भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

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विश्वामित्रजी श्रीरामचन्द्र को साथ ले विश्वामित्रजी आश्रममें पधारे।वहाँ जाकर देखाकि ऋषि विश्वामित्रजी तो हवन कर रहेहैं और राक्षस लोग उनपर खून तथा मांस आदि फेंक रहेहैं।भगवान् श्रीरामने यह देख बाण चढ़ाकर ताड़का पुत्र मारीच को सौ योजनदूर फेंकदिया, सुबाहुको मार, राक्षसोंको भगाके यज्ञ निर्विघ्न समाप्त करा दिया। फिर विश्वामित्रजी बोले कि, हे वत्स! अब जनक पुर चलो और वहांका धनुष यज्ञ देखकर आओ।सब मुनियों सहित श्रीरामचन्द्रजीने जनकपुरकी ओर प्रस्थान किया। मार्गमें अहिल्या शिलावत् बैठीहुईथी।उसको श्रीरामजीके चरण रजका स्पर्शहोतेही परम सुन्दरी स्त्रीका रूपहो गया।भगवान् रामके चरणकमलोंका यह प्रतापदेख सब मुनिगण श्रीरामजीकी स्तुति करनेलगे। इस प्रकारके अनेकानेक चरित्र करतेहुए मुनिजीके साथ श्रीरामजी जनकपुर पहुंचे।राजा जनकने मुनिका बहुत आदर सत्कार किया। जब जनकजीको मालूम हुआकि ये दोनोंकुमार अयोध्यापति श्रीदशरथजीके पुत्रहैं तो वे आश्चर्य करनेलगे।श्रीरामजीका रूपदेख राजा जनक मोहित होगये। प्रातःकाल दोनों भाई विश्वामित्रजीकी पूजाके वास्ते फूल लेनके लिये जनकजीके बागमें गये।उसी समय भगवती सीताजीभी भगवती भवानीका पूजन करनेके लिये सखियोंसहित पधारीं।उधर श्रीरामजीभी लक्ष्मणजीके साथ बागकी शोभा देखतेहुए उसस्थानपर पहुंचेजहां जानकीजी अपनी सखियोंके साथ भगवती भवानीजीकी स्तुतिकररहींथीं।श्रीरामजीके दर्शनपा सीताजी मोहित होगईं।श्रीरामजीभी सीताजीके रूपको देख प्रसन्न हुए। जब सीताजीने श्रीरामजीके चरणोंमें अपना चित्तलगा भगवती भवानीजीकी स्तुति की,तोभगवतीने सीताजीको वर दिया कि हे सुता ! तेरी मनोकामना पूर्ण होगी।सीताजी प्रसन्न होकर अपनी माताके पासगईं।श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीको सीताजीके रूपका वर्णन किया और फूलले विश्वामित्रजीके पास गये। दूसरे दिन जनकजीने सब देशके राजाओंको धनुषयज्ञमें बुलाया।राजा जनकने प्रतिज्ञा कीथी कि,जो कोई शिवजीके धनुषको तोड़ेगा,उसीके साथ सीताजीका विवाहहोगा। अनेक देशके राजाओंने धनुषको उठानेका यत्न किया,परन्तु वह किसीसे न उठा। राजा जनकने निराशहोकर कहाकि क्या यहपृथ्वी वीरोंसे खालीहोगईहै ? यहसुन लक्ष्मणजीको बहुत क्रोधआया।लक्ष्मणजीके क्रोधको देख विश्वामित्रजीने श्रीरामचन्द्रजीको आज्ञा दी।श्रीरामजीने जाकर शिवजीके धनुषको उठाया और डोरी चढ़ातेही वह टूटगया। चारों ओर श्रीरामचन्द्रजीकी जयजयकार होनेलगी।सीताजीने प्रसन्नहो श्रीरामजीके गलेमें जयमाल डालदी।राजा जनकने आनन्दितहो अयोध्यामें राजा दशरथजीको बरात लानेके लिये दूतभेजे। धनुष टूटनेका शब्द सुन परशुरामजी क्रोधयुक्तहो जनकपुरीमें आये और श्रीरामजीसे युद्ध करनेको उद्यतहुये।जब परशुरामजीको श्रीरामजीके स्वरूपका ज्ञानहुआ,तो वे उनकी स्तुतिकर वनको चलेगये। उधर अयोध्यामें दूतके मुखसे समाचार सुन राजा दशरथजी बरातसहित जनकपुर पहुंचे। राजा जनकने सबका यथायोग्य सत्कार किया।बड़ी धूमधामसे श्रीराम-सीताका विवाहहुआ। विश्वामित्रजीकी आज्ञासे लक्ष्मणजीका विवाह उर्मिलासे,भरतजीका माण्डवीसे और शत्रुघ्नजीका श्रुतकीर्तिसे हुआ।विवाहके पश्चात् राजा दशरथजी श्रीराम,लक्ष्मण,भरत,शत्रुघ्न और बहुओंको साथले अयोध्यापुरी पधारे। अयोध्यावासियोंको आनन्दका पार नरहा।श्रीरामजीको अयोध्याका राज्य देनेकी सलाह होनेलगी।मन्थरा दासीने रानी कैकेयीको भड़काया।कैकेयीने कोपभवनमें जाकर राजा दशरथसे दो वर मांगे।एकमें भरतको राजगद्दी और दूसरेमें श्रीरामजीको चौदह वर्षका वनवास। श्रीरामजी माता-पिताकी आज्ञा मानकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित वनको प्रस्थान करगये। राजा दशरथजीने श्रीरामके विरहमें प्राण त्यागदिये।भरतजी ननिहालसे आये और माताको बहुत धिक्कारा।भरतजीने मन्त्रियोंसहित चित्रकूट जाकर श्रीरामजीसे अयोध्या लौटनेकी प्रार्थनाकी। परन्तु श्रीरामजीने पिताकी आज्ञाका पालन करना अपना कर्त्तव्य समझा।तब श्रीरामजीने अपनी खड़ाऊँ-पादुका देकर भरतजीको विदा किया।भरतजीने उन खड़ाऊँओंको सिंहासन पर रखकर अयोध्याका राज्य किया।उधर श्रीरामजी वनमें रहकर अनेक राक्षसोंका संहार करतेहुए पंचवटीमें पहुंचे।शूर्पणखाके नाक-कान लक्ष्मणजीने काटदिये।इसके बाद रावणने कपटसे सीताजीका हरण करलिया।श्रीरामजी सीताजीकी खोजकरते हुए सुग्रीवसे मिले।सुग्रीवकी सहायतासे वानर सेना तैयारकी।समुद्रपर सेतु बांधकर लंकामें प्रवेशकिया।कुम्भकर्ण, मेघनाद आदि राक्षसोंसहित रावणका संहारकरके श्रीरामजीने विभीषणको लंकाका राज्य दिया।सीताजीको लेकर सबलोग, पुष्पक विमानसे अयोध्या लौटे।अयोध्यामें श्रीरामजीका राज्याभिषेक हुआ।प्रजा अत्यन्त प्रसन्न हुई। 207