भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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॥ श्री भिक्षु यशोवर्मा ॥ चौथा खण्ड भिक्षु पद सन् देश वास प्रकाश

ढाल 27 नर भव पायो रे नर भाव लीधो फिर मन कीधो साँचो गुरु सिर धार्यो सुद्ध आराधियो। साँचो ज्ञान लयो भ्रम तज्यो सम्यग् दर्श पायो चारित निर्मल पाल्यो परभव सुध साध्यो॥ धरम दलाली कीधी संजम हेत रो। साँचो माल दिवायो जग रो तारवो॥ गुण रो भण्डार भरयो अकल अपार थई। सम कित पायो थारो धरम सुधायो॥ संयम पाल्यो समकित धार्यो भव जल तार्यो। पायो नाम अमर जग माँहि सुहावणो॥ भारी करम खपाया मुक्ति सिधारिया। सुख सम्पत्ति पाई ज्ञान उजागर भाख्यो॥ भव भव सुख पायो शिव मग साध्यो। चउदस दिन दिन उदयो ज्ञान प्रकाश भलो। जग माँहि जस पायो नाम अमर थयो शिव सुख ज्ञान दियो जग माहिँ न कोई उपमा थारो उपगार। सुद्ध मार्ग दर्शायो भव जल तार्यो॥ वर वो नाम लयो नहिं भूलूँ थारो उपगार। जग सिर ताज अमर सुद्ध साध्यो मार्ग मोक्ष। नाम अमर सिर ताज सुख दायक जग रो तारक। नर भव पायो सार सुख सम्पति न कोई भूलूँ। श्री भीखमजी साता पायो साता पद पायो॥

इन ढालाँ द्वारा यह भी स्पष्ट ज्ञात होता है कि स्वामी जी केवल ज्ञान की खोज में नहीं निकले अपितु-उनका तो विचार यहाँ तक था कि यदि मुझे कोई सच्चा गुरु न मिला तो स्वयं ही संयम ग्रहण न करुँगा पर किसी को अपना गुरु मानकर या धोखा देकर अपना जीवन नष्ट नहीं करुँगा, ऐसा मेरा दृढ निश्चय उन्होंने जीवन के प्रारम्भिक दिनों में किया था।

सत्य की खोज करना अथवा किसी भी बात को समझना और तत्पश्चात्-उस तथ्य-पूर्ण वस्तु को ग्रहण या न ग्रहण करना यह व्यक्ति की प्रकृति-का एक अङ्ग बनकर रहता ही है। पर जब इस बात का पता लग जाय कि अमुक वस्तु अथवा विचार में दोष, पाप या फिर किसी प्रकार हानि की बात नहीं, तो उस पर दृढ़ हो जाना ही विचार शील व्यक्ति का कर्त्तव्य समझा जाता है। इस बात की सत्यता की भी परख हो जाती है। यह बात भी केवल समझ की दृष्टि तक ही परिमित-नहीं रहती वरन् जीवन के आचरण में उस सत्य निष्ठा का प्रभाव स्पष्ट रूप से नजर आने लगता है। स्वामी जी का रुख भी कुछ इसी प्रकार का था। उनका जीवन जहाँ सत्य के प्रति पूर्ण सजग था वहाँ सत्य को कार्य-रूप में परिणत करना उनका प्रथम लक्ष्य था। इसके अतिरिक्त जीवन को सुखी बनाने का उनका विचार भी इससे जुड़ा हुआ दिखाई पड़ता है।

स्वामी जी का यह कथन कितना स्पष्ट है कि जो कार्य करूँगा, निष्पक्ष भाव से करूँगा चाहे जो कुछ भी परिणाम निकले मैं सत्य से पीछे नहीं हटूंगा। उनका यही निश्चय था।

सत्य-का मार्ग भी तो एक ऐसा ही होता है जिससे मनुष्य अपने लक्ष्य तक पहुँच ही जाता है। केवल उस रास्ते पर चलने की क्षमता ही मनुष्य को सफलता प्रदान करने में समर्थ होती है। सत्य-का मार्ग चाहे कितना ही टेढ़ा, पथरीला क्यों न हो, एक बार उस पर चलने के पश्चात् विजय निश्चित है।

इसी प्रकार, यह बात उनके लिए पूर्ण रूप से लागू हो सकती है। जिन्होंने सत्य के मार्ग पर कदम रख कर यह स्पष्ट कर दिया था कि वे अपने पथ से डिगने वाले नहीं थे। इस प्रकार उनका जीवन यह संदेश दे रहा था कि सत्य को पहचानो, उस पर दृढ़ रहो।

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