भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 322 में से

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और जो लोग कहते कि मनुष्य को तो पाप का फल भोग कर नरक से मुक्ति मिल ही जाती होगी? शायद हो जाय, ऐसा तो किसी ने शास्त्र में कहा? उस काल उस लोक में, जहां नाना प्रकारकी या तना होती हैं उस में ऐसा ज्ञान या विवेक मन में उपजेगा कि मैं ऐसा करूंगा? उस काल में, जहां सब प्रकार काल अंधेरा प्रकाश का नाम नहीं है वहां उस को यह ज्ञान होने लगे कि मुझको इस पाप फल भोग कर उस लोक में, वा इस लोक में इस प्रकार का काम करना है? जिस काल में, वा उस काल के उपरान्त जब वह नरक से छूटेगा फिर उस को, वा जिस प्रकार से कि नरक से उसका पातक कटेगा, उस में उसको यह ज्ञान वा, वा उस काल पर्यन्त उसको इस बात का ज्ञान रहेगा, वा उस समय उसको सब बातें चेत रहेंगी कि जिस के करने से, इस बात का ज्ञान उस को हो जायगा, अथवा जो २ पाप उस ने किये-थे वा जिस २ पातक के कारण उस को नरक भोग का फल भोग हुआ होगा वा होता रहेगा? इन बातों के उत्तर में सत्य, सत्य यह उत्तर हो सक्ता, जिस को न्याय से विरोध न हो, क्योंकि किसी वस्तु विशेष ऽ वा विकार का स्मरण अथवा अभ्यास से बिना कोई ज्ञान स्मरण वा चेत किसी बात का मनुष्य को हो नहीं सक्ता जो इस प्रकार न्याय से विचारे सो अवश्य यह जानेगा कि पापी जीव, अनेक जन्मों तक अज्ञानता और मलिन वासनाओं से युक्त होकर कुयोनि यों में अथवा नरक में बार बार जन्म ले अवश्य ही भ्रम में भटकता ही रहेगा, इस लिये पापी जीव को जो जो दुर्गतियां होती हैं उन को सुन कर, जो मनुष्य ऐसा न करेगा उस का निवारण नहीं, पापी अवश्य घोर नरक गामी हो कर जन्म जन्मान्तर पर्यन्त क्लेश पाता रहेगा सो नरक के पापी जीवों अथवा भ्रम युक्त जीवों को परमेश्वर के बिना कौन उधारे? कौन बचाय! हे ईश्वर तू मुझ को बचा, तू ही दयालु सब का हितकारी और ऽ रक्षक है! मन, प्राण, तन सब कुछ तेरा ही दिया हुआ सो तू मुझको अपना दास जान के कृपा दृष्टि कर के सब प्रकार से मेरी रक्षा कर हे दयानिधान सर्व समर्थ तू मुझको पाप में न गिरने दे-- तू ही दीन बन्धु तू ही सर्व का रक्षक हे अनाथ नाथ, सब को सुखी कर, परमेश्वर तू ही सब जीवों का हित है? किस से मैं अपने पापों कहूं? बिना तेरे, हे नाथ संसार भर सब ही अनाथ बने हैं-- कोई किसी का नहीं सब स्वारथ के सब ही हैं इस संसार महा भयंकर हे दीन बन्धु, तू ही नाथ, सब को तू ही कर पार इस भव से? तू ही एक सब का रक्षक है-- मेरी सुन ले पुकार, तू अनाथों का नाथ परमेश्वर है तू, जिस अ-विनाशी को सब से बड़ा ही सब से परे सब संसार महा अंधकार में जिस के तेज से प्रकाशमान है, सत्य, प्रकाश, जिस का नाम है सो सब के पापों से रहित सत्य रूप जिस की महिमा का नाम सब वेद शास्त्र गाते हैं उस परमेश्वर का मन में ध्यान कर किस लिये, ऐसा सोच किया? चिन्ता किस की? सो स्वामी सब का, सदा ही सब का, सच्चा स्वामी सब काल सब का रक्षक, सब प्रकार समर्थ सो सब के पाप से बचा सक्ता है सो सब काल उस को जप सब के पाप से नाश कर सक्ता परमेश्वर सब पर दया कर के सब प्रकार का ज्ञान, जो जो पाप से बच ने का है उस का प्रकाश कर के जीव को पापों से बचा सक्ता, सो उस का आश्रय ले, सब पापी नरक के क्लेश से छूटेगा तू सब काल में सब प्रकार दया का सागर सब पर दया कर सर्व शक्तिमान सब का सब काल पालन करनहार सत्य तू, सत्य नारायण, सत्य रूप, सत्य नाम! इस लिये मुझ को पाप से बचा ले, जिस से फिर मैं नरक का क्लेश न देखूं 194