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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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अहो, जगन्नाथ कवि को यह पद भी मिला-- विद्या वैभव विकल, जगन्नाथ सुकवि मन मों कल्प नहीं होत, कहै कवि कोविद विद्या सो विसा कौन्ह रूपस, विद्या सो रूपस विकस विद्या सो विकस सो मन, विद्या सौ मन सिलाह विद्या सो सिलाह भइनी सुखद, विद्या सौ सुखद सुकवि सुकवि भइनी सुख रूप, सो मुख सुख सिरीस मुख सिरीस भइनी सुकवि, सो सुकवि सुख जगन्नाथ जगन्नाथ सुख सिलाह, कहै कवि कोविद सिरदार सो सिरदार सो सिलाह, विद्या भइ सुख जगन्नाथ विद्या तै सिलाह भइनी, जगन्नाथ तै जगन्नाथ विद्या तै सिलाह, भइनी जगन्नाथ तै जगन्नाथ सो सो विद्या सिलाह, विद्या तै जगन्नाथ जगन्नाथ अहो, जगन्नाथराय कवि कौन कौन भाषा जानते थे। संस्कृत भाषा, व्याकरण पर तो उनका पूरा अधिकार था अवश्यम्, किन्तु यह तो सब ही कवि कह गये यथा 'भाखा बहता नीर' वा वे पाषाण कवि पाठक कभी नहीं पढ़ते क्या वेद--उप वेद-वेदांग को छोड़ कर केवल संस्कृत मात्र से इनका काम चला ही सकता था। यदि ऐसा न होता, कभी क्या वे उस समय फारसी का अभ्यास न करते क्या? वेदों शास्त्रो आदि अनेक प्रकार विद्या का उस समय भी जो प्रचार था क्या ऐसा संस्कृत मात्र पड़े पंडित को उससमय की राज्य भाषा, क्या ऐसा क्या फारसी शिक्षित किसी मुसलमान कवि का पद मिल सकता था। क्या वे कवि न थे? वे महा महाकवि; जगन्नाथ का भाव, जब लवंग-लतिका की उपमा दी जाती है तब कहा जाता कि जब वे न रहे तो वे मुसलमान कवि के पास गये थे। जगन्नाथ को फारसी का कुछ अभ्यास अवश्य था। फारसी राज्य में तो क्या; केवल दो अक्षरों की योग्यता से ही कवि पंडित कहा जाता? उनका विषय कैसा रहा होगा क्या कोई जाने? कहा ही जाता पंडित कवि जी। जगन्नाथ की कविता पढ़ी जाती तो यह स्पष्टतया देखा जाता किविद्याभ्यास से ही तो सब कुछ हो रहा संस्कृत का कुछ तो प्रभाव था संस्कृत प्रभाव कम न था।फारसी यद्यपि वे फारसी कवि नहीं हुए तथापि न फारसी का काम पड़ा था।इस बात का न किसी को भी पता लगा होगा कि वे भी समय के साथ साथ भाषा के कवि भी थे।फारसी प्रभाव? कैसा प्रभाव था? या समय की भाषा का उस काल की भाषा का क्या प्रभाव था तथा वे कवि केवल कवि ही कहलाते थे, यह तो कहा; सब ही कवियों द्वारा ही क्यों सब कुछ देखा जा सकता कवि कहा जाता? न रूप था, न रूप भाषा, न रूप जगन्नाथ केवल कवित्व-भाव ही न था सब रूप था वे केवल एक कवि मात्र ही नहीं थे फारसी पढ़ फारसी न की, उस समय सब प्रकार विद्या का अभ्यास करके कवि कहलाये? पंडित जी कवि मात्र ही नहीं थे। पंडित जगन्नाथ जी। पंडित जी को कवि जगन्नाथ कह कर ही कोई पुकार ले सकता था। क्या हो--सकता? कवि तो पंडित जी कहलाते ही आये थे, पंडित तो जगन्नाथ कवि हो--सकते? कवि जगन्नाथ को जगन्नाथ न कहा जाता तो पंडित कवि कहा जा सकता, सो जगन्नाथराय कवि थे; कवि और पंडित सब कुछ थे, सो सब कुछ कहा गया फारसी पढ़ी उस समय तक, जब जहां विद्या पढ़ी उस समय फारसी पढ़ी, जब जहां विद्या पढ़ी सब संस्कृत अभ्यास किया गया, जहां उपाध्याय 150