अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभगवान् श्रीरामचन्द्र जब वनके लिये जाने लगे तब कौसल्या अत्यन्त व्याकुल होकर रोने लगीं; कौसल्या माताने अपने श्रीरामचन्द्र को वनवासके संकटों की भीषण तथा भयङ्कर परिस्थिति बतलायी और समझाया तथा रोकने का अत्यन्त यत्न किया पर श्रीरामचन्द्र जी टसके मस नहीं हुए, अन्तमें जब माता यह कही; महाराज दशरथने वनवास दिया सो दिया, महाराज का सिर भारी लेकिन यदि दोनों मिलकर आज्ञा देते तो जाना ही पड़ता पर पिताने आज्ञा दिया लेकिन माता तो मना करती है, इस स्थिति में माताका आज्ञापालन ही श्रेष्ठ होगा तो श्रीराम ने माता को यह स्मरण करा दिया कि पिता माता दोनों प्रातः स्मरणीय हैं पर पिताका पद मातासे ऊँचा है। कौसल्या रोती, बिलखती रह गयीं व श्रीराम चले गये। कौशल्या अत्यन्त व्याकुली थीं पर फिर सोचा--नहीं ऐसा उचित नहीं, मैं भूल करके बैठी; यह सोचा और श्रीरामचन्द्रजीके वन-गमनका समाचार सुन-सुनकर विश्वामित्र जी--और वशिष्ठजीके आश्रम की ओर दौड़ी, जब वहां पहुंची आश्रम तो सन्नाटा; वहां कोई नहीं दिखा। सब दौड़-दौड़ कर व राम के आगमन तथा उनके अभिषेकको तैयारियों की बात सोचे, फिर जब उन्हें विश्वामित्रजी मिले तो कौशल्या रोने और चीखने लगीं; विश्वामित्रजी चौंक पड़े! कौशल्याने हाथ जोड़ कर विनय पूर्वक कहा किकेयीजी कौशल्या कौशल्या कहके विश्वामित्रजीके पैरों पर गिरतीहुई तथा उनके चरणों पकड़कर, कैकयीजीका हृदय एकदम पाषाण हो गयाहै, कैकेयी का हृदय तो पत्थर समान, जिसपर न दयाका असरहै नही पुत्रवात्सल्य का लेशमात्र प्रभाव हो सकताहै; कैकेयी अपने हठपर दृढ़है कौसल्याने इस प्रकारसे रोते रोते सब विश्वामित्र जीसे निवेदन किया, और हाथ जोड़ कर शीश को भूमि पर रखके प्रार्थना की आपके अनुग्रहसेही राम को यह सब विद्या प्राप्त हुईहै आपही रामको वन जानेसे बचासकते हैं। हे ऋषिवर, दयाके सागर हो विश्वामित्रजी कृपा करो; विश्वामित्र असमंजसमें पड़े; कौशल्या को समझाते हुए बोले कौशल्याने फिर सिर नीचे किया, विश्वामित्रके चरणामृतके स्पर्शमात्रसे ही वह जान गये की, सब संसारका नाश करने महापापी दशाननके पाप भारसे इस पृथ्वीको छुड़ानेके लिये, तथा उस राक्षस- कुलका संहार करने, समस्त धर्म, इस संसारमें फिर स्थापित करनेके लिये, यह सब लीला रचना स्वयं परमात्माके ही, उस परमात्माकी इच्छाके वश होकर घटित होरहाहै ऐसा सर्वज्ञ ऋषिवरने समझकर कौसल्याको इन सबको शान्त किया; विश्वामित्रने माता कौशल्या को समझाते हुए सब रहस्य कहा, सब विश्वामित्रके समझाने पर शान्त होकर माता को जब श्रीराम वनगमन का पता लगा तथा उन्होंने सीताजी को यह बात कही तो? माताने श्रीरामजीके चरणों को पकड़ कर इस बात का समर्थन न करते हुए सिर झुका लिया रोने लगीं? माताने श्रीरामजीके वन जाने वाली विपदा माता को जब मालूमहुई तब सीताजी व जनक--राज माताने कौसल्याजीसे मिलकर कहा, सीता कैसे जायेगी? कौन सा पाप किया था जो परमात्मा ने सीता को इस भांति दुःख देनेके लिये आज्ञा दे दिया? इस तरह की बात को सुन कर कौशल्या ने सीता को अपने पास बुला कर समझाया, तो वे दोनों जनकनंदिनी और श्रीराम को अपना सर्वस्व मान कर सेवामें लग गयीं, किसी का कहा--सुना अब काम नहीं देगा! इस तरह की बात जान करके व कौशल्या सीताके समक्ष खड़ी हो पश्चातापयुक्त होकर, सीता के माता पिताका स्मरण कर कहतीहैं यह सब मेराही किया हुआ अपराध है। कौशल्याने फिर सीताजी को समझाया कि बेटी तुम यहीं रहो राम अपने भाइयों सहित लौटके आ जायेंगे, कौशल्या माताने सीताजीसे अपने सम्बन्धित बातों को कह समझाना आरम्भकिया परन्तु सीता को तो अपने पतिसे जुदा होना मंजूर नहीं था? सीता को जब उन्होंने जाते देखा माताके नेत्रोंमेंसे अश्रुधारा-बहनेपड़ी, सीता को जाने पर कौशल्याने रोका, सब प्रकारसे धीरज दिया, सबने समझाया। तब सबने! माता कौशल्या को सब बातें समझायीं तथा उन्होंने सीता श्रीरामको सब प्रकारके आशीर्वाद दिये और फिर माता की चरण धूलीको मस्तकपर लगाकर श्रीरामजी सब लोगोंसे आज्ञा लेकर, वन प्रस्थानके लिये चल दिये सीताजी सहित लक्ष्मण, सीतासहित लक्ष्मण, श्रीरामजीके साथ अपने प्राणोंको समर्पित करते हुए वन गमन किये सब नगर वासी भी इन तीनों के साथ-साथचलने लगे रामने बहुत प्रकार से माता--पिता भाई को समझा बुझा कर विदा किया; पर नगर वासी लोटने, लौटने तैयार नहीं हुए! तब वे नगरवासी रास्तेमें ही जब सो गये तो श्रीराम जी चुपके से रथपर सवार होकर आगे बढ़ निकले, प्रात:काल होने पर जब जागे, श्रीराम, सीता, लक्ष्मण को न पाकर सभी विलाप करते हुए नगर लौटे। इधर तमसा तटपर पहुँचकर भगवानने सबको विदा कर दिया था। इसके आगे वे सब लोग चले और आगे क्या हुआ? तमसा नदी पार करके वे लोग शृङ्गवेरपुर आ पहुंचे जहां निषाद राज ने उन लोगोंका स्वागत किया तथा उस रातको वहीं वे विश्राम किये, प्रात:काल होनेपर वे सब गंगापार के किनारे पर पहुंचे जहां नाव पर चढ़, गंगा पार पहुंचे निषाद राज को, विदा कर आगे बढ़े और आगे--आगे भारद्वाज आश्रम पहुंचे! वहां श्री भरद्वाजजी ने उन सब का बड़ा सत्कार किया, राम को चित्रकूट पर वास करने का परामर्श देकर विदा किया; श्री चित्रकूट पर्वतपर पहुँचकर भगवान् निवास करने लगे, भगवान्के 60