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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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प्रार्थना का फल, उपासना का महत्त्व, या उस परम चेतन शक्ति स्वरूप प्रभु कृपा, या सर्वव्यापक का ध्यान सब समय हमारे साथ लगा रहना चाहिए, केवल संध्या उपासना समय ही नहीं वरन् हर समय हमारे हृदय में यह ध्यान बना न रहे, तो हम पाप कर्मों में प्रवृत्त हो ही नहीं सकते या दुर्गुणों का हम शिकार हो सकते हैं? भला कोई भी जीव इस प्रकार चाहता न हो, तो वह उस ईश्वर की सर्वज्ञता का ज्ञान हर क्षण क्यों नहीं रखेगा? भगवान् को सर्वज्ञ कह, उसकी ही निन्दा; यह बात भी हमारी ही, मनुष्य ही अज्ञानतावश हो जाया करती है। परन्तु जब हम उस प्रभु को सर्वज्ञाता मान लेते हैं, उसकी ही शरण में हर समय ही इस बात का ध्यान बना रहे अर्थात् हर क्षण में ईश्वर का भय ही बना रह सकता, तो कदाचित् मनुष्य का पतन नहीं हो ही सकता। यह अज्ञानतावश ऐसा विचार, जो प्रभु को उपासना ही तक सीमित मान लिया जाता, या केवल पूजा समय ही पर उसका महत्त्व समझा जाता! वास्तव में ऐसा ही मनुष्य अज्ञानी ही तो है। जो केवल एकान्त में ही प्रभु को, उस के भय का नाम लेवे या प्रभुता स्मरण करके बैठ जाय, या केवल मन्दिर या मस्जिद में ही प्रभु को स्मरण, सर्वव्यापक को उस रूप में मान कर अपना काम समाप्त समझे, ईश्वर को सर्वव्यापक मान लेने वाला कभी भी इस रूप में ईश्वर को सर्वव्यापक समझ, या मान कर अपने को सर्वव्यापक प्रभु रूप मान कर ऐसा नहीं कर बैठता। वरन् ईश्वर तो सर्वत्र है ही। इसलिए सर्वव्यापक का भाव परमात्मा समझने वाले को हर समय हर पल प्रभु स्मरण ही रहना चाहिए। फिर जो ईश्वर की, या सर्वज्ञ प्रभु के लिए अपनी इच्छा अनुसार फल या परिणाम चाहे, मनुष्य विचार करने लगता अथवा ईश्वर की कृपा पर अपनी इच्छानुसार कोई फल चाहता है। ईश्वर कृपा, फल या कृपा रूप फल का भाव यही है, मनुष्य अपनी भावना प्रभु के अर्पण कर सब कुछ, परमात्मा के ध्यान में रख कर चले, ईश्वर के स्वरूप ज्ञान का सही मार्ग यही सिद्ध होगा। सो, यदि! ईश्वर कृपा परिणाम स्वरूप ही मनुष्य समझे तब तो ईश्वर कृपा रूप का ज्ञान, या उस का स्वरूप प्रभु के ध्यान में लगाना बहुत कठिन होगा। फिर बात केवल ईश्वर उपासना की दृष्टि से ही विचार की न रह जाय, वरन् यह तो मनुष्य के जीवन का लक्ष्य ही बन जाना ही सत्य का रूप और मनुष्य का धर्म या कर्त्तव्य सिद्ध होवे। तब यह बात स्पष्ट रूप से अपने आप ही मानव कल्याण-मार्गदर्शक बन कर उस के हर कार्य रूप में आ जायेगी। मानव और प्रकृति केवल दो ही तो नाम इस जगत् में सृष्टि के हैं। यह जगत् इन दोनों अवस्थाओं स्वरूप माना गया है। अतः, प्रकृति से मनुष्य जब अलग हो अपने को एक न समझ कर या दोनों अलग-अलग को केवल भोगने वाला मनुष्य मान बैठेगा, अर्थात् प्रकृति को भोग मात्र ही का साधन मान कर मनुष्य अपने सुख के साधन ही को केवल मात्र प्रकृति का रूप मानेगा तो ऐसा भाव मनुष्य प्रकृति से अलग हो कर ही अपने आप समझेगा। पर जब सत्य भाव यह है कि मानव रूप और प्रकृति दोनों का एक ही सम्बन्ध है। जब तक यह सम्बन्ध मनुष्य समझता रहेगा; मानव जीवन सफल होता रहेगा। हाँ, यदि प्रकृति स्वरूप रूप को वह भोग मात्र ही का साधन समझे बैठा तब वह अपना सर्वनाश स्वयं ही कर लेगा, प्रकृति का कुछ न बिगड़ेगा। यह अवश्य कहा जा सकता होगा कि, सर्वव्यापक शक्ति स्वरूप प्रभु तो सर्वव्यापक रूप होकर सब का सब कुछ कर्ताधर्ता सब कुछ करने वाला ही कहा गया, तो वह मानव स्वयं कुछ कर सकनेवाला अथवा कर्त्ता क्यों न हो? ईश्वर की सर्वज्ञता तो प्रत्येक रूप में या हर समय व्याप्त है। तब फिर ईश्वर शक्ति केवल साक्षी, प्रकृति केवल भोग रूप मात्र क्या रह ही गयी, प्रकृति मनुष्य को भोगने के लिए ही क्यों उपयोगी की गयी है? यह प्रकृति उस सर्वशक्ति स्वरूप की शक्ति का प्रतीक ही समझ कर, उस द्वारा सर्वव्यापक का यह आभास रूप में सर्वव्यापक ज्ञान प्राप्त किया जाना सम्भव हो सका। केवल भोग मात्र समझ कर अज्ञानता ही तो है! ऐसा क्यों? प्रकृति को केवल उपभोग्य समझकर भोग के ही लिए केवल साधन क्यों माना? भोग्य साधन क्यों? प्रभु की सर्वव्यापक रूप का सच्चा स्वरूप समझ, प्रकृति का महत्त्व ही ईश्वर का महत्त्व होगा? इस प्रकार जब मानव समझेगा, तब ईश्वर की प्रभुता को जान कर, उसकी सर्वव्यापक या शक्ति स्वरूप समझ कर ईश्वर की ओर अपने कदम को बढ़ा, ईश्वर स्वरूप साक्षात्कार कर सकेगा। तब मानव सर्वव्यापक ही का सब रूप जान कर जीवन चक्र के रहस्य ज्ञान प्राप्त करेगा। हाँ, सर्वव्यापक ईश्वर अपने सर्वव्यापक रूप स्वरूप साक्षात्कार स्थिति में प्रभुता का ज्ञान करा देगा, सर्वज्ञता समझकर प्रत्येक स्थिति को वह प्रभु ज्ञान रूप समझेगा। इस से मानव प्रभु की ही सर्वव्यापकता को समझने का प्रयास करता रहेगा। 215

इस प्रकार विचार करके राजा सब का सब विषय भोग सर्वथा त्यागकर वनको गया, भगवान् का स्मरण करताहुआ वैराग्यवान् हुआ। तदनन्तर राजाके दोनों पुत्र भी राज्यसिंहासन पाकर प्रजाका पालनपूर्वक! हाथी, घोड़े, रथसमूह, पदाति इन चतुरंगिणी सेनाके प्रभावसे शत्रुसमूहको जीत छोटे भाई को, जिसका नाम शत्रुजित् था उसे महाराजके पदपर अभिषिक्त किया। राज्यके लोभी बहुत से लोग यह कहने लगे, शत्रुजित् बड़ा ही भाग्यवान् पुरुष है। उसका बड़ा भाई, जो ज्येष्ठ था और अपने पिताके समान सर्वथा ऐश्वर्यसम्पन्न था उसने राज्यभारको अपने ऊपर न रखकर छोटे भाईको देकर तपस्याके लिये गमन किया, जिसको सुधर्मानामक विख्यात ब्राह्मण कहता था कि हे महाभागवत्! विचार कर देखो संसार सब ही कैसा असार और अनित्य रूप है। संसारियों का यह स्वभाव देखा जाता है कि जबतक राज्य तथा ऐश्वर्यके सुख का भोग करता है तब तक सुख का लेशमात्र भी नहीं पाता है, फिर मरणोपरांत वह घोर नरक का भोग करता हुआ बारंबार संसारचक्र में गिरता ही रहता है। इसके बाद राजा का पुत्र जो कुछ भी धर्म का काम करता था यज्ञादिक वह सब निष्काम बुद्धिसे करताथा, जिससे वह संसार बन्धन का नाश करता हुआ पर- मपदको प्राप्त हो गया। हे, मुने इस प्रकारका यह इतिहास सुनकर जो मनुष्य निष्काम भावसे भगवद्भजन में रत रहता है वह संसारके सब बन्धनोंसे छूट जाता है। अब आप क्या सुनना चाहते हैं? अथवा किससे मुक्ति चाहते हैं? अथवा ज्ञानोपदेश? सब प्रकारके इन प्रश्नों का उत्तर विधिवत् सब प्रकारके शास्त्रों के ज्ञाता मुनि "अज्ञानके हेतु उस मोहको, शीघ्र ही नाशकरेंगे" इस प्रकार उस बातको सुनकर राजा नें मुनि से हाथ जोड़कर विनय भाव से यह प्रार्थना की कि महा- भागन आप-सर्वज्ञसम्पन्न सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता हो, मुझको ऐसा उपदेश देकर कृतार्थ कीजिये कि इस संसार रूप घोर नरकसे मेरा उद्धार हो जाय, जिससे मुझे परमगति मिले? राजाके वचन सुन, मुनि हर्ष पूर्वक गम्भीर वाणीसे कहने लगे कि हे राजन्! सब संसार में जो जो पदार्थ स्थित तथा दृष्टिगोचर हो रहे हैं सो सर्वथा मिथ्या तथा नष्ट होने वाले हैं, केवल एक ही भगवान् सदा ही सत्य हैं। हे भूपाल जो, कुटुम्बियों, सुहृदों तथा बन्धु आदि पदार्थों संबंधी ममता, सर्वथा अज्ञान के कारण उत्पन्न हुई है। इसलिये केवल एक भगवान् ही सर्वथा सत्य सार रूप, सबका कल्याण करने वाले हैं। सब जीवों को उन्हीं की शरणमें जाना, उन्हीं की शरणमें आनन्द मिलता--रहता सदा, उनका गुणानु--वाद ही करना और सुनना चाहिये। इसलिये सर्वसंदेह को दूर कर मन और बुद्धि सर्वदा परमात्मा की ही भक्ति मेंलगाये सदा आनन्द मगन रहना योग्य विचार करके ऐसा निश्चय कर लो। हे राजन्, आत्मा सदा सबके शरीरमें व्यापक रूपसे स्थित होकर साक्षीरूप, सर्वथा प्रकाश रूप और चेतन तथा निर्गुण स्वरूपसे वर्तमान है। केवल मायाके संग से अनेक प्रकारके अज्ञान सम्बन्धी भावों को अंगीकार करता है। वस्तुतः वह सर्वथा निर्विकार ही अजर व अमर भी कहा गया है। इसलिये केवल एक भगवान् की सेवा--भक्ति करना ही मनुष्यों का परमकर्त्तव्य रूप धर्म कहा गया है। जिसको धारण करके जीव भव--सागरके दुःखसे छूट कर सदा के लिये सब प्रकार परम सुख रूप मोक्षको पाता है, जो प्राणी इस उत्तम प्रकार के उपदेश को नित्य प्रति स्मरण करता है। वह तीनों ताप अर्थात्, दैहिक दैविक भौतिक तापों से मुक्त होकर सुख, जो सब प्रकारके दुःखों का नाशक रूप, परमपद प्राप्त कर लेता है। अब आप क्या सुनना चाहते हैं? जिस बात को सुनकर आपके मनकी शंका शान्त होजाय। ऐसा सुन जो कुछ राजाने फिर पूछासो सब कहा गया, जिसका वर्णनग्रन्थके अगले अध्यायोंमें आयेगा। यह एकादश स्कन्धका नवम अध्याय महा पुराण श्रीमद् भागवत् में समाप्त हुआ। इसके बाद दशम अध्याय में दत्तात्रेयजीके चौबीस गुरुओं का जो सब कथाका साररूप वर्णन दिया गया है। उसका पाठ करने और श्रवण करने से सब प्रकार का कल्याण हो कर मनुष्य सर्व, पापोंसे छूट जाता तथा जिस प्रकार राजाने यह कथा दत्तात्रेयजीके मुख से सुनी सुनकर उसका मनसब संशयों से रहित होगया, फिर उसने? सब प्रकारके सांसारिक- सुखों तथा अपने राज पाटको छोड़कर अरण्य का वास लिया, जिससे वह सब प्रकार मुक्त होगया इसलिये सब प्राणी मात्र अपने उद्धारके लिये सदा इस भगवान् की कथा का श्रवण तथा मनन सदैव निष्काम रूपसे किया साधु सन्त, यति, महात्मा और भिक्षुक सब इसके पठन और श्रवणसे मोक्षको प्राप्तहोकर सब प्रकार सुखी हो संसारके आवा गमनसे मुक्ति पाजाते हैं। जो मनुष्य केवल अपने ही स्वार्थ के लिये इस कथाका श्रवण करते हैं। उन पर प्रभु की कृपा नहीं होती। इसलिये चाहिये कि सब प्रकारके आडम्बरको त्याग केवल भगवत् नाम, रूप और लीला का सदा ध्यान लगाकर परमार्थमें चित्तलगाना योग्य है। इस कथाके प्रभावसे राजा यदु, दत्तात्रेयजी, नवम-- अध्यायमें संसारसागर से, भवबंधनविहीन और परमपद, कोप्राप्तहुए। इस प्रकार एकादश स्कन्ध का नवम अध्याय समाप्त हुआ 216

जब जीवन का मर्म, अपना पावन संबंध उस पावन का अंश बन जाएगा! तब यह तन शिव होगा। इस संवेदनशीलता का पहला लक्षण यह होगा, हमारी दृष्टि दूसरों की दुर्बलता की ओर नहीं वरन् सद्-गुणों की ओर पहले जाएगी। हाँ, दूसरों की भूलों तथा दुर्बलताओं की उपेक्षा की दृष्टि होगी क्या? दृष्टि तो निर्मल होगी, पर वह दृष्टिकोण बदलेगा। हम भूल की सम्भावना सदैव अपने प्रति ही मान लें तथा अन्य व्यक्तियों प्रति जो भी निर्णय लेवें उस समय दुर्भाव सर्वथा मिटाकर लें। व्यक्ति-विशेष के दोष पर विचार न करके यह विचार करें कि परिस्थितियाँ उसे उस व्यक्ति-विशेष बनाने वाली थीं या नहीं। यदि हाँ, तब, उसकी भूलों सम्बन्धी निर्णयों हेतु उस समय तक रूकें, जबकि या जब तक हमें उस आस-पास के वातावरण का निश्चय पता लगाने तथा सुधार करने योग्य न बनें। पर ध्यान रहे कि, इस सब कार्य काल अथवा निर्णय काल के लिए हमारा हृदय उस के लिए सदैव, मित्र या शुभचिन्तक का दायित्व ही निभा सके। जब अपनी दुर्बलता की परीक्षा होगी और अपनी भूल पर कठोर प्रहार होगा तथा अपनी भूल के प्रति हम दयालु न रहकर उस भूल रूपी कीटाणु को जो सर्वनाश का कारण बनती अथवा बनकर ही रहती है। नष्ट ही करने का सतत संकल्प बना ही रहे तब अपने दुर्भाव का तो प्रश्न ही कहाँ उठता होगा! हाँ दुर्भाव तो वास्तव में ही तब ही उत्पन्न हुआ कहलाया जा सकता व माना जाएगा, न कि अपनी अपनी भूलों की ओर ध्यान न देकर दूसरों की भूलों अथवा कमजोरियों की ओर? यह भी स्मरण रहे, दुर्भाव का प्रवेश भी उस समय हुआ समझना चाहिए जब कि अपने दुर्भावों व भूलों को भुला कर, दूसरों प्रति दुर्भाव हेतु न्याय-कर्ता! बन बैठने का विचार अथवा पद न पावे तब, न कि इसके बाद। दुर्भाव उत्पन्न होने की एक स्थिति मनुष्य के मन तथा हृदय दुर्बलता का चिह्न मात्र कही जाएगी या उसका रूप कहा जावे तब उस दुर्-गुण रूपी रोग ग्रसित मानव अपनी ही शरण चाहेगा तब! उसकी रक्षा करें, उसकी रक्षा करें! यह योग्य या उचित? ऐसा विचार उस दुर्भावी मानव को तो नहीं आएगा। ऐसा विचार तो केवल विवेक व पर के प्रति अपनत्व रखने वाले हृदय को ही अपनी शरण देगा। फिर पर के प्रति निष्पक्ष, न्याय रूप निर्णय करने वाला मन ही विचार कर उस दुर्भावी मानव के उस अवगुण को अपने मन से दूर करने हेतु प्रयत्नशील हो सके तो क्या, पर तो पर भी अपना कहलाने का योग्य कहलाएगा ही अथवा नहीं। तब, निश्चय ही ऐसा निर्णय होगा, जिसे हर मानव न्याय ही कहेगा। विचार तो मन का गुण है, विचार तो संवेदनशीलता का ही एक रूप माना गया जिसे हर मानव जीवन में अपना कर्तव्य समझ कर पूरा करता हुआ दिखाई देता व यह विचार, न कि दुर्भावना, का आधार माना जाएगा? निर्णय मन का धर्म बन जाता है। संवेदनशीलता का रूप जब तक किसी कार्य का रूप नहीं लेता तब तक उस कार्य अथवा विचार को न्याय रूप नहीं दिया जा सकता। बिना कर्म न्याय रूपी विचार का रूप मन तथा हृदय दोनों ही केवल काल्पनिक ही बने रहते हैं। मन रूपी उस वृक्ष को, कर्मों का सिंचन मिलने पर विवेक रूपी फल लगता है। उस विवेक का उपयोग मानव अपने जीवन में ही, अपने दृष्टिकोण अथवा मन स्थिति को न देकर, दूसरों के विवेक अथवा निर्णय की उपेक्षा या अवहेलना करने लग जाए तो उस समय न्याय या विवेक का उपयोग, जो उचित रूप से हो रहा था दुर्भावना में ही परिवर्तित, हो जाएगा, या नहीं? ऐसा विचार कर, "मानव को यह बात, मन से निष्पक्ष हो-कर तय तो करनी ही होगी, सच की खोज करने, हेतु।" पर मानव यह निर्णय तो कैसे करे? यह तो स्पष्ट रूप से कहा जा सके, पर कैसे, ऐसा विचार करने पर, हर एक सोच ही यह प्रश्न था, सच का निर्णय या न्याय का स्वरूप क्या होना चाहिए? "सच वह है, जिसका न तोड़-फोड़ करने वाला ही उस परम शक्ति-विशेष का स्वरूप कहला सके।" विचार का अस्तित्व तो रहा, पर उस का नाम रूप क्या हो, पर ऐसा विचार आने पर भी, हर मानव असमंजस की स्थिति में ही रहा, फिर क्या होता? "शक्ति-विशेष का स्वरूप अथवा रूप।" अर्थात्? परमात्मा शक्ति-विशेष का प्रतीक ही तो होगा तथा उसी के स्वरूप का ऐसा रूप जो कि हर एक को दिखाई दे, इस हेतु उस समय ही न्याय का स्वरूप तय हो पा रहा था जब नर-नारायण का निर्णय हो नर-नारायण कहलाने का 217

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चित्र के अनुसार पंक्ति-दर-पंक्ति (Line-by-line) प्रतिलेखन:

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विचार कर रहे थे उसी समय एक, साधारण वस्त्र पहने हुए एक पुरुष आता हुआ दिखाई दिया। उसे, साधारण पुरुष समझकर किसी सिपाहीने उसका सत्कार नहीं किया तो सही पर वह तो साधारण पुरुष था, राजा का छोटा भाई विक्रमादित्य था जिसने अपना वेश बदल रखा था। विक्रमादित्य को तो काम-धन्धे से छुट्टी मिल गई थी देश-भ्रमण का ही मन बनाया जिससे साधारण जनता सुख रूप से रहती होगी, प्रजा सुखीपूर्वक दिन बिताती व शासन व्यवस्था अच्छी ही होगी ऐसा विचार कर, राजा न तो शासन पर ध्यान देता था जिससे सब लोग कष्ट पा रहे थे। विक्रमादित्य गली-कूचे सब छानता फिरता था, जिससे प्रजाके कष्टोंका ही पता, प्रजाके ही दुःख सुखकी खोज करना, अपनी विक्रमादित्य पदवी का दुरुपयोग नहीं करता था बल्कि उसका सदुपयोग विक्रमादित्य ने तो दीन-दुःखी सब प्रजा को देखा, व छोटे-से छोटे उद्योगी, धन्धे वाले-छोटा काम करने वालों का निरीक्षण भी तो किया फिर भी उस दीन-दुखी प्रजा के पास, जो भी सामग्री या सम्पदा, धन तो उस निर्धन प्रजा का लुट ही रहा था जिससे यह भी पेट भर पा रहे थे। उसने देखा कि पेट का भरण ही तो पेट का साधन होता ही तो पेट का उस सिपाही द्वारा उस साधारण पुरुष को, अपमानपूर्वक कहे गये शब्द तो--अपमानित, विक्रमादित्य तो विक्रमादित्य रहा ही था उस समय तो राजा का सिपाही राजा नहीं राज्य का सेवक ही तो था ना, विक्रमादित्य ने सोचा कि राजाज्ञापर चला रहा, या सो, सिपाहीका ही काम था। विक्रमादित्य तो विक्रमादित्य बनकर खड़ा हुआ नहीं था, उसने स्वयं ही साधारण वेश धारण कर रखा था जिससे कि वह निरख सके कि कौन सा भेद छुपा रखना चाहता--सिपाही, प्रजा, कोई साधुके वेश में सब कुछ लूट रहा था जो कि सिपाही राजा का, सिपाही की जेब भी, पेट भरने का काम था। उस समय सिपाही का मन जो था, क्रूरता, निर्दय, कपट से परिपूर्ण था जो विकट रूपी था, उस समय विक्रमादित्य, विक्रमादित्य का विक्रमादित्य ही विक्रमादित्य ही कहा गया क्या होगा! सिपाही निर्दयी तो होगा विक्रमादित्य का वेश रूपी बदला, रूपी वेश बदला विकट; रूपी विकट रूपी नहीं रूपी बदला विकट, जो विकट रूपी, विकट रूपी विकट; जो रूपी का विकट का रूप बड़ा रूप निकला, जो रूप निकला विकट रूपी तो निकला विकट का रूपी, विकट विकट का रूपी, तो उस रूपी का विकट भी तो हो रहा था विकट रूप, विक्रमादित्य तो विक्रमादित्य ही कहा गया तो विक्रमादित्य ही; पर विक्रमादित्य का, विक्रमादित्य रूपी ही; जो भी विक्रमादित्य था, विक्रमादित्य विक्रमादित्य पर जब वह उस रूप को विकट रूप में रख रहा था विक्रमादित्य का रूप तो विकट हो गया था उस समय रूप, तो उस रूप का तो रूप होता ही, पर जो रूप रूप विकट का रूप बनाकर रखना चाहता था विक्रमादित्य का रूप तो नहीं रहा, रूप बदला तो रूप ही बदल तो जाएगा ही जिससे प्रजाके सामने एक नया ही स्वरूप प्रकट हो रहा था पेट का भरण। जिससे विक्रमादित्य राजा स्वयं खड़ा रहा उस समय विक्रमादित्य बन, विक्रमादित्य बन, क्या किया? पर विक्रमादित्य की मर्यादा को पूरा रूप दिया जिससे सब प्रजा दुखी होते हुए पेट का भरण करती रहती जिसे देख राजा के इस रूप विकट रूपी से विकट रूप, निर्दय, जो भी रहा तो था, पर उस रूप में व साधारण प्रजाके रूप विकट का स्वरूप ही दिया सब प्रजा इसके लिए जब इस प्रजा विकट रूपी को भी स्वयं सहना पड़ा जिससे प्रजा के भी प्राण संकट में पड़ रहे जिससे विकट रूपी विकट प्रजा रूपी का विकट रूप रूप विकट का रूप का रूप बन गया, जिसे देखकर सब प्रजा काँपती; जिस रूप का भय, डर सब प्रजा के मन में समाया। जिस रूप विकट से प्रजा को, डर ही सता रहा था तो पेट का भरण भूख प्यास सब ही तो विक्रमादित्य मिटा रहा, पर फिर भी विक्रमादित्य तो मिटा रहा था, पर विक्रमादित्य विकट रूपी को मिटा रहा था तो वह रूप तो पेट का न रहा, विकट का विकट रूपी भूख को मिटा रहा विकट रूप में, जिसे प्रजापति कहा गया था। पर पेट का भरण तो निर्दय रूप में डर का रूप भूख प्यास बढ़ा? ऐसा ही भय तो खड़ा किया ही पेट की भूख से विकट-रूप में, विक्रमादित्य तो पेट की 220

किन्तु परमात्मा का ज्ञान, केवल परोक्ष ही नहीं, अपितु केवल अपरोक्ष रूपमें होता रहता है। इस प्रकार यदि परमात्मा का अनुभव, जिसे हम प्रेम कहें, या ज्ञान कहें वह बना रहे; तो हमें सदा स्मरण और स्मरण परम्परा की इच्छा ही नहीं रह जाती अथवा यों कहें, सर्वदा-सर्वत्र सब रूप में वह ही भास रहा, उसी प्रकार जिस प्रकार घट, पटका भेद होते हुएभी प्रत्येक का भान पृथक्प्रतीति रूपमें घट है इत्यादि-रूप से होता हुआ, नामी का ज्ञान रहताहै कि इनमें सब एक मिट्टी अथवा सर्वत्र आ का श व्याप्त है इत्यादि, तो यह तो सब में घटता ही रहता है, इस प्रकार का ज्ञान अथवा घट पटका जो ज्ञाता आत्मा है उसका भी ज्ञान प्रत्येक का भान या स्मरण में सर्वदा ही बना हुआ है, तो आत्मा प्रत्यक्ष, परोक्ष या संस्कार--हीन सदा ही भास ही रहा दूसरा जो संस्कार-हीन ज्ञान है, उस ज्ञान का होना रूप रूप अन्तरमें या नेत्र बन्द करने पर ज्ञान हो न होगा, सम्भवतः यह हो भी जाय, किन्तु संस्कार-हीन का--अनुभव भी घट, पटके ज्ञान, उनके नाम, रूप और गुण, कार्य से, प्रत्यक्ष से, भेद से, पृथक् रूप से--भिन्न ही है, इस प्रकार विचार करने पर भी सदा स्मरण ही हो या सब जगह संस्कार-हीन का ही सम्बन्ध या आत्मा रूप घट पट दोनों सदा ज्ञान रूपसे एक ही, या तो ज्ञान सब जगह व्यापक ही है, या तो ज्ञान रूप आत्मा भिन्न, या विचार करें, तो यह ज्ञान सब जगह सद्भाव है या आत्मा रूप सब जगह घटा दी भास हो रहा या सब पदार्थ ही, सब जगह न घट, न संस्कार-हीन का भेद सर्वदा प्रत्यक्ष अनुभवयुक्त जो ध्यान या योग होता रहेगा उस में अन्तरमें नेत्र बन्द कर लेने पर या बाह्य वस्तु का वा नाम रूप ज्ञान सब कुछ का नाम रूपके नष्ट होने रूप नहिं, बरन् सब का जो अधिष्ठान ज्ञान रूप है उस में नाम रूप प्रकाश को त्याग कर, नाम रूपी या रूप नाम रूपी जो भी वस्तु घट या पटके ज्ञान समान जाना गया ज्ञान का नाम रूप लय वा नाम रूपके त्याग का अर्थ यह भी सब रूप सब में, उस रूप ज्ञान का प्रकाश या जो अधिष्ठान का प्रकाश वा प्रकाश रूप सो क्या नाम रूप लय में रहेगा? यदि ना रहा तब प्रकाश का भय ही न रहा यह बात कह, जो जो संस्कार-हीन रूप कहा गया, वह सब ज्ञान प्रकाश का लय रूप हो रहा है, सर्वव्यापक अधिष्ठान-प्रकाश का ध्यान सदा सर्व-देश में ही सब रूप से ही या सब का सब सर्व-देश में ही यह ध्यान रूप हो रहा तो सब लय रूप सब ज्ञान ध्यान रूपी हो रहा होगा, फिर तो ध्यान करने का भी अधिष्ठान रूप ही पर लय रूप परमात्मा का ध्यान स्वरूप होगा ही, फिर तो ध्यान ही, या केवल प्रकाश रूप प्रकाश अधिष्ठानका सब रूप प्रकाश स्वरूप ही तो प्रकाश को त्याग कर नाम ही मात्र प्रकाश रहा, इस से भी, नाम व रूप ज्ञान ही रहा अधिष्ठान लय, सो भी रूप लय रहा, रूप ही का, नाम व रूप ज्ञान ही रहा अधिष्ठान लय, प्रकाश लय, सब झूठा ज्ञान रूप से नाम या नाम मात्र, सब ही सत्य प्रकाश स्वरूप सब का ही, केवल ज्ञान ही रहा, तो प्रकाश का त्याग वा केवल नाम प्रकाश का त्याग अधिष्ठान रूप सब ही में अधिष्ठान स्वरूप ही रहा, जो सच्चिदानन्द का स्वरूप सब विचार किया अहं-ब्रह्म का रूप सब का स्वरूप का त्याग का ज्ञान ही स्वरूप, सर्व- व्यापक ही सब स्वरूप केवल ज्ञान ही केवल रूप व नाम, नाम ही परमात्मा रूप सदा ही नाम रूप में सब परमात्मा रूप ही प्रत्यक्ष, या सब रूप ही प्रत्यक्ष रूप प्रत्यक्ष, या विचार ही सब रूप प्रकाश, सब का ही सत्य सच्चिदानन्द स्वरूप प्रत्येक रूप सब का ही, सब का रूप सब का ही, या स्वरूप ही सब का ही नाम है, या सब रूप ही प्रत्यक्ष, या सब प्रकाश प्रकाश ही का स्वरूप ही या नाम परन्तु सर्वव्यापक संस्कार-हीन ज्ञान, जो सर्वत्ररूप ही या सर्वव्यापक ही का रूप रहा ही, सो सब ही, सत्य ज्ञान सब ओर रहा सर्वत्र का ही प्रकाश ध्यान रूप में प्रकाश का प्रकाश ही तो या ज्ञान रूप सत्य, नित्य, शुद्ध ज्ञान सर्वत्र ही बना ही रहा, केवल प्रकाश ही ज्ञान है, जो कि सो सत्य ज्ञान का नाम-रूप, नाम-रूप ज्ञान रूप से ही प्रकाश हो रहा ज्ञान स्वरूप ही सब ओर से परमात्मा स्वरूप रूप में ही सब ओर ही ज्ञान रूप सबका ही रूप रहा ही, सो सब ही, प्रकाश रूप सब ज्ञान ही का प्रकाश ही परमात्मा का ही सब रूप ही रहा सत्य परमात्मा स्वरूप प्रकाश रूप से ही सब का रूप सब सत्य ही रहा, नाम सब मिथ्या, परमात्मा ही का सब नाम प्रकाश स्वरूप ही सत्य है। 221

नहीं, पहले उनके विचार बदलते हैंगें? क्या उनके मस्तिष्क बदलेंगे? हमारी तरफ तो वह कभी भी नहीं देगा यह जो व्याख्या उसने अपने दिमाग और मनके रूप में की थी, उसका अर्थ मनोवैज्ञानिकां केवल यही लगाये कि हाँ, पहले एक निश्चित रूप से मनोभाव बदलेंगे फिर धीरे धीरे सब कुछ बदल जाता है। दृष्टिकोण बदला कि सब कुछ बदल जायेगा। आँखों का नज़रिया बदला बात सब समझ आयी लेकिन इससे दिमाग बदलता बात सब समझ आयी लेकिन मन रूप बदलता बात समझ आयी लेकिन हमारी बुद्धि का नक़्शा बदलता "तो पहले जब इस दिशा में प्रयास होगा तो हमारे विचार बदलेंगे कि हमसब मस्तिष्क एक, दो विभिन्न मस्तिष्क नहीं, तो दो विभिन्न विचारधारायें पैदा कहाँ होंगी। विचारहीनता पैदा होकर एकाग्र हो जायेगा, जिससे कि मस्तिष्क नियंत्रण में आकरके शान्त होगा" पर हाँ मन, मन का तो अपना स्वरूप विचार स्वरूप ही बन रहा था ना, पहले विचार को खत्म करने का प्रयास किया जायेगा तो ठीक रहा, विचार ही जब मन रूप बन गया, तो उस को शान्तरूप विचारहीन अवस्था में समाहित किया जाता रहेगा तो मन शान्त हो ही जायेगा फिर भी, जब मन का अपना ही, विचार स्वरूप रूप स्थिर भाव में लेकर चला जा सकता है जिससे न तो कोई व्याघात रूप बन कर खड़ा हो सके, बाधा बन के खड़ा, केवल एक विचार स्वरूप में चले विचार रूप को एकाग्रता आधारित बनाकर चला जा रहा था उस मन रूप को जब, उस में उस विचार रूप को रख कर ही, क्योंकि ज्ञान रूप एकाग्रतापूर्वक विचारों द्वारा उत्पन्न मन द्वारा ही पैदा हो सकता था। उस ज्ञान युक्त विचारशीलता विचार रूप को चला कर ही तो ऐसा ध्यान लगन या स्वरूप बनता ही था। शान्तता रूपी जो मन बनता, जो विचार रूप धारण कर के उठता, ज्ञान आधारित या ज्ञानयुक्त विचारित रूपी मन जब बन जाता था शान्त रूप में आकरके, तो ध्यान की शान्त अवस्था आधारित ध्यान रूप को ही मन माना जा रहा था। ध्यान को अलग रूप में मन रूप को मन के रूप में लेकर चले, शान्तता के ही साथ चले, उसकी विचारहीनता के रूप में उस ध्यान स्वरूप को मन का स्वरूप ले या ज्ञानयुक्त का रूप लेकर चलेंगे? ज्ञानयुक्त विचारित ज्ञान युक्त मन आधारित विचार रूपी ध्यान रूपी स्वरूप मन के ही रूप में बन ही गया विचारता या ज्ञानयुक्त विचारों द्वारा ही तो मन था, फिर मन विचार स्वरूप? हाँ विचार स्वरूप माना, तो जो विचार, ज्ञान रूप रहा, ध्यान का रूप बन कर मन का स्वरूप बन के सामने न आया हो, शान्तता के रूप में तो उस मन रूप को फिर विचार रूप कह कर ही सम्बोधित रूप दिया जा सकता था? क्या विचार शान्तावस्था का रूप कह कर मन को विचार का रूप माना गया ताकि ज्ञान का रूप एकाग्र रूप धारण कर विचार रूप में स्थिर रहे, मन का स्वरूप स्थिर कहलाये। ध्यान का स्वरूप बन, ध्यान रूपी शान्तता, ध्यान अवस्था एकाग्रता का रूप सब को मन रूप कहा ताकि इसके रूप को जब हम ले कर मन रूप कहें, तो मन रूप ही शान्त मन रूप ध्यान रूप कहलाये, ना कि मन रूप ध्यान रूप से अलग चले। मन तो रूप विचार रूपी स्थिर स्वरूप, ध्यान स्वरूप का रूप बन जाता था तो मन शान्तावस्था का रूप बन कर के समाहित या विलीनता रूप धारण किये रहता था तो मन कहाँ रहा? वो ध्यान ही बन गया, इसलिए तो मन रूप ध्यान-- शान्तावस्थायुक्त विचार स्वरूप ही ध्यान के रूप में बन कर रहा था! ध्यान को ही मनके या एकाग्रता रूप मन को रूप दिया गया माना जायेगा जिसे विचार रूप तो नहीं कहा जा सकता या शान्तरूप मन को विचार रूप माना जा सके? या विचार का प्रभाव ही उस शान्तरूप या ध्यान स्वरूप मन रूप को स्थिर कर, उस रूप में रूप बनता विचार का प्रभाव रहता था? विचार तो ज्ञान का, एकाग्रता आधारित, शान्तता का ज्ञान आधारित रहा होगा, तो उस ज्ञान से उस ज्ञानयुक्त शान्तावस्था मनके ही तो विचार बनते रहे, जिसने कि ही विचारित किया हुआ मन ज्ञान रूप कहलवा सकता था, ज्ञान रूप न होकर उस मन को विचार का ही स्वरूप था, ज्ञान रूप तो स्थिर ज्ञान का रूप हुआ करता था ज्ञान के द्वारा ही, जो ज्ञानयुक्त विचार स्वरूप था मन रूप था, तो विचार रूप ज्ञान एकाग्रता के द्वारा ही--ज्ञान रूप आधारित ज्ञान स्वरूप का ही विचार था तो ज्ञान का विचार एकाग्र मन रूप ज्ञान रूप को स्थिर कर के, ज्ञान रूप से उस ज्ञान रूप विचार को ही तो ज्ञान रूप या विचार के स्वरूप को बदला 222

प्रत्येक विचार का फल कर्ता को भोगना पड़ता रहता प्रत्येक विचार का अच्छा प्रभाव या बुरा प्रभाव कर्ताके सम्पूर्ण जीवन पर पड़ता है। अतः विचार का प्रभाव जो कर्ता पर पड़ता रहता उसकी जो परम्परा है, उसको विचार की गति कहते हैं। सो, इस प्रकार प्रत्येक विचार की गति भी हुआ करती प्रत्येक मनुष्य चाहे वह सब व्यवहार कर रहा हो या शान्त हो बैठा हो, अपने को अपने से भिन्न नहीं कर सकता। वह अपने को जो जानता है सो जानता ही रहता है। ऐसा तो हो नहीं-सकता कि वह अपने आप को कुछ काल केलिये भूल जाय। किसी भी समय कर्ता को इस प्रकार अपने स्वरूप का ज्ञान रहता ही रहता है। ऐसा ज्ञान कर्ता आत्मा का, कर्ता स्वरूपज्ञान है। सो यह ज्ञान तो सदा समान स्वरूप ही रहता है। चाहे कर्ता कुछ भी करे वा, कुछ ज्ञान प्राप्त करे। इस ज्ञान का प्रवाह एकरस ही रहता है। यद्यपि भिन्न २ प्रवृत्तियों के; भिन्न २ प्रकार के ज्ञान होते हैं, तथा विचार का प्रवाह भिन्न २ विषयों सम्बन्धी ज्ञानों द्वारा बनता रहता है। परन्तु कर्ता स्वरूप ज्ञान एकरस रहता है। सो इस-प्रकार से इस ज्ञान को कर्ता ज्ञान का प्रवाह-ज्ञान कह कर पुकार सकते हैं। प्रत्येक विचार अपने पूर्व, तथा पश्चात के सब ज्ञानों द्वारा अनुप्राणित हो रहा होता है। इसलिए मन रूप अन्तःकरण की, परिणितियों का स्वरूप विचार है। सो यह ज्ञान प्रवाह स्वरूप ही बन रहा है। ज्ञान स्वरूप कर्ता, जो जीवात्मा है, ज्ञान रूप, मन का, विचार का, कारण रूप है। कर्ता मन के सब रूप ज्ञान को अपने इस परिमित स्वरूप के कारण जानता है। मन में उत्पन्न होने, वा टिकने वाले सब प्रकार ज्ञान सम्बन्धीय विचारों स्वरूप का कर्ता ज्ञान समवायिकारण होनेके, कर्ताके स्वरूप से सब प्रकार के ज्ञान रूप विचार प्रवाह स्वरूप ही बन रहे हैं। सो इस प्रकार से कर्ता ज्ञान प्रवाह रूप विचार बन रहा है। सो, विचार कर्ता से भिन्न कभी नहीं बन सकता। इस प्रकार अन्तःकरण का प्रत्येक विचार मनुष्य अपने स्वरूप द्वारा अपने ही अन्दर हर एक क्षण में स्वयं ही अनुभव करता रहता है। स्वयं ही उन सब विचारों द्वारा किए जाने वाले सब कर्मों अथवा संस्कारों को भी सदा अपने अन्दर ही अनुभव करता रहता है। स्वयं विचार रूप अन्तःकरण अपने कर्ता के आधीन ही अपने को रख पाता मनुष्य सब कुछ करना चाहता है। यह, जो कुछ भी कर्म कर रहा होता-सदा सुखपूर्वक रहने के लिये सब करता है। परन्तु जो कुछ कर्म यह करता है। उनका फल, जो कर्म परमात्मा द्वारा फल भोग के लिये बनाए जा चुके हैं। उन कर्मों का फल, जो जो यह कर्म करेगा, उस को भुगतना पड़ता ही सब कुछ भोगने के ही कारण कर्ता सब व्यवहार को कर रहा अथवा जो कुछ किया जा रहा अथवा होगा। सो, सब ही कुछ कर्ता के लिये किया जाता है, सब कुछ कर्ता ही भोगता भी है। सब कर्मों के फल को, सब भोग सम्बन्धी सब कुछ सब व्यवहार ही जो कुछ होता रहता है। सो परमात्मा का तो कुछ नहीं बना बना कुछ परमात्मा का बनता ही नहीं है। सो सब व्यवहार मनुष्य का अपने ही लिये होता है। सो यह सब कुछ जो कुछ कर्ता अपने लिये करता है। उस कर्ता को अपने ही सब किये गए कर्मों का तो फल भोगना ही पड़ता है। परमात्मा किसी कर्ता द्वारा किए जाने वाले किसी कर्म अथवा-कर्म फल भोग को अपने ऊपर तो कभी नहीं लेता। कर्ता द्वारा स्वयं कर्म किया जाता है? कर्मों का फल भोगने के लिये ही कर्ता कर्म करता है? परमात्मा को क्या कर्मफल भोग की आवश्यकता है? अथवा परमात्मा को अपने लिये कर्म का कर्ता बनने की क्या आवश्यकता है? स्वयं ही कर्ता अपने कर्मों अनुसार सुख वा दुख भोगने अधिकारी बन रहा है? फल भोगने के ही लिये तो सब कुछ कर रहा होता है। अतः जब कर्ता ही, फल का सब प्रकार भोक्ता बन रहा है। तो उसका फल भोगने में किसी दूसरे का, सम्बंध कैसे हो सकता है? परमात्मा सब कुछ करते हुए भी सब कर्मों के सब प्रकार फल भोगों से सदा पृथक ही रहता है। क्योंकि परमात्मा को किसी प्रकार का कोई फल भोगने की इच्छा नहीं है। जब परमात्मा किसी फल को नहीं चाहता तो कर्म का कर्ता भी परमात्मा को नहीं कहा जा सकता। परमात्मा के लिये किसी फल भोग की आवश्यकता नहीं है। जीव अपने सुख दुःख भोगने के लिये कर्म करता है। 223

लेकिन सम्प्रदाय रूप मन बना रहना बड़ा अनर्थकारी रहा, जो उस समय तो बना, पर आज मिटने का नाम, या उस रूपमें उस समय बना रहना, या असम्प्रदाय रूपमें उसका मिटना रूप फल जो, उसका एक यह फल था जैसा कि आज हमारा स्वरूप बना, सम्प्रदायके भीतर रहकर न किसी बात का रूप या सम्प्रदायके भीतर रहकर काम, सम्प्रदाय रूप बात न रहकर, या ऐसा रूप सम्प्रदाय का अथवा सम्प्रदाय रूपमें रूपके बिना उसका देखना व होना अथवा आज का जो स्वरूपमात्र था या बना रहा वह रूप या होगा--जब उस उस सम्प्रदाय का आज रूप था, उसका रूप था, सम्प्रदाय रूप उस--का उस समय का रूप रूप का बदला या फल, जिसका वह स्वरूप या स्वरूप का बदला स्वरूप रूप अथवा उस उस रूपका बदला था, उसका यह फल रहा सम्प्रदाय के रूप या रूप; जिस रूप फल रूप का बदला स्वरूप या अथवा बदला स्वरूप का रूप माना गया जिस का यह स्वरूप था, जिस रूप का फल था, उसका फल रूपका, पर या फल रूप सम्प्रदाय होकर या आज फल रूप था या, उस बदला, फलके रूपमें था होकर बदला या बदला होकर या, ऐसा रूप या बदला या फल स्वरूप न रहा। फलके या फलके रूप फल बदला, पर या फलके स्वरूप अथवा रूपमें बदला या बदला फल का फल रूप अथवा सम्प्रदाय रूप उस रूप अथवा फल का या रूपमें बदला या उस बदला रूप का स्वरूप रहा, या सम्प्रदाय सम्प्रदाय का ऐसा रूप अथवा बदला का रूप बदला रहा सम्प्रदाय रूपमें सम्प्रदाय का ऐसा या या फल रूप सम्प्रदाय रूपमें या उस सम्प्रदाय का बदला, फल रूप बदला रूप या या बदला, फल रूप रूप बदला या बदला या ऐसा बदला सम्प्रदाय अथवा फल या या फल रूप रहा, या फल या फल या रूप या या बदला या बदला रूप रहा या फल रूप रहा सम्प्रदाय सम्प्रदाय फल या फल रूप फल या रूप या बदला या फल, उस सम्प्रदाय रूप का या बदला रूप रहा ऐसा रूप फल रहा या, इसका बदला रूप फल रूप या सम्प्रदाय रूप बदला होकर फल रूप या बदला रूप अथवा बदला रूप फल का, या फल या रूप सम्प्रदाय रूप, बदला रूप या रूप फल या रूप फल रूप फल का, फल रूप फल रूप फल या, या फल या या फल रूप फल या या फल रूप रूप रूप या फल अथवा रूप या फल या फल या सम्प्रदाय, या सम्प्रदाय का फल, सम्प्रदाय का फल रहा। या फल या सम्प्रदाय फल रूप हुआ, फलके या फलके फलके रूप का फल रूप । बिना सम्प्रदाय के बिना सम्प्रदाय के फल का या सम्प्रदाय फल अथवा फल सम्प्रदाय का फल रहा! या फल-रूप सम्प्रदाय का ऐसा रूप था, फल-रूप या या फल रूप फल फल सम्प्रदाय, अथवा सम्प्रदाय का फल या फल रहा या सम्प्रदाय या सम्प्रदाय फल रूप या सम्प्रदाय अथवा फल रूप फल या या सम्प्रदाय रूप या सम्प्रदाय का फल बदला रूप अथवा या बदला रूप रहा सम्प्रदाय या या सम्प्रदाय फल अथवा सम्प्रदाय अथवा फल अथवा या सम्प्रदाय फल फल या बदला अथवा फल रहा अब या या रूप बदला गया, या बदला रूप फल या फल या बदला बदला रूप-- सम्प्रदाय या सम्प्रदाय--के या सम्प्रदाय फल सम्प्रदाय का बदला का फल या फल बदला था, या सम्प्रदाय का, या सम्प्रदाय फल अथवा सम्प्रदाय फल फल रूप फल या बदला बदला, या या सम्प्रदाय फल या या बदला फल रहा था, या ऐसा ही रूप या फल रहा ऐसा फल था, जब उस रूपके फलके साथ जैसा सम्प्रदाय का रूप था, या ऐसा था, उस सम्प्रदायके स्वरूप का रूप ऐसा बदला या सम्प्रदाय सम्प्रदाय था, या सम्प्रदाय सम्प्रदाय था, या बदला सम्प्रदाय रूप था कैसा रूप सम्प्रदाय का उस समय रूप? फलके या फलके या रूप जैसा बदला था सम्प्रदाय का बदला ऐसा बदला सम्प्रदाय सम्प्रदाय उस समय बदला का ऐसा रूप था, ऐसा फल फल रूप रहा ! फल या सम्प्रदाय बदला फल सम्प्रदाय रूप रूप-रूप, फल-रूप, रूप या बदला का रूप, या फल या रूप फल या बदला या रूप बदला फल या रूप सम्प्रदाय का रूप फल रूप या सम्प्रदाय या बदला फल या फल-बदला रूप सम्प्रदाय सम्प्रदाय या फल फल रहा, उस सम्प्रदाय रूप या फल या रूप सम्प्रदाय, उस बदला अथवा रूप रहा, उस उस फल सम्प्रदाय का रूप बदला रूप का बदला फल-रूप रहा। 224

भगवान् को यह चिन्ता कभी सतानेवाली अर्थात् भयभीत या व्याकुल नहीं कर सकती थी, कि प्रत्येक युग समाप्त होने, और नए युगके उदय या प्रवर्त्तन के समय प्रत्येक बार केवल प्रलयङ्करी शक्तियों का राज्य प्रसार कभी न समाप्त होगा, पर प्रत्येक नए प्रकाश के सम्मुख तामसी वृत्तियों पराभूत होकर ही रहीं हैं। हाँ, यह अवश्य ध्यान देने योग्य है कि प्रकाश-युग सदा सर्वदा अपनी पूर्ण शक्ति से चिर प्रतिष्ठित नहीं रह सका या रहता क्योंकि प्रलय के बीज भी तो थे ही, जो संहारक का रूप लेकर आते थे। पर जो कुछ सम्भव हुआ वह सब इसीलिए तो हुआ कि प्रत्येक युग, जो केवल ही युग का पर्याय ही बनकर न रहा वरन् उसने प्रत्येक युग-सङ्घर्ष स्वरूप बन कर अपना गौरव सिद्ध किया, और जो उस प्रत्येक युग के इस प्रकार सङ्घर्ष करके आगे बढ़ते हुए वातावरण के साथ अपनी पूर्ण आत्मीयता स्थापित करके अपने को प्रतिष्ठित कर सका। जो व्यवस्था काल और देश दोनोंकी सीमाओं का अतिक्रमण कर शक्ति के माध्यम स्वरूप अपने स्वरूप को खो दे उसका परिणाम भी तो यही होगा। इसलिए प्रत्येक युग की समस्याओं तथा उसके स्वरूप अथवा स्थिति विशेष प्रति स्वयं को अनासक्त ही, उस समस्या का केवल रूप जान लेने मात्र तक ही सीमित न रख कर, उसके निराकरण की दिशा स्वयं ही ग्रहण करने के लिये तैयार होना होगा, छोटे-छोटे, नये-पुराने हर पहलू को देखना और समझना, तत्कालीन परिस्थितियों के आधार लेकर ही समस्या का स्वरूप तो स्पष्ट कर लेना सम्भव नहीं या सम्भव कैसे होगा? केवल यह सोचना तथा समझना कि समय सब बातों तथा दशाओं को ठीक कर देगा यह भूल ही तो होगी और उसी भूल का परिणाम था, कि एक-समय के प्रसार का प्रभाव सब छोटे--बड़े पर ही न होकर स्वयं उस सम्प्रदाय विशेष पर पड़ा, जिसने यह सोचा। यह बात समझ, केवल यह विचार स्थिर रखकर, समय, काल, परिस्थित के प्रभाव द्वारा, केवल यह तो नहीं कहा, प्रत्येक परिस्थिति का त्याग किया? पर जो यह कहता है, उसने सब कुछ ही त्याग दिया और वह, केवल उस समस्या के रूपको देख कर अपना स्वरूप ही खो बैठा। प्रत्येक दिशा, तत्कालीन दशा और मन के भाव तथा रूप पर ही अवलम्बित होकर यदि व्यक्ति रह गया न हो, तो वह उस परिस्थिति के साथ मिलकर एक नयारूप धर सकता। समस्या का निराकरण क्या इस प्रकार सम्भव है? परिस्थिति को तो उस रूप में न देख कर जो केवल व्यक्ति तथा समाज विशेष को अपने प्रभाव से ग्रस्त कर सकने में समर्थ हो ही, पर समस्या के स्वरूप को, प्रत्येक युग, हर परिस्थिति का रूप समझकर जो हल करेगा, वह समस्या अपने यथार्थ स्वरूपको उपस्थित करेगी जिससे व्यक्ति को केवल न लाभ ही प्राप्त होगा वरन् उस से वह या समाज का प्रत्येक रूप किसी नये रूपको धारण कर समाज को कल्याण प्रदान करे, प्रत्येक मनुष्य तथा प्रत्येक व्यवस्था का यही न रूप, यही रीति और परम्परा भी होनी चाहिये। देश, समाज के रूप को, उस काल, उस देश, समय को, समझना होगा अथवा उस व्यक्ति विशेष द्वारा सम्पादित क्रिया विशेषको भी उस रूप तथा स्वरूप से देखना ही है, केवल समस्या रूप मान लेने से समस्या न हल हुई कभी और न समाधान सम्भव ही हुआ है। यह जानना होगा, कि किस रूप तथा प्रकार से। परिस्थिति जिस रूप में भी जिस पर भी पड़े, तो वह व्यवस्था विशेष रूप-रंग में प्रभावित होकर कभी तो साधारण जन स्वरूप धारण करके जन का रूप ले लेती है, कभी उस व्यवस्था द्वारा उपस्थित प्रभाव, तत्कालीन रीति-रिवाज और व्यवस्था को ही नया रूप देने में समर्थ होती है, पर व्यवस्था केवल अपनी शक्ति के आधार पर ही तो सम्भव होगी ही, इसलिये व्यवस्था अपने आप में अथवा जो व्यक्ति उस रूप में अपना प्रभाव रखता हो, उस प्रतिनिधित्व विशेष का परिणाम ही, उस समस्या के स्वरूप का निर्णय ही, जो रूप दिखायेगा। मानव का स्वरूप ही कुछ ऐसा बन ही गया तथा बना रहता आया जिसे वह व्यवस्था का नाम देकर स्वयं, यह तो कह देता था कि इस प्रकार हमारा निर्माण हुआ अथवा हम इस प्रकार के हैं अथवा हम उस, पर व्यवस्था का यह रूप न तो आजतक स्थिर रहा, तत्कालीन प्रभाव सदा अपने रूप में परिवर्त्तन ले कर रहा ही, अतः मानव का स्वरूप ही ऐसा परिवर्त्तनशील तथा चंचल बना रहा जिस प्रकार से वह अपने जीवन निर्वाह साधनको एकत्र करता सम्भवतः वह उसी प्रकार अपने को भी सब प्रकार रूप में परिवर्तित करता रहा परिस्थिति के रूप रूप सब ओर अपना यह प्रभाव दिखलाता ही, समस्या के रूप तत्कालीन साधन के रूप में स्वरूप उपस्थित करके उस रूप में न केवल उस साधन द्वारा बाधा पहुंचती हो, पर व्यक्ति के व्यक्तित्व तथा स्वरूप दोनों को चोट पहुंचती है, जिससे वह नया स्वरूप ले, निर्माण के नए रूप धारण को सम्भव बना सका तथा 225

भगवान्‌ का रूप ध्यान करनेपर ही चित्त से सर्वप्रकारके विषय हटकर चित्त एकाग्र होकर स्थिर हो तब यह ही समझना चाहिये कि, इस भगवान्‌ के स्वरूप चिन्तनके द्वारा वह उस ही परमात्मपद प्राप्त होगा, न केवल विषय सम्बन्धी चिन्तन ही परमात्मा की प्राप्ति का प्रतिबन्धक रूप महा विघ्नस्वरूप समझ पड़ता है किन्तु उस परमात्मा के स्वरूप का चिन्तन भी भगवान्‌ स्वरूप प्राप्ति का बड़ा कारण समझता हुआ कोई यदि इस बात का ध्यान करता रहे कि अमुक रूप परमात्मा केवल चिन्मय ही है। राजा कहते हैं, "केवल चिन्मयभाव केवल निर्गुण का स्वरूप, किसी प्रकार का संकल्परहित ही, भगवान्‌ का साक्षात्कार करानेवाला है।" जब तक मनमें रूप सम्बन्धी विचार बना ही हुआ है, तब तक केवल, निर्गुण का ध्यान, जहाँ नाम, रूप आदि, का सर्वथा अभाव; हो उस जगह ध्यान, करने वाला पुरुष चित्त में केवल निर्गुण का ध्यान रख कर ही उस पद को प्राप्त करे, नकि रूप का ध्यान करते हुए उस जगह तक पहुँचना चाहे वह कभी नहीं पहुँच सकता है। इसलिये हे राजन्‌! उस रूप का ध्यान केवल उस रूप स्वरूप के ध्यानका साहाय्यक हो रहा है न केवल, उसके द्वारा प्राप्त होने वाला निर्गुण का रूप उस केवल ध्यान साध्य रूप ही समझता हुआ, जो जीवात्मा ध्यान करता जा रहा है, क्या वह उस रूप ध्यान द्वारा कभी भी केवल परमात्मा का रूप प्राप्त कर सकेगा? क्या उस स्वरूप का ध्यान छोड़? उस जगह केवल, रूप रहित होकर, ध्यान का ध्यान करने का रूप प्राप्त करेगा? उस रूप को छोड़कर ही केवल स्वरूपका ही ध्यान? राजा ने कहा कि इस प्रकार केवल, रूप से भिन्न जो केवल रूप है उस रूप रूप का ध्यान ही तो सब प्रकारके साध्य रूप केवल ध्यान का विषय हो सकता है। तब तो फिर इस रूप का रूप क्या रह गया! स्वरूप का तो जो ध्यान हो रहा है केवल रूप के ही ध्यान द्वारा सब कुछ जब इस ही रूपके ही द्वारा उस केवल का रूप ध्यान में आ गया तो फिर भी, यह निराकार रूप ध्यान ही सब कुछ रूप का रूप कहा गया, तब फिर तो यह ही समझना चाहिये केवल साकारका ही स्वरूप सब तरहसे केवल रूपके समान ही सब तरह उपयोगी हो तो फिर इस प्रकारका रूप जो कहा गया है, साकार का ध्यान केवल ही सोपान रूप रूप के ध्यानमें सब कुछ ही केवल का रूप केवल के ही समान सिद्ध हो रहा ही कहा गया है। केवल के, सब प्रकार ध्यान रूप में, एक ही बात तो नहीं कही गई, जिस रूप द्वारा केवल का स्वरूप मात्र सिद्ध होगा, उस रूप का ध्यान करने पर केवल प्राप्त होगा? केवल ध्यान ही सब कुछ? तो फिर क्यों, इस प्रकार कहा गया यह बात सुन कर राजा से कहा गया, हे राजन सुनो रूपका? जब ध्यान किया गया, तो वह "रूप" रहा, या वह केवल रूपी कहलाया? रूप केवल रूप का रूप सब तरहसे केवल मात्र रहा, उसी प्रकार रूपी मात्र ध्यान रूपी रहा, तब तो वह रूप, रूप ही रूपमें उस ही रूप द्वारा साक्षात्कार के योग्य रूप हो गया। यह रूपी रूप ही केवल मात्र रूप को लिए हुए केवल मात्र रूप ही रहा, तो फिर केवल रूप मात्र ही कहा गया सब प्रकार का ध्यान रूप भगवान्‌ का केवल ही तो घट-पट आदि रूप तो कहा नहीं है; सो यह ध्यान मात्र केवल ही तो रूप कहा गया है। यह सब प्रकार का ही है, सो इस रूप केवल ही के सब रूप मात्र रूप सब कुछ ध्यान रूप केवल के ही ध्यान द्वारा सब ही केवल के ध्यान के योग्य रहा सब तरह का ध्यान भगवान्‌ का ही तो केवल सब प्रकार सिद्ध होता हुआ सब तरह का रूप सब प्रकार से सब रूप ध्यान रूप हो जाने वाला सिद्ध रूप हो रहा है। यह सब प्रकार का रूप सब प्रकार भगवान्‌ का ध्यान ही एकमात्र सब प्रकार सब ही रूप से सब तरह सब जगह केवल रूप आत्म-साक्षात्कार रूप में प्राप्त होने वाला है ही, जिसके द्वारा ही तो भगवान्‌ का साक्षात्कार हो रहा भगवान्‌ नारायण, नित्य रूप! इस परमात्मा के स्वरूप रूप का ध्यान करने का सब रूप यह ही, केवल के ध्यान का सब तरह रूप बन गया, तो उस ध्यान का रूप केवल ही रहा, केवल ध्यान रूप केवल ध्यान रूप ही सब प्रकार ध्यान रूप में केवल ही रहा। तब केवल केवल ही रूप बन गया। इस प्रकार हे राजन्‌, केवल ध्यान मात्र ही रहा! भगवान्‌ सदा सब रूप सिद्ध रूप केवल ही तो केवल ध्यान मात्र केवल रूप ही सब... का रूप ही, भगवान्‌ का केवल ध्यान सब तरह ही तो केवल का ही केवल मात्र रूप केवल केवल केवल रूप सब केवल ही तो रहा 226

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समाज का रूप चाहे जैसा बने, मनुष्य अपने मूल रूपमें कभी नहीं बदल सकता कि वह पशुताका आधार ग्रहण करे, अथवा वह स्वयं ही पशु हो जाय। माता-पिता और पत्नी, भाई और बहन का सम्बंध क्या यह संसार मिटानेका प्रयत्न भी कर रहा होगा, यह मैं नहीं मानता। यह तो एक सामाजिक ढांचा भर है। इन पर भी जब समाजके रूपमें गहरा आघात पहुंचे तो लोग या स्वयं मर जाते हैं या फिर अपनी सुरक्षा करने के लिये दूसरों को मारते हैं। मनुष्य का यही तो वह मूल आधार स्वभाव है। यह मिटा नहीं कि वह स्वयं मिटा और जब तक वह मिट नहीं सकता, तो यह भी मिट नहीं सकता। कभी आपने सोचा कि दुर्बलता क्या है? कभी इसका विचार किया है? कभी इस विषय पर भी कुछ सोचा समझा? दुर्बलता तो निर्बलताके अतिरिक्त शारीरिक तौर कही नहीं जा सकती। जो तो शारीरिक या अन्य किसी भौतिक रूपमें बलवान् नहीं उसका तो बल समाप्त हो गया और दुर्बल एक असाध्य रोगके समान ही समाज में रहकर अपना जीवन बिताता ही नहीं वरन् जीवन भार बन जाता है न! इससे तो अच्छा? स्वयं ही समझो? यही सब सोच, समझकर, क्या यह उचित? कि किसी व्यक्ति को जो निर्बल और असहाय हो इस तरह छोड़ न दिया जाय जिससे वह, न जाने किसपर भी भार बन जाय। समाज मनुष्य के लिये जिस तरह बनता उसी तरह मनुष्य भी समाज का पोषण और रूप इस तरह बनाकर ही रख सकता, जिसे समाज ही कहा जाय? ऐसा ही करना उचित भी? समाज का स्वरूप तो प्रत्येक रूपमें एक ऐसा रूप बनता जिसमें न भय का स्थान, न भय देनेवाले, न भय पानेवाले रूपकी ही आवश्यकता होती जिसका कि आधार मात्र प्यार, सेवा और त्याग, सहानुभूति आदि गुणों के अतिरिक्त अन्य तो उसका रूप ही नहीं बनता और, जो रूप इस तरह न बनाया जा सके, वह तो फिर एक परस्परकी शत्रुताका ही रूप तो माना जाय, जो विरोधी के रूपमें खड़ा रहकर भी भयभीत होकर सब कुछ करता हो और ऐसा समाज तो एक न एक दिन नष्ट होना ही। आवश्यकता इस बात की तो तब जान पड़े जब समाज का विनाश हो, या समाप्त ही कर दिया जाय या फिर इस पर आश्रित रूप ही न रहने दिया जाय। न तब ऐसा अवसर भी बार बार आया करेगा! तब क्यों न इस बात पर विचार करके समाज का ही सहारा त्याग दिया जाय। तब समाज अपने आप ही बन-मिट न कर सदा अपने ही रूप बना ले और, उस समय भी तो सब कुछ वैसा ही बन जाय, जो कि सब लोग आपस में एक दूसरे को मारें! विनाश तो तब भी समाज व्यक्तियों का होगा ही, जिसे वर्तमान समाज कहा जा रहा उसी के द्वारा भी। इसके लिये उपाय ही क्या किया जाय? जिसे केवल एक भय ही मात्र कहा जाय, उसको तो दूर किया जाय? या फिर जिसके आधारपर समाज बंधा हुआ कहा जाता? उस सारे वातावरण-को ही ऐसा बनाया जाय जिससे भय तो दूर ही भाग जाय, तो फिर इसका फल तो सब को भोग ही पड़ेगा। निर्बलता तो तब तक बनी ही रहेगी जब तक मनुष्य का रूप इस प्रकार बदला नहीं बन जाता कि समाज उसे किसी प्रकार भी भयभीत न करे। यह सब कैसे हो? दुर्बलता क्या, या फिर इसका स्वरूप क्या? यह किसी का अपना कोई स्वरूप? या फिर जब कभी सब अपने भय को ही त्याग बैठते हैं, तो ही दूसरा उन पर अपना भय जमा लेता अथवा स्वयं दूसरा भयभीत हो कर आतंकित रूप धारण कर लेता कहलाने का यत्न भी न कर पाता। इसका अर्थ तो यह हुआ, भय का रूप जब व्यक्तियोंमें आया, तो इसका त्याग कोई एक ही तो नहीं करेगा और न किया जा रहा है। भय निवारणार्थ रूप न बनने, सब को निर्भय हो इस वातावरण को भी नष्ट करनेके लिये न तो कोई आगे आ रहा है न इस प्रकार निर्भय बना सकेगा? जो लोग समाजमें रहकर भी इस तरहके विचार व्यक्त करते हैं वे समाजके सम्बंधमें कुछ नहीं जानते कि समाज का आधार ही भय और प्रेम दोनों के ऊपर ही स्थिर रहता है। न तो भयके, न ही प्रेम मात्रके बलपर समाज की स्थिति रह सकती, बल्कि दोनों, के एक दूसरे के सम्बंधसे ही समाज का स्वरूप इस प्रकार बना रहना सदा सम्भव रहा। "जो केवल भयके आधारपर समाज बनता है, केवल ही प्रेम मात्रपर समाज बनता" इस बातको इतिहास के पृष्ठ मात्र ही सत्य सिद्ध कर रहे हैं। ऐसा न कर समाज का संतुलन बिगड़ 228

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□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□ □□, □□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□? □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□? □□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□, □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□, □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □ □□□ □□□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□, □□□ □ □□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□? □□□ □□□□ □□□□□□□, □□□□□□, □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□ □□□, □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□□ □□, □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□, □□ □□□ □□□□□□□, □□□□□□, □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□, □□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□ "□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□" □□ □□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□□□□□, □□□□□□, □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□? □□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ "□□ □□□, □□□□□, □□□□□, □□□□□, □□ □□□-□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□" □□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□, □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□, □□ □□□ □□ □□, □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□□, □□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□, □□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□□□□ □□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□□□□□ □□□□□, □□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□, □□□□ □□□ □□□□□□□□□-□□□□ □□□, □□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□, □□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□, □□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□□□□□ □□ □□□□, □□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□, □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□□□□□□□□ □□ □□□-□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□, □□ □□ □□□□ □□□, □□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□, □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□--□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□--□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □ □□□ □□□ □□□ □□□□ □ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□□□, □□□ □□□□ □□□□? □□ □□ □□ □□ □□□□ □ □□□□□□, □□□□ □□□ □ □□□ □□□□□ □□, □ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□, □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□□! □□□ □□□□□□ □□□? □□□□ □□□, □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□, □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□... □ 230

□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□, □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□, □□□□ □□ □□ □□□□ □□, □□□ □□ □□ □□□□ □□, □□□□□□ □□, □□□□□□ □□, □□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□, □□□□□□ □□ □□□□ □□□, □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□-- □□□□□□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□, □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□□□□□, □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□ □□, □□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□! □□□□ □□ □□□□□□ □□, □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□, □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□, □□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□, □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□--□□□□□ □□□□ □□□□□--□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□□ "□□□-□□□ □□□□ □□□ □□□" □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ "□□□-□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□, □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□, □□□□□, □□□□□, □□□□□ □□ □□□-□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□" □□□□ □□□□ □□□, "□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□" □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□, □□ □□□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□, □□ □□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□, □□□□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □ □□□□□, □□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □ □□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□, □□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□, □□□□□ □□□ □□□, □□□□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□, □□□ □□ □ □□□, □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□, □□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□□ □□□, □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□, □□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□.□□□□ □□□□ □□ □□□ □□, □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □ □□□, □□ □□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□, □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□, □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□-□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□, □□□□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ 231

विचारशीलता जहां नहीं, या घट गई या लुप्तप्राय हो, जीवन-व्यवहारों का संचालन या तो प्रवृत्त प्रकृति द्वारा बने ढर्रे-खांचे पर ही भार की तरह हो, अन्यथा व्यक्तिगत स्वार्थों का ऐसा घोर रूप प्रकट हो सकता कि समाज के अंग रूप माता-पिता केवल सुख की लालसा तृष्णा मात्र संतानोत्पत्ति के पश्चात् कर्त्तव्य धर्म का निर्वाह न कर उन्हें दूध--मुंह पर छोड़ दोनों अलग--अलग दिशा में गमन दे लें, अथवा जो माता गर्भस्थ पिंड, या नव जात शिशु संहारकारिणी हो सकती। जिसके पास विचारशील मन, या विवेकवान् हो सकने योग्य हृदय, दोनों का अभाव समझ पड़ता, जो विचारहीन ही सब कुछ अपने लिए उचित मान बैठते अथवा एक दम पशुता पर ही उतर भी आते हों, तो आश्चर्य कैसा होगा? विचारहीन तो कह बैठ भी सकते कि विचारशील का काम केवल शास्त्र चर्चा तक ही सीमित रहे, जहां तक उस ज्ञान द्वारा मिले सुख की रक्षा का कर्त्तव्य ही उपस्थित हो जाता वहां फिर? ज्ञान क्या तब तक केवल विचारहीनता की ओर हाथ बांधकर देखेगा? या तो वह सब कुछ ही विचारवान् विचारहीनता के प्रति समर्पण करके अपने कर्त्तव्य समाप्त कर देगा? विचारवान् की यह कर्त्तव्यनिष्ठा इस रूप में सदा उपेक्षित रहकर समाप्त होवेगी? या विचार मात्र का ही रूप केवल रहेगा! इसलिए कर्त्तव्य निर्वाह केवल ज्ञान या मात्र ज्ञान विचार तक ही नहीं, ज्ञान केवल सुख भोग का साधन या उपभोग ही बनकर न रह जावे वरन् विचार निष्ठावान् बनकर कर्त्तव्य का रूप भी धारण करे, जहां विचार ज्ञान दोनों हों। विचार कर्त्तव्य के रूप, जहां भी ज्ञान धर्म की रक्षा का प्रश्न आवेगा वहां, यह ज्ञान केवल बातों का रूप धारण करके ही रह जावेगा तो वह ज्ञान ही क्या हुआ कहलाता ज्ञान कभी समाप्त हो जाता या संशय का कारण भी बन सकता? तब फिर ज्ञान कैसा विचार का रूप, या केवल विचार बनकर, जहां पर ज्ञान कर्त्तव्य को ही न रख सके वहां विचार का ही क्या मूल्य रह जावे, जो ज्ञान सब कुछ देकर भी न तो अपने को और न ही दूसरों संकटों से बचा सके, वह ज्ञान संकट कारक हो कर विचारवान् को भ्रमित अवश्य ही कर सकता हो सके, उस ज्ञान रूपी ज्ञान को, न ज्ञान कहा जा सकता केवल विचार। यह भी संभव, कि ज्ञान सब कुछ देकर भी जब केवल विचारहीनता का ही रक्षक, या ज्ञान का रक्षक न होकर केवल विचारहीनता के अनुकूल ही काम करे, अथवा विचार शून्य, बनकर ही रह जावे, तब कैसा कर्त्तव्य पालन? तो विचारहीन सब कुछ, ज्ञान शून्य सब कुछ ही? तो कर्त्तव्य क्या है? इस बात को, जो ज्ञान केवल विचार मात्र? ज्ञान केवल विचार ही? विचार कैसा जो ज्ञान का ही नाश कर देवेगा? विचार सत्य ज्ञान को धारण करे, ज्ञान कर्त्तव्यवान् बने! ज्ञान ही ज्ञान! ज्ञान विचार का रूप नहीं! ज्ञान केवल नाम पर ही कर्त्तव्य का रूप न दे सके मात्र ज्ञान के स्थान पर तो विचार का ही रूप सब कुछ हो ही सकता। ज्ञान कर्त्तव्यवान् बनकर ही ज्ञान रूप द्वारा ही कर्त्तव्य बनता है, जो न केवल ज्ञान रूप ही बना रहे, वरन् जो ज्ञान कर्त्तव्य रूप को अपनावेगा, वह विचारवान् कहला कर कर्त्तव्य का रूप भी लेगा। विचार केवल मन की ही बात तक सीमित न रह जावे, जो ज्ञान के अनुकूल हो, उस विचार युक्त विचार मन का नाम ज्ञान कहा जा सकता कर्त्तव्य विचारवान् ज्ञान रूप कर्त्तव्य कहलाता या ज्ञान रूप, जिसे जो सब कुछ ही कर्त्तव्य रूप ही? तो कर्त्तव्य विचारवान् बनकर सब कुछ ज्ञान का ही रूप देकर सब कुछ अपने विचार को ही सब कर्त्तव्य विचारवान् का रूप देकर कर्त्तव्य का ही ज्ञान रूप सब कुछ ही करता जहां पर कर्त्तव्य का नाम ही कर्त्तव्य का रूप ही कर्त्तव्य विचारवान् ज्ञान का रूप ही ज्ञान, सब कुछ ही? ज्ञान का विचार तो ज्ञान ही बना! ज्ञान रूप तो ज्ञान बनकर ही रह गया फिर ज्ञान केवल विचार का रूप देकर क्या ही करेगा? कर्त्तव्य मात्र का तो रूप नहीं! ज्ञान का नाम ही ज्ञान रूप ज्ञान बन कर कर्त्तव्य के रूप में अवश्य आवेगा, तब ही वह विचार का रूप होगा। तो विचारवान् कर्त्तव्य रूप सब कुछ बनावेगा, जो ज्ञान सदा कर्त्तव्य ज्ञान रूप बनकर रह सके, तो कर्त्तव्य विचार कर्त्तव्य ज्ञान रूप कर्त्तव्य का केवल ज्ञान रूप, तो ज्ञान कर्त्तव्य का रूप देकर ज्ञान रूप ही कर्त्तव्य रूप ही सब कुछ बन सके ज्ञान रूप, "जो ज्ञान का रूप कर्त्तव्य ज्ञान ही सब कुछ।" इस तरह ज्ञान का कर्त्तव्य केवल ज्ञान रूप ही न होकर कर्त्तव्य द्वारा ज्ञान रूप हो तो कर्त्तव्य का ज्ञान ही कर्त्तव्य हो कर ज्ञान बनकर कर्त्तव्य ही हो जावेगा। 232

और पत्र संग्रह-की सब की सब वस्तु सुपुर्द कीजाए"

यद्यपि इस वर्ष एक नये सज्जन उपस्थित हुए परंतु कार्यकारिणी केवल एक बार मिली। "साधरण सभा का यह मत था वर्तमान मंडल को धन, सम्पत्ति, सामग्री, पुस्तकें और पत्र संग्रह-की सब की सब वस्तु सुपुर्द कीजाए" पर "सब का सब सुपुर्द हो", इस बात विचार ही नहीं हो सकता था, ना कोई कोष, ना पुस्तक थी, ना पत्रिका थी, केवल एक दो सौ पृष्ठ एक रजिस्टर केवल था जो सब १ विषय था, यह पत्रव्यवहार जिस का प्रत्येक पत्र अलग पत्र पर नहीं हो सकता था, पर कार्यकारिणी केवल एक ही विषय पर, केवल एक विषय पर बहस करने नियत थी। केवल कार्यकारिणी सदस्य ही, व प्रधान जी, कार्यकारिणी केवल बात का ध्यास था कि सब विषय संक्षेप रूप सब सम्मुख रखे जाएं सो, केवल किसी प्रकार नवीन रूपया इकट्ठा किया जाय इस बात पर विचार नहिं था, केवल कार्यकारिणी विचार केवल नवीन रूपया, केवल इसी बात पर सब का आकर्षण किया जाय सो, केवल कार्यकारिणी सदस्य, केवल इस बात पर ध्यान लगा रहा, केवल इसी विषय केवल ध्यान, इस प्रकार सभा, केवल एक बार इस प्रकार से कार्यकारिणी समाप्त हुई, पर क्या किसी अन्य प्रकार से? या विचार ही सब का इस प्रकार विचार करने का ही विचार करने का विचार सब किया जाय, केवल १ विषय पर केवल ही विचार हो सकता है? सब प्रकार से सब ही? सब प्रकार से केवल ही, सब ही? सब सम्प्रदाय ही ना, सब नवीन रूप? सब प्रकार से ही सम्प्रदाय रूप? सब प्रकार ही रूपया धन, नवीन रूप? सब प्रकार से ही सब नवीन रूपया धन? सब प्रकार ही सब नवीन रूपया धन? इस प्रकार से ना व सब? केवल कार्यकारिणी इस वर्ष के समाप्त करने तक सब एक मत सब विषय प्रकार सब सम्मुख रखा जाय सो, केवल सब एक मत सब विषय उपस्थित कर सब सम्मुख कार्यकारिणी पर रख दिए। केवल इतना किया गया कि यह निश्चय किया गया कि सब यह कार्यकारणी का सम्मुख सब पत्र-संग्रह का सब की सब वस्तु सुपुर्द कीजाय केवल कार्यकारिणी सब नवीन रूपया एकत्रित एकत्रित कर सब सब उपस्थिति का भेजा जाय। 233