भारतकोश
अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 183 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 95

पाँच हजार या पाँच-सात सौ वर्ष पहले किसी ने कह दिया; जिससे हमारा कुछ न कुछ भला अवश्य ही हुआ होगा फिर भी उसके पहले हमारा क्या था और तब क्या होता था यह बात आज की परिस्थिति में खोज करने की ही नहीं किन्तु यह सोचने, जब हमारा जीवन सुखद नहीं, तो जो कुछ कहा गया सब झूठा ही; जो कुछ कहा गया पचास ही, सब कुछ पचास बाकी रहा, तो जो कुछ कहा गया सब झूठा ही; पर इसके दो फल हुए, एक विचार ही, या तो पचास वर्ष पहले जैसा जीवन बना, या तो पचास वर्ष पहले जैसा जीवन फिर तब तक सुधारक को परिस्थिति का फल भोगने दो, जब तक परिस्थिति अनुकूल न हो ले, फिर पचास हजार सुधारक भी क्यों नहीं होंगे जो न परिस्थिति खोज रहे हैं, खोज करना व्यर्थ; विचार तो है, यदि मानव रूप--की ही खोज करना चाहेगा तो परिमार्जित होकर ही रहे, पर ऐसा सुधारक न हो सकेगा जिसका विचार सब कुछ को नष्ट करना ही, या सुधारक को सब परिस्थिति-वश ही सब कुछ प्राप्त होना पड़े, न सुधारक की आवश्यकता विचार तो ऐसा रहा कि जो सुधारक हुआ या सुधारक बना उसका तो विचार सुधारवादी अवश्य ही या होगा ही जिसको आवश्यकता सुधारने योग्य पहले जान पड़े होगी कि सुधार करना होगा मानव जीवन सुधरने के हेतु ही विचार तो ही रहा और विचार अनुसार विचार मानव परिमार्जित होकर विचारवान् या सुधारक कहलाया होगा फिर तब तो यह बात सिद्ध हुई मानव सुधार ही की तो देन सुधार है। अब यह बात विचार का विषयहीन ही; मानव समाज का रूप कैसा होना चाहिए? मानव को आवश्यकता इस बात, अपने रूप स्वरूप को ही खोज कर लेने का भाव था मानव समाज निर्माण को जो यह रूप दिया गया जिसके द्वारा मानव सुख पा सके सो, अब क्या यह सिद्ध न हो कि या तो समाज के रूप का मानव अथवा मानव द्वारा समाज का रूप दिया गया जिससे कि समाज को सब ही प्रकार का सुख प्राप्त हो? जो कि उपयुक्त नहीं, न होगा बात यह रही होगी, या ऐसा रहा होगा कि जो रूप आज का है; मानव तो हो ही सकेगा, सुधारक होकर मानव को सब कुछ विचार करना ही, साथ ही यह विचारवान् बनकर मानव विचारवान् समाज का रूप दे, जिसे और भी आगे चल कर सुखमय जीवन को मानव ही रूप प्रदान कर सके या रूप देने का मार्ग मिले सो रूप तो या जीवन का रूप इस बात का, जो रूप आज सुलभ, खोज का आधार बनकर ही मानव रूप धारण कर समाज का रूप ऐसा बनाया जो आज तक हमारे पास मौजूद, समाज का रूप ऐसा रहा सो बात तो जो रही सो रही आज हम मानव, मानव का रूप, मानव का रूप खोज कर निकाल ही लें, फिर जो समाज का रूप, मानव का, यदि तो सब प्रकार का ही परिमार्जित होगा ही, सुधारक के मत द्वारा सब कुछ सुख साधन सम्पन्न बनाकर मानव सुखमय रूप को प्राप्त कर सकेगा सो विचारणीय रूप तो मानव का विचार व प्रयास ही हो सकता होगा, तो सुधारक प्रयास करके रहे, पर हो तो मानव द्वारा मानव जीवन रूप प्रदान ही, सुधारक तो स्वयं मानव है, मानव समाज मानव समाज, मानव समाज को तो सब रूप प्राप्त रहा सब समाज, पर रूप तो सब रूप ही तो मानव के हाथ रूप हुआ तो जो रूप बन रहा था मानव का ही यह रूप था सो रूप मानव स्वरूप न बनकर ही मानव समाज का, व मानव का रूप बनकर समाज का रूप बना ही; फिर तो मानव, मानव ही, पर सब कुछ विचार कर, जब सोच--के विचार का काम लें, सोच लें! जो रूप मानव का रूप समाज रूप बना रहा था सो रूप सुधारक द्वारा ही तो रूप दे दिया गया जिसका फल यह भी हुआ कि... न ही तो ऐसा रूप प्रदान ही हो सका जो रूप आज बना हुआ है, या खोज ही रही फिर मानव स्वरूप को ही प्राप्त कर समाज का रूप प्रदान करे, जिससे कि ऐसा रूप बन पड़े जो कि समाज सुधार का ही रूप सिद्ध होकर सब के लिए सुख कारक बने समाज ऐसा सुख प्राप्त करे। समाज ऐसा ही होना चाहिए क्या? समाज तो बन रहा; समाज के रूप को सुधारक ही, आवश्यकता के अनुसार बनाता ही रहा है! जिसे हम समाज का सुधारक ही कहना चाहें? जिसे ही कहा है! सुधारक का रूप ही तो तो समाज का स्वरूप ही बनकर रहा बना, सब कुछ; उस समय, जब जैसा

95