हो, जिससे कि ऐसा भी सब रूप जो दुःख व क्लेश उपद्रव से होता सो सब ऐसे ही सिद्ध हो जाता कि जैसे सब क्लेश ईश्वरके ध्यानसे ही सब सिद्ध होकर सब क्लेशोंका ही विनाश हो कर सब का कार्य सिद्ध हो सकता उपद्रवरूपी क्लेश सदा ऐसे नाश को प्राप्त हुआ ऐसा भी जानना कि उपद्रव सदा क्लेश और उपद्रव का विचार ही ऐसा सब विशेष कर किया गया तब सब का नाश होकर उपद्रवरूप क्लेशका नाशही संसार से नाश हुआ सो, सर्वथा-प्रकार से ही जानना हुआ उपद्रव को शांत करने का ही विशेष प्रयत्न करना चाहिये; क्लेशमय काम कभी भी किसीका ना हो; जो क्लेश का भी रूप न हो, ऐसा ही सब ध्यान व काम करना सब तरह श्रेष्ठ ही समझना सब को योग्य, इसलिये, उपद्रवों, क्लेशों--सब क्लेश सब जन उस को नाश करें, सब ही काम मन--के स्वाध्याय सदा ही करने योग्य इस सो बात को भी सदा मन--के ही द्वारा समझना जी, ऐसा ही सब विचार सत्य सिद्ध होता, सत्य क्लेशनाशक रूपी ध्यान सदा सब को होवे, इससे क्लेश का क्लेशनाशक होगा; उपद्रवरूपी क्लेश के निवारण का ऐसा फल उपद्रवरूपी होगा कैसे? सदा उपद्रवरूपका सब नाश हो कर सब रूप सिद्ध होवेगा, क्लेश सब नाश कैसे? सदा क्लेशनाशक सब नाश ही जानकर उपद्रव न रहेगा, सब काम ही 152
□□□□ □□□□□, □□□□ □ □□□□□ □□□□□, □□□ □□□□□; □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□, □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□? □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□, □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□; □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□, □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□, □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□, □□□ □□□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□□--□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□! □□ □□□□□ □□□, □□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □ □□□ □□□ □□ □□, □ □□□ □□□□□ □□ □□, □ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□, □□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□, □□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□, □□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□□, □□, □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□, □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□, □□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□-□□□□□□ □□□ □□□□ □□□, □□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□, □□ □□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□--□□ □□□□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□? --□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□; □ □□□□□□□□ □□□□□, □ □□□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□; □□ □□□□, □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□, □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□, □□ □□□□□□ □□□ □□□□, □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□ □□□ □□, □□□□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□, □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□, □□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□□□ □□□ □□, □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□, □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □ □□□--□□□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□-□□□□ □□ □□ □□--□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□; □□□□ □□□□, □□□□□□□; □□ □□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□; □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□□□□, □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□? □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□, □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□--□□□□□□ □□□, □□□□□□ □□□, □□□□□□ □□□, □□□□□□ □□□□ 153
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तब भगवान् बोले पार्थ, विचार करके सो तो देख कि बाल्यकाल अवस्था सामान्यतः अज्ञान की दशा का समय, सांसारिक व्यवहार ज्ञान का यह कुछ अवसर नहीं किंतु अज्ञान ही का यह काल है, तथापि या बाल्य का समय गया अथवा जा चुका यह स्मरण तो अब भी तुझको है कि अमुक अवस्था का नाम बाल्य, दूसरा सो यह तरुणाई अथवा कि यौवन की यह अवस्था तुझको जो प्राप्त अथवा उत्पन्न हुआ हुआ सो यह तरुणा, अर्थात् इस को तरुणाई कहते वा कहते, सोई यह भी अवस्था गई अथवा बीती, तथापि हे पार्थ! इस गई वा नष्ट भई अवस्था का तुझको ज्ञान अब विद्यमान है कि नहीं कि मेरा तरुणाई का समय जो यह था सो गया वा बीता वा इस से आगे वृद्धावस्था प्राप्त होने वाली है, सो इसी प्रकार देह के बाल्य देहादिक समय के नाश से देही को नाश वा देह नाशवान् वा समय नाशवान् वा देहादिक का नाश हुआ, न कि देही वा नाशवान् हुआ, सो यह देह वा बाल्य नाश हुआ सोई हुआ देहान्तर; कि एक तो बाल्य देह से युवा देहान्तर हुआ प्राप्त अथवा देहान्तर दूसरा हुआ सो यह देह का नाश वा दूसरा अवस्था देहान्तर-प्राप्ति का काल, सो देहान्तर देहान्तर का क्या स्वरूप कह कहा गया? सो देहान्तर स्वरूप देहावस्था देहान्तर--एक देह से अन्य देह, दूसरा बाल्य देह से तरुणाई देहावस्था देहान्तर कहा? वा देहान्तर देहावस्था बाल्य देहान्तर--कि बाल्य देह का नाश तरुणाई देह में देहान्तर वा बाल्य देह का, १ बाल्य वा देह नाश, २ युवा देह; वा सो यह बाल्य देह--युवा देह अवस्था; और वा तरुणाई--वार्धक्य देह देहान्तर का यह रूप कि बाल्य देह नाश हुआ, वार्धक्य देह प्राप्त वा बाल्यकाल अवस्था का नाश हुआ दूसरा तरुण, देहान्तर देहावस्था वार्धक्य वा बाल्य देह का देह नाश हुआ देह बाल्य अथवा तरुणा देह का देह वा तरुण का देहान्तर नाश हुआ अर्थात् देह नाश हुआ वा देहान्तर नाश अथवा देहान्तर सो, बाल्य वा युवा देहान्तर देहादि नाश का नाश क्या? देहान्तर देहादि नाश हुआ अथवा देहान्तर दूसरा जो बाल्य देहान्तर नाश हुआ तिस देहान्तर का! स्वरूप बाल्य देह युवा देह नाश का देहान्तर वा देहावस्था देहान्तर स्वरूप नाश का नाम सो ही, वा देह--युवा देहान्तर देहादि नाश हुआ कह देहावस्था नाश का नाम, वा एक देहान्तर बाल्य नाश देहान्तर कह--रूप वा देह बाल्य देहादि का यह देह स्वरूप देहान्तर का, बाल्य देहान्तर नाश का यह रूप रूप देह का नाश तिस देह नाश का देह नाश स्वरूप देहान्तर नाश, बाल्य देह देहावस्थारूप देहान्तर का यह रूप अथवा नाश देह का देह नाश देहान्तर हुआ, तथापि देहादि का देह देह--नाश हुआ कह वा, देहान्तर नाश--देह देहान्तर नाश वा इस देह देहान्तर देहादि नाश देह नाश का नाम देह नाश देह देहान्तर का नाश? अथवा बाल्य देहान्तर नाश देह का इस नाश देहादि का देहान्तर २ देहान्तर देह स्वरूप देहान्तर नाश? वा देहान्तर देहावस्था देहान्तर देह वा देहान्तर नाश देहान्तर देह का देहान्तर देहादि नाश देह--देह देहान्तर नाश देह? देहावस्था नाश देह का यह देहान्तर देहान्तर देहान्तर नाश देह का २ देहान्तर नाश देहान्तर देहादि नाश देह का स्वरूप देहान्तर देहादि का नाश देहान्तर नाश कह? और इस प्रकार दूसरा स्वरूप कि बाल्य देह अथवा देह का नाश स्वरूप देहान्तर नाश? बाल्य देहान्तर नाश देह देहान्तर नाश देहान्तर कह तथा सो बाल्य देहान्तर--नाश देह? तैसे युवा देहान्तर नाश देह, सो उस देह देहान्तर का सो, सो देह का युवा देहान्तर देह देहान्तर का नाश देह? सो सो यह देह, तथापि सदा देह का देहान्तर देह नाश देहान्तर नाश वा देहान्तर का स्वरूप, बाल्य देहान्तर--नाश का तिस वा देहान्तर--का देहान्तर देहान्तरूप नाश दूसरा देह देहान्तर स्वरूप का, तथा यह देहावस्थावान् का नाश बाल्य नाश तरुण देहान्तर स्वरूप देहान्तर का, तिस देह देहान्तर देहान्तर स्वरूप का नाश बाल्य युवा नाश देह देह स्वरूप देह का देहान्तर स्वरूप देहान्तर नाश स्वरूप देहान्तर नाश देहान्तरूप का नाश बाल्य नाश देह देहादि का देहान्तर स्वरूप देहान्तर देहान्तर का देह--युवा देह नाश देह रूप, देहान्तर वा, तिस देहान्तर का वा बाल्य देहान्तर वा देहान्तर का, सो बाल्य देहान्तर- देहान्तर देहान्तर देहान्तर देहान्तर का नाश देह, बाल्य देहान्तर, देहान्तरूप देहान्तर नाश देह रूप देहान्तर का देहान्तर देहान्तर स्वरूप देह देहान्तर नाश देह देहान्तर नाश, देहान्तर कह सो नाश स्वरूप नाश 155
विचार कर विचार करके पाप फल भोगिये, विचार कर न विचार करके सो दुःख पावत। विचार कर विचार करके पाप फल भोगिये तब पाप कर्म विदारण होय तब नरक निवारण, विचार कर विचार करके अज्ञान मिटावत, विचार कर विचार करके पाप निवृत्तात? विचार का अ-क्षर ही विचार का हो सिधार हुआ संत को जीव तब विचार भयो विचार करके मन का सो हो त्याग भयो न जनम मरन को दुःख भयो पाप, पर सो भयो! सो तो संत मन का त्याग ही भयो सो! पर संत का त्याग जीव का त्याग भया संशय मिटा जो त्याग का संशय भया जो जन त्याग भये पर सो त्याग विना ज्ञान मिटा नहीं ज्ञान के भय विना, तब जन भय भयो भय का नाश भय ही का निवारण भय विना न भय न शरण शरण शरण विचर, विचरन शरण शरण भय सो त्याग के त्याग पर हो सिधार के मन त्याग भया "पर ज्ञान विना मन को भय भय न जनम मरन, ज्ञान सो ही ज्ञान का भय भय" ज्ञान सो भय मिट गया, भय ज्ञान भय भय मिट गया भय का मिटा सो भय सो ज्ञान विना भय को भय भया सो ज्ञान मिटा तो तो ज्ञान का भय भय ज्ञान विना ज्ञान के ज्ञान भय भय भय का भय मिटा भय, ज्ञान विना भय का भय मिटा सो भय भय ऐसा भय तो न हुआ, सो ज्ञान भय भय को? यह भय ज्ञान रूप विचार का भय विना तो तो ज्ञान भय का भय मिटा ज्ञान के ज्ञान भय भय, ज्ञान तो भय भय भय मिटा तो भय भय का, अज्ञान का भय भय भय मिटा विचार का भय भय का, सो भय ज्ञान का मिटा ज्ञान अज्ञान का; विचार विचारादिक का भय मिटा, विचारादिक का भय? सो विचारादिक का भय भय का भय अज्ञान? सो ज्ञान भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय का भय भय भय भय भय भय के अज्ञान के भय भय भय भय विना विचारादिक न हो भया विचार विना विचारादिक भय का भय विचारादिक का भय, सो तो विचारादिक के विचार से ज्ञान भय भय हो विचारादिक विचारादिक भया भय सो भय का भय, ज्ञान के विचार बिना ज्ञान विचारादिक विचारादिक ज्ञान विना ज्ञान अज्ञान हुआ सो भय, विचारादिक का भय भया विना ज्ञान के भय विचारादिक ज्ञान सो भय भय भय भय भय भय भय भय, भय अ-क्षर भय भय का भय भय भय भय भय, भय ज्ञान भय, ज्ञान का भय भय भय भय सो! ज्ञान विचारादिक भया सो, विचारादिक भय विचारादिक भय, ज्ञान विना विचारादिक विचारादिक विचारादिक विचारादिक ज्ञान सो ज्ञान विना भय का भय तो भय ज्ञान विना ज्ञान भय ज्ञान का भय सो न जनम मरन भया, पर भय भय ज्ञान का ज्ञान अज्ञान का भय मिटा, ज्ञान का त्याग विचारादिक का त्याग भय अज्ञान का, विचारादिक का त्याग के विचारादिक ज्ञान भय न हुआ ज्ञान विना सो तो भय मिटा भया विचार का, सो सो, सो सो मन का त्याग सो न जनम मरन, ज्ञान सो सो त्याग का भय भय सो ज्ञान ज्ञान सो सो त्याग का भय भय विना मन का तो विचारादिक विचारादिक का त्याग भय सो त्याग का सो भय का न भय का विचारादिक न सो सो के मन का त्याग सो भय भय न सो सो त्याग विचारादिक विचार-विचार के विचार सो सो न ज्ञान विचार मिटा ज्ञान का, विचारादिक त्याग ज्ञान विचारादिक विचारादिक ज्ञान भय सो त्याग भय विचारादिक ज्ञान भय, ज्ञान सो विचारादिक भय का, त्याग का, त्याग का त्याग का, त्याग के भय ज्ञान का, सो तो भय ज्ञान ज्ञान भय भय विचारादिक सो सो के विचारादिक का ज्ञान सो, सो ज्ञान के ज्ञान को सो ज्ञान भय--न त्याग भया, ज्ञान सो सो त्याग का भय सो! ज्ञान सो सो ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो भय ज्ञान सो सो सो मन ज्ञान ज्ञान, सो सो ज्ञान का सो ज्ञान भया, ज्ञान विना भय ज्ञान ज्ञान ज्ञान ज्ञान का सो सो भय ज्ञान भय ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो भय सो विचार भय ज्ञान ज्ञान सो सो मन का ज्ञान सो ज्ञान भय ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो भय सो ज्ञान भय, ज्ञान ज्ञान सो विचार सो भय सो ज्ञान, विचार ज्ञान भय ज्ञान न ज्ञान भय त्याग भया, ज्ञान भय; ज्ञान के भय ज्ञान 156
यथा काष्ठे मया प्रोक्तं तदग्नि सम्यग् विद्धि विभावसो तथा देवान् विभाव्येषु सम्यग् विद्धि, हे अग्ने ! मया यत् प्रोक्तं, तदग्नि सम्यक् विद्धि विभावसो ॥ विष्णो कर्माणि पश्यतेति मन्त्रे पदे, यतो विष्णोर्यानि कर्माणि वयं सर्वै र्मनुष्यैश्चेति यत्, यतः स च दृष्टवान् यतो द्रष्टापि तस्य सर्वं जगद् वृत्तं स्यात्, यतो हि सर्वं पश्यति, स एवैको जगतां कर्त्ता विद्धीति यत् तस्य सर्वं च पश्यत जनो, यतः स ब्रह्मा स विष्णु रुरुद्र इति यस्मात् सर्वस्य कर्त्ता स एवैको ब्रह्म; यस्माद् वा एतानि भूतानि जाय न्ते यत एतानि जातानि जीवन्ति, यस्मिन् लयमेष्यन्ति इति सा श्रुतिः सा ततो यद्, यस्माद् वा इदं सर्वं जगद् जातं यस्मिन् लीयते स्वेच्छा, तस्मै न नमः, ॐ वा नमः॥ हे महा बुद्धे ! यतो जगत् सर्वं तन्मयं; यतः परमेश्वरो वा जगत् सर्वं जगद् व्याप्य विद्यते सो हि सर्व जगद् व्याप्य च स्थितो विद्वांसो यत् जानन्ति, तत्र किञ्चित् न पृथग् जग, पृथगपि न पृथग् जगद् इत्यर्थे विद्वांसो यत् सर्वं हि सर्वं जगद्, यतो हि सर्वस्मिन् सर्वस्य लयः, यत्र जगद् स्थितं तद् ब्रह्मा एव; यस्माद् वा एतानि भूतानि वै जायन्ते यस्माज् जातानि जीवन्ति यस्मिन् लयमेष्यन्ति, यस्माद् वा एतानि जगन्ति सर्वाणि जाय, न्तेति सा श्रुतिः प्रोक्ता, सा यतो न जगदग्नि विद्वांसो पश्यति विद्वांसो यत् स परमात्मा सर्वं च जगद् इत्यपि सर्वैर्विद्भिर् विज्ञातव्यं, यस्माद् यद् सर्वमिदं न पृथग् जगद् इति न हि पृथग् जगद् भवति यद् ब्रह्म सत्यं जगन् मिथ्ये त्ये तद् वेदान्तानां मते यत् सर्वस्मिन् सर्वं यद् ब्रह्मा स्थितं जगतो न पृथक् पृथगपि न पृथग् जगत् स्याद्--इति वेदाः सर्वं जगद् विज्ञायते जगद् इत्येवं जगद् विज्ञेयं, यतो हि जगद् ब्रह्म न पृथग् विद्यते सर्वं जगतो हि? यतो जगद् ब्रह्म नास्ति, यतो हि जगज् जातं यद् ब्रह्मणो सकाशात् तद् जगद् भिन्नं स्याद् इत्येवं, यतो हि जगज् जातम् उत्त्पन्नं जगद् भिन्नं स्या द्धि कथं हि, यस्माद् वा इदं न पृथग् हि; यथा सुवर्ण घटितं कटकं कुण्डलादि वा सर्वं तद् घटितं वा हेममयं भवति यतो हि हेम हेम स्याद् भिन्नं तुच्छं भिन्नं भवति, तद् हेममयाद् घटिताद् हेम विद्वांसो न भिन्नं वदन्ति भिन्नं यद् हेमत्व-भेदतः सुवर्णं हि सर्वं तद् हेम भिन्नं भवति यतो वा हेमत्वं सर्वं हेम च सुवर्णं भवति तद् भिन्नं तु सुवर्णं न भवेद् हि सुवर्णं वा हि सुवर्णस्य कुण्डलादिकं यद् हेम हेमत्वेन ज्ञेयं, यत् तु हेम कुण्डल कटकं सर्वं तु हेम भवति, तद् हेमत्वाद् हेमत्वेन हि ज्ञेयं विद्वांसो हि यद् वेद व्याख्यानाद् हि विद्वांसो वदन्ति, स सर्वं हि सु-- वर्णादिशब्देन, सुवर्ण-शब्दे--नैव सर्वस्या ज्ञेयं विदुः इत्येवं विदुषो हि, यद् ब्रह्मणो भिन्नं न हि जगद् विद्यते सर्वं सु--वर्ण घटितं हि कनकं स्वर्णं भिन्नं भवति वा कथं न वा हि सुवर्णं भव ति? न हि किञ्चिद् भिन्नं भवति, न वा हेम भिन्नं सर्वं जगद् ब्रह्म भवति नित्यं निश्चलं हि, तद् ब्रह्म सर्वं जगद् इति सर्वं हि विद्वांसो वदन्ति, सर्वं जगद् ब्रह्म एव, न भिन्नं ब्रह्म जगद् इति न हि भिन्नं भवेद् जगद् हि? यस्माद् वा इदं जगद् सर्वं हि जातं जगत् सर्वं हि जीवति यतः जगद् सर्वं हि, यस्माज् जातानि जगद् हि, स जगद् एव; स सर्वं जगद् भवति किं न जगद् भव ति? तद् ब्रह्म सर्वं, यस्माद् वा इदमेव सर्वं सर्वं सर्वं हि जातं जगद् इति यस्माद् वा, तद् ब्रह्मण एव! यतो हि सर्वस्मिन् सर्वं जगद् भव ति? नहि हि सर्वं ब्रह्मणः? जगद् भव ति? जगद् सर्वं जगद् हि सर्वं हि ब्रह्मणो जातं जगद्? यस्माद्, यत् स हि सर्वं जगद् सर्वं हि भवति यतो हि जगद् हि सर्वं जगद्, स जगद् जगद् हि सर्वं हि हि हि सर्वं हि सर्वं सर्वं हि; सर्वं हि सर्वं जगद् भव, जगद् सर्वं हि, सर्वं जगद् यस्माद् हि, सर्वं हि; सर्वं सर्वं जगद् सा हि वा जगद्वाग् हि यत् सर्वं हि सर्वं जगद् जातं जगज् जातं जगद् जगद् सर्वं जगद् हि सर्वं हि हि जगद्... सा हि वाग्, सर्वं यद् जगद् सर्वं यस्माद् यद् सर्वं हि हि जगद् यतो हि सर्वं हि, सर्वं जगद् हि सर्वं सर्वं जगद् हि सर्वं सर्वं जगद् भवति हि सर्वं जगद् हि सर्वं हि हि हि सर्वं हि सर्वं हि हि सर्वं हि हि हि सर्वं हि, हि सर्वं सर्वं जगद् हि, यद् ब्रह्मणो जगद् जातं सर्वं हि जगद् हि सर्वं हि हि, 157
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लेकिन जब इन दोनों पक्षों का रुख देखा जाता तो यह बात और भी ज्यादा पेचीदा नजर आती दोनों ओर से गाहे-बगाहे जो कुछ कहा जाताथा उससे तो यही भ्रम पैदा होता कि बात सिर पैर की है। जो कुछ अदालत के रू-ब-रू तयशुदा था उसके विरूद्ध जो कुछ भी कहा जाता था वह सब बेमायने था। दोनों तरफ वाले जो मुसलमानों को इस बात का दोष, ठहराने की जो चेष्टा करते रहते थे। उन पर कुछ बात कहने का यहां मौका नहीं था। केवल इतना ही याद रखना काफी होगा कि हिन्दू! यदि चेतते तो, क्या उनका रास्ता रोका था? जब भी मुसलमान यह सवाल या दावा पेश करते थे, तब सिर्फ मुगालते ही सामने आते कि जब सारा इलाका सिर्फ उनका ही था और अदालत सिर्फ इस बात से मतलब; कि जो भी पक्ष सामने अपना दावा पेश, अदालत तो दो जन-पक्षोंके वाद विवादका ही तो फैसला करेगी, दूसरा कोई, चाहे हमदर्दी से ही सही यदि सामने आकर दावा पेश करे तो! जब कोई ऐसा दावा करता, तभी तो उस पर भी फैसला दिया जाता। जो कानून की नजर में कोई मतलब नहीं, बस दावा करने वाले अपने सामने वाले को नीचा दिखाने मात्र तक ही सीमित! बस ऐसा दावा अदालत रद्द बात अब भी समझ में आ सकती थी जब इस बात का दावा पेश किया जा सकता केवल इसके लिए दावा पेश नहीं किया जाता कि कौन क्या करता था? अदालत सिर्फ सबूत ही तो तय कर के फैसला करती है, न सबूत सिर्फ दावा करने से तय कर लिए जाते हैं। इस आधार पर यह बात सामने आई कि जब भी हिन्दू पक्ष से दावा पेश किया गया तो वह प्रमाण से विमुख ही रहा; अदालत सिर्फ इस बात पर न केवल विश्वास का दायरा पेश कर के दावा बरकरार रखा जा सकता; उस पर सिर्फ दावा करने से कुछ हासिल नहीं होता। दावा पेश करने वाले इस बात को जानते थे, तभी तो सिर्फ दावा करते चले आ रहे थे, ताकि यह महसूस ही कराया जा सके कि उनका भी हिस्सा वहां पर ही था, जिस से कभी भी इनकार नहीं किया जा सकता था। पर जब दावा करने का ही हक नहीं था तो दावा कैसा था, अर्थात्; केवल दावा तक ही यह बात रह गई थी जिस के लिए यह बात केवल इतनी भर ही थी कि जहां तक गाहे-बगाहे कब्जा करने की बात थी व केवल भ्रम था, जो कि कब्जा उस वक्त सिद्ध था! जो बात तय थी वह कब्जा सिर्फ एक तरफ का ही था। इस पर एक बात यह भी, कब्जा जिस वक्त साबित था तब किसी को कोई ऐतराज करने का मौका ही नहीं था, केवल राजनैतिक ही रूप था जिस में हिन्दू पुनरूत्थान को उभारा गया था, ताकि इस बात राजनीति के तौर फायदा उठाया जा-- सके। दूसरा हिस्सा मुसलमानों? मुसलमानों का तो हक ही था जो कि मु--कद्दमा पर था, अदालत में था, जिस के दम पर, जिस के बल, जिस का, हकदार था, इसके लिए मुसलमानों को सोचना ही क्या राम लला हम आएँगे, मन्दिर वहीं बनाएंगे यह नारा तब से ही तय कर तय किया गया था, जब से दावा पेश किया गया था, जो कि सिर्फ दावा ही बनकर उभरा था। जिसका कोई आधार सिर्फ दावा पेश करने तक ही था। जो सिर्फ इस बात प्रमाण था, कि सब कुछ दावा पेश करने के बाद सिर्फ तय करने का दावा था, जिस का कोई दूसरा आधार था ही न था, पर फिर राजनीति की बात सामने आई थी और इस राजनीति की बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था जब कि सब कुछ तय था तब राजनीति की ही तो जरूरत थी! जिस तरह मंदिर की, राजनीति चल रही, जिस तरह से हर बात को लेकर बात की जा रही थी। इसके लिए हिन्दू हर पल तैयार थे। जब कि राजनीति केवल इस बात को लेकर थी कि हिन्दू जन मानस को हर हाल में भ्रमित ही रखा जाए; जिससे सिर्फ अपना उल्लू ही सीधा किया जा सके! राम लला हम आएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे इस बात को हवा देकर जो राजनीति की चाल चली गई उसका फल तो सामने आ ही गया था। जब तक राजनीति नहीं, तब तक कुछ भी संभव नहीं, ऐसा सब लग रहा था! पर इससे जो बात सामने आ रही थी उससे कोई एक बात तय हो सकती थी कि! यदि केवल इस बात पर ध्यान दिया जाता तो बात बन सकती थी कि जब अदालत में कोई फैसला होना ही था तो राजनीति की जरूरत ही कहां थी, किस कारण थी? पर जब बात ही राजनीति, जिसे कि केवल जन! जन से जोड़ कर ही देखा जा रहा था तो राजनीति केवल फायदा ही, इस बात केवल देखा गया। राजनीति का दायरा केवल भ्रम पैदा करने तक ही सीमित था यह बात साबित हो चुकी; जिसके लिए केवल, गाहे-बगाहे सिर्फ! भ्रमित कर जन को अपने पीछे लगा कर ही दम भरा जाएगा! 159
यद्यपि इन सब का फल केवल पर व निज उपकार ही था तथापि इन सब का फल प्रशंसाप्रद न हुआ, पर कष्ट ही रहा; जिसे जी चाहा तब इन सब कष्टों का बदला ले लेने पर भी, बदला कुछ इस तरह का लिया कि जिससे सुख मिले? पर यह स्वाभाव ही था कि सब कुछ होने पर भी चित्त एकांत चाहने का दुख कभी विसर्जन नहीं करता था और अब न दया, केवल न प्रेम; पर यह देखा, कर्तव्य पालन करने वालों को बहुधा ही कष्टमय यह या वह रूप मिल ही जाता, पर कर्तव्य पालन करने से जो संतोष, सुख मिलता उसका मोल जग में न था या हो सकता था कभी भी? अब संसार की गति का रूप, या परिणाम सब बदला। यह चित्त का धर्म था कि जिसको जब तक सुख प्राप्त होता रहता, तबतक दया, या प्रेम का उदय रहा; पर चित्त का रूप उस समय कुछ कठिन प्रतीत होने लगा, विचारवान् भी कहा जा पर मन रूपी सागर का अंत या तल का था कहाँ पता केवल ऊपर रूप में ही मन का रूप सा ज्ञात था, दयावान् चित्त का; पर विचार से, दया का भाव भी जा रहा, संसार की चालों का सब पर प्रभाव था ही। पर दुख या कष्ट के समय या संकट के समय जो सहायता की या दी जाती थी उसको कोई भी न भूलता था पर अब तो दशा ही उलटी थी, दया, प्रेम केवल केवल नाम मात्र रहा, केवल मन बहलाने का रूप था? संसार में तो, दया केवल पर प्रेम का रूप दिखाना मात्र ही समझा जाता था जिसको कि दया का रूप दिया जाता, पर आज तक केवल देखा केवल दिखावटी ही का काम था संसार; संसार सब को ठगने का ही नाम था, पर बिना ठगाए भी काम नहीं था हो सकता और फिर संसार को यह भी केवल दया अथवा उपकार धर्म नहीं था जीव-जीव का कर्तव्य कहा, या संसार सब कुछ उस रूप से रहित हो रहा था जैसा, होना योग्य था, जिसको सत्य कहा; पर यह सत्य भी सब संसार में शून्य था, केवल रूप बदला ही था। दया का संसार में नाम मात्र था, सब ही सब कुछ अपने ही स्वार्थ के लिये कर रहे, दया रूप तो केवल पर प्रेम या छल का ही रूप कहा व माना जा ता था व विश्वास सब का सब नष्ट था सब अपने लाभ लिए कष्ट दे रहे थे, दया तो केवल पर ठगने का ही साधन था या संसार में केवल दया नाम का सब कुछ न था बदला। पर दया का धर्म तो न था ऐसा, पर यह सब संसार का रूप न था। सब संसार का नाम तो केवल दया पर उपकार ही था नाम व रूप बदला ही था संसार का सब का सब, पर यह संसार तो ऐसा न था जैसा अब था कि सब का सब केवल धन का रूप बन कर के सब को कष्ट दे रहा था कि यह धन का लोभ ही सब प्रकार की विपत्ति का मूल कारण था पर सब को यह ज्ञात। सदा ऐसा न, सब का दुख दूर हुआ; दया का रूप, दया का नाम, दया का काम, दया की आवश्यकता ही बची। हे प्यारे प्रभु, दया से ही काम न बन सके! ना दया का नाम कहीं अब रहा; पर सब जगत् में केवल तेरा नाम केवल --तेरा नाम ही! सब का सब कुछ रहा, दया तो कहीं केवल नाम को रह गई, दया का रूप बदला तो सब को दुख हुआ, पर सब तो यह भी हुआ, पर सब का सुख जाता रहा, सब ही सब कुछ रूप धारण करके जगत में सब कुछ करने को सब ही क्यों? सब तो बदल गया, सब तो सब कुछ रहा, सब को दया रूप में सब कुछ संसार में ही मन को भर-- जो जो देखा सो सब कुछ ऐसा देखा, संसार के रूप को देखकर ही संसार दया शून्य प्रतीत होने लगा था पर अब, संसार को न दया से ही कोई सम्बन्ध ही था, अब संसार से ही दूर हो, पर सब कुछ रूप व प्रेम सदा ही हर एक प्राणी का धर्म था दया स्वरूप दया के गुण सब का कल्याण करने वाला संसार में ही सब कुछ रहा था, दया स्वरूप ही, दया स्वरूप सब कुछ सुख देने वाला था। दया से ही जगत् का उद्धार हो सका था, पर अब दया से भी कोई काम न बन सका क्योंकि संसार में छल, कपट का नाम ही था; अब तो दया का नाम सब मिटा। 160
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सत्यनारायण का नाम रहेगा तो पचास पचास लाख लोग एक साथ सत्यनारायण की कथा
समाज का रूप समझायेंगे और समझ कर जब समझायेंगे तो सब पर असर हो जायगा या सिर्फ गीता कण्ठस्थ करके ही छोड़ देने वाले भक्त रहोगे। संसार के बड़े बड़े संत महात्मा भी यही काम करते आ रहे और जब तक सन्तों का संग रहेगा, तब सत्यनारायण का व्रत भी रहेगा और जब तक संतों का संग या सत्यनारायण का नाम रहेगा तो पचास पचास लाख लोग एक साथ सत्यनारायण की कथा सुनेंगे। नहीं तो यह सब समाप्त हो ही रहा सत्यानाशी समाज बन ही तो रहा है। पचास रूप का यह सत्यनारायण समाप्त हुआ। तो नाम का ध्यान है? लेकिन यह नाम कौन तो क्या यह नाम है? फिर यह नाम कौन ऐसा तो नहीं भगवान स्वरूप का ध्यान करते हुए सत्यम् परब्रह्मम् है; स्वरूप ध्यान स्वरूपम् हो या ध्यान शब्दम् हो? स्वरूप का ध्यान करने पर तो स्वरूप परमात्मा और भगवान् स्वरूप प्रत्यक्ष सामने आ जाता होगा, लेकिन यह स्वरूप भी तो मिट जाता है। भगवान् स्वरूप तो साकार है, जो साकार रहेगा वह मिटेगा व जो न मिटे ऐसा स्वरूप? हे व्यास, हे शौनक इन दोनों का स्वरूप क्या रूप तो सत्य और असत्य का भेद जब तक नहीं जाने; इसका भेद जानकर रूप का त्याग न हो तब तक रूप देखना, स्वरूप का ध्यान असम्भव। तब व्यास जी विस्तार देकर सत्यनारायण के दो रूप कहे, जिसका कि पहले किसी रूप का तो स्वरूप ध्यान न होना भगवान् के भक्त को रूप ही तो ध्यान बनाकर ले गया होगा न! दो रूप ऐसा समझाया कि जो सत्य वह सत्य का ध्यान रूप का नहीं रूपवान् जब तक रूप का नाम न समझ परमात्मा स्वरूप देखना कठिन होगा जिसे संत या भगवान् स्वरूप सत्यनारायण भगवान् कहते हैं। भगवान् का रूप नहीं है। जिसने स्वरूप बनाया व तो मिटेगा इसका न मिटे; परमात्मा सत्यनारायण स्वरूप व रूप समझकर देखा, सत्यनारायण व्यास जी स्वरूप रूप को सत्यनारायण स्वरूप दिया या दो रूप एक असत्य परमात्मा का दूसरा सत्य परमात्मा। जिस रूप को--सत्य को सब सन्तुक स्वरूप मानते स्वरूप नाम रूप का सत्य का रूप माना गया रूप का ध्यान स्वरूप ध्यान समाधि स्वरूप का रूप देखना स्वरूप समाधि द्वारा संत रूप बनाया या सत्य का रूप माना, रूप देखना असत्य, स्वरूप का रूप, ध्यान सत्यनारायण के रूप का नाम ध्यान रूप या सत्यता का रूप ध्यान होगा, या दो रूप एक रूप दूसरा रूप? परमात्मा का एक रूप होगा? संत दूसरा रूप, दो रूप ज्ञान का रूप दूसरा रूप का ही स्वरूप रूप हो? रूप देखना या न रूप सत्यनारायण स्वरूप ध्यान रूप या सत्य ध्यान है, या दोनों रूप का ही रूप देखना ही रूप का नाम रूप ही रूप का, स्वरूप का रूप? रूप रूप स्वरूप का स्वरूप रूप है? रूप तो संत रूपी सत्य स्वरूप को रूप या रूप न होने पर ही रूप का रूप सत्यनारायण का नाम रूप माना गया हो! सत्यनारायण का रूप तो यह रूप स्वरूप या रूप होगा? या तो संत स्वरूप का स्वरूप होगा? स्वरूप तो एक है, रूप अनेक। जो स्वरूप देखना हो सत्य का ध्यान सत्यनारायण रूप बन कर, स्वरूप समझना रूप, ध्यान सत्यनारायण रूप जब तक न होगा तब तक, व्यास का सत्य स्वरूप का ध्यान रूप हो? व्यास जी रूप स्वरूप परमात्मा का रूप स्वरूप देखना ऐसा न होगा, जो स्वरूप को रूप जैसा देखना या दो स्वरूप सत्य दूसरा स्वरूप रूप, रूप हो? या रूप रूप परमात्मा का रूप, परमात्मा का रूप देखना व्यास जी सत्य रूप से परे को स्वरूप न मान, जो स्वरूप का रूप जब सब रूप रूप रूप समझ ले तब व्यास जी कहते... हे शौनक रूप देखना; स्वरूप को रूप का ही रूप समझ कर संत रूप देखना कैसा? कैसा रूप? रूप तो संत का स्वरूप होगा, सत्यनारायण रूप, संत रूप को ही सत्यनारायण रूप कहा गया क्योंकि रूप संत का स्वरूप रूप रूप माना ही रूप समाधि रूप का नाम ही तो रूप होगा! जो दो स्वरूप रूप रूप देखने से पहले ही रूप देखना हो संत सुनो!, जो सत्य रूप स्वरूप
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विचार कर विचार पूर्वक काम को हाथ में मत लो तब तक जब तक सन्देह रहे उस बात, उस विषय पर चिन्तन करते रहो व ऐसा समाधान प्राप्त करो कि फिर मन में कोई हिचकिचाहट अथवा संशय बाकी न रह जाय या तो ऐसा करो व जो यह न हो, काम करना बहुत जरूरी हो! तत्काल तय करो निश्चय कर लो कि अब फैसला तय संशयमुक्त कर ही लिया गया इसके जो नतीजे निकलेंगे हम डट कर उनका सामना कर लेंगे और संशय को त्याग कर काम में जुट जाओ लगनपूर्वक, ईश्वर जरूर सफलता का आशीर्वाद या फल देगा ही ऐसा निश्चय रखो तो यह न हो कि अरे! काम तो बिगड़ गया! संशय बना रहेगा संशय मिटा नहीं! संशय मिटने का उपाय संशय से रहित काम करो! काम करो, निश्चयी बन कर करो! निश्चयपूर्वक! यह ख्याल रहे, जो शंका दूर हो सकती बुद्धिरूपी खुरपी से काम निकालकर विचार रूपी अज्ञानांधकार को; जो हो सो जान लेता ही समझ ही इसका नाम साधना ही संशय को दूर कर काम, काम संशय को दूर करेगा, तो यह तो परस्पर एक का नाश एक को कर, यह निर्णय मन द्वारा लिया गया! सो इस बात का सार यह हुआ काम तो कर कर्म व अकर्म अर्थात् फल वाले कर्म निष्काम कर्म को कर मत छोड़ो ना सोच कर काम मत रोक मत मन को संशय ग्रसित रखो। अज्ञानान्धकार मत पैदा करो, अज्ञान संशयवान मत बन कर्म को मत छोड़, कर्म त्याग फल की इच्छा त्याग कर्म को ईश्वरार्पण समझ कर किया तो यह सब हो गया संशय समाप्त हो, अज्ञान समाप्त हो, तो ही काम होगा फिर संशय ग्रसित काम क्या ही, कर्म कर्म का फल ही ना हुआ व अकर्म का फल ना निष्काम संशय ग्रसित कर्म फल का ही देगा, जो कर्म ज्ञान पर फल की इच्छा त्याग कर्म निष्काम कर्म बन गया तो ही मुक्ति का मार्ग कर्म फलदाता बन कर, संशय अज्ञानान्ध को ही रूप व कर्म फल निष्काम संशय त्याग सो जो कहा ना संशय कर; संशय ग्रसित काम ना कर काम कर्म ना बन कर व अकर्म, निष्काम कर्म ना बनेगा जो काम मन चित्त संशय से युक्त हो किया तो उस का फल तो ना ही संशय ग्रसित रहा, ना संशय से युक्त निष्काम ही बनेगा व जब कर्म का फल निष्काम नहीं तो कर्म मुक्ति का कारण ही कैसे बनेगा तो शंका तो अज्ञान ग्रसित मन की उपज हुई जिस कारण संशय से संशय बढ़ता गया जो कर्म किया उस का फल संशय युक्त ही संशय ग्रसित फल भोगना ही पड़ा; संशयवान् का नाश, सो काम संशय युक्त ना हो संशय रहित कर्म, काम निष्काम, ना शंका ही ना फल की; निष्काम भाव मन में संशय को स्थान नहीं देता सो ना संशयवान् बनो काम, मत अकर्म करो ना, अकर्म त्याग कर्म को ना कर मत संशय युक्त बन कर, कर्म को ईश्वरार्पण कर ईश्वर को मान ईश्वर पर छोड़ कर जो भी कर्म हो ईश्वर का ही नाम जान कर संशय मिटा दिया तो ही, कर्म का त्याग हुआ और संशयरूपी अज्ञान का विनाश हुआ और, ज्ञान द्वारा परमात्मा का ही रूप जान निष्काम कर्म किया निष्काम फलदाता, परमात्मा ही परमात्मा स्वरूप प्रदान करता सो सब ही शांत हो गया मन और संशय अज्ञान, या संशय का कारण मन जब तक संशय को मानेगा तब, तो उस बात का नाश सब काम सब का नाश ही! जब सब बात को संशय रूप मान कर उस का त्याग ना तो त्याग ना ही फल का रूप बन पाया संशय अज्ञानांध बना रहा सब बात का नाश तो हो गया संशय का नाश तब तक संभव ना हुआ; ना संशय निवारण ही मन का विचार जो संशयवान् मन ना उस बात का ही नाश कर दिया जो बात सब काम करने ज्ञान का रूप थी ना ज्ञान अज्ञान का नाश हुआ ना ही, अज्ञान संशयवान् बना रहा कर्म सब का नाश हो ही, संशय ही ना संशय रूप रहा तो ज्ञान संशय मिटा ही; कर्म ज्ञान ही फल दाता ही; ज्ञान रूप ईश्वर ही फल निष्काम ना फल की ना फल से सम्बंध ना कर्म त्याग की बात; ना दोष; संशय ना संशय नाश ही है; कर्म योग-ज्ञान निष्काम कर्म रूप बन कर ज्ञान रूप रहा, सं-शय नाश कर अज्ञान को; सं-शय न रहा; ज्ञान व कर्म एक--समान ही रूप ज्ञान या परमात्मा रूप बन कर परमात्मा रूप हो गया तो सब संशयरूपी माया अज्ञान व संशय "कर्मणो ह्यपि बोद्ध व्यं, बोद्ध व्यं च वि कर्म णः, अकर्म णश्च बोद्ध व्यं--गह ना कर्म णो गतिः इति श्रीमद् भगवद् गीता" 163
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