भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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यह आत्मा ज्ञान का एक ज्ञायक स्वभाव धारण करता हुआ सब पर द्रव्यों के संयोग रूपी विभाव पर्यायों द्वार से रहित होता हुआ केवल स्व स्वभाव को उपलब्ध होता जिस प्रकार यह आत्मा पहले था, उस प्रकार का अब ज्ञान रूपी आत्मद्रव्य पर्याय सहित ही अब प्राप्त हुआ, अर्थात् अपने स्वभाव स्वरूप स्थित हुआ। किन्तु यह बात तब तक ही संभवित हो सकतीहै जब तक सम्यक्त्व पूर्वक सम्यक् रूप परिणत आत्मा हो, जो पर द्रव्य पर्याय रूप हो कर मिथ्या श्रद्धान करता हुआ पर द्रव्य पर्यायरूप ही अपने को मान रहा अथवा पर द्रव्यों के निमित्त से आत्मन्‌को कोई भी विकार आदि पर्यायें हो उन्हें अपना स्वरूप मान रहा वह तो अज्ञानी जीव जब तक ऐसा भाव रखता तब तक वह अनन्त-संसारी हुआ सदा काल संसार रूपी दुःख को ही भोगेगा जिस को सर्वज्ञ देवों द्वारा कहे हुए के अनुसार यह श्रद्धा नहीं कि मैं शुद्ध आत्मा हूँ केवल, सो मिथ्यात्वी जीव अनादिकाल पर्यायों संग भ्रमण करता रहेगा। अब यह बतलाते हुए समाधान करते हुए कहते हैं कि ऐसा विचार कभी नहीं करना योग्य कि मैं ज्ञानी हूँ, अब जो कुछ भी, सब कुछ सर्व कर्मों को नष्ट कर ही दूंगा सो, इस प्रकार बिना ज्ञान सम्यक्त्व धारण किए हुए ही केवल मात्र अपनी इच्छा रूपी परिणति करके कभी कोई कर्म नष्ट नहीं हो सकते और न कभी मोक्ष की सिद्धि प्राप्त एक समय किसी सेठ का एक बेटा, जो कि घर पर बैठा हुवा मुनीमगिरी का काम देखता था सो घर बैठे बैठे विचार करने लगा ६ लाख रुपैयोंका लेन देन तो मेरे हाथ से ही होता, अब मैं भी सौ घर देख कर ऐसा ही करूँगा, यदि दस लाख हाथ में आजावें तो मुनीम क्या मैं तो बड़ा भारी सेठ बन कर बैठूँ सो इस से यह शिक्षा मिलती कि कहने मात्र से कभी काम नहीं होता कार्य तो उस का करना ही पड़ता ही कथनी मात्र से कार्य नहीं, सो यह जीव कहने को, मन के विचार मात्रसे कर्मों का नाश तो करना चाहे और अपने आत्म स्वरूप ज्ञाता द्रष्टा का तो ध्यान नहीं रखता सदा संसार सम्बन्धी राग द्वेष रूप अज्ञान दशा रूप ही हो रहा; जिस प्रकार मुनीम के मुख कह देने-से वह तो बड़ा सेठ, लाखी अथवा करोड़पति नहीं बन जाता उसी प्रकार इस अज्ञानी को कहने मात्रसे कर्म रूपी पर्वतराजों चूर्ण नहीं हो जा सकते! मुनीमजी तो मुनीमजी ही, सेठजी कहाँ सेठजी स्वयं सेठ, उस प्रकार यथार्थ स्वरूप को जानना चाहिये, केवल मन से कल्पना करके कभी कार्य नहीं होता, अज्ञानियों की तो बात ही निराली है शास्त्रों की बात को समझ-कर ही कहना, सो अज्ञानी जन शास्त्र पढ़ कर भी सदा अज्ञानरूप ही रहते, सो कार्य तो उस स्वरूप में ही लीन हो जाना स्वाध्याय का फल है, न कि केवल मुख से कहना मात्र कवि का वचन है, " कहनी का कंचन कथनी से कछु न सरै सो ही जो कहै सो करै।" जिस प्रकार ६ लाख रुपैयों के लेन देन का काम करने वाले मुनीम को यह बात असंभव कि पचास ₹ माह मुनीम को मिलते हों, ६ लाख रुपयों का मालिक कह देवे, ६ लाख का काम तो केवल उस द्वारा कराया गया तो जिस प्रकार मुनीम के हाथ में करोड़ों का माल रहता हुवा भी वह केवल मुनीम होता है उसी प्रकार से, ज्ञान के निमित्त से राग रूप जो भाव हो उन्हें आत्माका कभी स्वरूप नहीं कहते, किन्तु परद्रव्य भाव जान कर आत्मा उन से भिन्न रहता हुआ कभी उन का कर्त्ता नहीं बनता जो इस भेद विज्ञान रूपी स्थिति को नहीं पहिचानता वह केवल ज्ञानीपने के अभिमान में ही मस्त हुआ अपने को ज्ञानी मान कर ही सर्व कर्मों का नाश करने लग गया सो इस अज्ञानी को उस मुनीम की तरह कभी फल की प्राप्ति नहीं हो सकती अतः अपने अज्ञान भावों को छोड़ सम्यक्त्व का प्रकाश हृदय में करना चाहिये न कि केवल अपने मुंह से कहना कि मैं ज्ञानी हूँ? सो मुनीमपना ही रहेगा वा सेठ बने? वा मुनीमपने का जो फल ६ सो ही मिले? कहने मात्र का फल तो कभी भी संसार में कहीं भी सफल नहीं होता किन्तु उसी के अनुसार गुण का नाम उस के अनुसार होना चाहिये सो ही सच्चा ज्ञान है, जो इस बात को समझ सम्यक्त्व के बल द्वारा सब पर द्रव्यों भिन्न केवल अपने स्वरूप ही पहचान कर लीन होते हुए सर्व कर्मों का नाश करके मोक्ष को ही प्राप्त! मुनीम कभी सेठ होगा! कभी मुनीम कहला कर तो नहीं होगा! अब निश्चय सम्यग् दर्शन स्वरूप कहते हैं कि जहां जीव पुद्गलादि द्रव्यों सहित संसार को सर्व रूप छोड़ कर केवल अपने ही आत्म स्वरूप में लीन भाव को शुद्ध सम्यग् दर्शन कहते हैं निश्चय सम्यग् दर्शन व्यवहार के निमित्त से प्रगट होता हुआ निश्चय का स्वरूप बनता सो निश्चय सदा स्वद्रव्य रूप ही होता व्यवहार पराश्रय रूप होता है, सो व्यवहार त्याग कर शुद्ध निश्चय रूप? ज्ञान स्वाध्याय का केवल फल यही 192