एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविचारवान् को चाहिए कि वह सदा अपने स्वरूप रूप का ध्यान किया करे। यथार्थ रूप विचार करे। वह विचार यह करे, प्रथम जब पिता के वीर्य से मेरा शरीर, रक्त की बूंदमात्र केवल, अतिशय सूक्ष्म, सो वीर्य किसका बना? सो वीर्य अन्न का और अन्न भूमि से उत्पन्न हुआ अन्न सोय! अर्थात् पृथिवी से वीर्य बना, पृथिवी से अन्न बना, पृथिवी के ऊपर पृथिवी का ही गोला बना। सो विचार यह करे, ना कुछ ना विचार, विचार रहित, विचार की उत्पत्ति कैसे, जब कुछ ज्ञान नहीं? सो विचार यह करे, विचार बड़ा बल धार! सो विचार सूक्ष्म रूप, मन को शांत कराकर निज रूप का ज्ञान करा। सो विचार यह करे, सूक्ष्म विचार कहाँ से उठ रहा सो विचार, सो तो ज्ञान रूप। अब ज्ञान रूप कहाँ? सो विचार यह करे, सत ज्ञान का भंडार जो सब धार! सो तो ज्ञान का आधार चेतन रूप, प्रकाश रूप घट-घट की लीला करे। विचार यह करे, घट में चेतन प्रकाश शक्ति रूप सो तो सर्व व्यापी ब्रह्म सनातन है, जो कि सब विकारों रूप प्रपंच मध्य से परे घट-घट, रोम में प्रकाश विस्तार रहा। पर जो सब जग को रचने रूप सो सनातन शब्द रूप सो रस, जो कि सब रचना सार, सो सत-नाम रूप सब के मध्य खेल सो प्रगट है, सो सर्व शक्ति के प्रकाश रूप प्रकाश का कारण सो सो सत-नाम शब्द रूप सब रचना मध्य से न्यारा भी है, शब्द रूप से ही सर्व मध्य पर भी व्याप रहा, शब्द रूपी मध्य घट "मैं" कह, सो चेतन प्रकाश का साक्षी। सो घट-घटेश्वर के प्रकाश से सब कुछ उदय सो जगत पर सो उस सत्य का ही अंश सो चैतन्य प्रकाश शक्ति रूप सो सब कुछ रच रहा सो सब मध्य विद्यमान सो घट-घटेश्वर के साथ मिला सो सत्य रूप चेतन, इसका रूप विद्यमान सो शब्द का व उस रूप का अभ्यास जो कोई करे। अभ्यास से ज्ञान का प्रकाश विद्यमान होगा? ज्ञान रूपी रंग! यह घट व शब्द का प्रकाश रचना रूप से परे, सत रूप, सत व रस, सो अविनाशी पुरुष पूर्ण सनातन शक्ति का भेद जान कर जो अभ्यास किए सो निज रूप सत घट-नाम रूप सो रस, सो उस रस, जो कि सब का सार सो सत्य नाम चेतन सत्ता ब्रह्म स्वरूप से ही सर्व उत्पन्न हुए सब रूप सो सनातन ज्ञान से ही सब घट का ज्ञान हो रहा, सो चेतन के ज्ञान से प्रकाश रूप अभ्यास द्वारा सनातन घट का भेद, सो अभ्यास से सब के आधार शक्ति को प्राप्त होय! सत्य का अंश ही तो ही सत्य का प्रकाश सत्ता सनातन सो घट-घट सब व्यापी सो सो सनातन शब्द द्वारा अभ्यास करा, चेतन प्रकटाया। केवल सत नाम के अभ्यास रूप द्वारा अविनाशी घट शब्द ज्ञान रूप का भेद घट व घट के प्रकाश विस्तार से मिला सो उस प्रकाश का भेद जो जान कर घट कहे, "हे संत, दयाल का प्रकाश ही प्रकाश व्यापक" सनातन व व प्रकाश स्वरूप सो प्रकाश सब रचना मध्य व्यापक रूप "घटेश्वर का ज्ञान रूप सत्य" सो भेद को जान कर निज रूप को जाने सो, जो सब व सबमें व्यापक प्रकाश रूप घटेश्वर रूप है, सो चेतन को जान कर निज रूप का ज्ञान पा लिया नाम से ही स्मरण से शब्द रूप परम चेतन् सनातन से, सनातन नाम रूप अभ्यास किए बिना सब घट से न्यारा है, सो सब घट मध्य सार से भिन्न, जो कि घट मध्य के भाव से ही चेतन का ज्ञान पाना है, सो तो जान ले, कि संत! सो चेतन की महिमा व ज्ञान से ही प्रकाश का ज्ञान होवे। सो तो सब घट का सनातन से सब का उदय रहा, सो चेतन ज्ञान से केवल सब शब्द न्यारा रूप सो सनातन शब्द द्वारा सब घट प्रकाश स्वरूप सो प्रथम मन को चेताया सो सनातन से मिला कर सब घट को, सो जाना रूप ब्रह्म शक्ति से सनातन के शब्द से जाना जाता है? सो कैसा रूप सब घट में? सो चेतन ज्ञान सब का आधार सत शब्द प्रकाश द्वारा सब को ज्ञान प्राप्त हो! सत्य सनातन घट का भेद घट व शब्द का अभ्यास घट में रूप को विस्तार होय! पूर्ण अभ्यास से सब घटों घट को चेता कर व सब के प्रकाश स्वरूप को जान कर अभ्यास रूप सत नाम विस्तार घट में घट द्वारा प्रकाश रूपी सत्य को चेता कर नाम रूप सो संत का अभ्यास किया जावे, सनातन प्रकाश सनातन प्रकाश, सनातन प्रकाश से, अविनाशी अजर अमर पद पावे, 209