भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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किन्तु परमात्मा का ज्ञान, केवल परोक्ष ही नहीं, अपितु केवल अपरोक्ष रूपमें होता रहता है। इस प्रकार यदि परमात्मा का अनुभव, जिसे हम प्रेम कहें, या ज्ञान कहें वह बना रहे; तो हमें सदा स्मरण और स्मरण परम्परा की इच्छा ही नहीं रह जाती अथवा यों कहें, सर्वदा-सर्वत्र सब रूप में वह ही भास रहा, उसी प्रकार जिस प्रकार घट, पटका भेद होते हुएभी प्रत्येक का भान पृथक्प्रतीति रूपमें घट है इत्यादि-रूप से होता हुआ, नामी का ज्ञान रहताहै कि इनमें सब एक मिट्टी अथवा सर्वत्र आ का श व्याप्त है इत्यादि, तो यह तो सब में घटता ही रहता है, इस प्रकार का ज्ञान अथवा घट पटका जो ज्ञाता आत्मा है उसका भी ज्ञान प्रत्येक का भान या स्मरण में सर्वदा ही बना हुआ है, तो आत्मा प्रत्यक्ष, परोक्ष या संस्कार--हीन सदा ही भास ही रहा दूसरा जो संस्कार-हीन ज्ञान है, उस ज्ञान का होना रूप रूप अन्तरमें या नेत्र बन्द करने पर ज्ञान हो न होगा, सम्भवतः यह हो भी जाय, किन्तु संस्कार-हीन का--अनुभव भी घट, पटके ज्ञान, उनके नाम, रूप और गुण, कार्य से, प्रत्यक्ष से, भेद से, पृथक् रूप से--भिन्न ही है, इस प्रकार विचार करने पर भी सदा स्मरण ही हो या सब जगह संस्कार-हीन का ही सम्बन्ध या आत्मा रूप घट पट दोनों सदा ज्ञान रूपसे एक ही, या तो ज्ञान सब जगह व्यापक ही है, या तो ज्ञान रूप आत्मा भिन्न, या विचार करें, तो यह ज्ञान सब जगह सद्भाव है या आत्मा रूप सब जगह घटा दी भास हो रहा या सब पदार्थ ही, सब जगह न घट, न संस्कार-हीन का भेद सर्वदा प्रत्यक्ष अनुभवयुक्त जो ध्यान या योग होता रहेगा उस में अन्तरमें नेत्र बन्द कर लेने पर या बाह्य वस्तु का वा नाम रूप ज्ञान सब कुछ का नाम रूपके नष्ट होने रूप नहिं, बरन् सब का जो अधिष्ठान ज्ञान रूप है उस में नाम रूप प्रकाश को त्याग कर, नाम रूपी या रूप नाम रूपी जो भी वस्तु घट या पटके ज्ञान समान जाना गया ज्ञान का नाम रूप लय वा नाम रूपके त्याग का अर्थ यह भी सब रूप सब में, उस रूप ज्ञान का प्रकाश या जो अधिष्ठान का प्रकाश वा प्रकाश रूप सो क्या नाम रूप लय में रहेगा? यदि ना रहा तब प्रकाश का भय ही न रहा यह बात कह, जो जो संस्कार-हीन रूप कहा गया, वह सब ज्ञान प्रकाश का लय रूप हो रहा है, सर्वव्यापक अधिष्ठान-प्रकाश का ध्यान सदा सर्व-देश में ही सब रूप से ही या सब का सब सर्व-देश में ही यह ध्यान रूप हो रहा तो सब लय रूप सब ज्ञान ध्यान रूपी हो रहा होगा, फिर तो ध्यान करने का भी अधिष्ठान रूप ही पर लय रूप परमात्मा का ध्यान स्वरूप होगा ही, फिर तो ध्यान ही, या केवल प्रकाश रूप प्रकाश अधिष्ठानका सब रूप प्रकाश स्वरूप ही तो प्रकाश को त्याग कर नाम ही मात्र प्रकाश रहा, इस से भी, नाम व रूप ज्ञान ही रहा अधिष्ठान लय, सो भी रूप लय रहा, रूप ही का, नाम व रूप ज्ञान ही रहा अधिष्ठान लय, प्रकाश लय, सब झूठा ज्ञान रूप से नाम या नाम मात्र, सब ही सत्य प्रकाश स्वरूप सब का ही, केवल ज्ञान ही रहा, तो प्रकाश का त्याग वा केवल नाम प्रकाश का त्याग अधिष्ठान रूप सब ही में अधिष्ठान स्वरूप ही रहा, जो सच्चिदानन्द का स्वरूप सब विचार किया अहं-ब्रह्म का रूप सब का स्वरूप का त्याग का ज्ञान ही स्वरूप, सर्व- व्यापक ही सब स्वरूप केवल ज्ञान ही केवल रूप व नाम, नाम ही परमात्मा रूप सदा ही नाम रूप में सब परमात्मा रूप ही प्रत्यक्ष, या सब रूप ही प्रत्यक्ष रूप प्रत्यक्ष, या विचार ही सब रूप प्रकाश, सब का ही सत्य सच्चिदानन्द स्वरूप प्रत्येक रूप सब का ही, सब का रूप सब का ही, या स्वरूप ही सब का ही नाम है, या सब रूप ही प्रत्यक्ष, या सब प्रकाश प्रकाश ही का स्वरूप ही या नाम परन्तु सर्वव्यापक संस्कार-हीन ज्ञान, जो सर्वत्ररूप ही या सर्वव्यापक ही का रूप रहा ही, सो सब ही, सत्य ज्ञान सब ओर रहा सर्वत्र का ही प्रकाश ध्यान रूप में प्रकाश का प्रकाश ही तो या ज्ञान रूप सत्य, नित्य, शुद्ध ज्ञान सर्वत्र ही बना ही रहा, केवल प्रकाश ही ज्ञान है, जो कि सो सत्य ज्ञान का नाम-रूप, नाम-रूप ज्ञान रूप से ही प्रकाश हो रहा ज्ञान स्वरूप ही सब ओर से परमात्मा स्वरूप रूप में ही सब ओर ही ज्ञान रूप सबका ही रूप रहा ही, सो सब ही, प्रकाश रूप सब ज्ञान ही का प्रकाश ही परमात्मा का ही सब रूप ही रहा सत्य परमात्मा स्वरूप प्रकाश रूप से ही सब का रूप सब सत्य ही रहा, नाम सब मिथ्या, परमात्मा ही का सब नाम प्रकाश स्वरूप ही सत्य है। 221