अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार जीव, जो अनादिकाल से कर्म सहित मोह रूपी निद्रा में सो रहा था सो वह चेतन रूप हो गया और उसका अज्ञान नष्ट हो गया कि यह आत्मा व शरीरादिक जुदा हैं! सो सम्यग्दर्शन को जय! सर्वोत्कृष्ट पद केवल ज्ञान को जय क्योंकि केवल ज्ञान न होता अथवा सम्यग् दर्शन न उपजता तो संसार रूपी घोर संकट सहित यह जीव नरक, तिर्यंच रूप कु योनियों में भटकता रहता? सो इस पर से सब ज्ञानी जन को चाहिए कि सब ओर से मन हटाकर आत्मस्वरूप चिन्तवन करें! तब ही इस पावन नरभव का, व उत्तम कुलका मिलना सफल कहावेगा! इसमें ऐसा जानना कि, केवल ही से ही संसार का नाश केवल ज्ञानी बिना कोई भी जीव मोक्ष को नहीं पा सकता, इस--लिये सर्व प्रकार केवल ज्ञान सर्व--उत्कृष्ट मोक्ष रूप है। हे भद्र! तू समझ अथवा न समझ इस आत्मस्वरूप को ग्रहण करेगा; व ग्रहण न भी करे तो नरक में पड़ेगा; हे भाई, संसार में रहकर यह दुष्ट कर्म हम सब जीवों को अनेक प्रकार के दुःख देता है और देता रहा सो यह भी सब मन की ही चाल है सो इसको दूर--कर उत्तम पदका लाभ प्राप्त कर सवैया इकतीसा आत्मा व केवल ज्ञान सम्वन्धी एक ओर सब संसार, ज्ञान स्वरूप संभार सो यह ही मन सब का कारण है। जिस में मन को ही सब का कारण कहा गया है सो व्यावहारिक मात्र ही का मन सब से श्रेष्ठ नहीं है किन्तु जब कि केवल ज्ञानी जीव को ध्यान के बल--द्वारा ही, मन से रहित हो कर ही सब केवल ज्ञान प्राप्त हो कर केवल ज्ञानी होना कहा गया! वास्तवमें ज्ञान ही केवल वा सब का कारण वा ज्ञान ही का फल--ज्ञान का स्वरूप है, ना ज्ञान से अन्य रूप वा अन्य का वा संसार का कारण है; सो पाठक भी ध्यान रखें सो व्यावहारिक वा अशुद्ध रूप निश्चय व्यवहार ज्ञान ही का फल मुक्ति नहीं किन्तु केवल ही का वा शुद्ध निश्चय ही सर्वोत्कृष्ट एवं मोक्षका फल देने वाला उत्तम सम्यग्ज्ञान होता हुआ मोक्ष प्रदायकरूप कहा गया सो सब भव्यजीव इस बात को समझें कि, यह सब, जो ऊपर लिखा गया सो सब मनके ही निमित्त मात्र होने कारण कहा गया इतर सब मन से भिन्न स्वतः सिद्ध सब आत्मा ही ज्ञान--का फल मोक्ष रूप सुख स्वरूप स्वाधीन है आत्मज्ञान, आत्मचिन्तवन वगैरह सो केवल ज्ञान वास्तवमें ही सबका कारण, यह कहने का तात्पर्य यह कि केवल ज्ञान ही प्रधान वा उत्कृष्ट पद सब ज्ञानों में, इसीलिए केवल उप--निषद्ज्ञान तत्वज्ञान को कहा गया फिर केवल ज्ञानको आत्मा का ज्ञान रूप ही, कहा गया जिसका अभिप्राय यह हुआ कि ज्ञान स्वरूप ही सब का कारण स्वरूप परमात्मा ज्ञान ही परमेश्वर सर्वज्ञ सर्वदर्शी परमात्मा है, जिस से संसारिक प्रपंचका नाश होता कहा पद नवां पूर्ण
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