एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमाज अथवा राष्ट्र का कल्याण व्यक्तिगत या समूह विशेष द्वारा किया जाना संभव है, क्योंकि ऐसा काम तो समूह ही कर सकता अथवा समाज ही, दोनों का रूप भिन्न नहीं। समाज संगठित हो; प्रत्येक व्यक्ति की शक्ति को, चाहे वह एक छोटा सा तिनका क्यों न हो एकत्र कर दिया, किसी बड़े काम में लगा दिया जाए तथा उसका कोई लक्ष्य निर्धारित कर दिया जाए, फिर तो संभव क्या नहीं। समाज का प्रत्येक अंग अपने हित का बलिदान देश या राष्ट्र के हित में करने को उद्यत हो जाए तभी ऐसा किया जा सकता है। व्यक्ति का बलिदान यदि समाज के लिए आवश्यक समझा जाए तो वह भी किया जा सकता है। जिस देश अथवा समाज के पास इस प्रकार की निस्वार्थता आ गई वह देश या राष्ट्र कभी पीछे नहीं रह सकता। राष्ट्र निर्माण तथा प्रगति व्यक्ति- स्वतंत्रता पर ही निर्भर नहीं, व्यक्ति के चरित्र निर्माण पर भी निर्भर करती है। समाज अथवा देश स्वतंत्रता तभी तक सार्थक है, जब तक वह देश अथवा समाज के विकास तथा सुरक्षा में योग दे सके। अतः, हर व्यक्ति को अपने चरित्र निर्माण का प्रयत्न करना चाहिए ताकि वह देश की रक्षा कर सके, न कि केवल अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए लड़े। अधिकार तथा कर्त्तव्य का चोली- दामन का साथ माना गया है। व्यक्ति यदि कर्त्तव्य समझे, तो उसे उस बात का भी अहसास "कर्त्तव्य--निष्ठा, त्याग, कर्त्तव्य--ही ऐसा पथ है जिस पर मानव चलकर अपने साथ समस्त मानव बिरादरी का भी कल्याण करता है।" एक आदर्श समाज तथा राष्ट्र केवल कर्त्तव्य पथ निर्मित समाज या संगठन अपनी शक्ति का अहसास जब किसी को करा सकता है अथवा देता है, तब यह डर, भयभीत हो जाता है, जब वह इस बात को सोच समझकर निर्णय पर पहुँच जाता, कि अब उसकी शक्ति का कोई मुकाबला या तोड़ सामने आ ही नहीं सकता, तो वह निरंकुशता का शिकार बनकर इस बात सोच, या समझ कर, अपनी शक्ति द्वारा ऐसा काम करने लगे, जो समाज या किसी व्यक्ति पर ही बुरा प्रभाव डालता हुआ हो, अत्याचारी बन कर सामने आए तथा दूसरों अपने शक्ति, के बल अथवा प्रभाव का भय दिखाकर बुरा प्रभाव करने लगे अथवा, हर काम मनमानी या गुंडागर्दी पर उतरकर धन का संग्रह या संचय करने लगे, अपने प्रभाव द्वारा धन संग्रह करने लगे शक्ति व धन के बल पर अनिष्ट कार्य, या अन्य किसी का हक छीनने लगे अथवा दूसरों हक को मारकर, दूसरों का अपहरण करने लगे अथवा किसी को मारकर धन छीन शक्ति मद में चूर होकर, अपनी शक्ति का अहसास भय दिखाकर या आतंक फैला कर हर प्रकार से नाजायज लाभ उठाना चाहे या अन्याय ही करने लग जाए तो ऐसे काम समाज में फूट का कारण, या इस बात का अहसास पैदा कर देगें, फिर उस संगठन अथवा समाज को न केवल आघात पहुँचेगा बल्कि उसका अंत निकट आया ही समझना चाहिए। जब भी शक्तिमद या फिर घमंड के कारण किसी संगठन अथवा किसी व्यक्ति में ऐसे गलत आचरणों का जन्म हुआ, तभी से उसके पतन की दिशा आरंभ समझ लेनी चाहिए फिर वह पतन, तो होकर ही रहेगा प्रगति किसे कहेंगे? आज उपभोक्तावादी युग में मानव केवल धन, वैभव की लालसा लिए काम करता जा रहा है। जिसके बल तथा प्रभाव से वह सब कुछ पाना चाहता तथा पा भी रहा है। भौतिक संपन्नता ही सब कुछ बन गई। केवल मानव धन को ही सब कुछ मान बैठा तथा धन की प्राप्ति करना ही उसका एक मात्र ध्येय बन कर रह गया। प्रगति किसे कहा जाए यह एक प्रश्न बन गया है, जब तक मानव का मन तथा आत्मा प्रगतिशील तथा शांत नहीं होगी तब तक मानव की यह भौतिक सुख तथा ऐश्वर्य संपन्नता किसी भी काम की नहीं। प्रगति--प्रगति, धन की प्रगति नहीं बल्कि आंतरिक पवित्रता तथा समत्व भाव से है। आज का धन तथा अर्थ-लोलुप मानव केवल मात्र भौतिक सुख की दिशा में अग्रसर होकर प्रगतिशील तो हो रहा है पर वह इस बात को भूल गया है कि वह केवल धन व साधन भर जुटा कर आज वास्तविक सुख तो प्राप्त नहीं कर सकता, न ही आंतरिक, परम शांति सुख-शांति प्राप्त कर पा रहा है, बल्कि धन के साथ या तो उसका अंत हो रहा है, या फिर अशांति तथा चिंताएं चिताएं, बन कर आघात कर रही हैं, जिससे उसका सारा जीवन दुख मय बन गया है। आज तक धन से किसी को स्थायी सुख तथा शाश्वत शांति नहीं मिल सकती। यह बात तो केवल त्याग तथा प्रेम के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है। जब तक मानव के दृष्टिकोण में बदलाव नहीं आ जाता तब तक वह न तो शांत रह सकता और न ही मानव जाति का कल्याण ही कर सकता है। जब तक मानव केवल अपने स्वार्थ के लिए जिए जा रहा है, वह कभी भी सुख से नहीं रह सकता, जब मानव केवल अपने लिए ही न जी-कर समाज तथा जन हितकारी काम करता है, तब उसका जीवन, मानव 147