भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 322 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 115

कहावत सुनोगे? कहावत सुनोगे? अरे बाबा शांत वातावरणमें शांति मिलेगी या फिर होटल जैसे या बाजार जैसी जगहमें या फिर इस तरह मंचपर या फिर इस तरह का कोई शोर-शराबा होनेवाली जगह पर? उसने झटपटसे हां, आसपास बैठकर जितने लोग बैठे हुए थे सब का सब ने एक साथ बोलना प्रारंभ किया या किसी जगह-जगह अपने विचारको एक समय पर ही सब ने शांत वातावरण में बैठकर बोलने लगा तो शांति से कैसे सुन पाएंगे? फिर उन्होंने क्या कहा? शांत हो जाओ महाराजजी? फिर जगह-जगह परस्पर वार्तालाप बंद, लेकिन बीच में अचानक हां, हे प्रभु जी, हे शरण में आए हुए को कभी त्याग देंगे? फिर बोलने का मौका? यह वचन तो बराबर उस समय चल रहा था जब रामचंद्रजी विभीषण को आश्रय दे रहे उस समय में विभीषणजी आए थे पर जो इसके सामने खड़ा होकर बोलता गया और सम्भाषण समाप्त न करते हुए निरंतर ही अपने इस प्रकारके वातावरण को शांत बनानेके अभिप्रायसे जो उसने ऐसा कहा तब वहां जितने लोग बैठे थे उनका ध्यान उस ओर चला गया और सब के सब ने एकदम से शांत होकर अपने कान खड़ेकरके, सुनकर शांत रहो, शांत! ऐसा एक बार बोलने मात्रसे शांत होकर सब लोग इस प्रकार शांत हो गये मानो कोई जीवित व्यक्ति वहां पर मौजूद ही नहीं हो ऐसा प्रतीत होता? फिर उन्होंने दो शब्द धीरे--से बोलना प्रारंभ किया जिस प्रकार आज दिनमें दो--तीन बजके करीब में? शांत होकर बोला हां, मंदिर का द्वार खोला; मंदिर का द्वार खोला; तब तक शांत होकर देखने पर सब लोग ने मंदिर द्वार की तरफ ही देखा, फिर तो भगवान् के सम्भाषणको सुन ही ना सके और सब लोग न जाने कहां से आए हुए एक भगवान् मूर्ति जैसी देखकर सब लोग शांत होकर फिर भगवान् के सामने नतमस्तक हुए और कहा, इसके पश्चात महाराजश्री, आचार्यश्री विद्यासागरजी के ही वचनोंको हम सब लोग सुन न सके इस संभाषणको हम सब लोग सुन रहे और जब तक शांत ना बैठ पाए तब तक हां, पर इसके दो दिन पहले की बात याद आ रही थी, इस कारण सब लोग घबराए, उस समय सब के मन यही चल रहा था कि उस समय न भगवान् की प्रतिमा का दर्शन होने पाए और नहीं भगवान् के चरणोंमें हम जा पाए न भगवान् रक्षा स्वरूप कुछ कह पाए या कुछ सुन भी नहीं सके। अब महाराज इस भगवान् रूपी तन-मन रूपी इस नए भगवान् सम्भाषणको जन-जन तक प्रचार करने का तो मन ही रहा है? किस वातावरण में रख कर यह सबको यह बात याद आवे जिससे कि सब लोग यह बात का ध्यान रख सके पाए? तो वो वक्तागण जो थे उन्होंने, सब को शांत वातावरण का पाठ पढ़ाया जिसका मुख्य उद्देश्य यह था कि शांत रहकर जिस तरह भगवान् को याद किया, उस प्रकार सब लोग, शांति को धारण ही करना है, तो मन को तो पहले शांत करना ही होगा, तो किसी प्रकार चित्त एकाग्रता को प्राप्त करके फिर शांति मिलेगी, उस समय शांत होकर सभी लोग अपने को संभाल तो रहे थे पर भगवान् स्वरूप वाणीको सब लोग सुनना चाहते थे, इसलिए सब लोग शांतचित्त होकर बैठे, पर वो सोच रहे थे जिस तरह से भगवान् प्रतिमा के मुखकमल शांत रहता है उसी प्रकारसे, वो लोग शांत बैठे थे लेकिन, मन में किसी प्रकारका विचार आ रहा था, कि एकांत में बैठकर ही सारा समाधान संभव हो सकता है। एकांत ही ऐसा माध्यम बन सकता है, जिससे सब लोग शांतचित्त होकर ज्ञान की पिपासा को बुझा सकें और ज्ञान प्राप्त करके अपने जीवनको धन्य कर सकें इस बात को सुनकर सब शांत हो गए। इस प्रकार जो विचार कर शांति स्थापना का उपदेश आचार्यश्री द्वारा दिया गया वह सबने बड़े ध्यान पूर्वक सुना था, और सबने इस निर्णय को माना भी, कि वाणी को, या चित्त वृत्तिको एकाग्र, या शांत रखने से सब समस्याका हल हो सकता तथा एक बात यह सब लोग जान सके जिससे आत्मा का उद्धार हो, जिससे ज्ञान की वृद्धि हो सके और मन एकाग्र होकर एक रूप हो सके जिससे, ज्ञानकी धारा, प्रवाहित होकर, अज्ञानान्धकार दूर हो सके, ऐसा ज्ञान सब लोग, प्राप्त कर सके। सब लोगोंने शांत हो कर इस प्रकार उपदेशको मनमें भरा, कि सब लोग शांत हुए। इसलिए आचार्यश्री हमेशा सब को शांत वातावरणका पाठ जो पढ़ाते उसका प्रभाव सब लोगों पर बहुत पड़ता था, शांतिका प्रसार हो, वातावरणमें शांति बनी रहे इस प्रकार की कार्यप्रणालीके द्वारा सब लोग एक ही सूत्रमें बंधकर इस वातावरणको शांत रखने लगे जिस से, समाज में इस रूप से शांति का विस्तार हो सके, तो यह उचित रहेगा? 115