एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 205, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंकोई अपना पेट भर रोटी खिलाएगा? पर न त हमारा शरीर ऐसा जिससे कि कोई दयालु सहायता करेगा? ऐसा विचार करके वह मन और तन को अत्यंत बलवान् प्रभावशाली और दृढप्रतिज्ञ तो बना रहा तथा विद्या, कला, हुनर को सब कुछ जान चुका था पर यह विद्या संसार जिसे वह न जानता था उस का वह ज्ञान करेगा। जिसने महाराज जनक-सुलभा की कथा पढ ली वह विद्या विशारद क्या काम का और वह सब कुछ समझ जाता कि यह विद्यावान् क्या तो व्यवहार कर रहा, क्या निन्दा, क्या स्तुति है, किस से सावधान हो काम लिया, किस प्रकार, क्या आचरण स्वीकार कर रहा है, जो इन सब को न जानता केवल पुस्तकीय विद्यावान् हो वह सब कुछ व्यवहार में फेल हो न हो, पर विचार तो दो--पुस्तकी विद्या विशारद "सुलभा" उस--का कुछ ऐसा रूप देखकर न ह हो, विचार किया गया जिस पर यह सब क्रिया कलाप चल रहा है, ऐसा विचार कर जो व्यवहार किया जाता है वह दोनों पुस्तकीय तथा दोनों को समझ कर किया गया विचार दोनों ही को पूर्ण लाभ पहुँचा कर कर्तव्य का रूप बन कर, धर्म की जो व्याख्या वास्तविक की गई है उस पर जब वह उतरा, तो मन-बलवान् से कर्तव्य का पालन हो ही गया तथा वह उस मन-बलवान् से ही वह अपनी दृष्टि को रोक कर विचार- वान बन गया न कि उस के बाह्य रूप को मन-बलवान् ने, उस काम रूप चंचल मन--विचारवान् जिसने रूप को लखना चाहा, जिस से केवल लाभ ही रहा यह सब विचार से सिद्ध हो ही गया था उसका। मन-बलवान् ही ऐसा काम कर ले यह सब कुछ ठीक, पर ऐसा काम वही कर ले जिस मन का रूप विचार बन चुकाहैउसका तो तन भी काम करेगा विचार पूर्वक मन तो तन करेगा जब ही दोनों मिलकर एक रूप बन कर व्यावहारिक कर्तव्य को सफल कर उस से विद्या कला का लाभ उठा सकेंगे अन्यथा बिना तन विद्या कला सफल न होगी जब कर्तव्य, जो तन द्वारा व्यावहारिक कर्त्तव्य के रूपमें मन को ही करना है जिस से कर्तव्य ही रूप बन विद्या कला सब कुछ बन जावे, न तो विद्या ही विद्या रह जावे और न केवल तन रूप कर्म ही कर्म रह जावे वरन रूप दोनों का एक रूप हो कर ऐसा हो जावे कि जिस प्रकार दूध में खांड को मिला कर दो रूप बना दो लाभ उठाए जा सकें मन-बलवान् से पहला लाभ विद्या कला का होना ही कहा जा सकता दूसरा लाभ मन के कारण, तन से कर्त्तव्य कर सब लाभ संसार रूपी व्यवहार का पाया जा सकता ही नहीं वरन्, सब कुछ ही तन द्वारा ही, जो हो रहा था जिस के रूप को कर्तव्य-रूप, कला विशारद ने सब कुछ समझ लिया और उस ने ही अपने तन से ऐसा रूप ले कर व्यवहार को सफल कर दिखाया इसी प्रकार जब इस प्रकार विचार उत्पन्न हो गया संसार के सब रूप बदल गये, विद्या ही न बलवान् हो सकी वरन्, विद्या से, बलवान् से, विद्या का रूप ही, जब दोनों एकत्र हो ज्ञान विचार बन गये तो सब ही कर्तव्य स्वरूप बन कर सब प्रकार से लाभ मिलने का रूप दिखाई दिया। जब विद्या का रूप ही न रह सका केवल न तन केवल न ही विद्या ही रह सके दोनों एक रूप हो गये, तब क्या शेष रहा फिर उस समय मनुष्य विचार विचार कर सब को देख कर ऐसा कह रहा संसार का व्यवहार सब उस रूप विद्या कला विद्या का न केवल वरन्, जो दोनों रूप का रूपवान्, जो उस विद्या से ही बन सका था? वह ऐसा सब समझ ले गया था, पर उस समय मन को जो भी, यह बात केवल पुस्तक ही से जान ले सका था, केवल ही से बात समझ कर सब से कह रहा था वह सब ही असत्य थी, जब तक वह अपने रूप व्यवहार नहीं ला सका तब तक वह मन को सब कुछ न कर सका न ही समझ सका केवल कथन मात्र-मात्र ही रह गया था जिसका रूप न केवल मन वरन् तन तक ही समाप्त हो चुका था जिसे वह विद्या-कला विशारद कह रहा था सो तो सब का सब रूप ज्ञान का वास्तविक व्यावहारिक ही बन सकता था जिसका विस्तार हुआ, जो केवल न तन ही का सम्बन्ध ही सम्बन्ध था, जिसे उस समय में, केवल में, ज्ञान में, मन में, जो कुछ था उसका जो सम्बन्ध सब से ही सम्बन्ध हो जाने के पश्चात् ही ज्ञान की 205