एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनहीं, पहले उनके विचार बदलते हैंगें? क्या उनके मस्तिष्क बदलेंगे? हमारी तरफ तो वह कभी भी नहीं देगा यह जो व्याख्या उसने अपने दिमाग और मनके रूप में की थी, उसका अर्थ मनोवैज्ञानिकां केवल यही लगाये कि हाँ, पहले एक निश्चित रूप से मनोभाव बदलेंगे फिर धीरे धीरे सब कुछ बदल जाता है। दृष्टिकोण बदला कि सब कुछ बदल जायेगा। आँखों का नज़रिया बदला बात सब समझ आयी लेकिन इससे दिमाग बदलता बात सब समझ आयी लेकिन मन रूप बदलता बात समझ आयी लेकिन हमारी बुद्धि का नक़्शा बदलता "तो पहले जब इस दिशा में प्रयास होगा तो हमारे विचार बदलेंगे कि हमसब मस्तिष्क एक, दो विभिन्न मस्तिष्क नहीं, तो दो विभिन्न विचारधारायें पैदा कहाँ होंगी। विचारहीनता पैदा होकर एकाग्र हो जायेगा, जिससे कि मस्तिष्क नियंत्रण में आकरके शान्त होगा" पर हाँ मन, मन का तो अपना स्वरूप विचार स्वरूप ही बन रहा था ना, पहले विचार को खत्म करने का प्रयास किया जायेगा तो ठीक रहा, विचार ही जब मन रूप बन गया, तो उस को शान्तरूप विचारहीन अवस्था में समाहित किया जाता रहेगा तो मन शान्त हो ही जायेगा फिर भी, जब मन का अपना ही, विचार स्वरूप रूप स्थिर भाव में लेकर चला जा सकता है जिससे न तो कोई व्याघात रूप बन कर खड़ा हो सके, बाधा बन के खड़ा, केवल एक विचार स्वरूप में चले विचार रूप को एकाग्रता आधारित बनाकर चला जा रहा था उस मन रूप को जब, उस में उस विचार रूप को रख कर ही, क्योंकि ज्ञान रूप एकाग्रतापूर्वक विचारों द्वारा उत्पन्न मन द्वारा ही पैदा हो सकता था। उस ज्ञान युक्त विचारशीलता विचार रूप को चला कर ही तो ऐसा ध्यान लगन या स्वरूप बनता ही था। शान्तता रूपी जो मन बनता, जो विचार रूप धारण कर के उठता, ज्ञान आधारित या ज्ञानयुक्त विचारित रूपी मन जब बन जाता था शान्त रूप में आकरके, तो ध्यान की शान्त अवस्था आधारित ध्यान रूप को ही मन माना जा रहा था। ध्यान को अलग रूप में मन रूप को मन के रूप में लेकर चले, शान्तता के ही साथ चले, उसकी विचारहीनता के रूप में उस ध्यान स्वरूप को मन का स्वरूप ले या ज्ञानयुक्त का रूप लेकर चलेंगे? ज्ञानयुक्त विचारित ज्ञान युक्त मन आधारित विचार रूपी ध्यान रूपी स्वरूप मन के ही रूप में बन ही गया विचारता या ज्ञानयुक्त विचारों द्वारा ही तो मन था, फिर मन विचार स्वरूप? हाँ विचार स्वरूप माना, तो जो विचार, ज्ञान रूप रहा, ध्यान का रूप बन कर मन का स्वरूप बन के सामने न आया हो, शान्तता के रूप में तो उस मन रूप को फिर विचार रूप कह कर ही सम्बोधित रूप दिया जा सकता था? क्या विचार शान्तावस्था का रूप कह कर मन को विचार का रूप माना गया ताकि ज्ञान का रूप एकाग्र रूप धारण कर विचार रूप में स्थिर रहे, मन का स्वरूप स्थिर कहलाये। ध्यान का स्वरूप बन, ध्यान रूपी शान्तता, ध्यान अवस्था एकाग्रता का रूप सब को मन रूप कहा ताकि इसके रूप को जब हम ले कर मन रूप कहें, तो मन रूप ही शान्त मन रूप ध्यान रूप कहलाये, ना कि मन रूप ध्यान रूप से अलग चले। मन तो रूप विचार रूपी स्थिर स्वरूप, ध्यान स्वरूप का रूप बन जाता था तो मन शान्तावस्था का रूप बन कर के समाहित या विलीनता रूप धारण किये रहता था तो मन कहाँ रहा? वो ध्यान ही बन गया, इसलिए तो मन रूप ध्यान-- शान्तावस्थायुक्त विचार स्वरूप ही ध्यान के रूप में बन कर रहा था! ध्यान को ही मनके या एकाग्रता रूप मन को रूप दिया गया माना जायेगा जिसे विचार रूप तो नहीं कहा जा सकता या शान्तरूप मन को विचार रूप माना जा सके? या विचार का प्रभाव ही उस शान्तरूप या ध्यान स्वरूप मन रूप को स्थिर कर, उस रूप में रूप बनता विचार का प्रभाव रहता था? विचार तो ज्ञान का, एकाग्रता आधारित, शान्तता का ज्ञान आधारित रहा होगा, तो उस ज्ञान से उस ज्ञानयुक्त शान्तावस्था मनके ही तो विचार बनते रहे, जिसने कि ही विचारित किया हुआ मन ज्ञान रूप कहलवा सकता था, ज्ञान रूप न होकर उस मन को विचार का ही स्वरूप था, ज्ञान रूप तो स्थिर ज्ञान का रूप हुआ करता था ज्ञान के द्वारा ही, जो ज्ञानयुक्त विचार स्वरूप था मन रूप था, तो विचार रूप ज्ञान एकाग्रता के द्वारा ही--ज्ञान रूप आधारित ज्ञान स्वरूप का ही विचार था तो ज्ञान का विचार एकाग्र मन रूप ज्ञान रूप को स्थिर कर के, ज्ञान रूप से उस ज्ञान रूप विचार को ही तो ज्ञान रूप या विचार के स्वरूप को बदला 222