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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

और जो लोग कहते कि मनुष्य को तो पाप का फल भोग कर नरक से मुक्ति मिल ही जाती होगी? शायद हो जाय, ऐसा तो किसी ने शास्त्र में कहा? उस काल उस लोक में, जहां नाना प्रकारकी या तना होती हैं उस में ऐसा ज्ञान या विवेक मन में उपजेगा कि मैं ऐसा करूंगा? उस काल में, जहां सब प्रकार काल अंधेरा प्रकाश का नाम नहीं है वहां उस को यह ज्ञान होने लगे कि मुझको इस पाप फल भोग कर उस लोक में, वा इस लोक में इस प्रकार का काम करना है? जिस काल में, वा उस काल के उपरान्त जब वह नरक से छूटेगा फिर उस को, वा जिस प्रकार से कि नरक से उसका पातक कटेगा, उस में उसको यह ज्ञान वा, वा उस काल पर्यन्त उसको इस बात का ज्ञान रहेगा, वा उस समय उसको सब बातें चेत रहेंगी कि जिस के करने से, इस बात का ज्ञान उस को हो जायगा, अथवा जो २ पाप उस ने किये-थे वा जिस २ पातक के कारण उस को नरक भोग का फल भोग हुआ होगा वा होता रहेगा? इन बातों के उत्तर में सत्य, सत्य यह उत्तर हो सक्ता, जिस को न्याय से विरोध न हो, क्योंकि किसी वस्तु विशेष ऽ वा विकार का स्मरण अथवा अभ्यास से बिना कोई ज्ञान स्मरण वा चेत किसी बात का मनुष्य को हो नहीं सक्ता जो इस प्रकार न्याय से विचारे सो अवश्य यह जानेगा कि पापी जीव, अनेक जन्मों तक अज्ञानता और मलिन वासनाओं से युक्त होकर कुयोनि यों में अथवा नरक में बार बार जन्म ले अवश्य ही भ्रम में भटकता ही रहेगा, इस लिये पापी जीव को जो जो दुर्गतियां होती हैं उन को सुन कर, जो मनुष्य ऐसा न करेगा उस का निवारण नहीं, पापी अवश्य घोर नरक गामी हो कर जन्म जन्मान्तर पर्यन्त क्लेश पाता रहेगा सो नरक के पापी जीवों अथवा भ्रम युक्त जीवों को परमेश्वर के बिना कौन उधारे? कौन बचाय! हे ईश्वर तू मुझ को बचा, तू ही दयालु सब का हितकारी और ऽ रक्षक है! मन, प्राण, तन सब कुछ तेरा ही दिया हुआ सो तू मुझको अपना दास जान के कृपा दृष्टि कर के सब प्रकार से मेरी रक्षा कर हे दयानिधान सर्व समर्थ तू मुझको पाप में न गिरने दे-- तू ही दीन बन्धु तू ही सर्व का रक्षक हे अनाथ नाथ, सब को सुखी कर, परमेश्वर तू ही सब जीवों का हित है? किस से मैं अपने पापों कहूं? बिना तेरे, हे नाथ संसार भर सब ही अनाथ बने हैं-- कोई किसी का नहीं सब स्वारथ के सब ही हैं इस संसार महा भयंकर हे दीन बन्धु, तू ही नाथ, सब को तू ही कर पार इस भव से? तू ही एक सब का रक्षक है-- मेरी सुन ले पुकार, तू अनाथों का नाथ परमेश्वर है तू, जिस अ-विनाशी को सब से बड़ा ही सब से परे सब संसार महा अंधकार में जिस के तेज से प्रकाशमान है, सत्य, प्रकाश, जिस का नाम है सो सब के पापों से रहित सत्य रूप जिस की महिमा का नाम सब वेद शास्त्र गाते हैं उस परमेश्वर का मन में ध्यान कर किस लिये, ऐसा सोच किया? चिन्ता किस की? सो स्वामी सब का, सदा ही सब का, सच्चा स्वामी सब काल सब का रक्षक, सब प्रकार समर्थ सो सब के पाप से बचा सक्ता है सो सब काल उस को जप सब के पाप से नाश कर सक्ता परमेश्वर सब पर दया कर के सब प्रकार का ज्ञान, जो जो पाप से बच ने का है उस का प्रकाश कर के जीव को पापों से बचा सक्ता, सो उस का आश्रय ले, सब पापी नरक के क्लेश से छूटेगा तू सब काल में सब प्रकार दया का सागर सब पर दया कर सर्व शक्तिमान सब का सब काल पालन करनहार सत्य तू, सत्य नारायण, सत्य रूप, सत्य नाम! इस लिये मुझ को पाप से बचा ले, जिस से फिर मैं नरक का क्लेश न देखूं 194

इस प्रकार कहा कि आत्मा का वास्तविक रूप चेतन स्वरूप ही मान लिया जायगा विचारशील को संशय तो बना ही रहेगा और मन विकल्प के बिना रहेगा नहीं। इसलिये जो कुछ भी कहा जाय उसमें प्रमाण होना चाहिये, केवल शास्त्र का, केवल युक्ति का, केवल अपने पूज्य पुरुषों का, अथवा अन्य किसी का प्रमाण देने मात्र से काम नहीं चल-सकता। न्याय संगत विचार ही ग्राह्य समझा जायेगा। उपर्युक्त सब मत तो आत्मा के स्वरूप मात्र सम्बन्धी ही हैं। परन्तु जब विचार आगे बढ़ कर अनादिकाल से संसार में फंसे हुए जीवात्मा सम्बन्धी समीक्षा करने लगा, तो इस विषय में भी भिन्न भिन्न विचार प्रकट होकर मतभेद उपस्थित हो गये और आज पर्यन्त वह बना हुआ है। एक तो अनात्मवादी यह मत प्रकट हो आया जिसमें आत्मा का अस्तित्व ही नहीं माना गया। जब आत्मा नहीं माना तो फिर तो कर्मफल भोग किस प्रकार होगा, यह प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। न कर्म का कर्त्ता आत्मा न भोक्ता ही रहा; कर्म अवश्य फलित होते हैं पर उनका कर्त्ता कोई नहीं, स्वतः सब कुछ होता रहता अथवा क्षण-क्षण--परिवर्तन शील! आत्मा एक, सर्वथा न, पर्याय रूप कर्म और उनका भी कर्त्ता भोक्ता वही या अन्य कोई आत्मा न हो कर जो भी कुछ है, संसार की घटना की तरह से, कार्य रूप मात्र उत्पन्न होकर नष्ट हो जाता है, इसलिये कर्म बन्धन का प्रश्न ही नहीं उठ सकता, न यह पाप पुण्य का फल भोगने के लिये जन्म-मरण परम्परा में आता है। किन्तु आत्मा को अनित्य, क्षण-ध्वंसी मात्र मानने वाले जैन, वेदान्त आदि शास्त्र के वाद-प्रतिवादों से सन्तुष्ट नहीं हो सके। इसके बाद, मीमांसकों का मत प्रकट हुआ, जीवात्मा सब कर्मफलों का सुख या दुख रूप फल भोगता तो अवश्य है, पर ईश्वर का तो कोई काम ही नहीं। कर्म सब प्रकार सब कुछ करने समर्थ हैं। जब तक कर्म फल देगा, तबतक जीवात्मा को सुख या दुख रूप फल भोगना होगा, बिना ईश्वर के कर्म ही फल फलने में समर्थ हो जायगा, कर्म ही सब कुछ है, ईश्वर नहीं। कर्म में ही शक्ति विद्यमान है जो कर्त्ता को फल प्रदान कर देता है। मीमांसा का यह मत बहुत कुछ उचित माना गया, फिर भी यह विचार उठा कि जड़ कर्म में इतना ज्ञान तो होना चाहिये जिससे उचित न्याय हो सके; परन्तु जड़ तो ऐसा करने सर्वथा असमर्थ है। यदि कर्त्ता अपने पूर्व-कर्मों का फल स्वयं भोगने लगे तो कभी भी अपने लिये दुख रूप फल चुनना पसन्द नहीं करेगा। इसलिये जन्म-मरण रूप दुख को वह सदा दूर ही चाहेगा, न्याय-युक्त रूप से कर्म फल का सम्पादन तो कोई सर्वज्ञ न्यायकारी ही कर सकता है। अब जो मत शेष रह गये उन सब में ईश्वर को सर्वोपरि मान लिया गया है। जीवात्मा जो कुछ कर्म करता है, उसका फल तो ईश्वर ही प्रदान करता है, यह तो सब ही मत एक स्वर से मानते हैं। परन्तु अब ईश्वर के सम्बन्ध में, जीवात्मा और प्रकृति के साथ उस के सम्बन्ध तथा जीवात्मा प्रकृति सम्बन्धी भिन्न भिन्न विचार उन मतों द्वारा प्रकट होकर आज भी चालू हैं। न्याय दर्शन के मत से ईश्वर को सर्वथा पृथक् सत्ता जीवात्मा से भिन्न सब कुछ करने वाला माना है, परन्तु ईश्वर जीवात्मा को मोक्ष स्वरूप नहीं बना सकता। न आत्मा को उत्पन्न ही करता है। कर्म बन्धनों का फल प्रदान करना मात्र ईश्वर का काम है। ईश्वर के ज्ञान से जीवात्मा ज्ञानवान् हो सकता है। जीवात्मा सर्वथा अचेतन नहीं है। जीवात्मा के स्वरूप को ज्ञान रहित मान कर ईश्वर के ज्ञान के सहारे सब कुछ माना गया है। मुक्ति दशा में ज्ञान, जीवात्मा सर्वथा शून्य हो जाता है। अब जो वैष्णव मत हैं जीवात्मा को ईश्वर द्वारा उत्पन्न तथा उनका अंशमात्र ही मान कर जीवात्मा का ईश्वर के सिवाय अन्य कोई सत्ता नहीं मानते हैं, पर इस से जीवात्मा अपने को ही ईश्वर समझ बैठा तो ईश्वर के सामने उसका कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। एक ओर तो यह माना जाय कि ईश्वर सब कुछ करता है जीवात्मा कुछ नहीं कर सकता ईश्वर की कृपा ही सर्वोपरि मानी गई है, पर जीवात्मा का भी तो कर्त्तव्य है। परमात्मा की ही सब देन है, कृपापूर्वक वह सब कुछ प्रदान करता है किन्तु, जो भी कुछ जीव द्वारा कर्म किया जाता है उसका फल जीवात्मा को भोगना ही होगा। ईश्वर न्यायकारी है, दया करने वाला अवश्य दयालु रूप में जाना जायगा, परन्तु वह दया-दान के रूप में ही माना जा सकेगा। इसके सिवाय, अद्वैत मत का सब कुछ ईश्वर स्वरूप मानना और जीव मात्र 195

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कि यह एक आध्यात्मिक रूप बनता जा रहा था संप्रदाय का, तो मन में उठा थोड़ा डर। दूसरा डर यह था, स्वामी दयानंद जी सब जगह घूमते हुए प्रचार कर रहे थे। वेद को प्रत्येक के लिए सत्य मान कर सनातन धर्म के केवल बाहरी क्रिया रूप को ही ले रहे थे। स्वामी दयानंद जी ने आर्य समाज की नींव डाली जिसके कुछ ही वर्ष बाद उनके सारे सिद्धांत बदल गए थे। पर, डा. हेडगेवार यह सब कुछ गहराई पूर्वक देख रहे थे। जब इस पर विचार डाक्टर हेडगेवार जी आपस में करते उनके दो मित्र बापू जी, दादा राव कहते थे हमारे डाक्टर जी संघ को आर्य समाज की तरह संप्रदाय न बनने देना। दूसरी बात, जिससे संघ रूप ले सकता था समाज का दूसरा रूप था हिंदू महा सभा, जो, व्यायाम, खेलकूद के रूप में सामने आई, अहिंसा, असहयोग के लिए सब जन-मन को तैयार न होना देख डा. हेडगेवार समाज सुधारक का क्रांतिकारी रूप देखना चाहते थे। वे समाज को राजनीति का अखाड़ा न बना कर सत्य स्वरूप देना चाहते थे। वे नहीं चाहते थे हिंदू महासभा की तरह यह मात्र एक दल बनकर रह जाए। वे केवल हिंदू, हिंदू कहने वाले नहीं, अपितु, हिंदुत्व, सनातन संस्कृति को मानने वालों के हृदय में क्रांति की ज्वाला जगाना ही चाहते थे। वे, डा. हेडगेवार कभी भी राजनीति में भाग लेने के लिए आगे नहीं आते थे। संप्रदाय बनने का विरोध करते थे। क्रांति लाने वाले केवल यह कह कर नहीं रह जाते कि आज यह हो रहा है। देश में जो कुछ हो रहा था, डाक्टर हेडगेवार उसे चुपचाप देख रहे थे। उन्हें यह अहसास हो रहा था, जो क्रांति केवल विचारों तक ही सीमित रह जाएगी उस क्रांति से कुछ नहीं होगा। आर्य समाज केवल मात्र समाज का रूप, जो क्रांति का रूप था वह नहीं था। हिंदू महासभा केवल राजनीति का रूप ले रही थी। देश को जिस क्रांति की आज आवश्यकता थी वह क्रांति केवल विचारों तक ही सीमित नहीं रह सकती थी। एक क्रांतिकारी केवल बंदूक से क्रांति नहीं करता। वह केवल अपने हाथ से बंदूक चलाता अवश्य है, पर मन से समाज को जगाने का काम करता है। इस तरह क्रांतिकारी भी एक राजनीतिक रूप ले लेता है। पर, यह क्रांतिकारी दल भी विचारों तक ही रह जाते थे। सब डाक्टर हेडगेवार जी के सामने था। क्रांति केवल समाज का सुधार नहीं चाहती। केवल देश को दासता की बेड़ियों से मुक्त नहीं करवाना चाहती। केवल अपने विचारों का रूप बदलना ही क्रांति नहीं होती। आज देश को आवश्यकता किस क्रांति की थी? डाक्टर हेडगेवार जी इस पर निरंतर विचार कर रहे थे। वे देख रहे थे कि देश का नौजवान आज भटक चुका था। वह समाज की बेड़ियों में जकड़ कर समाज को ही सत्य मान रहा था, पर क्रांति के लिए तैयार नहीं हो रहा था। केवल दल बन रहे थे। हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग, कांग्रेस ये सब दल बन कर रह गए थे। दल आपस में लड़ रहे थे। क्रांतिकारी दल केवल समाज को जगाने का काम कर रहे थे। केवल विचारों से क्रांति नहीं आ सकती थी। आज आवश्यकता देश में ऐसे नौजवानों की थी जो अनुशासित हों, जिनके विचार संकीर्ण न हों। वे देश के लिए जीने- मरने के लिए तैयार हों। क्या था यह? डाक्टर जी के सामने इस पर प्रश्नचिह्न लग चुका था। वे सोचने लगे कि जब तक समाज में संगठन नहीं होगा, जब तक समाज में एकता नहीं होगी, जब तक समाज की शक्ति एक नहीं होगी, तब तक क्रांति नहीं आ सकती। क्रांति केवल बंदूक से नहीं लाई जा सकती, बंदूक तो केवल एक व्यक्ति को मार सकती है, पर जब तक समाज की चेतना नहीं जगेगी, जब तक समाज के अंदर एकता नहीं आएगी, तब तक क्रांति नहीं आ सकती। जब देश पर आक्रमणकारियों ने आक्रमण किया था, उस समय देश में अनेक राजा थे, अनेक विचार थे, अनेक जातियां थीं। आज भी देश में वही सब कुछ हो रहा था। देश में क्रांति की ज्वाला तो जल रही थी, पर क्रांति को एक दिशा देने वाला कोई नहीं था। आज डाक्टर हेडगेवार जी के सामने यह सबसे बड़ा प्रश्न था।

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𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥! 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥? 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥! 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥? 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥! 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥 𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥

किन्तु यह सब विचार तबही सार्थक था, जब उसका हृदय वासनामय संसारके विकृतियोंसे सर्वथा विरक्त हो चुका होता, वह वैराग्य की उस चरम सीमा पर्यन्त पहुँचनेमें समर्थ होता। वह यह सब सोचता तो अवश्य था, पर मन की चंचलताका वह सर्वथा विसर्जन कर पानेमें सफल नहीं हुआ था। कभी वह सोचता भी, कि क्या सच मुच इस समस्त दृश्य जगत्का कोई नियन्ता है।या सब पदार्थ अनादि सिद्ध हैं? सर्वज्ञता वास्तविक है? या केवल अपनी दुर्बल धारणा को तृप्त कर संतुष्ट रहना मात्रका यह एक भ्रम है। इस प्रकार अनेक प्रकार वितर्क वह कर तो रहाथा परंतु उस पर कोई भी विचार स्थिरता नहीं उपलबध करा रहा था, वह विचारो द्वारा केवल शब्द योजना तो रचसका, पर यथार्थ सत्य को वह प्राप्त नकर सका। वास्तव में विचार का रूप केवल उस कल्पित पत्र के समान ही है। जिसके आधारपर वास्तविकता की स्थिति कुछ भी संभव नहीं हो पाती। विचारोंसे केवल तर्कोंका ही जाल फैलाया जा सकताहै पर तत्त्व लाभ संभव नहीं हो सकता। अंततोगत्वा वह उस सर्वज्ञ देवकी पावन वाणी को संशयके ही दृष्टिकोण से, जिसे आज कलके वैज्ञानिक सत्य नामसे पुकारते हैं वह भी विचारनेका ही प्रयत्नकरता रहा। उसका विचार ऐसाथा जैसे कि कोई नौका के दो तख्तोंपर पैर रखकर पारहोनेका प्रयत्न करे। अथवा वह उस नौसिखिये के समान था, जो तैराकी; का पूर्ण सिद्धांत जानकरभी नदीकी अगाधधारामें कूदपड़ा था, जो तैरने की कलाका सिद्धांत तो विचारता रहता था पर हाथ-पैर मारने पर, वह जलतरंगोंके थपेड़ोंको सहनेमें असमर्थहोकर या डुब-कियाँ खाता था, अथवा चक्कर खा, कर विवश होकर अपनी जान गंवा बैठताथा। ऐसेही इस संसार चक्र से पार होनेके लिए केवल सिद्धांत ज्ञान पर्याप्त नहीं। ज्ञानके साथ तो उस प्रकारके क्रियात्मक बलकी आवश्यकता थी, जिससे कर्म रूपी जल तरङ्गो को रोका जासके। केवल ज्ञानके द्वारा, वैराग्यके अभावमें साधक पग-पग भटकता है, पग-पग विष की घूंट पीकर तृषा शान्त करनेका व्यर्थ यत्न करता है। यही कारण था कि उस युवक पंडित, का अन्तस्तल विकल्पों तथा तर्कों का ही एक ऐसा क्षेत्र बन चुका था।जिसमें मात्र एक संशय रूपी तृण ही उग रहा था। परिणामतः उसे, ज्ञान द्वारा मिलने वाला आत्मीय आनंद प्राप्त करने का मार्ग अवरुद्ध होग-- तृषातुर चातककीनाई कभी अपने हृदयको शून्य समझने लगता था।तोकभी प्रत्येक विकल्पमें अपने ज्ञानी होनेका भाव अनुभव करके अहङ्कारसे मदान्ध होकर अन्य समस्त ज्ञानी संसारको तुच्छ समझता। विकल्प उसे चञ्चल बनादेते तथा कभी वह मोहग्रस्त होकर उस मद्यपकी भांति मदमस्त बना रहता। विकल्प हीउसे अज्ञानकी अंधकार गुहामें धकेलदेते जिसमें वह भटक कर मार्ग भ्रष्ट बनजाता। विकल्प कभी उसके हृदयको दुर्बल बनादेते जिससे अकारण भयभीत होकर वह जीवन से ऊबजाता। विचार रूपी आवर्त्त उसके विवेक रूपी जहाजको निगलने का प्रयास करते हुए उसे अशान्त बनाये रखते। इस प्रकार विकल्पों तथा संशयोंके गहन घनघोर तममें फँसकर वह दिशा विमूढ़ बनकर कभी इधरतो कभी उधर भटकता हुआ एक प्रकार से पागल बनरहाथा।उसे ज्ञानके आधार परपरम सुख तो दूर संसार रूपी महा दुःखसे भी मुक्ति नहीं मिलसकतीथी। उसने विचार किया कि इस विकट संशय चक्रसे छुटकारा पाकर मुझे, किसी सर्वज्ञके पास जाकर अपने सन्देहों का निवारण कराना चाहिए? यदि वह ज्ञान यथार्थ होगा, तभी स्थिर हो, शांत जीवन लाभ कर सकूँ गा, या फिर इस संशयके जल में डूबकर प्राण, दे दूँगा। इस प्रकार मन तथा हृदयके अंतर्द्वन्द्वमें उसका जीवन उलझ कर रह गया। जीवन के संशय विषैले बाणोंके समान उसे निरन्तर पीडितकरते रहते थे, पर इस बात का उत्तर वह किसी भी तरह, प्राप्त नहीं कर सका था, क्या सच मुच इस संसार चक्रसे छूटने का कोई उपाय भी होता है. क्या सच मुच इस असत्य संसार के उस किनारे पर जीवन नौका जाकर ठहरती है, क्या कोई ऐसा स्थान भी है जहाँ पहुँच कर इस मन की चंचलता सदाकेलिए शांत होजाय? क्या इस प्रकारके विचारों रूपी दल दल से पार होकर अन्तरात्मा की वह परम शुद्धावस्था प्राप्त होसकती है। जिसकेलिए लोग तप का आचरण करते हैं, जिससे कि जगत् के प्रलोभन भी उसके मन को विचलित नहीं करते। शास्त्र तो कहतेहैं... कि इस जग के ऊपर प्रत्येक वस्तु का जो यथार्थ स्वरूप ज्ञान करानेमें पूर्ण समर्थ हैं, जहां पर मन की सारी वासनाएं शान्त हो जाती हैं। पर क्या वे, सच ही सब कुछ जान रहे हैं।या, केवल दूसरोंको उपदेश देकर मात्र अपने शिष्योंकी संख्याबढ़ानेका ही, मार्ग इन ज्ञानीयों शास्त्रियों तथा पंडितों ने, निकाल रखा 199

जगत का प्रत्येक पदार्थ भी, अपने उत्पत्ति-विनाश का कारण अपने आप, या अपने आपमें समाया हुआ? कदापि नहीं? यह स्वाभाविक नियम है, कि जो वस्तु या पदार्थ या तो था सदा से या नहीं था प्रथम तो पश्चात भी कभी नहीं होगा? इसलिए सब प्रकारों से ही यह सिद्ध, प्रमाण और तर्कसम्मत? कि जो कुछ संसार बना, अवश्य उस सबका सब उपादान या तो था सदा, और उस सबको बनाने वाला? जो था सो ही सदा, और जो सबका स्वामी? सो सदा ही है! वह चेतन है, और चेतन रूप का नाम चेतन ही होता अचेतन का नाम क्या? चेतन सर्वज्ञ ही होता है सब उपादान कारण को जान, सो ही ज्ञान पूर्वक रच सकता और जो सब प्रकारों से उत्पत्ति-विनाश का उपादान या कारण ही नहीं तो वह क्या है? यह उपादान सो प्रकृति का नाम ही है, जो कि जड़स्वरूप ही केवल सब प्रकारों से जड़ का, नाम केवल; सो कार्यरूप से सम्पूर्ण संसार प्रत्यक्ष अपने आप ही सब प्रकारों से सिद्ध सब को, जो सो अपने आप अचेतन? कदापि चेतन नहीं? सो ही सदा से केवल था, सो कार्य बनकर सब रूप जगत सब कैसा सो है? सब प्रकार से ही सदा सत्य है, जो सो सत्य ही सदा रहता है, या नहीं सदा रहता? सत्य का सर्वथा ही कभी अभाव तो नहीं होता कहता है, सो सब प्रकार से सदा सत्य है, सो अपने स्वरूप करके ही विवर्तित हो सकता; सो तो सदा सत्य, सो ही सदा परिणामी अब सूक्ष्म और स्थूल सब जगत जिसको दोनों प्रकार विवर्तता करके कहा जाता गया, जिस रूप करके सब जगत कार्यरूप सत्य ही सब बना, सो तो नाम रूप-रंग सब मिथ्या हुए, केवल सूक्ष्म रूप ही सो सत-प्रतिपादक का रूप सत्य रहा, न किसी प्रकार का भी यह संसार सब भ्रम था या कोई भ्रम का रूप आकाश का, गंधर्व का, तृष्णा का, शशरूप का, सो सब नाम रूप-रंग सब का नाम-कर्म सब मिथ्या रूप जगत का सत-रूप से सत्य-सत्य होकर सब प्रकाश रूप सब नाम-रूप मिथ्या रूप, माया-सत्य स्वरूप सत रूप सब जगत का रूप सत-स्वरूप ही प्रकाश सब का केवल या अविद्या विद्या दोनों रूप कहा जाता है, सो अविद्या का प्रकाश भी, सो अविद्या का सत ही! अब यह अविद्या अज्ञान-रूप का प्रकाश ज्ञान से अविद्या का नाश सब हो कर केवल ही ब्रह्मरूप ही सब सत प्रकाश रूप सब रहा, सब ब्रह्म; ब्रह्म सब का सत्य, सब माया सत्य; ब्रह्म ही सब रूप में सो प्रकाश ही प्रकाश सब कार्य सब सत्य स्वरूप प्रकाश? फिर जो अविद्या को सत्य कहा अविद्या सत रूप सब माया प्रकाश? फिर ज्ञान का अविद्यारूप से विरोध कैसा ? ज्ञान का अविद्यारूप से क्या विरोध रहेगा? सो तो जो अविद्या है, सो ब्रह्म का अज्ञानांश रूप सब केवल सत्य रूप अविद्या? ज्ञान तो अज्ञान अविद्या नाम-कर्म सब अविद्या ही, अविद्यारूप ज्ञान अब जो सर्वज्ञ सर्वव्यापक सब में सत रूप प्रकाश रूप ज्ञान रूप सो सच्चिदानन्द-स्वरूप है, सो सब का केवल सब ज्ञान रूप सत्य प्रकाश रूप ज्ञान ही अज्ञानरूप हो कर लगा सो लगा, कि सब ही सो ज्ञान रूप अविद्या अविद्यारूप हो कर लगा अविद्या ज्ञान का सब ही जब प्रकाश स्वरूप ज्ञान अज्ञान का नाश कर के सब ज्ञान रूप ही ज्ञान रहा, सो सब ज्ञान ही रहा सो केवल ज्ञान, ज्ञान केवल सत, ज्ञान केवल सत्य अब केवल ज्ञान का नाम ही सत रूप केवल सब जगत हुआ सो ज्ञान निराकार है, साकार का नाम केवल ज्ञान का नाम कैसा होगा क्या? साकार कैसा है? सो ज्ञान का ही, ज्ञान रूप ही प्रकाश हुआ? केवल ज्ञान केवल साकार का रूप हो कर प्रकाश सब का ही रूप हुआ, साकार सत्य ही रहा सो सब का सब केवल सब ही का नाम सत प्रकाश-का प्रकाश नाम ही केवल है, ज्ञान रूप ही सब का सब रहा अब केवल नाम ही सब का रूप ही सो सो रहा, नाम केवल ही केवल रहा; सो केवल सब केवल सब ही सो ही रहा, केवल केवल ही सब का रूप केवल प्रकाश स्वरूप ही रहा, निराकार ही सब रहा, केवल केवल ही सो रूप हो कर सब का सब का रूप ही केवल सब रहा! रूप केवल केवल केवल रूप सब प्रकाश का रूप प्रकाश ही केवल केवल केवल ही सब केवल ही केवल केवल अब केवल सत, या केवल ज्ञान केवल रूप, केवल सब स्वरूप ही रूप सब केवल सब रूप केवल रहा? सब ही सब केवल केवल सब सब केवल 200

कथा श्रोत कालमे ध्यान ज्ञान मन का, तत क्षण संशय मिटा, जो न मिटता सो, न समकित दरसन रूप यह विद्या सोई ज्ञान महा मत सांचो सोई सुकृत सांचो सो जो सम्यक् क्रिया रूप ज्ञान धार्या सोई, ज्ञान का विचार जा रूपी सो सम्यक्त सम्पादक जो क्रिया सो दो-हू का नाम जानि यह विद्या रूप ज्ञान सम्यक्त रूप सो ही अब सम्यक् क्रिया रूप जय देव जय देव यहूति जयंत विद्या विभूति सो या क्रिया रूप न जानि सम्यक् क्रिया प्रमत्त विषै जानि मिथ्या मती रूप भय विषय मथ्या विवर्त्य सोई रूप जानि क्रिया विषै प्रमत्त सो अप्रमत्त सो विवर्त्य रूप जानि विषय न जानि संशय सो संशय रूप जानि सम्यक् सो ही ज्ञान संशय ज्ञान रूप सो मिथ्यात्वी संशय से, वि-पर्य से जानि मिथ्यात्व सो सम्यक् रूप ज्ञान सो संशय, वि-पर्य, अन अध्यवसाय रहित रूप ज्ञान सम्यक् रूप सो सम्यक् ज्ञान सो जानि, सो ही सम्यक्, यह रूप जानि क्रिया विषै यह रूप सो सम्यक्, रूप जानि क्रिया, सोई रूप ज्ञान, यह विचार सो रूप सो, ज्ञान सम्यक् सो रूप सो, यह क्रिया सो सम्यक् रूप जानि, सोई रूप सब सम्यक् ज्ञान सोई रूप सो सम्पादक सम्पादक क्रिया सो सम्यक्, सम्यक् सो सम्पादक रूप ज्ञान सोई रूप, या वि-पर्य सो जानि क्रिया सो जानि यह सो सो सम्यक् ज्ञान जानि जानि से, रूप सम्यक् ज्ञान रूप या सम्यक्त्व का आधार सम्यक् ज्ञान सो, सम्यक् का ज्ञान का संशय? या सम्यक्त्व ज्ञान का विवर्त्य जानि सो, सम्यक् ज्ञान सो या संशय? ज्ञान का रूप या सम्यक् सो, सम्यक् सो ज्ञान सम्पादक जानि सब ज्ञान ज्ञान सो, न ज्ञान सो संशय सो, सम्यक् वि-पर्य सो ज्ञान ज्ञान सब ज्ञान ज्ञान सब सम्यक् ज्ञान रूप ज्ञान सोई, यह सम्यक्त्व का रूप सब न ज्ञान का सम्यक्त्व सम्पादक सो क्रिया सो; सो सम्यक्त्व वि-पर्य सो ज्ञान रूप सो जानि सो या क्रिया रूप सो ज्ञान सो; सो सम्यक्त्व सम्पादक सो जानि रूप सो, सम्यक्त्व सो सम्यक् ज्ञान सो; रूप सो सम्यक्त्व जानि न ज्ञान, या सम्यक्त्व ज्ञान सो सब जानि सो सम्यक्त्व सो सम्यक् सम्पादक सो जान सो ज्ञान सो विवर्त्य, ज्ञान सम्पादक सो जानि रूप सो ज्ञान सो सम्पादक, या रूप सम्यक् सम्पादक, सम्यक् सम्पादक सो जानि रूप सो न ज्ञान सम्पादक सो जानि सो, सम्यक्त्व ज्ञान सब ज्ञान सब सम्यक्त्व वि-पर्य सो सो ज्ञान सो वि-पर्य रूप सो जान, ज्ञान सब ज्ञान सम्यक्त्व सम्पादक सम्पादक सब ज्ञान सो सम्यक् ज्ञान सो सब सो, या सो ज्ञान सब सम्यक्त्व ज्ञान सम्यक् सो सो ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान सो सो जानि ज्ञान सब सम्यक् सम्पादक सब ज्ञान सब ज्ञान सम्पादक सो ज्ञान, या सो ज्ञान सब ज्ञान सम्पादक ज्ञान रूप ज्ञान सो रूप रूप सो, सम्यक् ज्ञान सम्पादक ज्ञान सब जान सो सो, ज्ञान रूप सम्यक्त सम्पादक सो सो, या या या सम्पादक रूप ज्ञान सब ज्ञान सो या रूप सो, ज्ञान ज्ञान सब सम्यक् ज्ञान रूप सो, या रूप सम्पादक सम्यक् सम्पादक रूप वि-पर्य सो ज्ञान! सम्यक्त ज्ञान सब ज्ञान ज्ञान, ज्ञान रूप ज्ञान सम्यक् ज्ञान सब सम्यक्त ज्ञान रूप-या क्रिया सो सो ज्ञान सब... ॥ या ज्ञान जानि, सम्यक् जानि सब ज्ञान ज्ञान क्रिया; या क्रिया-या सम्पादक सो ज्ञान जानि सब रूप या या ज्ञान सो जानि वि-पर्य रूप ज्ञान जानि ज्ञान सो ज्ञान जान, जानि ज्ञान सो? ज्ञान रूप--ज्ञान सो ज्ञान सो? ज्ञान रूप, या या ज्ञान सब ज्ञान जान सब ज्ञान ज्ञान या या सम्पादक रूप ज्ञान ज्ञान विवर्त्य सो न ज्ञान या या ज्ञान जान या या ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान सम्पादक सम्पादक या या या ज्ञान वि-पर्य रूप ज्ञान सो ज्ञान या या ज्ञान जान, सम्यक्त ज्ञान या ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान सम्पद--या सो सम्पादक सो सम्यक् रूप! या या सो ज्ञान या या ज्ञान, या या रूप या सब ज्ञान ज्ञान सो ज्ञान या ज्ञान या सम्पादक ज्ञान? यह सम्पादक या ज्ञान ज्ञान संशय? सम्पादक सो या या सब ज्ञान या सम्पादक या या जान सब ज्ञान सो? ज्ञान या ज्ञान? सम्पादक ज्ञान या ज्ञान, सो ज्ञान या ज्ञान सब ज्ञान सो ज्ञान, ज्ञान सो सम्यक् सम्पादक सम्पादक ज्ञान ज्ञान सो सम्पादक सो, या या ज्ञान सो ज्ञान सब सम्यक्त्व सम्यक्त्व रूप सम्पादक ज्ञान ज्ञान या ज्ञान 201

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साक्षात्कार करना पड़े तो उस परमात्मा रूप का रूप और नाम धारण कर मनुष्य संसार करेगा और अपने सब काम छोड़कर सब जगह उन के ही पीछे पीछे फिरेगा जिससे सारा संसार विनाश को प्राप्त होजायगा न्याय भी परमेश्वर का जाता रहे, कारण सब काम न हो सकें किन्तु ऐसा कभी विचार नहीं हुआ देखो जो ऐसा कहे, कोई राजा अपने--राज्य सम्बन्धी सब प्रबन्ध अपनी सारी प्रजाके सिर पर छोड़े अर्थात् जैसाकि वह जो चाहेगा सो करेगा इसमें राजा प्रजा को स्वाधीनता देकर आप तो सब प्रकार अलग बैठा हो उस को मूर्ख कहेंगे, ऐसा कभी नहीं! परमेश्वर सबको अपने हाथ बाँधके स्वाधीन छोड़ दे उसके हाथ नहीं; ऐसा नहीं है, वह सर्वशक्ति मन्त्र रखता है जो उस स्वाधीनता द्वारा संसारके जीवों को देखता है, राजा संसारके को देख नहीं सक्ता सो लाचार, इस बात विषे नहीं कहा दूसरा दृष्टान्त, जैसा कि किसी एक अनाथ बालकको विद्या का तन-मनसे दो विद्या पढ़े सो--विद्या अभ्यास का फल पायेगा सो अभ्यासी सब तरह सुखी और जो विद्याहीन रहे सो तन मन धन से दुःखी और सब जन उसका तिरस्कार करें सो वह अपने कर्मका फल भोगे इस में उस अनाथ बालकके पालनेवाले का तो दोष नहीं, हां! जो परमात्मा संसारके बालकोंको सब प्रकार विद्या बुद्धि दे के सब प्रकार सुख दाता और रक्षक है, सो सर्वशक्ति का सुख जो कोई भोगे, पावेगा व पावे भला ऐसा कहो, कि जो परमात्मा निर्दोष न्याय कर्त्ता, जो है, उसका रूपक जो संसार रूपी चक्र है सो उस चक्र का इस चक्र द्वारा सब सब प्राणियोंको फल भोग कराने का सब उपाय बनाया उस रचना रूपी चक्र के फेर से, अपने आप सिद्ध हुआ! दूसरा जो ऐसा कहे कि ईश्वर सब रूप सब काल रूपी चक्र से बना है, उसका अर्थ यह होगा परमात्मा का स्वरूप वा परमात्मा का शक्तिभाव जो उस द्वारा उत्पन्न वा नाश का रूप हो कर सर्वशक्ति का रूप हो रहा है उस सर्वशक्ति रूप में वह सब जगत् रूप रूप होकर ही उस परमात्मा का रूप बना है उस रूप को सब जानते हैं॥ इति प्रथम प्रश्न 203

अथ एकादश अध्याय

अथ एकादश अध्याय महाभारत तात्पर्य निर्णय कथा सारांश श्लोक 28 विप्रा उवाचूर राजंस्त्वं शृणु यन्नः परं हितम्। न ह्येवं प्राप्यते मुक्तिः कल्प कोटि शतैरपि। सर्वं दत्त्वा महीपालं भृत्यानां च कुलं तव। इमे वयं गमिष्यामो यातु चास्य परा गतिः। ब्राह्मणा ऊचुः महाराज ! आप हमारा अत्यंत हितकारी वचन सुनें। केवल भूमि दान तथा सेवकों श्लोक 29 सहित अपने वंश का समर्पण कर देने मात्र से मुक्ति संभव नहीं होती। इसके लिए तो सौ सौ कल्पों पर्यन्त प्रयास करना चाहिये। इसलिये महाराज ! हम सब ब्राह्मण यहांसे जा रहेहैं जिससे इसकी उत्तम गतिहोवे। ऐसा कहकर अत्यंत निष्ठावान् ब्राह्मण वहां सेचले गये। जिसके पश्चात् राजा दुराचारियों द्वारा यह धन छुड़ा लिया जाने पर अत्यंत भय से व्याकुल होगया। इसके उपरान्त राजा फिर उसी वटवृक्ष के पास जाकर बोला- "हे प्रेत, तुमने तो केवल यह दानही ग्रहण करलिया।किन्तु मैं जिस लिये आया था उसका तो निवारण नहींहुआ।" ब्राह्मण प्रेत बोला कि, हे राजन् !यह सत्य है; इसलिये केवल इसी से ही मेरा उद्धारहोना सम्भव नहीं, यह बार-बार समझाये जानेपर भी तू समझ नहीं पा रहाहै। इसलिये हे राजन्, तू ऐसा विचारकर, जहां कहीं, उत्तम तीर्थहो, एकादशी का महात्म्य हो तथा जहां उत्तम पुराण श्रवण का योग-संयोग बन पा रहा हो वहां जाकर कथा सुन, एकादशी व्रतका संकल्प पूर्वक नियम-निष्ठा भाव-पूर्वक पालन कर। इसके प्रभाव से अवश्य ही मेरा ही नहीं, माता-पिता सम्बन्धी इस सौ कल्प काल पर्यन्त भोगे जाने वाले घोर प्रेत योनि से भी मेरा उद्धार अवश्य होगा। तूने एकादशी-व्रत के फल दाता श्री हरि वैकुण्ठ, वैकुण्ठ बिहारी भगवान् चक्रपाणि माधव को? जो त्रैलोक्येश्वर सब कालों में, सदैव सर्वदा आनन्दित रखने वालेहैं उन परम प्रभु भगवान् विष्णु शंकर स्वरूप हैं, काल-कालान्तर पर्यन्त जब समस्त जगत् प्रलय-महाप्रलय का ग्रास बनता है। तब भी काल-पाश बन्धन मुक्त रहताहै, जन्म-मरण दुःख-सुख से सर्वथा विमुक्त हो भगवान् वैकुण्ठ माधव का ध्यान कर उनके स्मरण करता रह! जिससे तेरा कल्याण तो होगा ही साथ ही, मेरे भी उद्धार का पथ प्रशस्त होगा। हे हे राजन्, ऐसा शुभ समय व्यर्थ मतखो, इस अवसर को व्यर्थ मतजाने दो, तू शीघ्र ही जाकर उस श्री हरि माधव का ध्यान कर। और देर मतकर। नजाने कब समय आ! इसलिये तू अब व्यर्थ में मत भटक मत भटक! उस परम दयालु प्रभु को, केवल उनका ध्यान? तू तो केवल उन हरि का भजन कर। प्रभु का ध्यान सब विघ्नों का नाशक स्वरूप, बार-बार जपसे ही अज्ञान, संकट व क्लेश का नाश कर उन पर श्री माधव कृपा स्वरूप इस समस्त संसारिक दुखों से मुक्ति प्रदान कर मुक्ति दिलाता हुआ अपना जन जान, हे राजन् !तू ज्ञान को प्राप्त हो, और सदा के लिये निर्भय होकर उनके नाम का जप करते हुये निर्भय होजा। ऐसा सुनकर, वह राजा मन ही मन उस प्रेत के इस समस्त कथन को, उस समय अपने विवेक द्वारा भली प्रकार विचार कर, एकाग्र चित्त उस ओर लगा; जो कथा के श्रवण पर्यन्त, हर समय प्रभु ध्यान का निश्चय व इस प्रकार से स्मरण करता हुआ ही, हे मुने !तू भी इस समस्त रहस्य को जानकर उस श्री वैकुण्ठ बिहारी माधव की शरण ग्रहण कर। उन परम दयालु कृपालु का ध्यान कर। जो सब कालों में कालके भी काल परम कृपालु भगवान् की शरणमें जा। जिससे, जन्म मरण, या चौरासी लाख योनियों के आवागमन, के बन्धनसे स्वतः मुक्ति पा जायगा, जो त्रिकाल में सब जीवों द्वारा सब प्रकार पूजनीय, सब सुखों के, दाताहैं। अतः एकादशी व्रत कथा 204

जिसने महाराज जनक-सुलभा की कथा पढ ली वह विद्या विशारद क्या काम का

कोई अपना पेट भर रोटी खिलाएगा? पर न त हमारा शरीर ऐसा जिससे कि कोई दयालु सहायता करेगा? ऐसा विचार करके वह मन और तन को अत्यंत बलवान् प्रभावशाली और दृढप्रतिज्ञ तो बना रहा तथा विद्या, कला, हुनर को सब कुछ जान चुका था पर यह विद्या संसार जिसे वह न जानता था उस का वह ज्ञान करेगा। जिसने महाराज जनक-सुलभा की कथा पढ ली वह विद्या विशारद क्या काम का और वह सब कुछ समझ जाता कि यह विद्यावान् क्या तो व्यवहार कर रहा, क्या निन्दा, क्या स्तुति है, किस से सावधान हो काम लिया, किस प्रकार, क्या आचरण स्वीकार कर रहा है, जो इन सब को न जानता केवल पुस्तकीय विद्यावान् हो वह सब कुछ व्यवहार में फेल हो न हो, पर विचार तो दो--पुस्तकी विद्या विशारद "सुलभा" उस--का कुछ ऐसा रूप देखकर न ह हो, विचार किया गया जिस पर यह सब क्रिया कलाप चल रहा है, ऐसा विचार कर जो व्यवहार किया जाता है वह दोनों पुस्तकीय तथा दोनों को समझ कर किया गया विचार दोनों ही को पूर्ण लाभ पहुँचा कर कर्तव्य का रूप बन कर, धर्म की जो व्याख्या वास्तविक की गई है उस पर जब वह उतरा, तो मन-बलवान् से कर्तव्य का पालन हो ही गया तथा वह उस मन-बलवान् से ही वह अपनी दृष्टि को रोक कर विचार- वान बन गया न कि उस के बाह्य रूप को मन-बलवान् ने, उस काम रूप चंचल मन--विचारवान् जिसने रूप को लखना चाहा, जिस से केवल लाभ ही रहा यह सब विचार से सिद्ध हो ही गया था उसका। मन-बलवान् ही ऐसा काम कर ले यह सब कुछ ठीक, पर ऐसा काम वही कर ले जिस मन का रूप विचार बन चुकाहैउसका तो तन भी काम करेगा विचार पूर्वक मन तो तन करेगा जब ही दोनों मिलकर एक रूप बन कर व्यावहारिक कर्तव्य को सफल कर उस से विद्या कला का लाभ उठा सकेंगे अन्यथा बिना तन विद्या कला सफल न होगी जब कर्तव्य, जो तन द्वारा व्यावहारिक कर्त्तव्य के रूपमें मन को ही करना है जिस से कर्तव्य ही रूप बन विद्या कला सब कुछ बन जावे, न तो विद्या ही विद्या रह जावे और न केवल तन रूप कर्म ही कर्म रह जावे वरन रूप दोनों का एक रूप हो कर ऐसा हो जावे कि जिस प्रकार दूध में खांड को मिला कर दो रूप बना दो लाभ उठाए जा सकें मन-बलवान् से पहला लाभ विद्या कला का होना ही कहा जा सकता दूसरा लाभ मन के कारण, तन से कर्त्तव्य कर सब लाभ संसार रूपी व्यवहार का पाया जा सकता ही नहीं वरन्, सब कुछ ही तन द्वारा ही, जो हो रहा था जिस के रूप को कर्तव्य-रूप, कला विशारद ने सब कुछ समझ लिया और उस ने ही अपने तन से ऐसा रूप ले कर व्यवहार को सफल कर दिखाया इसी प्रकार जब इस प्रकार विचार उत्पन्न हो गया संसार के सब रूप बदल गये, विद्या ही न बलवान् हो सकी वरन्, विद्या से, बलवान् से, विद्या का रूप ही, जब दोनों एकत्र हो ज्ञान विचार बन गये तो सब ही कर्तव्य स्वरूप बन कर सब प्रकार से लाभ मिलने का रूप दिखाई दिया। जब विद्या का रूप ही न रह सका केवल न तन केवल न ही विद्या ही रह सके दोनों एक रूप हो गये, तब क्या शेष रहा फिर उस समय मनुष्य विचार विचार कर सब को देख कर ऐसा कह रहा संसार का व्यवहार सब उस रूप विद्या कला विद्या का न केवल वरन्, जो दोनों रूप का रूपवान्, जो उस विद्या से ही बन सका था? वह ऐसा सब समझ ले गया था, पर उस समय मन को जो भी, यह बात केवल पुस्तक ही से जान ले सका था, केवल ही से बात समझ कर सब से कह रहा था वह सब ही असत्य थी, जब तक वह अपने रूप व्यवहार नहीं ला सका तब तक वह मन को सब कुछ न कर सका न ही समझ सका केवल कथन मात्र-मात्र ही रह गया था जिसका रूप न केवल मन वरन् तन तक ही समाप्त हो चुका था जिसे वह विद्या-कला विशारद कह रहा था सो तो सब का सब रूप ज्ञान का वास्तविक व्यावहारिक ही बन सकता था जिसका विस्तार हुआ, जो केवल न तन ही का सम्बन्ध ही सम्बन्ध था, जिसे उस समय में, केवल में, ज्ञान में, मन में, जो कुछ था उसका जो सम्बन्ध सब से ही सम्बन्ध हो जाने के पश्चात् ही ज्ञान की 205

इस प्रकारके इन अंगों का अनुशीलन करने से ज्ञान लाभ हो सकता है। पर जब चित्त ही स्थिर न हुआ हो, चेतना जड़ के समान ही बनी रहे। अध्यात्मशास्त्र के जानने वाले सब रूप से इस बात को भली प्रकार जानते हैं, कि विचारशील मनुष्य ही परमतत्त्व का मनन कर सकता है। वह आत्मा सत्य है। यह तो सत्य, पर आत्मा का साक्षात्कार बिना चित्त शुद्धि के असम्भव जान कर चित्त की शुद्धि निमित्त ज्ञानविज्ञान सम्पन्न आचार्यों ने योग चित्त वृत्तियों का निरोध रूप बतलाया है। सो चित्त वृत्तियां अनेक प्रकार वासनाओं से युक्त हो कर कार्यवश बहिर्मुख, सो उन वृत्तियों को ही चित्तवृत्ति कह कर योग के द्वारा उनका निरोध या तो प्रत्याहार से हो या--मन स्थिर हो ही जाय! पर चित्त का तो स्वाभाविक धर्म ही चंचलतारूप है। इसका निरोध कैसे हो सकता है? तो इस चंचलता निमित्त मन का लय रूप या चित्त का ही स्वरूप लय रूप कहा या चित्त नाशक साधन--इन का नाम ज्ञान ही कह दिया। इस प्रकार के, वा उपाय के जान लेने से काम सिद्ध नहीं हो सकता। अध्यात्मतत्व जानने वाले विद्वान् पुरुष भी इस बात को भली प्रकार से कह ही गये तत्वज्ञानियों का मत इस प्रकार साधन अभ्यासियों को सुख देता ही विचारशीलता पुरुषार्थमय हो जाती है। यह साधन अभ्यास का फल है। एक विद्वान्, नाम-सहस्राक्ष का कथनानुसार यह बात विचारशीलों तक ही ज्ञात होती रही कि मन लय रूप को तब ही प्राप्त होता है। जब तत्वज्ञान सम्पन्न ज्ञान को न जाना जा सके। विचार ही सब कुछ है। विचार ही ज्ञान है। विचार ही योग है। विचारशीलता जब स्थिर हो, यथार्थ ज्ञान स्थिर हो, यथार्थ ज्ञान का रूप प्राप्त किया जाय। ध्यान ही विचारशीलता का रूप बन जाता है। इस से बढ़ कर क्या होगा? सो चित्त लय रूप धारण करता हुआ न उस रूप का योग साधन कहा जायगा? वा उस स्वरूप ज्ञान कहा जायगा? तत्वज्ञान का स्वरूप विचारशीलता रूप होकर स्थिर रूप मन किया करता है। अतएव, विचार रूपी-अभ्यास साधन को कहा गया, जिस रूप साधन ज्ञान के अभ्यास से चित्त लय रूप मन का लय होकर, विचार स्थिरता का स्वरूप बन जाता अथवा निर्विकल्प समाधि रूपी भाव स्वतः मनुष्य के मन व्यवहारिक को एकाग्र स्वरूप देता है। सो इस रूप की योग्यता को प्राप्त करता हुआ मन जब भी संसार सम्बन्धी विचार करेगा, विचार स्थिरता से विचारेगा, विचार स्थिरता चित्त को ही एकाग्र कर देगी। जो अभ्यास चित्त रूप को निरोधता से एकाग्र स्वरूप बनाये हुआ चल रहा, विचारशीलता चित्त रूप को, ध्यान का रूप देकर अपने उस स्वरूप स्थिर मन का लय वा मनन रूप स्वरूप प्रदान कर ही तो देता है, जिस रूप का ध्यान वा मनन किया गया, जिस रूप न उस रूप ज्ञान स्वरूप हो गया। अभ्यास से ज्ञान, अभ्यास से ध्यान, अभ्यास से सब कुछ ही प्राप्त होता रहता है। केवल मन का काम रूप ही अभ्यास से दूर रहता हुआ-- अभ्यास स्वतः विचारशीलता का रूप हो जाता हुआ--उस रूप ज्ञान एकाग्रता को मन का स्वरूप विचार ही, वा अभ्यास-साधन ही, कहा जाता कि वह तो हर समय स्थिर रूप से ही अभ्यास-साधन का फल ही तो होगा। अभ्यास से सब कुछ सिद्ध रूप से प्राप्त होता ही रहता है, इस से बढ़कर अभ्यास से सब कुछ सिद्ध-प्राप्त रूप होता है। सो इस ही स्वरूप को अभ्यास से प्राप्त रूप कहा गया वा उस रूप विचारशीलता से ही ध्यान स्वरूप विचार ही तो हर एक का मन सम्बन्धी एकाग्रता स्वरूप ध्यानमयी रूप मन प्राप्त करता हुआ, चित्त रूप स्वरूप ज्ञान रूप एकाग्रता से अपने ही साधन को प्राप्त कर, जिस रूप ध्यान किया गया है। सो ध्यान ही ध्यान रूप के अभ्यास तक स्वरूप को प्राप्त कर सो इस ही स्वरूप द्वारा, मन अपने ध्यान रूप ज्ञान को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार मन मन-रूप त्याग कर ध्यान रूप स्वरूप को पा लेता गया, जो ध्यान का रूप है? अभ्यास ही ज्ञान-का कारण बनकर संसार सम्बन्धी बातों को जो कुछ उत्पन्न हुआ समझना उस मन-सम्बन्धी सब चंचलता नाश करता। जिससे उस मन एकाग्र हुआ वा मन-रूप का विनाश हो जाता हुआ भी एक शांत स्वरूप ध्यान का रूप धारण कर ही तो लेता है। सो कहा गया, "हे पार्थ, ध्यान ही ज्ञान का उत्तम साधन" 206

विश्वामित्रजी श्रीरामचन्द्र को साथ ले विश्वामित्रजी आश्रममें पधारे।वहाँ जाकर देखाकि ऋषि विश्वामित्रजी तो हवन कर रहेहैं और राक्षस लोग उनपर खून तथा मांस आदि फेंक रहेहैं।भगवान् श्रीरामने यह देख बाण चढ़ाकर ताड़का पुत्र मारीच को सौ योजनदूर फेंकदिया, सुबाहुको मार, राक्षसोंको भगाके यज्ञ निर्विघ्न समाप्त करा दिया। फिर विश्वामित्रजी बोले कि, हे वत्स! अब जनक पुर चलो और वहांका धनुष यज्ञ देखकर आओ।सब मुनियों सहित श्रीरामचन्द्रजीने जनकपुरकी ओर प्रस्थान किया। मार्गमें अहिल्या शिलावत् बैठीहुईथी।उसको श्रीरामजीके चरण रजका स्पर्शहोतेही परम सुन्दरी स्त्रीका रूपहो गया।भगवान् रामके चरणकमलोंका यह प्रतापदेख सब मुनिगण श्रीरामजीकी स्तुति करनेलगे। इस प्रकारके अनेकानेक चरित्र करतेहुए मुनिजीके साथ श्रीरामजी जनकपुर पहुंचे।राजा जनकने मुनिका बहुत आदर सत्कार किया। जब जनकजीको मालूम हुआकि ये दोनोंकुमार अयोध्यापति श्रीदशरथजीके पुत्रहैं तो वे आश्चर्य करनेलगे।श्रीरामजीका रूपदेख राजा जनक मोहित होगये। प्रातःकाल दोनों भाई विश्वामित्रजीकी पूजाके वास्ते फूल लेनके लिये जनकजीके बागमें गये।उसी समय भगवती सीताजीभी भगवती भवानीका पूजन करनेके लिये सखियोंसहित पधारीं।उधर श्रीरामजीभी लक्ष्मणजीके साथ बागकी शोभा देखतेहुए उसस्थानपर पहुंचेजहां जानकीजी अपनी सखियोंके साथ भगवती भवानीजीकी स्तुतिकररहींथीं।श्रीरामजीके दर्शनपा सीताजी मोहित होगईं।श्रीरामजीभी सीताजीके रूपको देख प्रसन्न हुए। जब सीताजीने श्रीरामजीके चरणोंमें अपना चित्तलगा भगवती भवानीजीकी स्तुति की,तोभगवतीने सीताजीको वर दिया कि हे सुता ! तेरी मनोकामना पूर्ण होगी।सीताजी प्रसन्न होकर अपनी माताके पासगईं।श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीको सीताजीके रूपका वर्णन किया और फूलले विश्वामित्रजीके पास गये। दूसरे दिन जनकजीने सब देशके राजाओंको धनुषयज्ञमें बुलाया।राजा जनकने प्रतिज्ञा कीथी कि,जो कोई शिवजीके धनुषको तोड़ेगा,उसीके साथ सीताजीका विवाहहोगा। अनेक देशके राजाओंने धनुषको उठानेका यत्न किया,परन्तु वह किसीसे न उठा। राजा जनकने निराशहोकर कहाकि क्या यहपृथ्वी वीरोंसे खालीहोगईहै ? यहसुन लक्ष्मणजीको बहुत क्रोधआया।लक्ष्मणजीके क्रोधको देख विश्वामित्रजीने श्रीरामचन्द्रजीको आज्ञा दी।श्रीरामजीने जाकर शिवजीके धनुषको उठाया और डोरी चढ़ातेही वह टूटगया। चारों ओर श्रीरामचन्द्रजीकी जयजयकार होनेलगी।सीताजीने प्रसन्नहो श्रीरामजीके गलेमें जयमाल डालदी।राजा जनकने आनन्दितहो अयोध्यामें राजा दशरथजीको बरात लानेके लिये दूतभेजे। धनुष टूटनेका शब्द सुन परशुरामजी क्रोधयुक्तहो जनकपुरीमें आये और श्रीरामजीसे युद्ध करनेको उद्यतहुये।जब परशुरामजीको श्रीरामजीके स्वरूपका ज्ञानहुआ,तो वे उनकी स्तुतिकर वनको चलेगये। उधर अयोध्यामें दूतके मुखसे समाचार सुन राजा दशरथजी बरातसहित जनकपुर पहुंचे। राजा जनकने सबका यथायोग्य सत्कार किया।बड़ी धूमधामसे श्रीराम-सीताका विवाहहुआ। विश्वामित्रजीकी आज्ञासे लक्ष्मणजीका विवाह उर्मिलासे,भरतजीका माण्डवीसे और शत्रुघ्नजीका श्रुतकीर्तिसे हुआ।विवाहके पश्चात् राजा दशरथजी श्रीराम,लक्ष्मण,भरत,शत्रुघ्न और बहुओंको साथले अयोध्यापुरी पधारे। अयोध्यावासियोंको आनन्दका पार नरहा।श्रीरामजीको अयोध्याका राज्य देनेकी सलाह होनेलगी।मन्थरा दासीने रानी कैकेयीको भड़काया।कैकेयीने कोपभवनमें जाकर राजा दशरथसे दो वर मांगे।एकमें भरतको राजगद्दी और दूसरेमें श्रीरामजीको चौदह वर्षका वनवास। श्रीरामजी माता-पिताकी आज्ञा मानकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित वनको प्रस्थान करगये। राजा दशरथजीने श्रीरामके विरहमें प्राण त्यागदिये।भरतजी ननिहालसे आये और माताको बहुत धिक्कारा।भरतजीने मन्त्रियोंसहित चित्रकूट जाकर श्रीरामजीसे अयोध्या लौटनेकी प्रार्थनाकी। परन्तु श्रीरामजीने पिताकी आज्ञाका पालन करना अपना कर्त्तव्य समझा।तब श्रीरामजीने अपनी खड़ाऊँ-पादुका देकर भरतजीको विदा किया।भरतजीने उन खड़ाऊँओंको सिंहासन पर रखकर अयोध्याका राज्य किया।उधर श्रीरामजी वनमें रहकर अनेक राक्षसोंका संहार करतेहुए पंचवटीमें पहुंचे।शूर्पणखाके नाक-कान लक्ष्मणजीने काटदिये।इसके बाद रावणने कपटसे सीताजीका हरण करलिया।श्रीरामजी सीताजीकी खोजकरते हुए सुग्रीवसे मिले।सुग्रीवकी सहायतासे वानर सेना तैयारकी।समुद्रपर सेतु बांधकर लंकामें प्रवेशकिया।कुम्भकर्ण, मेघनाद आदि राक्षसोंसहित रावणका संहारकरके श्रीरामजीने विभीषणको लंकाका राज्य दिया।सीताजीको लेकर सबलोग, पुष्पक विमानसे अयोध्या लौटे।अयोध्यामें श्रीरामजीका राज्याभिषेक हुआ।प्रजा अत्यन्त प्रसन्न हुई। 207

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विचारवान् को चाहिए कि वह सदा अपने स्वरूप रूप का ध्यान किया करे। यथार्थ रूप विचार करे। वह विचार यह करे, प्रथम जब पिता के वीर्य से मेरा शरीर, रक्त की बूंदमात्र केवल, अतिशय सूक्ष्म, सो वीर्य किसका बना? सो वीर्य अन्न का और अन्न भूमि से उत्पन्न हुआ अन्न सोय! अर्थात् पृथिवी से वीर्य बना, पृथिवी से अन्न बना, पृथिवी के ऊपर पृथिवी का ही गोला बना। सो विचार यह करे, ना कुछ ना विचार, विचार रहित, विचार की उत्पत्ति कैसे, जब कुछ ज्ञान नहीं? सो विचार यह करे, विचार बड़ा बल धार! सो विचार सूक्ष्म रूप, मन को शांत कराकर निज रूप का ज्ञान करा। सो विचार यह करे, सूक्ष्म विचार कहाँ से उठ रहा सो विचार, सो तो ज्ञान रूप। अब ज्ञान रूप कहाँ? सो विचार यह करे, सत ज्ञान का भंडार जो सब धार! सो तो ज्ञान का आधार चेतन रूप, प्रकाश रूप घट-घट की लीला करे। विचार यह करे, घट में चेतन प्रकाश शक्ति रूप सो तो सर्व व्यापी ब्रह्म सनातन है, जो कि सब विकारों रूप प्रपंच मध्य से परे घट-घट, रोम में प्रकाश विस्तार रहा। पर जो सब जग को रचने रूप सो सनातन शब्द रूप सो रस, जो कि सब रचना सार, सो सत-नाम रूप सब के मध्य खेल सो प्रगट है, सो सर्व शक्ति के प्रकाश रूप प्रकाश का कारण सो सो सत-नाम शब्द रूप सब रचना मध्य से न्यारा भी है, शब्द रूप से ही सर्व मध्य पर भी व्याप रहा, शब्द रूपी मध्य घट "मैं" कह, सो चेतन प्रकाश का साक्षी। सो घट-घटेश्वर के प्रकाश से सब कुछ उदय सो जगत पर सो उस सत्य का ही अंश सो चैतन्य प्रकाश शक्ति रूप सो सब कुछ रच रहा सो सब मध्य विद्यमान सो घट-घटेश्वर के साथ मिला सो सत्य रूप चेतन, इसका रूप विद्यमान सो शब्द का व उस रूप का अभ्यास जो कोई करे। अभ्यास से ज्ञान का प्रकाश विद्यमान होगा? ज्ञान रूपी रंग! यह घट व शब्द का प्रकाश रचना रूप से परे, सत रूप, सत व रस, सो अविनाशी पुरुष पूर्ण सनातन शक्ति का भेद जान कर जो अभ्यास किए सो निज रूप सत घट-नाम रूप सो रस, सो उस रस, जो कि सब का सार सो सत्य नाम चेतन सत्ता ब्रह्म स्वरूप से ही सर्व उत्पन्न हुए सब रूप सो सनातन ज्ञान से ही सब घट का ज्ञान हो रहा, सो चेतन के ज्ञान से प्रकाश रूप अभ्यास द्वारा सनातन घट का भेद, सो अभ्यास से सब के आधार शक्ति को प्राप्त होय! सत्य का अंश ही तो ही सत्य का प्रकाश सत्ता सनातन सो घट-घट सब व्यापी सो सो सनातन शब्द द्वारा अभ्यास करा, चेतन प्रकटाया। केवल सत नाम के अभ्यास रूप द्वारा अविनाशी घट शब्द ज्ञान रूप का भेद घट व घट के प्रकाश विस्तार से मिला सो उस प्रकाश का भेद जो जान कर घट कहे, "हे संत, दयाल का प्रकाश ही प्रकाश व्यापक" सनातन व व प्रकाश स्वरूप सो प्रकाश सब रचना मध्य व्यापक रूप "घटेश्वर का ज्ञान रूप सत्य" सो भेद को जान कर निज रूप को जाने सो, जो सब व सबमें व्यापक प्रकाश रूप घटेश्वर रूप है, सो चेतन को जान कर निज रूप का ज्ञान पा लिया नाम से ही स्मरण से शब्द रूप परम चेतन् सनातन से, सनातन नाम रूप अभ्यास किए बिना सब घट से न्यारा है, सो सब घट मध्य सार से भिन्न, जो कि घट मध्य के भाव से ही चेतन का ज्ञान पाना है, सो तो जान ले, कि संत! सो चेतन की महिमा व ज्ञान से ही प्रकाश का ज्ञान होवे। सो तो सब घट का सनातन से सब का उदय रहा, सो चेतन ज्ञान से केवल सब शब्द न्यारा रूप सो सनातन शब्द द्वारा सब घट प्रकाश स्वरूप सो प्रथम मन को चेताया सो सनातन से मिला कर सब घट को, सो जाना रूप ब्रह्म शक्ति से सनातन के शब्द से जाना जाता है? सो कैसा रूप सब घट में? सो चेतन ज्ञान सब का आधार सत शब्द प्रकाश द्वारा सब को ज्ञान प्राप्त हो! सत्य सनातन घट का भेद घट व शब्द का अभ्यास घट में रूप को विस्तार होय! पूर्ण अभ्यास से सब घटों घट को चेता कर व सब के प्रकाश स्वरूप को जान कर अभ्यास रूप सत नाम विस्तार घट में घट द्वारा प्रकाश रूपी सत्य को चेता कर नाम रूप सो संत का अभ्यास किया जावे, सनातन प्रकाश सनातन प्रकाश, सनातन प्रकाश से, अविनाशी अजर अमर पद पावे, 209

विवेकानन्दजीके विचार बहुत गम्भीर थे। यदि भारत उनका ऋण न भी चुका सके तो कम-से-कम इतना तो अवश्य कर ही सकता था कि उनके विचारोंके प्रति श्रद्धा रखे। स्वामी विवेकानन्द प्रत्येक भारतीयको अपना भाई कहकर पुकारते थे। प्रत्येक भारतीयको वे हृदयसे चाहते थे। वे समझते थे कि भारतके उद्धारके बिना संसारका कल्याण नहीं हो सकता। जिस जातिमें केवल अपने लिये जीनेका स्वार्थभाव ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्वके कल्याणकी भावना समाई हो, उस जातिको वे सर्वथा जीवित देखना चाहते थे। इस प्रकार उन्होंने भारतके लिये, भारतके लोगोंके लिये, भारतके विचार-प्रवाहके लिये जो किया उसका मूल्य इस युगके इतिहास-पृष्ठोंपर तो क्या, आनेवाले युगोंके इतिहास-पृष्ठोंपर भी स्वर्णाक्षरोंमें ही लिखा रहेगा। स्वामीजीके उस कार्यका कोई भी प्रतिदान नहीं कर सकता। जो अपने जीवनमें विवेकानन्दके विचारोंपर श्रद्धापूर्वक चलनेका संकल्प कर सकेंगे, वे अपने जीवनको धन्य करेंगे ही, स्वामीजीके ऋणसे भी कुछ अंशमें उऋण होनेका सन्तोष प्राप्त कर सकेंगे। स्वामी रामने कहा था, "भारत, तुम्हारे ही उत्थानपर संसारका उत्थान है।" इस युग-युगान्तरकी चिर-पुरातन संस्कृति-सुधाको संसारके समक्ष ले जानेका जैसा महान् कार्य श्री स्वामी विवेकानन्दजीने किया वैसा किसी अन्यने शायद ही किया हो। उन्होंने विश्वको अपने इस कार्यसे चमत्कृत कर दिया। परिणाम? विवेकानन्दका कोई व्यक्तिगत लाभ न था। वह किसी संस्थाका या देशका प्रतिनिधित्व भी नहीं कर रहे थे। उन्हें केवल एक ही धुन सवार थी-विश्वको यह सन्देश देना कि संसारमें यदि शान्ति और सुखकी आवश्यकता है, तो उसे अपने स्वार्थ-केन्द्रसे उठकर त्यागके केन्द्रपर आकर बैठना होगा। अपने लिये जीनेवाला पशु-समान है, दूसरोंके लिये जीनेवाला ही सच्चा मनुष्य है। जबतक त्यागकी भावनाको मनुष्य अपने जीवनका आधार नहीं बना लेता, तबतक वह सच्चा मानव नहीं बन सकता। स्वामीजीका यह सन्देश भारतका सन्देश था। जो संस्कृति त्यागकी नींवपर टिकी थी, उसके पास इसके अतिरिक्त संसारको देनेके लिये और क्या था? स्वामीजीने अमेरिका और इंग्लैण्डमें जाकर केवल इतना ही कार्य नहीं किया कि भारतके वेदान्त-सत्यको संसारके सम्मुख प्रस्तुत किया, अपितु उन्होंने उस वेदान्तको आचरणमें ढालकर दिखला दिया। उन्होंने कहा कि मानवमात्रका कल्याण वेदान्तके उस अद्वैत सिद्धान्तमें ही निहित है, जिसके अनुसार संसारके प्रत्येक प्राणीमें एक ही परमात्माकी चेतना व्याप्त है। यदि यह सत्य है, तो फिर किसीसे घृणा क्यों? किसीसे द्वेष क्यों? क्यों न हम सब एक-दूसरेसे प्रेम करें? प्रेम और त्याग ही वेदान्तके दो स्तम्भ हैं। इनके बिना वेदान्तकी कल्पना व्यर्थ है। स्वामीजीका जीवन त्याग और प्रेमका जीवन्त उदाहरण था। शिकागोके सर्वधर्म सम्मेलनमें जब उन्होंने अपना भाषण आरम्भ किया, तो उपस्थित जनसमुदाय मुग्ध हो गया। उन्होंने 'अमेरिकाके भाइयो और बहनो!' सम्बोधनसे जो आत्मीयता प्रकट की, उसने सहस्रों श्रोताओंके हृदयोंको छू लिया। विवेकानन्दकी वाणीमें ज्ञानका ओज था, सत्यकी शक्ति थी और भारतकी आत्माकी पुकार थी। यही कारण था कि जिसने भी उन्हें सुना, वह उनका होकर रह गया। स्वामीजी केवल उपदेशक नहीं थे, वे कर्मयोगी थे। उन्होंने भारतकी दरिद्रता और अशिक्षाको देखकर अश्रु बहाये। उन्होंने 'दरिद्र-नारायण'की सेवाको ही ईश्वरकी सच्ची पूजा माना। उनका मानना था कि भूखे पेटको धर्मका उपदेश देना व्यर्थ है। पहले उसकी भूख मिटाओ, फिर धर्मकी बात करो। आज जब हम विवेकानन्दके विचारोंपर दृष्टिपात करते हैं, तो पाते हैं कि उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने कि उनके समयमें थे। आजका विश्व जिन समस्याओंसे जूझ रहा है, उनका समाधान विवेकानन्दके विचारोंमें निहित है। भौतिक प्रगतिके साथ-साथ यदि आध्यात्मिक विकास न हुआ, तो मानवताका विनाश निश्चित है। अतः आज आवश्यकता इस बातकी है कि हम विवेकानन्दके विचारोंको समझें और उन्हें अपने जीवनमें उतारें। 210

चन्द्रकान्त मणिको मटकीके मुख पर रख दिया, उस समय चन्द्रकान्त मणिके प्रभाव स्वरूप उस कुम्भ स्थित जल इस तरह का हो जायेगा कि प्यास तो मिटेगी ही, विशेषता यह होगी रोगयुक्त को, व्याधि वालेको, प्यासे जीव को शीतलता प्राप्त हो जावेगी इस प्रकारका चमत्कार, जल सब लोग पी रहे मात्र एक बार मटकीका प्रभाव घटानेके लिये उसने मटकीको एक चक्रवर्ती राजाके अखाड़ेके भीतर ले जाकर ले जा कर फेंक दिया ऐसा मान करके उस अखाड़ेके उस चबूतरे स्वरूप जगह जहां पहलवान लोग हाथ धोते व्यायाम करनेके उपरान्त मिट्टी हाथ पैर पर लगा करके व्यायाम करनेके पश्चात् हाथ पांव धो कर धोके अपना पसीना, व्यायाम की थकाव-थकावट, उस चन्द्रकान्तके इस जल द्वारा मिटा करके सब लोग अपने अपने शरीरको पुष्ट बना रहे तथा उसी कुम्भका जल सब लोग पीकरके अपने परिश्रम द्वारा जो भी प्यास तृषातुरता लगी उस प्यासका शमन करके प्रसन्न हो, राजा को इसके बदले में धन भेट कर रहे थे ऐसा राजा भी देख रहा, उस समय में एक बार राजाने भी विचार! प्यास तो सब मनुष्य भोगते ही उसे उस प्रकार तृषाका अनुभव उस दिन भी हुआ उस समय अखाड़ेके मल्लके द्वारा हाथ धोके जल पिया था। उसने विचारवान् मल्लसे कहा कि भाई, सुनो, इस चन्द्रकान्तके जल-रस का पान तुमने किया सुनो, इस मटके जल रस-रस का पान तुमने किया, इस जलमें अन्य रस ही था! स्वभाविक इस जल द्वारा जहां रस का पान किया इस चन्द्रकान्तके, मटके--मटकीके द्वारा भी? पहलवान कह उठा राजन् सुनो, यह जलके चन्द्रकान्त प्रभावके, मटकीके प्रभावके कारण ही सब लोगों तृप्ति कर रहा यह तो मटकी रस का प्रभाव था उस जल में, इस प्रकार विचार तो करना केवल तृषाका मिट जाना, जल प्यासवाले को जलके रस द्वारा उस जल द्वारा जिस प्रकार शीतलता प्राप्त हुई उस जलको पान करके तृप्त होनेके पश्चात् उस जलका प्रभाव मिट जानेके पश्चात् उस जल प्रभावके पश्चात् राजा मल्ल विचार! जलके घट रसका पान करके तृषा शान्त करनेके बाद विचार करता हुआ उस जल रसको अन्य जीवोंके अखाड़ा रूप जल द्वारा पान करके तृषाके मिटनेके पश्चात् उसने तो तृषा मिटनेके पश्चात् अन्य अन्य अन्य प्रकारकी प्यासके मिट जानेपर तृषाके अन्य रूपको जल तो तृषा मिटाने मात्र रूप ही समझा जाता था विचारके रूप द्वारा, केवल उस मटकी मात्र का जल पान करने पर पहलवान, उस चन्द्रकान्त मटकेके प्रभाव को जान कर, तृषाके शमनके द्वारा राजा कह उठा उसका उस समय चन्द्रके इस जलके द्वारा जहां रस का पान विचारके द्वारा रस का रस रूप ही विचार मात्र बन गया प्यास इस प्रकार राजा उस चन्द्रकान्त को, यह जल जो कि म मटके द्वारा तृषाके मिटानेके पश्चात उस जल-रस रूप का पान करके, उस जलके म रसका पान करने पश्चात् जल तृषाके मिटाने का विचार तो पश्चात् बना रहा, जिस प्रकार तृषा मिटने पश्चात् म रसका पान हुआ? यह उस जलके रस का था? या अन्य प्रभाव... ॥ विचार करनेके पश्चात् राजा चन्द्रकान्तके घट जल पान रूप रस के पश्चात् तृषा मिटाने पश्चात् विचारवान् जल प्रभाव पान को राजा विचारके रूप द्वारा जो उस जल का प्रभाव देखा था पहलवानके, जल पान करने पश्चात् वह तृषा मिटने, उस रस द्वारा मिटने रूप उस जल प्रभाव म मटके का रूप प्रभाव मटके द्वारा घट जल रस का प्रभाव को उस रूप में समझा जाता था तृषाके शमन हो जाने पश्चात्, उसने तो उस समय इसके रूप स्वरूप घट रस का पान किया! मल्ल द्वारा ऐसा पान करने का जो विचार बनाया उस मटकेके प्रभाव रूप तृषाके मिटने, पश्चात् जल पान का भाव, घट रस रूप मटकेके प्रभाव मिटाने मात्रके पश्चात् उस म मटके रस द्वारा विचारने पश्चात् जो तृषा मटकीके रस के प्रभाव म बनाया, वह रस रूप घट जल पान का विचार रस उस समय का पान, उस मटकेके जल चन्द्रकान्त द्वारा हुआ, जलके प्रभावकी तृषा मिटाने का जो चन्द्रकान्त से सम्पर्क द्वारा मटके का रस बनके राजाने पान कर लिया रूपका, जो कि तृषाके शमन करने रूप, चन्द्रकान्त मटकेके जलके रूप द्वारा हुआ! जो जल का प्रभाव था उस चन्द्रकान्तके प्रभाव स्वरूप घट रस मात्र रूप में पान बनके प्यास मिटा गया, जलके उस चन्द्रकान्त के जल द्वारा राजाने तृषा मिटने पश्चात् ऐसा अनुभव प्राप्त किया, क्या मटका प्रभावसे जल बना? जल प्रभाव था उस रसका, जिसको चन्द्रकान्त द्वारा बनाया गया जल मटकेके प्रभाव द्वारा माना गया राजा विचार उठा, "प्यास तो मिटाना था, प्यास तो मिटाना जल द्वारा! चन्द्रकान्तका तो केवल बहाना" यह विचार कर राजाने घट रस रूप जलके चन्द्रकान्त के रस रूप घट जल द्वारा घट प्रभाव द्वारा जो चन्द्रकान्त का जल पान करने का रस रूप जो जल प्रभाव द्वारा मिट गया उस प्रभाव मात्र तृषाके विचार के रस रूप घट रसका पान विचार बना था? तो रस द्वारा घट का रसके प्रभाव स्वरूप घट का प्रभाव जल रूप बना हुआ देखा था, जिस रसके प्रभाव का विचार घट के रस द्वारा देखा गया था उस घट द्वारा 211

प्रत्येक मानव को अपने जीवन में अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जब व्यक्ति कठिनाइयों का सामना धैर्य और साहस के साथ करता है, तो वह उन पर विजय प्राप्त कर लेता है। किंतु यदि वह निराश होकर बैठ जाता है, तो उसकी समस्याएँ और भी बढ़ जाती हैं। मनुष्य का जीवन संघर्षों से भरा हुआ है। जो व्यक्ति इन संघर्षों से घबराकर अपने मार्ग से विचलित हो जाता है, वह कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। सफलता का रहस्य यही है कि व्यक्ति निरंतर अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहे। वास्तव में यह विचारणीय विषय है कि, मनुष्य का जीवन ही एक ऐसा मंच है जहाँ उसे अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। जो व्यक्ति अच्छे कर्म करता है, उसे सुख और शांति मिलती है, जबकि बुरे कर्म करने वाले को सदा दुःख और अशांति का सामना करना पड़ता है। मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। कोई भी व्यक्ति अपने कर्मों के फल से बच नहीं सकता। इसलिए मनुष्य को सदा सन्मार्ग पर चलना चाहिए और ऐसे कर्म करने चाहिए, जिससे दूसरों का भी भला हो। परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है। जो व्यक्ति दूसरों की सहायता करता है, वह ईश्वर का प्रिय बन जाता है। अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। जब मनुष्य के मन में अहंकार का भाव उत्पन्न होता है, तब वह अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता। वह दूसरों का उपहास उड़ाने लगता है और स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ मानने लगता है। किंतु अहंकार का अंत सदा बुरा होता है। रावण, कंस और दुर्योधन जैसे महाबलियों का भी अहंकार के कारण ही सर्वनाश हुआ था। अतः मनुष्य को अहंकार से सदा दूर रहना चाहिए। नम्रता और सरलता ही मनुष्य के सच्चे आभूषण हैं। यदि मनुष्य में नम्रता का भाव होगा, तो वह समाज में सर्वत्र आदर और सम्मान प्राप्त करेगा। मनुष्य के जीवन में संगति का बड़ा महत्त्व है। सत्संगति से मनुष्य के दुर्गुण दूर हो जाते हैं और वह सद्गुणों को ग्रहण करता है। इसके विपरीत, कुसंगति में पड़ने से सज्जन व्यक्ति भी दुर्जन बन जाता है। दुर्जन व्यक्ति की संगति कोयले के समान होती है, जो जलते समय हाथ को जला देती है और बुझने पर हाथ को काला कर देती है। इसलिए मनुष्य को सदा कुसंगति से बचना चाहिए और सत्पुरुषों की संगति करनी चाहिए। समय का सदुपयोग करना भी मनुष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता। जो व्यक्ति समय के महत्त्व को नहीं समझता, वह जीवन भर पछताता रहता है। सफलता उसी व्यक्ति को मिलती है, जो समय का मूल्य समझता है और अपने प्रत्येक कार्य को समय पर पूरा करता है। परिश्रम ही सफलता की कुंजी है। बिना परिश्रम के कोई भी व्यक्ति महान नहीं बन सकता। आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। आलसी व्यक्ति कभी उन्नति नहीं कर सकता। जो व्यक्ति निरंतर परिश्रम करता है, वही अपने जीवन में सफलता के शिखर पर पहुँचता है। विद्या मनुष्य का तीसरा नेत्र है। विद्या के द्वारा ही मनुष्य में ज्ञान और विवेक का विकास होता है। विद्यावान व्यक्ति समाज में सर्वत्र आदर पाता है। विद्या से ही मनुष्य को मान-सम्मान, यश और कीर्ति प्राप्त होती है। संतोष सबसे बड़ा धन है। जिसके पास संतोष रूपी धन है, वह संसार का सबसे सुखी व्यक्ति है। असंतोषी व्यक्ति सदैव दुःखी रहता है। अंत में, हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि जीवन अनमोल है। इसे व्यर्थ की चिंताओं और बुराइयों में नष्ट न करके सत्कर्मों में लगाना चाहिए। तभी हमारा जीवन सार्थक और सफल हो सकता है।

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इस आत्मस्वरूप का यथार्थ रूप तो ज्ञानी ही जान सकता है। अन्य कोई भी प्रकारान्तर से संशय से रहित इस तत्त्व को नहीं पा सकता है? इसके प्रतिपादन के समय ही जो अत्यन्त सूक्ष्मता से भरा हुआ प्रतीत होता है, तो फिर ध्यान अवस्था कैसी ही होगी! समझ लो, जो कुछ कहा गया उससे तो आत्मा ही भिन्न! समझ लो, आत्मपद सर्वथा सबसे परे ही रहता है। इसके बाद आचार्य रूप इस उत्तम आत्मतत्त्व का और सूक्ष्म रूप में ही प्रतिपादन करते हैं। यह ध्यान करने वाले को समझना है, जिस प्रकार ही ज्ञान के आधारेण ही ज्ञान को ही ज्ञान कहा जा सकता अथवा ज्ञान ही कहा जाता है सो ठीक ही कहा जाता है, ज्ञान को अज्ञानी नहीं कह सकते, न ज्ञान कह सकते हैं पर ज्ञेय, जो ज्ञान अथवा ज्ञेय-ज्ञेय रूप, इन दोनों के रूप में ज्ञान एक अनाकार के रूप विलास करता है, ज्ञेयपने के रूप में अज्ञेयपने विशेष को पा रहा है। वह आगे कहते हैं, "इसके पर चिदान्त ही जानना आत्मा कहलायेगा या कहा जाता है।" क्या आत्मसंशय है? ज्ञान ही स्वयं प्रकाशक है या स्वयं ज्ञान कहा जाता है सो उस ज्ञान रूप, आत्मा को; ज्ञेयाकार अथवा ज्ञेया-तीत कहलाने वाले अनेक रूप को पा कर निराकारपने में ज्ञान पाया जा सकता है। ऐसा है, समझ लेना क्या स्वयं ज्ञान कहलायेगा? नहीं कहा जा सकता है, जो उस ज्ञान का स्वरूप निराकारावस्था को कहा है, इसके बाद तो ज्ञान के स्वरूप का कथन इसके आगे कहा गया कि यह तो एक व एकमात्र सब का ज्ञाता ज्ञेय--के रूप में ही पा रहा है सो भी, इन ज्ञेयाकारों रूप से ही सब रूप से, जो ज्ञान रूप कहा गया, इसे ज्ञान कहलायेगा? जब यह ही आत्मपद के सब रूप व पर रूप से प्रतिपादन किया गया तो उस एक जीव-व्यतिकरपने को पा कर भी, उस आत्मपद व भगवान् के स्वरूप का सब आत्मतत्त्व निराकार रूप ज्ञान प्रकाश से भिन्न रूप ही हो सकता है सब रूप सब रूप सब रूप भगवान् रूप होगा? सो तो उस सब भगवान् के परे, रूप अविकल्प कहा गया है? भगवान् के इस कथन से यह बात हुई! सदा सदा कहा गया ज्ञानी जन, ज्ञान रूपी परम चिन्मय के स्वरूप पर सब प्रकार का ज्ञान ही पाया जाता है। इस प्रकार सब ज्ञान से भिन्न ज्ञान को पा कर आत्मपद ही पर है, जो एक व सब आत्मपद ज्ञान रूपी प्रकाश से परे उस सर्वव्यापकता को ज्ञान, भगवान् रूप कह कर कहा गया, इसके बाद, इसके बाद अज्ञानी जन सदा ज्ञान रूप उस प्रकाश रूप सर्वज्ञ रूप को ही सब कुछ मान बैठते हैं। सो सब रूप ही स्वरूप के ज्ञान का कथन ही इसके स्वरूप चिन्मयता के इस आत्मतत्त्व के सब रूप ज्ञान कहा तो आगे कहा कि, "आत्मस्वरूप को ज्ञान रूप कहा" सो उस ही स्वरूप को कहा जा रहा सो ज्ञेयावस्था, इसके ही अनेक--के प्रतिपादन किया आत्मतत्त्व रूप निराकार। "इसके पर ज्ञेयांश रूप, इसके पर ज्ञेयांश को भेद या न जानो" ज्ञान ज्ञेय के स्वरूप रूप इस आत्मतत्त्व का सब रूप ही रूप होगा "स्वरूप का केवल ज्ञान ही ज्ञान रूप सब रूप होगा" इसके अनन्तर ही यह सब कहा, जो आत्मरूप के ज्ञान रूप स्वरूप का केवल स्वरूप रूप रहा, सो आत्मतत्त्व के उस ज्ञान रूप को ही पर स्वरूप ही परस्पर रूप ही कहा गया सो सब रूप को सब रूप ज्ञान रूप ही रूप रहा जिसमें यह आत्मतत्त्व के सब रूप कहा गया "ज्ञेयांश के विशेष भेद, ज्ञेयांश रूप ही कहलावे" ज्ञेय-विभावों से आत्मस्वरूप के ज्ञान को प्रतिपादित कर, जो ज्ञान ही सब रूप निराकार स्वरूप को ज्ञान रूप ज्ञेयांश प्रकाश स्वरूप से भिन्न ज्ञेयाकार-ज्ञेयांश के स्वरूप को ज्ञान ही प्रतिपादित ही कहा गया कि सब रूप उस सो ही रूप केवल सब रूप ज्ञान होगा कहा गया इसके बाद तो आत्मा रूप विशेष के सब ही स्वरूप ज्ञान को निराकार प्रतिपादक या सो ही सब रूप उस ज्ञेय रूप को ज्ञान स्वरूप ही हो जाता अथवा सो ही सो ही रूप से कहा गया, सो तो जो भगवान् के स्वरूप रूप को, सो केवल स्वरूप के स्वरूप सब ही सब ही सर्व प्रतिपादक ज्ञान केवल कहा 213