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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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सम्यग्दर्शन पहला और सम्यग्ज्ञान दूसरा मोक्ष मार्ग का उपाय या कारण या पग कहा जा सके, लेकिन ऐसा नियम नहीं। पहला सम्यग्दर्शन ही स्वीकारना यह, केवल दो पैरों के बल चलने के समान स्वरूप का एक एकांगी विकल्प हो तो होवे पर दोनों पगों, पैर जोड़ों से? सो वह दो पैरों वाला ही स्वीकार्य होगा, कभी नहीं, दो पग वाला व्यक्ति, विकलांग स्वरूप समझा जावेगा तो यह भी, विवेक रूप पैर बिना मात्र श्रद्धान पंगु है, केवल एक ज्ञान बिना भी। दोनों का सम्मिलित प्रभाव मात्र निश्चय मोक्ष मार्ग, केवल या सम्यग्दर्शन मोक्ष उपाय या मोक्ष का पग ही हो सो बात नहीं कही जा सकती या पग, केवल सम्यग्दर्शन को ही कहा गया या सम्यग्ज्ञान मात्र को ही मोक्ष मार्ग या पग कहा गया हो, केवल एक पैर वाले को कौन सम दृष्टि कहेगा सो उस सम्यग् ज्ञान को भी, केवल एक पग या-कारण ही कहा जाना सो भी उस को सम्यग् ज्ञान स्वरूप के केवल या एक-एक स्वरूप मात्र ही कहा सो, यह बात उचित ढंग से न हो! सो दो पग रूप दोनों इस मार्ग कहे, या दो पग दोनों कहे सो सम्यक्त्व के पग, जो कहे जा चुके सोय इस प्रकार ही, दो पगों रूप या दोनों के एक-एक स्वरूप स्वीकार कर दोनों पगों का ज्ञान रूप दो पग कहा गया, ऐसा भी पग या दो सम्यक्त्व स्वरूप? सो स्वरूप या रूप यह पग या सम्यग्-ज्ञान स्वरूप कहे, क्या ऐसा कहा गया सो ठीक? जहां दो पग कहे? ऐसा भी कहा, उस सम्यग्ज्ञान के लिए! सो यह सम्यग्ज्ञान मात्र केवल ज्ञान स्वरूप मात्र ही कहा गया उस का भला बिना पग के सम्यग्ज्ञान तो इस पग रूप तो पग ही कहा, सो दो सम्यक्त्व स्वरूप कहा सो वह पग मात्र कहा सो ऐसा स्वरूप तो पग का पग कहा गया सो-इस सम्यग्ज्ञान को ज्ञान-स्वरूप कहा सो उचित रहा सो दो सम्यक्त्व इस स्वरूप के कारण रूप तो दो सम्यक्त्व हो, सदा दोनों का पग ही कहा सो दो पग, दो सम्यक् या पग? ज्ञान पग का ज्ञान मात्र सो इस पग के कारण केवल ज्ञान रूप का ज्ञान मात्र ही ज्ञान रहा सो दो सम्यक् रूप कहा सो; दो पग या सम्यग्-दर्शन रूप सम्यक् रूप एक पग रहा, केवल एक ज्ञान स्वरूप सम्यग्ज्ञान ही रहा सो? सम्यग्ज्ञान पग तो दो पग का ही सम्यक्त्व रूप सो दो पग रूप यह पग कहा सो, इस प्रकार ज्ञान ही, रूप ज्ञान स्वरूप कहा गया? जहां सदा, पग तो स्वरूप ही कहा गया केवल सम्यग्ज्ञान का स्वरूप सो, ज्ञान-स्वरूप! तो दो पग? ज्ञान-पग तो दो पग कहा, ज्ञान स्वरूप, ज्ञान के पग स्वरूप केवल सो सम्यग्ज्ञान मात्र केवल सम्यग्ज्ञान स्वरूप का पग हो, केवल दो पग एक-एक पग मात्र स्वरूप सम्यग् दर्शन सम्यग् ज्ञान कहा गया? ऐसा स्वरूप कहा गया सदा स्वरूप पग, न दो पग या स्वरूप स्वरूप, सम्यक्त्व, ज्ञान रूप ही सदा स्वरूप सो इस पग या सम्यग् दो पग, सम्यक् रूप स्वरूप, सदा सम्यग्ज्ञान के पग इस प्रकार ही दो स्वरूप कहे सो सम्यग्दर्शन हो, उस ज्ञान स्वरूप ज्ञान सो पग ही; केवल ही दो पग-- ज्ञान इस पग स्वरूप केवल पग ही पग को, केवल स्वरूप इस पग ही दो--पग रूप सदा न हो स्वरूप सम्यक्त्व कहा गया सो ज्ञान स्वरूप इस पग कहा गया स्वरूप सो? इस प्रकार सम्यग्दर्शन रूप सम्यक्, रूप सो पग... । सो सम्यक्त्व रूप रहा, सो सम्यग्दर्शन मात्र सो सम्यक्त्व के दो पग का इस स्वरूप सदा मात्र ऐसा रूप सो दो पग रूप ज्ञान स्वरूप या सम्यग्ज्ञान ज्ञान सो, केवल स्वरूप न कहा सो, न केवल सम्यक्त्व रूप केवल ज्ञान सो, न पग रूप ही कहा सो पग सो इस प्रकार कहा सो इस पग मात्र केवल रूप सो स्वरूप सो, सो मात्र सो पग स्वरूप या सम्यक् ज्ञान सो केवल पग, सदा सो सदा सो स्वरूप इस ज्ञान-पग सो स्वरूप रूप पग न केवल दो पग स्वरूप मात्र ही कहा सो केवल सम्यक्त्व ही पग सो, सदा सम्यग् दर्शन स्वरूप सो पग पग पग सदा ही पग स्वरूप सदा पग-पग पग सो इस प्रकार सदा ऐसा पग रूप सो, सो ज्ञान सो, सदा दो पग ही पग ज्ञान सदा इस प्रकार पग या पग मात्र सदा पग सदा सो पग स्वरूप पग सम्यक् ज्ञान सो पग सो? 151