एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 195, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार कहा कि आत्मा का वास्तविक रूप चेतन स्वरूप ही मान लिया जायगा विचारशील को संशय तो बना ही रहेगा और मन विकल्प के बिना रहेगा नहीं। इसलिये जो कुछ भी कहा जाय उसमें प्रमाण होना चाहिये, केवल शास्त्र का, केवल युक्ति का, केवल अपने पूज्य पुरुषों का, अथवा अन्य किसी का प्रमाण देने मात्र से काम नहीं चल-सकता। न्याय संगत विचार ही ग्राह्य समझा जायेगा। उपर्युक्त सब मत तो आत्मा के स्वरूप मात्र सम्बन्धी ही हैं। परन्तु जब विचार आगे बढ़ कर अनादिकाल से संसार में फंसे हुए जीवात्मा सम्बन्धी समीक्षा करने लगा, तो इस विषय में भी भिन्न भिन्न विचार प्रकट होकर मतभेद उपस्थित हो गये और आज पर्यन्त वह बना हुआ है। एक तो अनात्मवादी यह मत प्रकट हो आया जिसमें आत्मा का अस्तित्व ही नहीं माना गया। जब आत्मा नहीं माना तो फिर तो कर्मफल भोग किस प्रकार होगा, यह प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। न कर्म का कर्त्ता आत्मा न भोक्ता ही रहा; कर्म अवश्य फलित होते हैं पर उनका कर्त्ता कोई नहीं, स्वतः सब कुछ होता रहता अथवा क्षण-क्षण--परिवर्तन शील! आत्मा एक, सर्वथा न, पर्याय रूप कर्म और उनका भी कर्त्ता भोक्ता वही या अन्य कोई आत्मा न हो कर जो भी कुछ है, संसार की घटना की तरह से, कार्य रूप मात्र उत्पन्न होकर नष्ट हो जाता है, इसलिये कर्म बन्धन का प्रश्न ही नहीं उठ सकता, न यह पाप पुण्य का फल भोगने के लिये जन्म-मरण परम्परा में आता है। किन्तु आत्मा को अनित्य, क्षण-ध्वंसी मात्र मानने वाले जैन, वेदान्त आदि शास्त्र के वाद-प्रतिवादों से सन्तुष्ट नहीं हो सके। इसके बाद, मीमांसकों का मत प्रकट हुआ, जीवात्मा सब कर्मफलों का सुख या दुख रूप फल भोगता तो अवश्य है, पर ईश्वर का तो कोई काम ही नहीं। कर्म सब प्रकार सब कुछ करने समर्थ हैं। जब तक कर्म फल देगा, तबतक जीवात्मा को सुख या दुख रूप फल भोगना होगा, बिना ईश्वर के कर्म ही फल फलने में समर्थ हो जायगा, कर्म ही सब कुछ है, ईश्वर नहीं। कर्म में ही शक्ति विद्यमान है जो कर्त्ता को फल प्रदान कर देता है। मीमांसा का यह मत बहुत कुछ उचित माना गया, फिर भी यह विचार उठा कि जड़ कर्म में इतना ज्ञान तो होना चाहिये जिससे उचित न्याय हो सके; परन्तु जड़ तो ऐसा करने सर्वथा असमर्थ है। यदि कर्त्ता अपने पूर्व-कर्मों का फल स्वयं भोगने लगे तो कभी भी अपने लिये दुख रूप फल चुनना पसन्द नहीं करेगा। इसलिये जन्म-मरण रूप दुख को वह सदा दूर ही चाहेगा, न्याय-युक्त रूप से कर्म फल का सम्पादन तो कोई सर्वज्ञ न्यायकारी ही कर सकता है। अब जो मत शेष रह गये उन सब में ईश्वर को सर्वोपरि मान लिया गया है। जीवात्मा जो कुछ कर्म करता है, उसका फल तो ईश्वर ही प्रदान करता है, यह तो सब ही मत एक स्वर से मानते हैं। परन्तु अब ईश्वर के सम्बन्ध में, जीवात्मा और प्रकृति के साथ उस के सम्बन्ध तथा जीवात्मा प्रकृति सम्बन्धी भिन्न भिन्न विचार उन मतों द्वारा प्रकट होकर आज भी चालू हैं। न्याय दर्शन के मत से ईश्वर को सर्वथा पृथक् सत्ता जीवात्मा से भिन्न सब कुछ करने वाला माना है, परन्तु ईश्वर जीवात्मा को मोक्ष स्वरूप नहीं बना सकता। न आत्मा को उत्पन्न ही करता है। कर्म बन्धनों का फल प्रदान करना मात्र ईश्वर का काम है। ईश्वर के ज्ञान से जीवात्मा ज्ञानवान् हो सकता है। जीवात्मा सर्वथा अचेतन नहीं है। जीवात्मा के स्वरूप को ज्ञान रहित मान कर ईश्वर के ज्ञान के सहारे सब कुछ माना गया है। मुक्ति दशा में ज्ञान, जीवात्मा सर्वथा शून्य हो जाता है। अब जो वैष्णव मत हैं जीवात्मा को ईश्वर द्वारा उत्पन्न तथा उनका अंशमात्र ही मान कर जीवात्मा का ईश्वर के सिवाय अन्य कोई सत्ता नहीं मानते हैं, पर इस से जीवात्मा अपने को ही ईश्वर समझ बैठा तो ईश्वर के सामने उसका कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। एक ओर तो यह माना जाय कि ईश्वर सब कुछ करता है जीवात्मा कुछ नहीं कर सकता ईश्वर की कृपा ही सर्वोपरि मानी गई है, पर जीवात्मा का भी तो कर्त्तव्य है। परमात्मा की ही सब देन है, कृपापूर्वक वह सब कुछ प्रदान करता है किन्तु, जो भी कुछ जीव द्वारा कर्म किया जाता है उसका फल जीवात्मा को भोगना ही होगा। ईश्वर न्यायकारी है, दया करने वाला अवश्य दयालु रूप में जाना जायगा, परन्तु वह दया-दान के रूप में ही माना जा सकेगा। इसके सिवाय, अद्वैत मत का सब कुछ ईश्वर स्वरूप मानना और जीव मात्र 195