अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकथा इस बात सिद्धि करती कि मनुष्य को परमात्मा की आज्ञा माननी योग्य है; क्योंकि परमात्मा दयालु पिता रूप है और पिता अपने पुत्रों, जिन को उसने उत्पन्न किया उन को अनेक प्रकार विद्या और उत्तम शिक्षा दे कर अवश्य ही योग्य बनाता ही है॥ "जो कुछ दया और धर्मयुक्त काम हैं सो सब धर्म और जिसके विपरीत हैं सो अधर्म गिना जाता" इस बात सिद्ध करने विषय में एक कथा एक समय में राजा भोज बैठे हुए थे, कि इतने पश्चात् सभासद् ने निवेदन करा महाराज इस सभा में जो-जो पुरुष धर्मात्मा हैं उनका नाम लिखा जाय सो प्रथम आप धर्मात्माओं का नाम लिख के फिर उन सब राजा और प्रजा का नाम लिखिये जिस में धर्म की निन्दा कदापि न होवे क्योंकि आप सर्वथा धर्मात्मा मनुष्य हैं; सो सुन करके राजा ने कहा भाई हम धर्मात्मा नहीं किन्तु पाप रूप हैं क्योंकि हमने बहुत जीवों को दुःख पहुंचाया होगा? तब सभासद् हाथ जोड़ के बोले महाराज आप तो सब न्याय युक्त काम करते हो? राजा ने कहा भाई विचारो तो, हम सब पाप रूप हैं; सो सुनो इस पर कथा मैं कहता हूं॥ सुनो एक समय में एक पुरुष का बड़ा रूपवान् अति गुणवान् पुत्र था, उसने तन मन से विद्या पढ़ कर सब प्रकार ज्ञान को प्राप्त कर के अभ्यास से विद्या का प्रकाश सब देश में कर के बड़ा यश प्राप्त किया। तत्पश्चात् उसने अपने पिता से विनय की कि-अब आप आज्ञा देवे जिससे मैं, देश देशान्तर में जा कर वेद धर्म का सब देश में प्रकाश करूं जिस से सब मनुष्य सुख पावें तब उस के पिता धर्मात्मा पुरुष ने उस को आज्ञा नहीं दी। तब--पुत्र ने हाथ जोड़, नम्रता से विनय--की महाराज सत्य वेद धर्म का प्रकाश तो सब देश में होना अवश्य चाहिये जिससे सब मनुष्य अपने-अपने धर्म को पहिचानें ॥ तब पिता ने अपने पुत्र धर्मात्मा से कहा कि सुनो॥ जो कोई किसी प्रकार का उपकार करे और उस के बदले में जो उस का बुरा करे सो सब जगत् पापी क्यों न कहे सो इस बात को विचार और धर्म का प्रकाश कभी मत कर, जो तू मेरा कहना नहीं मानेगा॥ तब पुत्र ने हाथ जोड़ कर कहा कि, हे पिता ऐसा अपराध मैं कदापि नहीं कर सक्ता जिस से आप अप्रसन्न होवें॥ तत्पश्चात् पिता ने कहा कि तू इस बात को अच्छी रीति से देख ले और विचार कर कि परोपकार न करना ही, अच्छा है इस बात को॥ धर्मात्मा ने कहा कि इस बात को प्रत्यक्ष रीति से कहो जिस से मैं समझू॥ तब पिता ने कहा कि तू जो सब धर्मों का ज्ञाता और धर्मात्मा है सो इस बात को भली प्रकार से समझ ले जिस से तुझ को ज्ञान हो जाय कि इस जगत् में सब कोई कृतघ्नी सब जगत् में ऐसा कोई न होगा जिस के साथ भलाई की जाय और वह उस के बदले में बुरा न करे सो इस बात को परीक्षा करके देख लेवेगा तब तेरे मन का भ्रम छूटेगा और तू अवश्य इस बात विचार को छोड़ेगा कि किसी परोपकार भी हो, क्योंकि इस जगत्--के सब मनुष्यों का मन पापयुक्त सदा रहता है॥ तब पुत्र ने कहा कि महाराज सत्य धर्मानुष्ठान को तो कभी भी नहीं छोड़ना चाहिये यह वचन सुन पिता ने, उस अपने पुत्र से कहा॥ विचार तो ऐसा जान कि तू जो काम करेगा उस का विपरीत फल होगा; क्योंकि संसार विषे सब लोग दुष्ट स्वभाव वाले ही पापी कृतघ्नी ही होते हैं अर्थात् धर्म को न मानेंगे, परोपकार को बुरा मानेंगे विद्याभ्यास को दुष्टकर्म ही जानेंगे सो तू क्यों व्यर्थ पुरुषार्थ करता है जिस बात में कोई भी फल सिद्ध नहीं होता; सो विचार करके बैठ जा विद्या का, विस्तार मत कर जिस से, सब जगत् तेरे पर भी कुपित हो, सो निष्फल बात है॥ तब उस धर्मात्मा पुत्र ने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की कि ऐसा कदापि न होना चाहिये, जिस से सत्य को छोड़ के असत्य बात को कोई माने वा सत्य धर्म काम न करे सो धर्म काम तो मैं सदा ही करूँगा जिस से परमात्मा भी मुझ पर प्रसन्न हो और इस जगत् का भी भला होवे; क्योंकि सब काम का दाता ईश्वर है, जिस बात को सब विचार कर के सत्य जानें; पिता जी ने यह सुन कर के, निश्चय जान लिया कि यह नहीं मानेगा, तब पिता ने उस को आज्ञा दी कि जा इस रीति से परीक्षा कर और जगत् का हाल प्रत्यक्ष देख सब मनुष्यों का स्वभाव तू आप ही जानेगा तब धर्मानुष्ठान का विचार अपने मन से दूर कर देगा क्योंकि जगत् का स्वभाव ही ऐसा है॥ पिता आज्ञा से उसने वन में जाकर देखा॥ एक बड़ा कूप सूखा हुआ था उस में देखा॥ बहुत प्रकार के जीव उस में पड़े थे॥ एक मनुष्य एक सिंह एक सर्प एक गिरगिट॥ 54