अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयद्यपि इन सब का फल केवल पर व निज उपकार ही था तथापि इन सब का फल प्रशंसाप्रद न हुआ, पर कष्ट ही रहा; जिसे जी चाहा तब इन सब कष्टों का बदला ले लेने पर भी, बदला कुछ इस तरह का लिया कि जिससे सुख मिले? पर यह स्वाभाव ही था कि सब कुछ होने पर भी चित्त एकांत चाहने का दुख कभी विसर्जन नहीं करता था और अब न दया, केवल न प्रेम; पर यह देखा, कर्तव्य पालन करने वालों को बहुधा ही कष्टमय यह या वह रूप मिल ही जाता, पर कर्तव्य पालन करने से जो संतोष, सुख मिलता उसका मोल जग में न था या हो सकता था कभी भी? अब संसार की गति का रूप, या परिणाम सब बदला। यह चित्त का धर्म था कि जिसको जब तक सुख प्राप्त होता रहता, तबतक दया, या प्रेम का उदय रहा; पर चित्त का रूप उस समय कुछ कठिन प्रतीत होने लगा, विचारवान् भी कहा जा पर मन रूपी सागर का अंत या तल का था कहाँ पता केवल ऊपर रूप में ही मन का रूप सा ज्ञात था, दयावान् चित्त का; पर विचार से, दया का भाव भी जा रहा, संसार की चालों का सब पर प्रभाव था ही। पर दुख या कष्ट के समय या संकट के समय जो सहायता की या दी जाती थी उसको कोई भी न भूलता था पर अब तो दशा ही उलटी थी, दया, प्रेम केवल केवल नाम मात्र रहा, केवल मन बहलाने का रूप था? संसार में तो, दया केवल पर प्रेम का रूप दिखाना मात्र ही समझा जाता था जिसको कि दया का रूप दिया जाता, पर आज तक केवल देखा केवल दिखावटी ही का काम था संसार; संसार सब को ठगने का ही नाम था, पर बिना ठगाए भी काम नहीं था हो सकता और फिर संसार को यह भी केवल दया अथवा उपकार धर्म नहीं था जीव-जीव का कर्तव्य कहा, या संसार सब कुछ उस रूप से रहित हो रहा था जैसा, होना योग्य था, जिसको सत्य कहा; पर यह सत्य भी सब संसार में शून्य था, केवल रूप बदला ही था। दया का संसार में नाम मात्र था, सब ही सब कुछ अपने ही स्वार्थ के लिये कर रहे, दया रूप तो केवल पर प्रेम या छल का ही रूप कहा व माना जा ता था व विश्वास सब का सब नष्ट था सब अपने लाभ लिए कष्ट दे रहे थे, दया तो केवल पर ठगने का ही साधन था या संसार में केवल दया नाम का सब कुछ न था बदला। पर दया का धर्म तो न था ऐसा, पर यह सब संसार का रूप न था। सब संसार का नाम तो केवल दया पर उपकार ही था नाम व रूप बदला ही था संसार का सब का सब, पर यह संसार तो ऐसा न था जैसा अब था कि सब का सब केवल धन का रूप बन कर के सब को कष्ट दे रहा था कि यह धन का लोभ ही सब प्रकार की विपत्ति का मूल कारण था पर सब को यह ज्ञात। सदा ऐसा न, सब का दुख दूर हुआ; दया का रूप, दया का नाम, दया का काम, दया की आवश्यकता ही बची। हे प्यारे प्रभु, दया से ही काम न बन सके! ना दया का नाम कहीं अब रहा; पर सब जगत् में केवल तेरा नाम केवल --तेरा नाम ही! सब का सब कुछ रहा, दया तो कहीं केवल नाम को रह गई, दया का रूप बदला तो सब को दुख हुआ, पर सब तो यह भी हुआ, पर सब का सुख जाता रहा, सब ही सब कुछ रूप धारण करके जगत में सब कुछ करने को सब ही क्यों? सब तो बदल गया, सब तो सब कुछ रहा, सब को दया रूप में सब कुछ संसार में ही मन को भर-- जो जो देखा सो सब कुछ ऐसा देखा, संसार के रूप को देखकर ही संसार दया शून्य प्रतीत होने लगा था पर अब, संसार को न दया से ही कोई सम्बन्ध ही था, अब संसार से ही दूर हो, पर सब कुछ रूप व प्रेम सदा ही हर एक प्राणी का धर्म था दया स्वरूप दया के गुण सब का कल्याण करने वाला संसार में ही सब कुछ रहा था, दया स्वरूप ही, दया स्वरूप सब कुछ सुख देने वाला था। दया से ही जगत् का उद्धार हो सका था, पर अब दया से भी कोई काम न बन सका क्योंकि संसार में छल, कपट का नाम ही था; अब तो दया का नाम सब मिटा। 160