भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 322 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 119

इसलिए बार-बार समझाया जा रहा-था। संसार में रहकर ही मुक्ति का उपाय ढूँढ लो अन्यथा यह तन छूटेगा ताके, फिरि चौरासी न ॥ भाई, नर देहिया का न भरोसा पाछे परिहै काल की फाँसी पर नर देहिया मिलेगी नहीं। जब तक यह नर देह मिली हुई तब तक अपने लक्ष्य को तन से लगा लो भाई, नर देहिया फिर नहीं मिलनी है। फिर तो चौरासी की फाँसी में बंध कर चले ही जाओगे और फिर सब का सब माया के चक्कर में फँसोगे। जो मनुष्य देह मिला हुआ सब कुछ तो इसी में ही सब कुछ मिल सकता था। जब नर देह ही नहीं तो फिर क्या? फिर काल चक्र घूमता ही ही ही रहेगा। चौरासी चक्कर लगा ओ! इस शब्द पर सन्तमत व्याख्याता स्वर्गीय श्री तुलसीदास जी का कहना बहुत ही सुन्दर व सार युक्त विचारणीय रहताथा- "जिस मनुष्य रूप को, जिस मनुष्य शरीर जैसी अमूल्य वस्तु को सब ही शास्त्र ग्रन्थ उत्तम मानते हैं। मन को सब से श्रेष्ठ मान कर मनुष्य को मुक्ति का साधन, भगवद् का वा परमात्मा प्राप्ति का साधन मान कर साधन का ऐसा अमूल्य नर देह दिया जिसमें न तो शक्ति की कमी थी और न बुद्धि की। जहाँ मनुष्य अपनी समझ से काम ले सकता था। जिस देह से परमात्मा को भी वशीभूत कर सकता था। जिस नर देह से ईश्वर को जाना जाता था और उस नर देह को, जो इतना सब कुछ कर सकता था। बिना किसी खास उद्देश्य के यों नष्ट समाप्त किया जाय? जरा सा तो सोच देखो, बार-बार चेतावनी सब सन्त महापुरुषों ने दी कि यह देह, इस देह को ऐसे न गंवाओ।" बात ठीक, विचार कर सब कुछ किया जा रहा था। जब तक सन्त उपदेश दे रहे थे समझाते थे, विभिन्न दृष्टान्तों से समझाते सब अपनी समझ लगा रहे थे कि हां, सन्त ठीक समझा रहे हैं। सन्त रूपी गुरु शिष्य के हृदय रूपी कली को खिलाना आरम्भ करते हैं। जब तक कली बन्द है, तब तक ज्ञान रूपी पुष्प की महक नहीं आ रही है पर जब कली खिल जाती है, तो सब ओर महक फैल जाती है। सन्त भी यही चाहते हैं। सब को, मानव-मात्र को, सब के घट में, सब के हृदय में सतगुरु परमात्मा का ज्ञान जो प्रकाशित हो तो यह ज्ञान अन्धकार को हर लेता संसार के सब, प्राणी, जन... ॥ सब तो समझ में आनी वाली बातें हैं। समझ सब कुछ सकते हैं। पर फिर भी ना समझ सा व्यवहार करते हैं। जो बातें मानव को घट रूप दीपक प्रज्वलित कर दी जाने योग्य बना रही हैं। उन सब का प्रभाव उल्टा क्यों पड़ने लगता? इसका एक मात्र कारण यह हो सकता है कि, मन का सब कुछ विपरीत ही दिशा जाना था, मन का क्या भरोसा? इसका क्या विश्वास? मन सब को भर मायेगा ही। मन का भरोसा ही सब को संसार की ओर खींचता चला गया। इसका क्या उपाय सोचा जाय जिससे मन को वश में किया जाय? संसार के सब बन्धन, मन द्वारा बाँधे जा रहे थे। मन के नियन्त्रण के लिए केवल ही सतगुरु का नाम ही काम आता देखा गया, पर जब तक जीव सतगुरु वचनों की ओर ध्यान नहीं दे रहा होता था तब तक समझ में आ भी रहा होता था पर मन विचलित कर देता था। सन्त गुरु समझा रहे थे कि, सतगुरु का, सन्त-गुरु का ध्यान मन द्वारा किया जाय। सतगुरु नाम रूपी मन्त्र... का! जो मन बार बार हर ओर भाग रहा, भटकाव में पड़ भटकता फिर रहा था उस मन को बाँधने के लिए केवल सतगुरु नाम ही होगा? इसलिए जब भी मन का ध्यान लगाया जाय तो पूरा-पूरा ध्यान केवल सतगुरु नाम में पर होना चाहिए। ध्यान की सफलता के लिए ही तो मन को एकाग्र कर सब का सब कुछ स्मरण किया जाता केवल नाम का ही स्मरण करने से क्या सफलता मिलेगी? जब तक मन केवल सतगुरु के ध्यान में एकाग्र न हो जाये? केवल मन को नाम द्वारा साध कर क्या होगा? मन का क्या स्वरूप? जिसे सब ओर से मोड़ कर मन को केवल नाम रूप मन्त्र में एकाग्र करना पड़ा था। स्मरण करने के लिए जब सन्त महापुरुषों से प्रश्न किया गया तो उ त्तर, सन्त-गुरु ने स्पष्ट कर समझाया कि मन विकार रहित होकर केवल ईश्वर नाम में ही ध्यान लगावे, तो संसार व सब विकारों से छूट कर, मन का भटकाव सब दूर हो जाता तथा, नाम स्मरण करने का अवसर आ ता, जिससे मन, सब ओर से हट, केवल परमात्मा का, प्रभु नाम, रूप का स्मरण ही ध्यान में लाता, जिससे नाम का ही सिमरन हो 119