भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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विवेकानन्दजीके विचार बहुत गम्भीर थे। यदि भारत उनका ऋण न भी चुका सके तो कम-से-कम इतना तो अवश्य कर ही सकता था कि उनके विचारोंके प्रति श्रद्धा रखे। स्वामी विवेकानन्द प्रत्येक भारतीयको अपना भाई कहकर पुकारते थे। प्रत्येक भारतीयको वे हृदयसे चाहते थे। वे समझते थे कि भारतके उद्धारके बिना संसारका कल्याण नहीं हो सकता। जिस जातिमें केवल अपने लिये जीनेका स्वार्थभाव ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्वके कल्याणकी भावना समाई हो, उस जातिको वे सर्वथा जीवित देखना चाहते थे। इस प्रकार उन्होंने भारतके लिये, भारतके लोगोंके लिये, भारतके विचार-प्रवाहके लिये जो किया उसका मूल्य इस युगके इतिहास-पृष्ठोंपर तो क्या, आनेवाले युगोंके इतिहास-पृष्ठोंपर भी स्वर्णाक्षरोंमें ही लिखा रहेगा। स्वामीजीके उस कार्यका कोई भी प्रतिदान नहीं कर सकता। जो अपने जीवनमें विवेकानन्दके विचारोंपर श्रद्धापूर्वक चलनेका संकल्प कर सकेंगे, वे अपने जीवनको धन्य करेंगे ही, स्वामीजीके ऋणसे भी कुछ अंशमें उऋण होनेका सन्तोष प्राप्त कर सकेंगे। स्वामी रामने कहा था, "भारत, तुम्हारे ही उत्थानपर संसारका उत्थान है।" इस युग-युगान्तरकी चिर-पुरातन संस्कृति-सुधाको संसारके समक्ष ले जानेका जैसा महान् कार्य श्री स्वामी विवेकानन्दजीने किया वैसा किसी अन्यने शायद ही किया हो। उन्होंने विश्वको अपने इस कार्यसे चमत्कृत कर दिया। परिणाम? विवेकानन्दका कोई व्यक्तिगत लाभ न था। वह किसी संस्थाका या देशका प्रतिनिधित्व भी नहीं कर रहे थे। उन्हें केवल एक ही धुन सवार थी-विश्वको यह सन्देश देना कि संसारमें यदि शान्ति और सुखकी आवश्यकता है, तो उसे अपने स्वार्थ-केन्द्रसे उठकर त्यागके केन्द्रपर आकर बैठना होगा। अपने लिये जीनेवाला पशु-समान है, दूसरोंके लिये जीनेवाला ही सच्चा मनुष्य है। जबतक त्यागकी भावनाको मनुष्य अपने जीवनका आधार नहीं बना लेता, तबतक वह सच्चा मानव नहीं बन सकता। स्वामीजीका यह सन्देश भारतका सन्देश था। जो संस्कृति त्यागकी नींवपर टिकी थी, उसके पास इसके अतिरिक्त संसारको देनेके लिये और क्या था? स्वामीजीने अमेरिका और इंग्लैण्डमें जाकर केवल इतना ही कार्य नहीं किया कि भारतके वेदान्त-सत्यको संसारके सम्मुख प्रस्तुत किया, अपितु उन्होंने उस वेदान्तको आचरणमें ढालकर दिखला दिया। उन्होंने कहा कि मानवमात्रका कल्याण वेदान्तके उस अद्वैत सिद्धान्तमें ही निहित है, जिसके अनुसार संसारके प्रत्येक प्राणीमें एक ही परमात्माकी चेतना व्याप्त है। यदि यह सत्य है, तो फिर किसीसे घृणा क्यों? किसीसे द्वेष क्यों? क्यों न हम सब एक-दूसरेसे प्रेम करें? प्रेम और त्याग ही वेदान्तके दो स्तम्भ हैं। इनके बिना वेदान्तकी कल्पना व्यर्थ है। स्वामीजीका जीवन त्याग और प्रेमका जीवन्त उदाहरण था। शिकागोके सर्वधर्म सम्मेलनमें जब उन्होंने अपना भाषण आरम्भ किया, तो उपस्थित जनसमुदाय मुग्ध हो गया। उन्होंने 'अमेरिकाके भाइयो और बहनो!' सम्बोधनसे जो आत्मीयता प्रकट की, उसने सहस्रों श्रोताओंके हृदयोंको छू लिया। विवेकानन्दकी वाणीमें ज्ञानका ओज था, सत्यकी शक्ति थी और भारतकी आत्माकी पुकार थी। यही कारण था कि जिसने भी उन्हें सुना, वह उनका होकर रह गया। स्वामीजी केवल उपदेशक नहीं थे, वे कर्मयोगी थे। उन्होंने भारतकी दरिद्रता और अशिक्षाको देखकर अश्रु बहाये। उन्होंने 'दरिद्र-नारायण'की सेवाको ही ईश्वरकी सच्ची पूजा माना। उनका मानना था कि भूखे पेटको धर्मका उपदेश देना व्यर्थ है। पहले उसकी भूख मिटाओ, फिर धर्मकी बात करो। आज जब हम विवेकानन्दके विचारोंपर दृष्टिपात करते हैं, तो पाते हैं कि उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने कि उनके समयमें थे। आजका विश्व जिन समस्याओंसे जूझ रहा है, उनका समाधान विवेकानन्दके विचारोंमें निहित है। भौतिक प्रगतिके साथ-साथ यदि आध्यात्मिक विकास न हुआ, तो मानवताका विनाश निश्चित है। अतः आज आवश्यकता इस बातकी है कि हम विवेकानन्दके विचारोंको समझें और उन्हें अपने जीवनमें उतारें। 210