भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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जब जीवन का मर्म, अपना पावन संबंध उस पावन का अंश बन जाएगा! तब यह तन शिव होगा। इस संवेदनशीलता का पहला लक्षण यह होगा, हमारी दृष्टि दूसरों की दुर्बलता की ओर नहीं वरन् सद्-गुणों की ओर पहले जाएगी। हाँ, दूसरों की भूलों तथा दुर्बलताओं की उपेक्षा की दृष्टि होगी क्या? दृष्टि तो निर्मल होगी, पर वह दृष्टिकोण बदलेगा। हम भूल की सम्भावना सदैव अपने प्रति ही मान लें तथा अन्य व्यक्तियों प्रति जो भी निर्णय लेवें उस समय दुर्भाव सर्वथा मिटाकर लें। व्यक्ति-विशेष के दोष पर विचार न करके यह विचार करें कि परिस्थितियाँ उसे उस व्यक्ति-विशेष बनाने वाली थीं या नहीं। यदि हाँ, तब, उसकी भूलों सम्बन्धी निर्णयों हेतु उस समय तक रूकें, जबकि या जब तक हमें उस आस-पास के वातावरण का निश्चय पता लगाने तथा सुधार करने योग्य न बनें। पर ध्यान रहे कि, इस सब कार्य काल अथवा निर्णय काल के लिए हमारा हृदय उस के लिए सदैव, मित्र या शुभचिन्तक का दायित्व ही निभा सके। जब अपनी दुर्बलता की परीक्षा होगी और अपनी भूल पर कठोर प्रहार होगा तथा अपनी भूल के प्रति हम दयालु न रहकर उस भूल रूपी कीटाणु को जो सर्वनाश का कारण बनती अथवा बनकर ही रहती है। नष्ट ही करने का सतत संकल्प बना ही रहे तब अपने दुर्भाव का तो प्रश्न ही कहाँ उठता होगा! हाँ दुर्भाव तो वास्तव में ही तब ही उत्पन्न हुआ कहलाया जा सकता व माना जाएगा, न कि अपनी अपनी भूलों की ओर ध्यान न देकर दूसरों की भूलों अथवा कमजोरियों की ओर? यह भी स्मरण रहे, दुर्भाव का प्रवेश भी उस समय हुआ समझना चाहिए जब कि अपने दुर्भावों व भूलों को भुला कर, दूसरों प्रति दुर्भाव हेतु न्याय-कर्ता! बन बैठने का विचार अथवा पद न पावे तब, न कि इसके बाद। दुर्भाव उत्पन्न होने की एक स्थिति मनुष्य के मन तथा हृदय दुर्बलता का चिह्न मात्र कही जाएगी या उसका रूप कहा जावे तब उस दुर्-गुण रूपी रोग ग्रसित मानव अपनी ही शरण चाहेगा तब! उसकी रक्षा करें, उसकी रक्षा करें! यह योग्य या उचित? ऐसा विचार उस दुर्भावी मानव को तो नहीं आएगा। ऐसा विचार तो केवल विवेक व पर के प्रति अपनत्व रखने वाले हृदय को ही अपनी शरण देगा। फिर पर के प्रति निष्पक्ष, न्याय रूप निर्णय करने वाला मन ही विचार कर उस दुर्भावी मानव के उस अवगुण को अपने मन से दूर करने हेतु प्रयत्नशील हो सके तो क्या, पर तो पर भी अपना कहलाने का योग्य कहलाएगा ही अथवा नहीं। तब, निश्चय ही ऐसा निर्णय होगा, जिसे हर मानव न्याय ही कहेगा। विचार तो मन का गुण है, विचार तो संवेदनशीलता का ही एक रूप माना गया जिसे हर मानव जीवन में अपना कर्तव्य समझ कर पूरा करता हुआ दिखाई देता व यह विचार, न कि दुर्भावना, का आधार माना जाएगा? निर्णय मन का धर्म बन जाता है। संवेदनशीलता का रूप जब तक किसी कार्य का रूप नहीं लेता तब तक उस कार्य अथवा विचार को न्याय रूप नहीं दिया जा सकता। बिना कर्म न्याय रूपी विचार का रूप मन तथा हृदय दोनों ही केवल काल्पनिक ही बने रहते हैं। मन रूपी उस वृक्ष को, कर्मों का सिंचन मिलने पर विवेक रूपी फल लगता है। उस विवेक का उपयोग मानव अपने जीवन में ही, अपने दृष्टिकोण अथवा मन स्थिति को न देकर, दूसरों के विवेक अथवा निर्णय की उपेक्षा या अवहेलना करने लग जाए तो उस समय न्याय या विवेक का उपयोग, जो उचित रूप से हो रहा था दुर्भावना में ही परिवर्तित, हो जाएगा, या नहीं? ऐसा विचार कर, "मानव को यह बात, मन से निष्पक्ष हो-कर तय तो करनी ही होगी, सच की खोज करने, हेतु।" पर मानव यह निर्णय तो कैसे करे? यह तो स्पष्ट रूप से कहा जा सके, पर कैसे, ऐसा विचार करने पर, हर एक सोच ही यह प्रश्न था, सच का निर्णय या न्याय का स्वरूप क्या होना चाहिए? "सच वह है, जिसका न तोड़-फोड़ करने वाला ही उस परम शक्ति-विशेष का स्वरूप कहला सके।" विचार का अस्तित्व तो रहा, पर उस का नाम रूप क्या हो, पर ऐसा विचार आने पर भी, हर मानव असमंजस की स्थिति में ही रहा, फिर क्या होता? "शक्ति-विशेष का स्वरूप अथवा रूप।" अर्थात्? परमात्मा शक्ति-विशेष का प्रतीक ही तो होगा तथा उसी के स्वरूप का ऐसा रूप जो कि हर एक को दिखाई दे, इस हेतु उस समय ही न्याय का स्वरूप तय हो पा रहा था जब नर-नारायण का निर्णय हो नर-नारायण कहलाने का 217