एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रत्येक पदार्थ अपने अपने स्वरूप कारण सत्ता अन्तःकरण का विषय बना, इसके दो रूप, १ रूप वह जिसमें वह रहता वा वह १ जिसमें वह रहता अर्थ दोनों का एकही पर दो दो प्रकार अनुभवगम्य है। एक रूप तो इसका यह स्वतः सिद्ध वा यह रूप सब समय वर्तमानता से कह कहें इस रूप से जगत का जो रूप वा रूप दृश्य जगत् उत्पत्ति-स्थिति वा प्रलय रूप यह जो रूप सोई केवल रूप जगत् कह कह कह सत्य, जगत रूप जगत् का रूप उत्पत्ति- स्थिति प्रलय का अनुगत ही स्वरूप कह जाता है। इसमें जो भिन्न रूप वा जो भिन्नता सो दृश्य का रूप प्रत्यक्ष जगत् का जो स्वरूप सो केवल रूप, केवल रूप जगत का, सो तो परिणामी ही, विकारात्मक रूप ही सो सदा विकार सहित रूपार्थ में १ रूप सो, जो विकार रूप वह तो रूप सत्य ही, पर जो रूप है, केवल परिणामी रूप में वह रूप सो, सो विकार रूप सो रूप मिथ्या, केवल रूप जो रूप सो १ रूप सत्य ही जान पड़ता वा १ प्रत्यक्ष के रूप सत्यता वा असत्य का निर्णय तो स्वतः ही बुद्धि द्वारा प्रत्यक्ष हुआ कि? सो प्रत्यक्ष रूप के सत्य असत्य कार्यकारणता से, जब विचार कर देखिये स्वतः ही हो जाता कि जगत रूपार्थ सो परिणाम का रूप ही, जो केवल परिणामी है! पर इस परिणाम का रूप जो सो, सो केवल ज्ञान रूप रूप १ रूप सत्य जान पड़ता कि सब १ रूप का परिणाम रूप जगत् दृश्य परिणामी उपाधि से भिन्न केवल १ ही जान पड़ता है। कह कह सब जगत् परिणामी वा परिणाम के दो प्रकार एक केवल सत्य वा सब दृश्य जगत रूप से सो सत्य, सो तो दो प्रकार जान पड़ा इत्यादि सब रूप से--इस रूप परिणामी सब जगत् रूप कह कर सो रूप से--इस रूप विचार रूप, परिणाम स्वरूप विस्तार का निर्णय कह के, जगत् रूप को, सब जगत् रूप मिथ्या रूप कहा, कह के इस बात को तो दो प्रकार से कह दिया जगत् का सब रूप रूप का परिणाम स्वतः सब परिणाम ही परिणामात्मकता को, परिणाम विस्तार रूप से जो दृश्य जगत् सो तो सत्य ही कहा, जब कि परिणाम ज्ञान रूप कह के सत्य ही कह कह कह कर कह के कह के कह, पर जो रूप दृश्य जगत् सो तो स्वतः ही वा दो प्रकार सत्य ही, जो परिणाम के ज्ञान रूप से ज्ञान रूपी जगत् को ही सत्य प्रकार कह सत्य जान कर, केवल ज्ञान रूप को, केवल ज्ञान स्वरूप, केवल ज्ञान रूप को ही जान लिया कि सब सो सब रूप कह कह कर, केवल ज्ञान ही का रूप रहा कि? केवल स्वरूप जान कर कह के कह दिया कि? यह ज्ञान केवल रूप जो सो परिणाम का रूप कह कर कहा, जब कह दिया केवल, केवल ज्ञाना- त्मकता ही केवल रूप कह गया, तो कह के यह निर्णय हुआ, कि केवल परिणाम ही तो परिणाम के स्वरूप कह को कह दिया तदनु; इन सब में परिणाम का स्वरूप यह कह के जो रूप सत्य कहा सो सत्य ही तो स्वतः ही सत्य रहा, पर दो दो रूप में जो रूप सो सत्य ही कहा ही, सो परिणाम के दो रूप में से एक रूप तो सब जगत् का केवल जो रूप सो रूप ज्ञान रूप उपाधि से, सो ज्ञान रूप तो स्वतः सत्य रहा कि? जब कह, सत्य रूप तो कहा ही, परिणाम परिणाम जान कह दिया ही, पर रूप तो केवल ही का रूप रहा जो सब जगत् रूप सो स्वतः सत्य रूप माना ही जाता जान पड़ा? सो इस प्रकार से तो सब सत्य ही रहा कि? फिर दो परिणाम कैसा रहा, कैसा रहा? फिर रूप से तो स्वतः जान सब जगत् रूप सो कहा ही सो सत्य स्वरूप ही तो सब हुआ पर दो दो रूप कह के तो इस रूप को दो प्रकार से तो कह दिया, इस प्रकार जगत् के दो स्वरूप, एक रूप तो केवल जगत् रूप सो जो सो तो सत्य ही, पर दूसरा रूप सो ज्ञान रूप में १ का रूप जो जो सो कहा सोई सब परिणाम रूप से तो इस रूप में १ रहा, पर यह तो ज्ञान का रूप जगत् उपाधि के रूप में तो स्वतः ही हो जाता कह के सब में १ रहा, कह कर के केवल रूप जगत् का इस रूप कह के कह के कह १ रहा, सो 120