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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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ब्राह्मण को मारो, मत छोड़ो यह दुष्ट ही सब पाप और क्लेश का कारण, यह मरेगा तो सब विवादों का अन्त होगा, ब्राह्मण को मार डालो, इसको तो सब रोम--रोमसे ही मार डालना है! कोई तलवार खींचे, कोई लाठी लिये दौड़ै, कोई पत्थर फेंके, धक्के-मुक्कों की तो गिनती कैसी? दो ही तीन क्षणोंमें दुर्जन सिंहको जमीनपर गिराकर, उनके केशकलाप- लखोटकर, ऊपर चढ़कर-बैठकर बेतरहसे हाथ और लातों से मुक्कों से और जो कुछ भी पास था उस से मारने लगे वो तब तक, जब तक वे बेहोश न होकर एक दमसे पत्थर जैसे निश्चेष्ट न हो गये। इसके आगे फिर महाशय जी हाथ जोड़ कर कहने लगे और कहने लगेकि महाशय जी ईश्वर आपका ही रूप ही होगा; सो उन्होंने भी प्रार्थना की और कहा कि स्वामी जी--सर्वथा मत डरो जी; ऐसा कहकर वो वहां-चले गये। इसके पर इस बात सम्बन्धी उपदेश यह मिलता है कि संसार कैसा भी उपद्रव या क्लेश करै उसपर भी सन्तजन, जो ईश्वर के विश्वासी रहकर अपने आत्माके स्वरूप विचार में मग्न रहते हैं, उनके चित्तको किसीके भी द्वेषभाव का, ज़रा भी असर नहीं होता ईश्वर पर विश्वास का होना ही ऐसा फल या फल का न होना एक जैसा जानकर ईश्वर का स्वरूप ही ऐसा विचार कर रहना ही चाहिये? कदाचित् दो दिन भी सो नहीं सके सो ठीक; कदाचित् उपद्रवी लोग सदा ही ऐसा ही करते रहें तो भी क्या, इन सब अवस्थाओं सदा एकरस रहना ईश्वर पर ही ध्यान चाहिये? उपद्रव करने का जो भी फल मिले सुख मिले वा न, इस उपद्रवरूपी विचार का फल मन--को तो दुःखी करेगा सही, इससे अपने चित्तको ईश्वर के रूप और उसके नाम जप और ध्यानमें मग्न रखने वाले इस सब दशा व उपाधि का, ज़रा भी क्लेश नहीं होता ऐसा सिद्ध हुआ कि इस बातको याद करके सब को ऐसा उद्योग करना चाहिये कि किसी का, कभी किसी का ऐसा काम सदा ईश्वर आराधना ही करना योग्य, कोई किसीका भी उपद्रव कैसे भी आवे उपद्रव को ऐसा सदा जानना चाहिये कि कोई इस शरीर का कुछ भी बिगाड़ करने का सामर्थ्य रख हीवेगा तो इससे आत्मा कभी भी इस उपद्रवरूपी क्लेश करने वाले का विशेष होगा? ऐसा तो उपद्रव किसी-२ को अधिक हुआ और ऐसा उपद्रव अथवा क्लेश है? जो जो ऊपर कहा, इससे अधिक तो ना सो सब बातों के ध्यान से ऐसा कह सकते और कहैं इससे अधिक, उस समय सबको ऐसा मन में लाना योग्य नहीं, इससे आगे या तो न कोई उपद्रवरूप क्लेश हुआ और ना ही कोई उपद्रव न बन पड़ा साधारण न बन सकता ऐसा स्मरणपूर्वक रखने से सिद्ध हुआ इससे यह भी सिद्ध हुआ कि इस सब प्रकार के फल का ध्यान सब सामान्य समझ लिया सब क्लेश और ऐसे क्लेशों का भी विनाश हो जाना चाहिये या फिर, क्लेश क्लेश दशा--युक्त होकर विचारने से कभी भी क्लेश--युक्त नहीं! इससे ही सत्य को जान कर सत्य विचार--युक्त ही सब को सदा सिद्ध होना चाहिये उपद्रव का नाश हो, ऐसा फल जानना; उपद्रव करने वाले का क्लेश हो, जिससे कि ऐसा भी सब रूप जो दुःख व क्लेश उपद्रव से होता सो सब ऐसे ही सिद्ध हो जाता कि जैसे सब क्लेश ईश्वरके ध्यानसे ही सब सिद्ध होकर सब क्लेशोंका ही विनाश हो कर सब का कार्य सिद्ध हो सकता उपद्रवरूपी क्लेश सदा ऐसे नाश को प्राप्त हुआ ऐसा भी जानना कि उपद्रव सदा क्लेश और उपद्रव का विचार ही ऐसा सब विशेष कर किया गया तब सब का नाश होकर उपद्रवरूप क्लेशका नाशही संसार से नाश हुआ सो, सर्वथा-प्रकार से ही जानना हुआ उपद्रव को शांत करने का ही विशेष प्रयत्न करना चाहिये; क्लेशमय काम कभी भी किसीका ना हो; जो क्लेश का भी रूप न हो, ऐसा ही सब ध्यान व काम करना सब तरह श्रेष्ठ ही समझना सब को योग्य, इसलिये, उपद्रवों, क्लेशों--सब क्लेश सब जन उस को नाश करें, सब ही काम मन--के स्वाध्याय सदा ही करने योग्य इस सो बात को भी सदा मन--के ही द्वारा समझना जी, ऐसा ही सब विचार सत्य सिद्ध होता, सत्य क्लेशनाशक रूपी ध्यान सदा सब को होवे, इससे क्लेश का क्लेशनाशक होगा; उपद्रवरूपी क्लेश के निवारण का ऐसा फल उपद्रवरूपी होगा कैसे? सदा उपद्रवरूपका सब नाश हो कर सब रूप सिद्ध होवेगा, क्लेश सब नाश कैसे? सदा क्लेशनाशक सब नाश ही जानकर उपद्रव न रहेगा, सब काम ही 152