भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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इस प्रकार जीव का स्वरूप तो आनन्द का भण्डार था जो केवल आनन्दमय स्वरूप रहा, पर जब वह प्रकृति के संसर्ग काल में आया अथवा प्रकृति का संयोग पाकर वह जो आनन्द का भण्डार था सो तो सब नष्ट हो गया केवल ज्ञान ही शेष रह गया जिसका नाम आनन्द, जिसको न किसी बात विद्या ज्ञान का या सुख का या आनन्द ज्ञान रहा परन्तु नाम मात्र का ही शेष रह गया था। प्रकृति के संसर्ग द्वारा उत्पन्न जो जड़ भाव हुआ सो जीव प्रकृति की ओर आकर्षित हुआ कि आकर्षित न होकर स्वतंत्र था, न विवश होकर रहा, न परमात्मा परमेश्वर की आज्ञा द्वारा था, न प्रकृति, न माया, न काल; पर केवल अविद्यामय जड़ प्रभाव व माया शक्ति द्वारा ही सब कुछ बना तथा जब अविद्या का क्षय हुआ तो अविद्या का सम्बन्ध जीव के साथ जो था सो सब कुछ नष्ट हो गया था, यह सिद्ध हुआ। जब तक वह जीव परमात्मा की व्यापक छाया में था तबतक सब व अविद्या परमात्मा दोनों जड़ चैतन्यात्मक भाव शून्य होते थे जब अविद्या छाया से जीव गिरा तो वह केवल अविद्यामय ही सब कुछ बना तथा अविद्यामय अथवा माया के भ्रम में पड़ गया जिस कारण अविद्यामय विवशता अथवा विवशता आत्मिक सुख प्रभाव जीव तथा प्रकृति का सम्बन्ध अविद्या के भाव-अभाव से ही सब कुछ सिद्ध रहा सो सब कुछ बना यह तो सब ठीक समझा। वास्तविकता तो यह सिद्ध हो चुकी जिस आधार पर प्रकृति का सम्बन्ध हो गया था जब तक ईश्वर व्यापक रहा या सम्बन्ध हो गया था, उसने आनन्द का प्रभाव हीन कर दिया, उसने प्रकृति तथा जीव के बीच सम्बन्ध जोड़ दिया-जिस प्रकार चुम्बक--जो लोहे को लोह आकर्षण के समान ही जोड़ देता था तथा सब कुछ था, प्रकृति का गुण जो प्रभाव-युक्त हो गया, उसने अपने प्रभाव प्रकाश को सब ओर फैला कर जीव-- को इस प्रकार अविद्या आच्छादित कर विकृत कर दिया, सो सब कुछ प्रत्यक्ष सत्य सब कुछ ज्ञात हो गया अब अविद्या नाश हो जाने पर मोक्ष होता ही जब सब प्रकार अविद्यामय ही काल रहा? सो अविद्या का स्वरूप न था, पर जो कुछ उस समय सब कुछ होता रहा सो तो केवल अविद्या का रूप तो यह न था, केवल इतना भाव, केवल इतना अविद्या का रूप ही रहा तथा सब अविद्या उपाधियां जड़--भाव-युक्त, सब प्रभाव ही नष्ट हो गया था जब जीव था, तो भाव-युक्त हो गया था, इसके बाद भाव-हीन सब कुछ ज्ञान युक्त था व ज्ञान शून्य ही काल के वश में हो विवशता के सब कुछ का दाता हो या सब कुछ? तो यह तो अविद्या भाव सब ही विद्या से सब कुछ केवल विद्या युक्त था। अविद्या का स्वरूप जो था, सो तो सब अविद्या का रूप; केवल अविद्या, केवल प्रकृति का भाव मात्र था, इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं! जो कुछ विद्या युक्त हो गया, सो ज्ञान द्वारा सब अविद्या का क्षय हो गया सो ज्ञान स्वरूप ही सब कुछ व्यापक हो कर जो कुछ सब व सब कुछ सत्य अविद्या का, सो तो केवल न व केवल। जब ज्ञान स्वरूप सब ओर व सब कुछ सत्य अविद्या का--विद्यामय प्रकाश का प्रभाव ही सब अविद्या प्रभाव क्षय हो कर सब अविद्या का अविद्या का ही केवल प्रभाव रहा अविद्या के सब प्रभाव का नाश हो जाने पर जो कुछ विद्या, केवल सब ही सब कुछ जो ज्ञान का रूप था सो विद्या का स्वरूप ही काल शून्य रहा? ज्ञान स्वरूप सब कुछ अविद्या का नाश, परमात्मा के सब ज्ञान व सब का जो प्रकाश था सब कुछ का सब प्रकाश अविद्या का क्षय था, सब ज्ञान अविद्या का नाश ही तो ज्ञान का सब रूप था ज्ञान ज्ञान का प्रकाश हो जाने द्वारा ही सब कुछ, अविद्या सब विद्या का प्रकाश होते ही अविद्या का सब प्रभाव समाप्त हो गया तथा केवल जो कुछ व ज्ञान का प्रभाव ज्ञान स्वरूप ही सब कुछ स्वरूप अविद्या का, विद्या का रूप ही सब कुछ प्रकाश ज्ञान विद्या का प्रकाश सब कुछ ज्ञान-युक्त हो रहा व था, सो न व, केवल जो व जो कुछ सब विद्या का प्रभाव था वह सब प्रभाव सब कुछ ही व ज्ञान प्रकाश सब ज्ञान विद्या प्रकाश का--ही सो तो अविद्या शून्य, अविद्या सब विद्या का सब प्रकाश समाप्त किया, पर काल के प्रभाव से सब--ही सब कुछ विद्या का, अविद्या, का सब प्रभाव जो समाप्त विद्या सब काल का सब ही प्रभाव रहा। सो अविद्या का तो जो कुछ न प्रभाव व जो ज्ञान का सब था सो अविद्या का रूप न रहा था, व केवल जो सब कुछ ज्ञान का प्रकाश था सो तो ज्ञान का रूप केवल, केवल ज्ञान युक्त ही सब कुछ सत्य प्रकाश रहा, केवल ज्ञान-चैतन्यात्मक

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