भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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इस प्रकार विचार करके राजा सब का सब विषय भोग सर्वथा त्यागकर वनको गया, भगवान् का स्मरण करताहुआ वैराग्यवान् हुआ। तदनन्तर राजाके दोनों पुत्र भी राज्यसिंहासन पाकर प्रजाका पालनपूर्वक! हाथी, घोड़े, रथसमूह, पदाति इन चतुरंगिणी सेनाके प्रभावसे शत्रुसमूहको जीत छोटे भाई को, जिसका नाम शत्रुजित् था उसे महाराजके पदपर अभिषिक्त किया। राज्यके लोभी बहुत से लोग यह कहने लगे, शत्रुजित् बड़ा ही भाग्यवान् पुरुष है। उसका बड़ा भाई, जो ज्येष्ठ था और अपने पिताके समान सर्वथा ऐश्वर्यसम्पन्न था उसने राज्यभारको अपने ऊपर न रखकर छोटे भाईको देकर तपस्याके लिये गमन किया, जिसको सुधर्मानामक विख्यात ब्राह्मण कहता था कि हे महाभागवत्! विचार कर देखो संसार सब ही कैसा असार और अनित्य रूप है। संसारियों का यह स्वभाव देखा जाता है कि जबतक राज्य तथा ऐश्वर्यके सुख का भोग करता है तब तक सुख का लेशमात्र भी नहीं पाता है, फिर मरणोपरांत वह घोर नरक का भोग करता हुआ बारंबार संसारचक्र में गिरता ही रहता है। इसके बाद राजा का पुत्र जो कुछ भी धर्म का काम करता था यज्ञादिक वह सब निष्काम बुद्धिसे करताथा, जिससे वह संसार बन्धन का नाश करता हुआ पर- मपदको प्राप्त हो गया। हे, मुने इस प्रकारका यह इतिहास सुनकर जो मनुष्य निष्काम भावसे भगवद्भजन में रत रहता है वह संसारके सब बन्धनोंसे छूट जाता है। अब आप क्या सुनना चाहते हैं? अथवा किससे मुक्ति चाहते हैं? अथवा ज्ञानोपदेश? सब प्रकारके इन प्रश्नों का उत्तर विधिवत् सब प्रकारके शास्त्रों के ज्ञाता मुनि "अज्ञानके हेतु उस मोहको, शीघ्र ही नाशकरेंगे" इस प्रकार उस बातको सुनकर राजा नें मुनि से हाथ जोड़कर विनय भाव से यह प्रार्थना की कि महा- भागन आप-सर्वज्ञसम्पन्न सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता हो, मुझको ऐसा उपदेश देकर कृतार्थ कीजिये कि इस संसार रूप घोर नरकसे मेरा उद्धार हो जाय, जिससे मुझे परमगति मिले? राजाके वचन सुन, मुनि हर्ष पूर्वक गम्भीर वाणीसे कहने लगे कि हे राजन्! सब संसार में जो जो पदार्थ स्थित तथा दृष्टिगोचर हो रहे हैं सो सर्वथा मिथ्या तथा नष्ट होने वाले हैं, केवल एक ही भगवान् सदा ही सत्य हैं। हे भूपाल जो, कुटुम्बियों, सुहृदों तथा बन्धु आदि पदार्थों संबंधी ममता, सर्वथा अज्ञान के कारण उत्पन्न हुई है। इसलिये केवल एक भगवान् ही सर्वथा सत्य सार रूप, सबका कल्याण करने वाले हैं। सब जीवों को उन्हीं की शरणमें जाना, उन्हीं की शरणमें आनन्द मिलता--रहता सदा, उनका गुणानु--वाद ही करना और सुनना चाहिये। इसलिये सर्वसंदेह को दूर कर मन और बुद्धि सर्वदा परमात्मा की ही भक्ति मेंलगाये सदा आनन्द मगन रहना योग्य विचार करके ऐसा निश्चय कर लो। हे राजन्, आत्मा सदा सबके शरीरमें व्यापक रूपसे स्थित होकर साक्षीरूप, सर्वथा प्रकाश रूप और चेतन तथा निर्गुण स्वरूपसे वर्तमान है। केवल मायाके संग से अनेक प्रकारके अज्ञान सम्बन्धी भावों को अंगीकार करता है। वस्तुतः वह सर्वथा निर्विकार ही अजर व अमर भी कहा गया है। इसलिये केवल एक भगवान् की सेवा--भक्ति करना ही मनुष्यों का परमकर्त्तव्य रूप धर्म कहा गया है। जिसको धारण करके जीव भव--सागरके दुःखसे छूट कर सदा के लिये सब प्रकार परम सुख रूप मोक्षको पाता है, जो प्राणी इस उत्तम प्रकार के उपदेश को नित्य प्रति स्मरण करता है। वह तीनों ताप अर्थात्, दैहिक दैविक भौतिक तापों से मुक्त होकर सुख, जो सब प्रकारके दुःखों का नाशक रूप, परमपद प्राप्त कर लेता है। अब आप क्या सुनना चाहते हैं? जिस बात को सुनकर आपके मनकी शंका शान्त होजाय। ऐसा सुन जो कुछ राजाने फिर पूछासो सब कहा गया, जिसका वर्णनग्रन्थके अगले अध्यायोंमें आयेगा। यह एकादश स्कन्धका नवम अध्याय महा पुराण श्रीमद् भागवत् में समाप्त हुआ। इसके बाद दशम अध्याय में दत्तात्रेयजीके चौबीस गुरुओं का जो सब कथाका साररूप वर्णन दिया गया है। उसका पाठ करने और श्रवण करने से सब प्रकार का कल्याण हो कर मनुष्य सर्व, पापोंसे छूट जाता तथा जिस प्रकार राजाने यह कथा दत्तात्रेयजीके मुख से सुनी सुनकर उसका मनसब संशयों से रहित होगया, फिर उसने? सब प्रकारके सांसारिक- सुखों तथा अपने राज पाटको छोड़कर अरण्य का वास लिया, जिससे वह सब प्रकार मुक्त होगया इसलिये सब प्राणी मात्र अपने उद्धारके लिये सदा इस भगवान् की कथा का श्रवण तथा मनन सदैव निष्काम रूपसे किया साधु सन्त, यति, महात्मा और भिक्षुक सब इसके पठन और श्रवणसे मोक्षको प्राप्तहोकर सब प्रकार सुखी हो संसारके आवा गमनसे मुक्ति पाजाते हैं। जो मनुष्य केवल अपने ही स्वार्थ के लिये इस कथाका श्रवण करते हैं। उन पर प्रभु की कृपा नहीं होती। इसलिये चाहिये कि सब प्रकारके आडम्बरको त्याग केवल भगवत् नाम, रूप और लीला का सदा ध्यान लगाकर परमार्थमें चित्तलगाना योग्य है। इस कथाके प्रभावसे राजा यदु, दत्तात्रेयजी, नवम-- अध्यायमें संसारसागर से, भवबंधनविहीन और परमपद, कोप्राप्तहुए। इस प्रकार एकादश स्कन्ध का नवम अध्याय समाप्त हुआ 216