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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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लेकिन जब इन दोनों पक्षों का रुख देखा जाता तो यह बात और भी ज्यादा पेचीदा नजर आती दोनों ओर से गाहे-बगाहे जो कुछ कहा जाताथा उससे तो यही भ्रम पैदा होता कि बात सिर पैर की है। जो कुछ अदालत के रू-ब-रू तयशुदा था उसके विरूद्ध जो कुछ भी कहा जाता था वह सब बेमायने था। दोनों तरफ वाले जो मुसलमानों को इस बात का दोष, ठहराने की जो चेष्टा करते रहते थे। उन पर कुछ बात कहने का यहां मौका नहीं था। केवल इतना ही याद रखना काफी होगा कि हिन्दू! यदि चेतते तो, क्या उनका रास्ता रोका था? जब भी मुसलमान यह सवाल या दावा पेश करते थे, तब सिर्फ मुगालते ही सामने आते कि जब सारा इलाका सिर्फ उनका ही था और अदालत सिर्फ इस बात से मतलब; कि जो भी पक्ष सामने अपना दावा पेश, अदालत तो दो जन-पक्षोंके वाद विवादका ही तो फैसला करेगी, दूसरा कोई, चाहे हमदर्दी से ही सही यदि सामने आकर दावा पेश करे तो! जब कोई ऐसा दावा करता, तभी तो उस पर भी फैसला दिया जाता। जो कानून की नजर में कोई मतलब नहीं, बस दावा करने वाले अपने सामने वाले को नीचा दिखाने मात्र तक ही सीमित! बस ऐसा दावा अदालत रद्द बात अब भी समझ में आ सकती थी जब इस बात का दावा पेश किया जा सकता केवल इसके लिए दावा पेश नहीं किया जाता कि कौन क्या करता था? अदालत सिर्फ सबूत ही तो तय कर के फैसला करती है, न सबूत सिर्फ दावा करने से तय कर लिए जाते हैं। इस आधार पर यह बात सामने आई कि जब भी हिन्दू पक्ष से दावा पेश किया गया तो वह प्रमाण से विमुख ही रहा; अदालत सिर्फ इस बात पर न केवल विश्वास का दायरा पेश कर के दावा बरकरार रखा जा सकता; उस पर सिर्फ दावा करने से कुछ हासिल नहीं होता। दावा पेश करने वाले इस बात को जानते थे, तभी तो सिर्फ दावा करते चले आ रहे थे, ताकि यह महसूस ही कराया जा सके कि उनका भी हिस्सा वहां पर ही था, जिस से कभी भी इनकार नहीं किया जा सकता था। पर जब दावा करने का ही हक नहीं था तो दावा कैसा था, अर्थात्; केवल दावा तक ही यह बात रह गई थी जिस के लिए यह बात केवल इतनी भर ही थी कि जहां तक गाहे-बगाहे कब्जा करने की बात थी व केवल भ्रम था, जो कि कब्जा उस वक्त सिद्ध था! जो बात तय थी वह कब्जा सिर्फ एक तरफ का ही था। इस पर एक बात यह भी, कब्जा जिस वक्त साबित था तब किसी को कोई ऐतराज करने का मौका ही नहीं था, केवल राजनैतिक ही रूप था जिस में हिन्दू पुनरूत्थान को उभारा गया था, ताकि इस बात राजनीति के तौर फायदा उठाया जा-- सके। दूसरा हिस्सा मुसलमानों? मुसलमानों का तो हक ही था जो कि मु--कद्दमा पर था, अदालत में था, जिस के दम पर, जिस के बल, जिस का, हकदार था, इसके लिए मुसलमानों को सोचना ही क्या राम लला हम आएँगे, मन्दिर वहीं बनाएंगे यह नारा तब से ही तय कर तय किया गया था, जब से दावा पेश किया गया था, जो कि सिर्फ दावा ही बनकर उभरा था। जिसका कोई आधार सिर्फ दावा पेश करने तक ही था। जो सिर्फ इस बात प्रमाण था, कि सब कुछ दावा पेश करने के बाद सिर्फ तय करने का दावा था, जिस का कोई दूसरा आधार था ही न था, पर फिर राजनीति की बात सामने आई थी और इस राजनीति की बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था जब कि सब कुछ तय था तब राजनीति की ही तो जरूरत थी! जिस तरह मंदिर की, राजनीति चल रही, जिस तरह से हर बात को लेकर बात की जा रही थी। इसके लिए हिन्दू हर पल तैयार थे। जब कि राजनीति केवल इस बात को लेकर थी कि हिन्दू जन मानस को हर हाल में भ्रमित ही रखा जाए; जिससे सिर्फ अपना उल्लू ही सीधा किया जा सके! राम लला हम आएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे इस बात को हवा देकर जो राजनीति की चाल चली गई उसका फल तो सामने आ ही गया था। जब तक राजनीति नहीं, तब तक कुछ भी संभव नहीं, ऐसा सब लग रहा था! पर इससे जो बात सामने आ रही थी उससे कोई एक बात तय हो सकती थी कि! यदि केवल इस बात पर ध्यान दिया जाता तो बात बन सकती थी कि जब अदालत में कोई फैसला होना ही था तो राजनीति की जरूरत ही कहां थी, किस कारण थी? पर जब बात ही राजनीति, जिसे कि केवल जन! जन से जोड़ कर ही देखा जा रहा था तो राजनीति केवल फायदा ही, इस बात केवल देखा गया। राजनीति का दायरा केवल भ्रम पैदा करने तक ही सीमित था यह बात साबित हो चुकी; जिसके लिए केवल, गाहे-बगाहे सिर्फ! भ्रमित कर जन को अपने पीछे लगा कर ही दम भरा जाएगा! 159