भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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पृष्ठ 204

अथ एकादश अध्याय महाभारत तात्पर्य निर्णय कथा सारांश श्लोक 28 विप्रा उवाचूर राजंस्त्वं शृणु यन्नः परं हितम्। न ह्येवं प्राप्यते मुक्तिः कल्प कोटि शतैरपि। सर्वं दत्त्वा महीपालं भृत्यानां च कुलं तव। इमे वयं गमिष्यामो यातु चास्य परा गतिः। ब्राह्मणा ऊचुः महाराज ! आप हमारा अत्यंत हितकारी वचन सुनें। केवल भूमि दान तथा सेवकों श्लोक 29 सहित अपने वंश का समर्पण कर देने मात्र से मुक्ति संभव नहीं होती। इसके लिए तो सौ सौ कल्पों पर्यन्त प्रयास करना चाहिये। इसलिये महाराज ! हम सब ब्राह्मण यहांसे जा रहेहैं जिससे इसकी उत्तम गतिहोवे। ऐसा कहकर अत्यंत निष्ठावान् ब्राह्मण वहां सेचले गये। जिसके पश्चात् राजा दुराचारियों द्वारा यह धन छुड़ा लिया जाने पर अत्यंत भय से व्याकुल होगया। इसके उपरान्त राजा फिर उसी वटवृक्ष के पास जाकर बोला- "हे प्रेत, तुमने तो केवल यह दानही ग्रहण करलिया।किन्तु मैं जिस लिये आया था उसका तो निवारण नहींहुआ।" ब्राह्मण प्रेत बोला कि, हे राजन् !यह सत्य है; इसलिये केवल इसी से ही मेरा उद्धारहोना सम्भव नहीं, यह बार-बार समझाये जानेपर भी तू समझ नहीं पा रहाहै। इसलिये हे राजन्, तू ऐसा विचारकर, जहां कहीं, उत्तम तीर्थहो, एकादशी का महात्म्य हो तथा जहां उत्तम पुराण श्रवण का योग-संयोग बन पा रहा हो वहां जाकर कथा सुन, एकादशी व्रतका संकल्प पूर्वक नियम-निष्ठा भाव-पूर्वक पालन कर। इसके प्रभाव से अवश्य ही मेरा ही नहीं, माता-पिता सम्बन्धी इस सौ कल्प काल पर्यन्त भोगे जाने वाले घोर प्रेत योनि से भी मेरा उद्धार अवश्य होगा। तूने एकादशी-व्रत के फल दाता श्री हरि वैकुण्ठ, वैकुण्ठ बिहारी भगवान् चक्रपाणि माधव को? जो त्रैलोक्येश्वर सब कालों में, सदैव सर्वदा आनन्दित रखने वालेहैं उन परम प्रभु भगवान् विष्णु शंकर स्वरूप हैं, काल-कालान्तर पर्यन्त जब समस्त जगत् प्रलय-महाप्रलय का ग्रास बनता है। तब भी काल-पाश बन्धन मुक्त रहताहै, जन्म-मरण दुःख-सुख से सर्वथा विमुक्त हो भगवान् वैकुण्ठ माधव का ध्यान कर उनके स्मरण करता रह! जिससे तेरा कल्याण तो होगा ही साथ ही, मेरे भी उद्धार का पथ प्रशस्त होगा। हे हे राजन्, ऐसा शुभ समय व्यर्थ मतखो, इस अवसर को व्यर्थ मतजाने दो, तू शीघ्र ही जाकर उस श्री हरि माधव का ध्यान कर। और देर मतकर। नजाने कब समय आ! इसलिये तू अब व्यर्थ में मत भटक मत भटक! उस परम दयालु प्रभु को, केवल उनका ध्यान? तू तो केवल उन हरि का भजन कर। प्रभु का ध्यान सब विघ्नों का नाशक स्वरूप, बार-बार जपसे ही अज्ञान, संकट व क्लेश का नाश कर उन पर श्री माधव कृपा स्वरूप इस समस्त संसारिक दुखों से मुक्ति प्रदान कर मुक्ति दिलाता हुआ अपना जन जान, हे राजन् !तू ज्ञान को प्राप्त हो, और सदा के लिये निर्भय होकर उनके नाम का जप करते हुये निर्भय होजा। ऐसा सुनकर, वह राजा मन ही मन उस प्रेत के इस समस्त कथन को, उस समय अपने विवेक द्वारा भली प्रकार विचार कर, एकाग्र चित्त उस ओर लगा; जो कथा के श्रवण पर्यन्त, हर समय प्रभु ध्यान का निश्चय व इस प्रकार से स्मरण करता हुआ ही, हे मुने !तू भी इस समस्त रहस्य को जानकर उस श्री वैकुण्ठ बिहारी माधव की शरण ग्रहण कर। उन परम दयालु कृपालु का ध्यान कर। जो सब कालों में कालके भी काल परम कृपालु भगवान् की शरणमें जा। जिससे, जन्म मरण, या चौरासी लाख योनियों के आवागमन, के बन्धनसे स्वतः मुक्ति पा जायगा, जो त्रिकाल में सब जीवों द्वारा सब प्रकार पूजनीय, सब सुखों के, दाताहैं। अतः एकादशी व्रत कथा 204