भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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विचार कर रहे थे उसी समय एक, साधारण वस्त्र पहने हुए एक पुरुष आता हुआ दिखाई दिया। उसे, साधारण पुरुष समझकर किसी सिपाहीने उसका सत्कार नहीं किया तो सही पर वह तो साधारण पुरुष था, राजा का छोटा भाई विक्रमादित्य था जिसने अपना वेश बदल रखा था। विक्रमादित्य को तो काम-धन्धे से छुट्टी मिल गई थी देश-भ्रमण का ही मन बनाया जिससे साधारण जनता सुख रूप से रहती होगी, प्रजा सुखीपूर्वक दिन बिताती व शासन व्यवस्था अच्छी ही होगी ऐसा विचार कर, राजा न तो शासन पर ध्यान देता था जिससे सब लोग कष्ट पा रहे थे। विक्रमादित्य गली-कूचे सब छानता फिरता था, जिससे प्रजाके कष्टोंका ही पता, प्रजाके ही दुःख सुखकी खोज करना, अपनी विक्रमादित्य पदवी का दुरुपयोग नहीं करता था बल्कि उसका सदुपयोग विक्रमादित्य ने तो दीन-दुःखी सब प्रजा को देखा, व छोटे-से छोटे उद्योगी, धन्धे वाले-छोटा काम करने वालों का निरीक्षण भी तो किया फिर भी उस दीन-दुखी प्रजा के पास, जो भी सामग्री या सम्पदा, धन तो उस निर्धन प्रजा का लुट ही रहा था जिससे यह भी पेट भर पा रहे थे। उसने देखा कि पेट का भरण ही तो पेट का साधन होता ही तो पेट का उस सिपाही द्वारा उस साधारण पुरुष को, अपमानपूर्वक कहे गये शब्द तो--अपमानित, विक्रमादित्य तो विक्रमादित्य रहा ही था उस समय तो राजा का सिपाही राजा नहीं राज्य का सेवक ही तो था ना, विक्रमादित्य ने सोचा कि राजाज्ञापर चला रहा, या सो, सिपाहीका ही काम था। विक्रमादित्य तो विक्रमादित्य बनकर खड़ा हुआ नहीं था, उसने स्वयं ही साधारण वेश धारण कर रखा था जिससे कि वह निरख सके कि कौन सा भेद छुपा रखना चाहता--सिपाही, प्रजा, कोई साधुके वेश में सब कुछ लूट रहा था जो कि सिपाही राजा का, सिपाही की जेब भी, पेट भरने का काम था। उस समय सिपाही का मन जो था, क्रूरता, निर्दय, कपट से परिपूर्ण था जो विकट रूपी था, उस समय विक्रमादित्य, विक्रमादित्य का विक्रमादित्य ही विक्रमादित्य ही कहा गया क्या होगा! सिपाही निर्दयी तो होगा विक्रमादित्य का वेश रूपी बदला, रूपी वेश बदला विकट; रूपी विकट रूपी नहीं रूपी बदला विकट, जो विकट रूपी, विकट रूपी विकट; जो रूपी का विकट का रूप बड़ा रूप निकला, जो रूप निकला विकट रूपी तो निकला विकट का रूपी, विकट विकट का रूपी, तो उस रूपी का विकट भी तो हो रहा था विकट रूप, विक्रमादित्य तो विक्रमादित्य ही कहा गया तो विक्रमादित्य ही; पर विक्रमादित्य का, विक्रमादित्य रूपी ही; जो भी विक्रमादित्य था, विक्रमादित्य विक्रमादित्य पर जब वह उस रूप को विकट रूप में रख रहा था विक्रमादित्य का रूप तो विकट हो गया था उस समय रूप, तो उस रूप का तो रूप होता ही, पर जो रूप रूप विकट का रूप बनाकर रखना चाहता था विक्रमादित्य का रूप तो नहीं रहा, रूप बदला तो रूप ही बदल तो जाएगा ही जिससे प्रजाके सामने एक नया ही स्वरूप प्रकट हो रहा था पेट का भरण। जिससे विक्रमादित्य राजा स्वयं खड़ा रहा उस समय विक्रमादित्य बन, विक्रमादित्य बन, क्या किया? पर विक्रमादित्य की मर्यादा को पूरा रूप दिया जिससे सब प्रजा दुखी होते हुए पेट का भरण करती रहती जिसे देख राजा के इस रूप विकट रूपी से विकट रूप, निर्दय, जो भी रहा तो था, पर उस रूप में व साधारण प्रजाके रूप विकट का स्वरूप ही दिया सब प्रजा इसके लिए जब इस प्रजा विकट रूपी को भी स्वयं सहना पड़ा जिससे प्रजा के भी प्राण संकट में पड़ रहे जिससे विकट रूपी विकट प्रजा रूपी का विकट रूप रूप विकट का रूप का रूप बन गया, जिसे देखकर सब प्रजा काँपती; जिस रूप का भय, डर सब प्रजा के मन में समाया। जिस रूप विकट से प्रजा को, डर ही सता रहा था तो पेट का भरण भूख प्यास सब ही तो विक्रमादित्य मिटा रहा, पर फिर भी विक्रमादित्य तो मिटा रहा था, पर विक्रमादित्य विकट रूपी को मिटा रहा था तो वह रूप तो पेट का न रहा, विकट का विकट रूपी भूख को मिटा रहा विकट रूप में, जिसे प्रजापति कहा गया था। पर पेट का भरण तो निर्दय रूप में डर का रूप भूख प्यास बढ़ा? ऐसा ही भय तो खड़ा किया ही पेट की भूख से विकट-रूप में, विक्रमादित्य तो पेट की 220