एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रत्येक मानव को अपने जीवन में अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जब व्यक्ति कठिनाइयों का सामना धैर्य और साहस के साथ करता है, तो वह उन पर विजय प्राप्त कर लेता है। किंतु यदि वह निराश होकर बैठ जाता है, तो उसकी समस्याएँ और भी बढ़ जाती हैं। मनुष्य का जीवन संघर्षों से भरा हुआ है। जो व्यक्ति इन संघर्षों से घबराकर अपने मार्ग से विचलित हो जाता है, वह कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। सफलता का रहस्य यही है कि व्यक्ति निरंतर अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहे। वास्तव में यह विचारणीय विषय है कि, मनुष्य का जीवन ही एक ऐसा मंच है जहाँ उसे अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। जो व्यक्ति अच्छे कर्म करता है, उसे सुख और शांति मिलती है, जबकि बुरे कर्म करने वाले को सदा दुःख और अशांति का सामना करना पड़ता है। मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। कोई भी व्यक्ति अपने कर्मों के फल से बच नहीं सकता। इसलिए मनुष्य को सदा सन्मार्ग पर चलना चाहिए और ऐसे कर्म करने चाहिए, जिससे दूसरों का भी भला हो। परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है। जो व्यक्ति दूसरों की सहायता करता है, वह ईश्वर का प्रिय बन जाता है। अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। जब मनुष्य के मन में अहंकार का भाव उत्पन्न होता है, तब वह अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता। वह दूसरों का उपहास उड़ाने लगता है और स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ मानने लगता है। किंतु अहंकार का अंत सदा बुरा होता है। रावण, कंस और दुर्योधन जैसे महाबलियों का भी अहंकार के कारण ही सर्वनाश हुआ था। अतः मनुष्य को अहंकार से सदा दूर रहना चाहिए। नम्रता और सरलता ही मनुष्य के सच्चे आभूषण हैं। यदि मनुष्य में नम्रता का भाव होगा, तो वह समाज में सर्वत्र आदर और सम्मान प्राप्त करेगा। मनुष्य के जीवन में संगति का बड़ा महत्त्व है। सत्संगति से मनुष्य के दुर्गुण दूर हो जाते हैं और वह सद्गुणों को ग्रहण करता है। इसके विपरीत, कुसंगति में पड़ने से सज्जन व्यक्ति भी दुर्जन बन जाता है। दुर्जन व्यक्ति की संगति कोयले के समान होती है, जो जलते समय हाथ को जला देती है और बुझने पर हाथ को काला कर देती है। इसलिए मनुष्य को सदा कुसंगति से बचना चाहिए और सत्पुरुषों की संगति करनी चाहिए। समय का सदुपयोग करना भी मनुष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता। जो व्यक्ति समय के महत्त्व को नहीं समझता, वह जीवन भर पछताता रहता है। सफलता उसी व्यक्ति को मिलती है, जो समय का मूल्य समझता है और अपने प्रत्येक कार्य को समय पर पूरा करता है। परिश्रम ही सफलता की कुंजी है। बिना परिश्रम के कोई भी व्यक्ति महान नहीं बन सकता। आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। आलसी व्यक्ति कभी उन्नति नहीं कर सकता। जो व्यक्ति निरंतर परिश्रम करता है, वही अपने जीवन में सफलता के शिखर पर पहुँचता है। विद्या मनुष्य का तीसरा नेत्र है। विद्या के द्वारा ही मनुष्य में ज्ञान और विवेक का विकास होता है। विद्यावान व्यक्ति समाज में सर्वत्र आदर पाता है। विद्या से ही मनुष्य को मान-सम्मान, यश और कीर्ति प्राप्त होती है। संतोष सबसे बड़ा धन है। जिसके पास संतोष रूपी धन है, वह संसार का सबसे सुखी व्यक्ति है। असंतोषी व्यक्ति सदैव दुःखी रहता है। अंत में, हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि जीवन अनमोल है। इसे व्यर्थ की चिंताओं और बुराइयों में नष्ट न करके सत्कर्मों में लगाना चाहिए। तभी हमारा जीवन सार्थक और सफल हो सकता है।
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