भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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इस प्रकारके इन अंगों का अनुशीलन करने से ज्ञान लाभ हो सकता है। पर जब चित्त ही स्थिर न हुआ हो, चेतना जड़ के समान ही बनी रहे। अध्यात्मशास्त्र के जानने वाले सब रूप से इस बात को भली प्रकार जानते हैं, कि विचारशील मनुष्य ही परमतत्त्व का मनन कर सकता है। वह आत्मा सत्य है। यह तो सत्य, पर आत्मा का साक्षात्कार बिना चित्त शुद्धि के असम्भव जान कर चित्त की शुद्धि निमित्त ज्ञानविज्ञान सम्पन्न आचार्यों ने योग चित्त वृत्तियों का निरोध रूप बतलाया है। सो चित्त वृत्तियां अनेक प्रकार वासनाओं से युक्त हो कर कार्यवश बहिर्मुख, सो उन वृत्तियों को ही चित्तवृत्ति कह कर योग के द्वारा उनका निरोध या तो प्रत्याहार से हो या--मन स्थिर हो ही जाय! पर चित्त का तो स्वाभाविक धर्म ही चंचलतारूप है। इसका निरोध कैसे हो सकता है? तो इस चंचलता निमित्त मन का लय रूप या चित्त का ही स्वरूप लय रूप कहा या चित्त नाशक साधन--इन का नाम ज्ञान ही कह दिया। इस प्रकार के, वा उपाय के जान लेने से काम सिद्ध नहीं हो सकता। अध्यात्मतत्व जानने वाले विद्वान् पुरुष भी इस बात को भली प्रकार से कह ही गये तत्वज्ञानियों का मत इस प्रकार साधन अभ्यासियों को सुख देता ही विचारशीलता पुरुषार्थमय हो जाती है। यह साधन अभ्यास का फल है। एक विद्वान्, नाम-सहस्राक्ष का कथनानुसार यह बात विचारशीलों तक ही ज्ञात होती रही कि मन लय रूप को तब ही प्राप्त होता है। जब तत्वज्ञान सम्पन्न ज्ञान को न जाना जा सके। विचार ही सब कुछ है। विचार ही ज्ञान है। विचार ही योग है। विचारशीलता जब स्थिर हो, यथार्थ ज्ञान स्थिर हो, यथार्थ ज्ञान का रूप प्राप्त किया जाय। ध्यान ही विचारशीलता का रूप बन जाता है। इस से बढ़ कर क्या होगा? सो चित्त लय रूप धारण करता हुआ न उस रूप का योग साधन कहा जायगा? वा उस स्वरूप ज्ञान कहा जायगा? तत्वज्ञान का स्वरूप विचारशीलता रूप होकर स्थिर रूप मन किया करता है। अतएव, विचार रूपी-अभ्यास साधन को कहा गया, जिस रूप साधन ज्ञान के अभ्यास से चित्त लय रूप मन का लय होकर, विचार स्थिरता का स्वरूप बन जाता अथवा निर्विकल्प समाधि रूपी भाव स्वतः मनुष्य के मन व्यवहारिक को एकाग्र स्वरूप देता है। सो इस रूप की योग्यता को प्राप्त करता हुआ मन जब भी संसार सम्बन्धी विचार करेगा, विचार स्थिरता से विचारेगा, विचार स्थिरता चित्त को ही एकाग्र कर देगी। जो अभ्यास चित्त रूप को निरोधता से एकाग्र स्वरूप बनाये हुआ चल रहा, विचारशीलता चित्त रूप को, ध्यान का रूप देकर अपने उस स्वरूप स्थिर मन का लय वा मनन रूप स्वरूप प्रदान कर ही तो देता है, जिस रूप का ध्यान वा मनन किया गया, जिस रूप न उस रूप ज्ञान स्वरूप हो गया। अभ्यास से ज्ञान, अभ्यास से ध्यान, अभ्यास से सब कुछ ही प्राप्त होता रहता है। केवल मन का काम रूप ही अभ्यास से दूर रहता हुआ-- अभ्यास स्वतः विचारशीलता का रूप हो जाता हुआ--उस रूप ज्ञान एकाग्रता को मन का स्वरूप विचार ही, वा अभ्यास-साधन ही, कहा जाता कि वह तो हर समय स्थिर रूप से ही अभ्यास-साधन का फल ही तो होगा। अभ्यास से सब कुछ सिद्ध रूप से प्राप्त होता ही रहता है, इस से बढ़कर अभ्यास से सब कुछ सिद्ध-प्राप्त रूप होता है। सो इस ही स्वरूप को अभ्यास से प्राप्त रूप कहा गया वा उस रूप विचारशीलता से ही ध्यान स्वरूप विचार ही तो हर एक का मन सम्बन्धी एकाग्रता स्वरूप ध्यानमयी रूप मन प्राप्त करता हुआ, चित्त रूप स्वरूप ज्ञान रूप एकाग्रता से अपने ही साधन को प्राप्त कर, जिस रूप ध्यान किया गया है। सो ध्यान ही ध्यान रूप के अभ्यास तक स्वरूप को प्राप्त कर सो इस ही स्वरूप द्वारा, मन अपने ध्यान रूप ज्ञान को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार मन मन-रूप त्याग कर ध्यान रूप स्वरूप को पा लेता गया, जो ध्यान का रूप है? अभ्यास ही ज्ञान-का कारण बनकर संसार सम्बन्धी बातों को जो कुछ उत्पन्न हुआ समझना उस मन-सम्बन्धी सब चंचलता नाश करता। जिससे उस मन एकाग्र हुआ वा मन-रूप का विनाश हो जाता हुआ भी एक शांत स्वरूप ध्यान का रूप धारण कर ही तो लेता है। सो कहा गया, "हे पार्थ, ध्यान ही ज्ञान का उत्तम साधन" 206